🌿 सर्ग 76: श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़ाकर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपःप्राप्तपुण्य लोकों का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्र पर्वत को लौट जाना
Shri Rama strings the Vaishnava bow and destroys the pious worlds earned by Parashurama's penance with the infallible arrow, and Parashurama returns to Mount Mahendra
कुल श्लोक: 24
श्रुत्वा तु जामदग्न्यस्य वाक्यं दाशरथिस्तदा।
गौरवाद्यन्त्रितकथः पितू राममथाब्रवीत्॥
॥ 1.76.1 ॥
हिंदी अनुवाद:
दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्र जी अपने पिता के गौरव का ध्यान रखकर संकोचवश वहाँ कुछ बोल नहीं रहे थे, परंतु जमदग्निकुमार परशुरामजी की उपर्युक्त बात सुनकर उस समय वे मौन न रह सके। उन्होंने परशुरामजी से कहा
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| तु |
परंतु (अव्यय) |
| जामदग्न्यस्य |
जमदग्निकुमार परशुरामजी की (षष्ठी विभक्ति) |
| वाक्यम् |
उपर्युक्त बात (द्वितीया विभक्ति) |
| दाशरथिः |
दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्र जी (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| गौरवात् |
अपने पिता के गौरव का ध्यान रखकर (पञ्चमी विभक्ति) |
| यन्त्रितकथः |
संकोचवश कुछ बोलने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| पितुः |
पिता के (षष्ठी विभक्ति) |
| रामम् |
परशुरामजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| अथ |
तब (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
कृतवानसि यत् कर्म श्रुतवानस्मि भार्गव।
अनुरुध्यामहे ब्रह्मन् पितुरानृण्यमास्थितः॥
॥ 1.76.2 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘भृगुनन्दन! ब्रह्मन्! आपने पिता के ऋण से ऊऋण होने की—पिता के मारने वाले का वध करके वैर का बदला चुकाने की भावना लेकर जो क्षत्रिय-संहाररूपी कर्म किया है, उसे मैंने सुना है और हमलोग आपके उस कर्म का अनुमोदन भी करते हैं (क्योंकि वीर पुरुष वैर का प्रतिशोध लेते ही हैं) ॥२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कृतवान् |
किया है (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| असि |
है (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| यत् |
जो (द्वितीया विभक्ति) |
| कर्म |
क्षत्रिय-संहाररूपी कर्म (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुतवान् |
सुना है (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| अस्मि |
है (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| भार्गव |
हे भृगुनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
| अनुरुध्यामहे |
हमलोग आपके उस कर्म का अनुमोदन भी करते हैं (अनु + रुध् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| पितुः |
पिता के (षष्ठी विभक्ति) |
| आनृण्यम् |
ऋण से ऊऋण होने की—पिता के मारने वाले का वध करके वैर का बदला चुकाने की (द्वितीया विभक्ति) |
| आस्थितः |
भावना लेकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव।
अवजानासि मे तेजः पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥
॥ 1.76.3 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘भार्गव! मैं क्षत्रियधर्म से युक्त हूँ (इसीलिये आप ब्राह्मण-देवता के समक्ष विनीत रहकर कुछ बोल नहीं रहा हूँ) तो भी आप मुझे पराक्रमहीन और असमर्थसा मानकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। अच्छा, अब मेरा तेज और पराक्रम देखिये’॥३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वीर्यहीनम् |
मुझे पराक्रमहीन (द्वितीया विभक्ति) |
| इव |
के समान (अव्यय) |
| अशक्तम् |
और असमर्थ-सा मानकर (द्वितीया विभक्ति) |
| क्षत्रधर्मेण |
मैं क्षत्रियधर्म से युक्त हूँ (तृतीया विभक्ति) |
| भार्गव |
हे भार्गव (सम्बोधन विभक्ति) |
| अवजानासि |
आप तिरस्कार कर रहे हैं (अव + ज्ञा धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| तेजः |
तेज और (द्वितीया विभक्ति) |
| पश्य |
देखिये (दृश् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| अद्य |
