वाल्मीकि रामायण

बालकाण्ड सर्ग 76 | श्रीमद्वाल्मीकि रामायण

🌿 सर्ग 76: श्रीराम का वैष्णव-धनुष को चढ़ाकर अमोघ बाण के द्वारा परशुराम के तपःप्राप्तपुण्य लोकों का नाश करना तथा परशुराम का महेन्द्र पर्वत को लौट जाना
Shri Rama strings the Vaishnava bow and destroys the pious worlds earned by Parashurama's penance with the infallible arrow, and Parashurama returns to Mount Mahendra
कुल श्लोक: 24
श्लोक 1
श्रुत्वा तु जामदग्न्यस्य वाक्यं दाशरथिस्तदा।
गौरवाद्यन्त्रितकथः पितू राममथाब्रवीत्॥
॥ 1.76.1 ॥
श्लोक 2
कृतवानसि यत् कर्म श्रुतवानस्मि भार्गव।
अनुरुध्यामहे ब्रह्मन् पितुरानृण्यमास्थितः॥
॥ 1.76.2 ॥
श्लोक 3
वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव।
अवजानासि मे तेजः पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥
॥ 1.76.3 ॥
श्लोक 4
इत्युक्त्वा राघवः क्रुद्धो भार्गवस्य वरायुधम्।
शरं च प्रतिजग्राह हस्ताल्लघुपराक्रमः॥
॥ 1.76.4 ॥
श्लोक 5
आरोप्य स धनू रामः शरं सज्यं चकार ह।
जामदग्न्यं ततो रामं रामः क्रुद्धोऽब्रवीदिदम्॥
॥ 1.76.5 ॥
श्लोक 6
ब्राह्मणोऽसीति पूज्यो मे विश्वामित्रकृतेन च।
तस्माच्छक्तो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम्॥
॥ 1.76.6 ॥
श्लोक 7
इमां वा त्वद्गतिं राम तपोबलसमर्जितान्।
लोकानप्रतिमान् वापि हनिष्यामीति मे मतिः॥
॥ 1.76.7 ॥
श्लोक 8
न ह्ययं वैष्णवो दिव्यः शरः परपुरंजयः।
मोघः पतति वीर्येण बलदर्पविनाशनः॥
॥ 1.76.8 ॥
श्लोक 9
वरायुधधरं रामं द्रष्टुं सर्षिगणाः सुराः।
पितामहं पुरस्कृत्य समेतास्तत्र सर्वशः॥
॥ 1.76.9 ॥
श्लोक 10
गन्धर्वाप्सरसश्चैव सिद्धचारणकिन्नराः।
यक्षराक्षसनागाश्च तद् द्रष्टुं महदद्भुतम्॥
॥ 1.76.10 ॥
श्लोक 11
जडीकृते तदा लोके रामे वरधनुर्धरे।
निर्वीर्यो जामदग्न्योऽसौ रामो राममुदैक्षत॥
॥ 1.76.11 ॥
श्लोक 12
तेजोभिर्गतवीर्यत्वाज्जामदग्न्यो जडीकृतः।
रामं कमलपत्राक्षं मन्दं मन्दमुवाच ह॥
॥ 1.76.12 ॥
श्लोक 13
काश्यपाय मया दत्ता यदा पूर्वं वसुंधरा।
विषये मे न वस्तव्यमिति मां काश्यपोऽब्रवीत्॥
॥ 1.76.13 ॥
श्लोक 14
सोऽहं गुरुवचः कुर्वन् पृथिव्यां न वसे निशाम्।
तदाप्रभृति काकुत्स्थ कृता मे काश्यपस्य ह॥
॥ 1.76.14 ॥
श्लोक 15
तामिमां मद्गतिं वीर हन्तुं नार्हसि राघव।
मनोजवं गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥
॥ 1.76.15 ॥
श्लोक 16
लोकास्त्वप्रतिमा राम निर्जितास्तपसा मया।
जहि ताञ्छरमुख्येन मा भूत् कालस्य पर्ययः॥
॥ 1.76.16 ॥
श्लोक 17
अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम्।
धनुषोऽस्य परामर्शात् स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥
॥ 1.76.17 ॥
श्लोक 18
एते सुरगणाः सर्वे निरीक्षन्ते समागताः।
त्वामप्रतिमकर्माणमप्रतिद्वन्द्वमाहवे॥
॥ 1.76.18 ॥
श्लोक 19
न चेयं मम काकुत्स्थ व्रीडा भवितुमर्हति।
त्वया त्रैलोक्यनाथेन यदहं विमुखीकृतः॥
॥ 1.76.19 ॥
श्लोक 20
शरमप्रतिमं राम मोक्तुमर्हसि सुव्रत।
शरमोक्षे गमिष्यामि महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥
॥ 1.76.20 ॥
श्लोक 21
तथा ब्रुवति रामे तु जामदग्न्ये प्रतापवान्।
रामो दाशरथिः श्रीमांश्चिक्षेप शरमुत्तमम्॥
॥ 1.76.21 ॥
श्लोक 22
स हतान् दृश्य रामेण स्वाँल्लोकांस्तपसार्जितान्।
जामदग्न्यो जगामाशु महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्॥
॥ 1.76.22 ॥
श्लोक 23
ततो वितिमिराः सर्वा दिशश्चोपदिशस्तथा।
सुराः सर्षिगणा रामं प्रशशंसुरुदायुधम्॥
॥ 1.76.23 ॥
श्लोक 24
रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्यः प्रपूजितः।
ततः प्रदक्षिणीकृत्य जगामात्मगतिं प्रभुः॥
॥ 1.76.24 ॥
सर्ग समाप्ति
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्सप्ततितमः सर्गः॥७६॥
हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥७६॥
🔍 शब्दार्थ
संस्कृत शब्द हिंदी अर्थ
इति इस प्रकार (अव्यय)
आर्षे ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति)
श्रीमद्रामायणे श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति)
वाल्मीकीये वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति)
आदिकाव्ये आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति)
बालकाण्डे बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति)
षट्सप्ततितमः छिहत्तरवाँ (प्रथमा विभक्ति)
सर्गः सर्ग (प्रथमा विभक्ति)
॥७६॥ संख्या ७६ (सर्ग संख्या)

ॐ श्रीरामाय नमः

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