अब (अव्यय) |
| पराक्रमम् |
पराक्रम (द्वितीया विभक्ति) |
इत्युक्त्वा राघवः क्रुद्धो भार्गवस्य वरायुधम्।
शरं च प्रतिजग्राह हस्ताल्लघुपराक्रमः॥
॥ 1.76.4 ॥
हिंदी अनुवाद:
ऐसा कहकर शीघ्र पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने कुपित हो परशुरामजीके हाथसे वह उत्तम धनुष और बाण ले लिया (साथ ही उनसे अपनी वैष्णवी शक्तिको भी वापस ले लिया) ॥ ४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| राघवः |
श्रीरामचन्द्रजी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| क्रुद्धः |
कुपित हो (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| भार्गवस्य |
परशुरामजी के (षष्ठी विभक्ति) |
| वरायुधम् |
वह उत्तम धनुष (द्वितीया विभक्ति) |
| शरम् |
और बाण (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| प्रतिजग्राह |
ले लिया (प्रति + ग्रह् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हस्तात् |
हाथ से (पञ्चमी विभक्ति) |
| लघुपराक्रमः |
शीघ्र पराक्रम करनेवाले (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
आरोप्य स धनू रामः शरं सज्यं चकार ह।
जामदग्न्यं ततो रामं रामः क्रुद्धोऽब्रवीदिदम्॥
॥ 1.76.5 ॥
हिंदी अनुवाद:
उस धनुषको चढ़ाकर श्रीरामने उसकी प्रत्यञ्चापर बाण रखा, फिर कुपित होकर उन्होंने जमदग्निकुमारपरशुरामजी से इस प्रकार कहा- ॥५॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| आरोप्य |
चढ़ाकर (ल्यबन्त अव्यय, आ + रुह् धातु, प्रयोज्यार्थ) |
| सः |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| धनुः |
धनुष को (द्वितीया विभक्ति) |
| रामः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| शरम् |
बाण (द्वितीया विभक्ति) |
| सज्यम् |
प्रत्यञ्चा पर रखा (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| चकार |
कर दिया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (अव्यय) |
| जामदग्न्यम् |
जमदग्निकुमार परशुरामजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| ततः |
फिर (अव्यय) |
| रामम् |
परशुरामजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| रामः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| क्रुद्धः |
कुपित होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
ब्राह्मणोऽसीति पूज्यो मे विश्वामित्रकृतेन च।
तस्माच्छक्तो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम्॥
॥ 1.76.6 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘(भृगुनन्दन) राम! आप ब्राह्मण होने के नाते मेरे पूज्य हैं तथा विश्वामित्रजी के साथ भी आपका सम्बन्ध है—इन सब कारणों से मैं इस प्राण-संहारक बाण को आपके शरीर पर नहीं छोड़ सकता॥६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्राह्मणः |
आप ब्राह्मण होने के नाते (प्रथमा विभक्ति) |
| असि |
हैं (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| इति |
इस कारण (अव्यय) |
| पूज्यः |
मेरे पूज्य हैं (प्रथमा विभक्ति, तव्य प्रत्ययान्त) |
| मे |
मेरे (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| विश्वामित्रकृतेन |
विश्वामित्रजी के साथ भी आपका सम्बन्ध है (तृतीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| तस्मात् |
इन सब कारणों से (अव्यय) |
| शक्तः |
मैं समर्थ नहीं हूँ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| राम |
हे (भृगुनन्दन) राम (सम्बोधन विभक्ति) |
| मोक्तुम् |
छोड़ना (तुमुन्नन्त अव्यय, मुच् धातु) |
| प्राणहरम् |
इस प्राण-संहारक (द्वितीया विभक्ति) |
| शरम् |
बाण को (द्वितीया विभक्ति) |
इमां वा त्वद्गतिं राम तपोबलसमर्जितान्।
लोकानप्रतिमान् वापि हनिष्यामीति मे मतिः॥
॥ 1.76.7 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘राम! मेरा विचार है कि आपको जो सर्वत्र शीघ्रतापूर्वक आने-जाने की शक्ति प्राप्त हुई है उसे अथवा आपने अपने तपोबल से जिन अनुपम पुण्यलोकों को प्राप्त किया है उन्हीं को नष्ट कर डालूँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इमाम् |
आपको जो यह (द्वितीया विभक्ति) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| त्वद्गतिम् |
सर्वत्र शीघ्रतापूर्वक आने-जाने की शक्ति प्राप्त हुई है (द्वितीया विभक्ति, षष्ठी तत्पुरुष समास) |
| राम |
हे राम (सम्बोधन विभक्ति) |
| तपोबलसमर्जितान् |
अपने तपोबल से जिन्हें प्राप्त किया है (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| लोकान् |
अनुपम पुण्यलोकों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अप्रतिमान् |
अनुपम को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| हनिष्यामि |
नष्ट कर डालूँ (हन् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| इति |
यह (अव्यय) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| मतिः |
विचार है (प्रथमा विभक्ति) |
न ह्ययं वैष्णवो दिव्यः शरः परपुरंजयः।
मोघः पतति वीर्येण बलदर्पविनाशनः॥
॥ 1.76.8 ॥
हिंदी अनुवाद:
क्योंकि अपने पराक्रम से विपक्षी के बलके घमंड को चूर कर देनेवाला यह दिव्य वैष्णव बाण, जो शत्रुओं की नगरी पर विजय दिलाने वाला है, कभी निष्फल नहीं जाता है’ ।। ७-८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
कभी नहीं (अव्यय) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| अयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| वैष्णवः |
वैष्णव (प्रथमा विभक्ति) |
| दिव्यः |
दिव्य (प्रथमा विभक्ति) |
| शरः |
बाण (प्रथमा विभक्ति) |
| परपुरञ्जयः |
शत्रुओं की नगरी पर विजय दिलाने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| मोघः |
निष्फल (प्रथमा विभक्ति) |
| पतति |
जाता है (पत् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वीर्येण |
अपने पराक्रम से (तृतीया विभक्ति) |
| बलदर्पविनाशनः |
विपक्षी के बल के घमंड को चूर कर देनेवाला (प्रथमा विभक्ति) |
वरायुधधरं रामं द्रष्टुं सर्षिगणाः सुराः।
पितामहं पुरस्कृत्य समेतास्तत्र सर्वशः॥
॥ 1.76.9 ॥
हिंदी अनुवाद:
उस समय उस उत्तम धनुष और बाण को धारण करके खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी को देखने के लिये सम्पूर्ण देवता और ऋषि ब्रह्माजी को आगे करके वहाँ एकत्र हो गये॥९॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वरायुधधरम् |
उस उत्तम धनुष और बाण को धारण करने वाले (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| रामम् |
श्रीरामचन्द्रजी को (द्वितीया विभक्ति) |
| द्रष्टुम् |
देखने के लिये (तुमुन्नन्त अव्यय, दृश् धातु) |
| सर्षिगणाः |
ऋषियों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| सुराः |
सम्पूर्ण देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पितामहम् |
ब्रह्माजी को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरस्कृत्य |
आगे करके (ल्यबन्त अव्यय, पुरस् + कृ धातु) |
| समेताः |
एकत्र हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| सर्वशः |
सब प्रकार से (अव्यय) |
गन्धर्वाप्सरसश्चैव सिद्धचारणकिन्नराः।
यक्षराक्षसनागाश्च तद् द्रष्टुं महदद्भुतम्॥
॥ 1.76.10 ॥
हिंदी अनुवाद:
गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, किन्नर, यक्ष, राक्षस और नाग भी उस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखने के लिये वहाँ आ पहुँचे॥ १० ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गन्धर्वाप्सरसः |
गन्धर्व और अप्सराएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
भी (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| सिद्धचारणकिन्नराः |
सिद्ध, चारण और किन्नर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यक्षराक्षसनागाः |
यक्ष, राक्षस और नाग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
भी (अव्यय) |
| तत् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| द्रष्टुम् |
देखने के लिये (तुमुन्नन्त अव्यय, दृश् धातु) |
| महत् |
अत्यन्त (द्वितीया विभक्ति) |
| अद्भुतम् |
अद्भुत दृश्य को (द्वितीया विभक्ति) |
जडीकृते तदा लोके रामे वरधनुर्धरे।
निर्वीर्यो जामदग्न्योऽसौ रामो राममुदैक्षत॥
॥ 1.76.11 ॥
हिंदी अनुवाद:
जब श्रीरामचन्द्रजी ने वह श्रेष्ठ धनुष हाथ में ले लिया, उस समय सब लोग आश्चर्य से जडवत् हो गये। (परशुरामजी का वैष्णव तेज निकलकर श्रीरामचन्द्रजी में मिल गया इसलिये) वीर्यहीन हुए जमदग्निकुमार राम ने दशरथनन्दन श्रीराम की ओर देखा॥११॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| जडीकृते |
जडवत् हो गये (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, च्वि प्रत्यय, सति सप्तमी) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| लोके |
सब लोग (सप्तमी विभक्ति) |
| रामे |
जब श्रीरामचन्द्रजी ने (सप्तमी विभक्ति) |
| वरधनुर्धरे |
वह श्रेष्ठ धनुष हाथ में ले लिया (सप्तमी विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| निर्वीर्यः |
वीर्यहीन हुआ (प्रथमा विभक्ति, नञ् तत्पुरुष समास) |
| जामदग्न्यः |
जमदग्निकुमार (प्रथमा विभक्ति) |
| असौ |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| रामः |
राम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| रामम् |
दशरथनन्दन श्रीराम की ओर (द्वितीया विभक्ति) |
| उदैक्षत |
देखा (उत् + ईक्ष् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
तेजोभिर्गतवीर्यत्वाज्जामदग्न्यो जडीकृतः।
रामं कमलपत्राक्षं मन्दं मन्दमुवाच ह॥
॥ 1.76.12 ॥
हिंदी अनुवाद:
तेज निकल जाने से वीर्यहीन हो जाने के कारण जडवत् बने हुए जमदग्निकुमार परशुराम ने कमलनयन श्रीराम से धीरे-धीरे कहा- ॥ १२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेजोभिः |
तेज निकल जाने से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| गतवीर्यत्वात् |
वीर्यहीन हो जाने के कारण (पञ्चमी विभक्ति) |
| जामदग्न्यः |
जमदग्निकुमार परशुराम (प्रथमा विभक्ति) |
| जडीकृतः |
जडवत् बना हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, च्वि प्रत्यय) |
| रामम् |
श्रीराम से (द्वितीया विभक्ति) |
| कमलपत्राक्षम् |
कमलनयन से (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| मन्दम् |
धीरे (अव्यय, क्रियाविशेषण) |
| मन्दम् |
धीरे (वीप्सार्थक द्विरुक्ति) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (अव्यय) |
काश्यपाय मया दत्ता यदा पूर्वं वसुंधरा।
विषये मे न वस्तव्यमिति मां काश्यपोऽब्रवीत्॥
॥ 1.76.13 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘रघुनन्दन! पूर्वकाल में मैंने कश्यपजी को जब यह पृथिवी दान की थी, तब उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘तुम्हें मेरे राज्य में नहीं रहना चाहिये’॥ १३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| काश्यपाय |
कश्यपजी को (चतुर्थी विभक्ति) |
| मया |
मैंने (तृतीया विभक्ति, अस्मद्) |
| दत्ता |
दान की थी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| यदा |
जब (अव्यय) |
| पूर्वम् |
पूर्वकाल में (अव्यय) |
| वसुन्धरा |
यह पृथिवी (प्रथमा विभक्ति) |
| विषये |
मेरे राज्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| मे |
मेरे (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| वस्तव्यम् |
रहना चाहिये (प्रथमा विभक्ति, तव्य प्रत्ययान्त) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| माम् |
मुझसे (द्वितीया विभक्ति, अस्मद्) |
| काश्यपः |
कश्यपजी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा था (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
सोऽहं गुरुवचः कुर्वन् पृथिव्यां न वसे निशाम्।
तदाप्रभृति काकुत्स्थ कृता मे काश्यपस्य ह॥
॥ 1.76.14 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘ककुत्स्थकुलनन्दन! तभी से अपने गुरु कश्यपजी की इस आज्ञा का पालन करता हुआ मैं कभी रात में पृथिवी पर नहीं निवास करता हूँ; क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि मैंने कश्यप के सामने रात को पृथिवी पर न रहने की प्रतिज्ञा कर रखी है। १४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| गुरुवचः |
अपने गुरु कश्यपजी की इस आज्ञा का (द्वितीया विभक्ति) |
| कुर्वन् |
पालन करता हुआ (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| पृथिव्याम् |
पृथिवी पर (सप्तमी विभक्ति) |
| न |
कभी नहीं (अव्यय) |
| वसे |
निवास करता हूँ (वस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| निशाम् |
रात में (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया) |
| तदाप्रभृति |
तभी से (अव्यय) |
| काकुत्स्थ |
हे ककुत्स्थकुलनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
| कृता |
कर रखी है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मे |
मैंने (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| काश्यपस्य |
कश्यप के (षष्ठी विभक्ति) |
| ह |
ही (अव्यय) |
तामिमां मद्गतिं वीर हन्तुं नार्हसि राघव।
मनोजवं गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥
॥ 1.76.15 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘इसलिये वीर राघव! आप मेरी इस गमनशक्ति को नष्ट न करें मैं मनके समान वेग से अभी महेन्द्र नाम क श्रेष्ठ पर्वत पर चला जाऊँगा॥ १५ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| इमाम् |
मेरी इस (द्वितीया विभक्ति) |
| मद्गतिम् |
गमनशक्ति को (द्वितीया विभक्ति, षष्ठी तत्पुरुष समास) |
| वीर |
हे वीर (सम्बोधन विभक्ति) |
| हन्तुम् |
नष्ट करना (तुमुन्नन्त अव्यय, हन् धातु) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| राघव |
हे राघव (सम्बोधन विभक्ति) |
| मनोजवम् |
मन के समान वेग से (अव्यय, क्रियाविशेषण) |
| गमिष्यामि |
चला जाऊँगा (गम् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| महेन्द्रम् |
महेन्द्र नामक (द्वितीया विभक्ति) |
| पर्वतोत्तमम् |
श्रेष्ठ पर्वत पर (द्वितीया विभक्ति) |
लोकास्त्वप्रतिमा राम निर्जितास्तपसा मया।
जहि ताञ्छरमुख्येन मा भूत् कालस्य पर्ययः॥
॥ 1.76.16 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘परंतु श्रीराम! मैंने अपनी तपस्या से जिन अनुपम लोकों पर विजय पायी है, उन्हीं को आप इस श्रेष्ठ बाण से नष्ट कर दें; अब इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये॥१६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| लोकाः |
जिन अनुपम लोकों पर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
परंतु (अव्यय) |
| अप्रतिमाः |
अनुपम पर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| निर्जिताः |
विजय पायी है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तपसा |
अपनी तपस्या से (तृतीया विभक्ति) |
| मया |
मैंने (तृतीया विभक्ति, अस्मद्) |
| जहि |
नष्ट कर दें (हन् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| तान् |
उन्हीं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| शरमुख्येन |
इस श्रेष्ठ बाण से (तृतीया विभक्ति) |
| मा |
नहीं (निषेधार्थक अव्यय) |
| भूत् |
होना चाहिये (भू धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, 'मा' योग में) |
| कालस्य |
इसमें (षष्ठी विभक्ति) |
| पर्ययः |
विलम्ब (प्रथमा विभक्ति) |
अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम्।
धनुषोऽस्य परामर्शात् स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥
॥ 1.76.17 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘शत्रुओं को संताप देने वाले वीर! आपने जो इस धनुष को चढ़ा दिया, इससे मुझे निश्चितरूप से ज्ञात हो गया कि आप मधु दैत्य को मारने वाले अविनाशी देवेश्वर विष्णु हैं। आपका कल्याण हो॥१७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अक्षय्यम् |
अविनाशी (द्वितीया विभक्ति) |
| मधुहन्तारम् |
मधु दैत्य को मारने वाले (द्वितीया विभक्ति, तृच् प्रत्ययान्त) |
| जानामि |
मुझे निश्चितरूप से ज्ञात हो गया (ज्ञा धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| त्वाम् |
आपको (द्वितीया विभक्ति, युष्मद्) |
| सुरेश्वरम् |
देवेश्वर विष्णु हैं (द्वितीया विभक्ति) |
| धनुषः |
आपने जो इस धनुष को (षष्ठी विभक्ति) |
| अस्य |
इस (षष्ठी विभक्ति) |
| परामर्शात् |
चढ़ा दिया (पञ्चमी विभक्ति) |
| स्वस्ति |
कल्याण (अव्यय) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| अस्तु |
हो (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| परन्तप |
हे शत्रुओं को संताप देने वाले वीर (सम्बोधन विभक्ति) |
एते सुरगणाः सर्वे निरीक्षन्ते समागताः।
त्वामप्रतिमकर्माणमप्रतिद्वन्द्वमाहवे॥
॥ 1.76.18 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘ये सब देवता एकत्र होकर आपकी ओर देख रहे हैं। आपके कर्म अनुपम हैं; युद्धमें आपका सामना करने वाला दूसरा कोई नहीं है॥ १८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एते |
ये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सुरगणाः |
सब देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| निरीक्षन्ते |
देख रहे हैं (नि + ईक्ष् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| समागताः |
एकत्र होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| त्वाम् |
आपकी ओर (द्वितीया विभक्ति, युष्मद्) |
| अप्रतिमकर्माणम् |
जिसके कर्म अनुपम हैं (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| अप्रतिद्वन्द्वम् |
जिसका सामना करने वाला दूसरा कोई नहीं है (द्वितीया विभक्ति, नञ् तत्पुरुष समास) |
| आहवे |
युद्ध में (सप्तमी विभक्ति) |
न चेयं मम काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति।
त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृतः॥
॥ 1.76.19 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘ककुत्स्थकुलभूषण! आपके सामने जो मेरी असमर्थता प्रकट हुई—यह मेरे लिये लज्जाजनक नहीं हो सकती; क्योंकि आप त्रिलोकीनाथ श्रीहरि ने मुझे पराजित किया है॥ १९॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| इयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| मम |
मेरे लिये (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| काकुत्स्थ |
हे ककुत्स्थकुलभूषण (सम्बोधन विभक्ति) |
| व्रीडा |
लज्जाजनक (प्रथमा विभक्ति) |
| भवितुम् |
होना (तुमुन्नन्त अव्यय, भू धातु) |
| अर्हति |
योग्य है (अर्ह् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| त्वया |
आपके द्वारा (तृतीया विभक्ति, युष्मद्) |
| त्रैलोक्यनाथेन |
त्रिलोकीनाथ श्रीहरि ने (तृतीया विभक्ति) |
| यत् |
जो (प्रथमा विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| विमुखीकृतः |
पराजित किया गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, च्वि प्रत्यय) |
शरमप्रतिमं राम मोक्तुमर्हसि सुव्रत।
शरमोक्षे गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥
॥ 1.76.20 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले श्रीराम ! अब आप अपना अनुपम बाण छोड़िये; इसके छूटने के बाद ही मैं श्रेष्ठ महेन्द्र पर्वत पर जाऊँगा’॥ २०॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| शरम् |
अपना अनुपम बाण (द्वितीया विभक्ति) |
| अप्रतिमम् |
अनुपम (द्वितीया विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| मोक्तुम् |
छोड़ना (तुमुन्नन्त अव्यय, मुच् धातु) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सुव्रत |
हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले (सम्बोधन विभक्ति) |
| शरमोक्षे |
इसके छूटने के बाद ही (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| गमिष्यामि |
जाऊँगा (गम् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| महेन्द्रम् |
श्रेष्ठ महेन्द्र (द्वितीया विभक्ति) |
| पर्वतोत्तमम् |
पर्वत पर (द्वितीया विभक्ति) |
तथा ब्रुवति रामे तु जामदग्न्ये प्रतापवान्।
रामो दाशरथिः श्रीमांश्चिक्षेप शरमुत्तमम्॥
॥ 1.76.21 ॥
हिंदी अनुवाद:
जमदग्निनन्दन परशुरामजी के ऐसा कहने पर प्रतापी दशरथनन्दन श्रीमान् रामचन्द्रजी ने वह उत्तम बाण छोड़ दिया॥ २१॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
ऐसा (अव्यय) |
| ब्रुवति |
कहने पर (सप्तमी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| रामे |
परशुरामजी के (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| जामदग्न्ये |
जमदग्निनन्दन के (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रतापवान् |
प्रतापी (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| रामः |
रामचन्द्रजी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| दाशरथिः |
दशरथनन्दन ने (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रीमान् |
श्रीमान् ने (प्रथमा विभक्ति) |
| चिक्षेप |
छोड़ दिया (क्षिप् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| शरम् |
वह उत्तम बाण (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
स हतान् दृश्य रामेण स्वाँल्लोकांस्तपसार्जितान्।
जामदग्न्यो जगामाशु महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥
॥ 1.76.22 ॥
हिंदी अनुवाद:
अपनी तपस्या द्वारा उपार्जित किये हुए पुण्यलोकों को श्रीरामचन्द्रजी के चलाये हुए उस बाण से नष्ट हुआ देखकर परशुरामजी शीघ्र ही उत्तम महेन्द्र पर्वत पर चले गये॥ २२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| हतान् |
नष्ट हुए (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| दृश्य |
देखकर (ल्यबन्त अव्यय, दृश् धातु) |
| रामेण |
श्रीरामचन्द्रजी के चलाये हुए उस बाण से (तृतीया विभक्ति) |
| स्वान् |
अपनी (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| लोकान् |
पुण्यलोकों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तपसा |
तपस्या द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| अर्जितान् |
उपार्जित किये हुए (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| जामदग्न्यः |
परशुरामजी (प्रथमा विभक्ति) |
| जगाम |
चले गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| आशु |
शीघ्र ही (अव्यय) |
| महेन्द्रम् |
उत्तम महेन्द्र (द्वितीया विभक्ति) |
| पर्वतोत्तमम् |
पर्वत पर (द्वितीया विभक्ति) |
ततो वितिमिराः सर्वा दिशश्चोपदिशस्तथा।
सुराः सर्षिगणा रामं प्रशशंसुरुदायुधम्॥
॥ 1.76.23 ॥
हिंदी अनुवाद:
उनके जाते ही समस्त दिशाओं तथा उपदिशाओं का अन्धकार दूर हो गया। उस समय ऋषियों सहित देवता उत्तम आयुधधारी श्रीराम की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
उनके जाते ही (अव्यय) |
| वितिमिराः |
अन्धकार दूर हो गया (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| सर्वाः |
समस्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| दिशः |
दिशाओं का (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| उपदिशः |
उपदिशाओं का (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| सुराः |
देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्षिगणाः |
ऋषियों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| रामम् |
श्रीराम की (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रशशंसुः |
भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे (प्र + शंस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| उदायुधम् |
उत्तम आयुध धारण करने वाले की (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्यः प्रपूजितः।
ततः प्रदक्षिणीकृत्य जगामात्मगतिं प्रभुः॥
॥ 1.76.24 ॥
हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्निकुमार परशुराम का पूजन किया। उनसे पूजित हो प्रभावशाली परशुराम दशरथकुमार श्रीराम की परिक्रमा करके अपने स्थान को चले गये॥२४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| रामम् |
श्रीराम ने (द्वितीया विभक्ति) |
| दाशरथिम् |
दशरथनन्दन ने (द्वितीया विभक्ति) |
| रामः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| जामदग्न्यः |
जमदग्निकुमार परशुराम का (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रपूजितः |
पूजन किया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| प्रदक्षिणीकृत्य |
परिक्रमा करके (ल्यबन्त अव्यय, प्रदक्षिण + कृ धातु, च्वि प्रत्यय) |
| जगाम |
चले गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| आत्मगतिम् |
अपने स्थान को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रभुः |
प्रभावशाली परशुराम (प्रथमा विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः॥७६॥
हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७६॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आर्षे |
ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| षट्सप्ततितमः |
छिहत्तरवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥७६॥ |
संख्या ७६ (सर्ग संख्या) |
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