🌿 सर्ग 75: राजा दशरथ की बात अनसुनी करके परशुराम का श्रीराम को वैष्णव-धनुष पर बाण चढ़ाने के लिये ललकारना
Ignoring King Dasharatha's plea, Parashurama challenges Shri Rama to string an arrow on the Vaishnava bow
कुल श्लोक: 28
राम दाशरथे वीर वीर्यं ते श्रूयतेऽद्भुतम्।
धनुषो भेदनं चैव निखिलेन मया श्रुतम्॥
॥ 1.75.1 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘दशरथनन्दन श्रीराम! वीर! सुना जाता है कि तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है। तुम्हारे द्वारा शिव-धनुष के तोड़े जाने का सारा समाचार भी मेरे कानों में पड़ चुका है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| राम |
हे दशरथनन्दन श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| दाशरथे |
हे दशरथनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
| वीर |
हे वीर (सम्बोधन विभक्ति) |
| वीर्यम् |
तुम्हारा पराक्रम (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| श्रूयते |
सुना जाता है (श्रु धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अद्भुतम् |
अद्भुत है (प्रथमा विभक्ति) |
| धनुषः |
शिव-धनुष के (षष्ठी विभक्ति) |
| भेदनम् |
तोड़े जाने का (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
भी (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| निखिलेन |
सारा समाचार (तृतीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| मया |
मेरे द्वारा (तृतीया विभक्ति, अस्मद्) |
| श्रुतम् |
सुना जा चुका है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तदद्भुतमचिन्त्यं च भेदनं धनुषस्तथा।
तच्छ्रुत्वाहमनुप्राप्तो धनुर्गृह्यापरं शुभम्॥
॥ 1.75.2 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘उस धनुष का तोड़ना अद्भुत और अचिन्त्य है; उसके टूटने की बात सुनकर मैं एक दूसरा उत्तम धनुष लेकर आया हूँ॥२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
उस (प्रथमा विभक्ति) |
| अद्भुतम् |
अद्भुत (प्रथमा विभक्ति) |
| अचिन्त्यम् |
और अचिन्त्य है (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| भेदनम् |
तोड़ना (प्रथमा विभक्ति) |
| धनुषः |
उस धनुष का (षष्ठी विभक्ति) |
| तथा |
उसी प्रकार (अव्यय) |
| तत् |
उसके टूटने की बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| अनुप्राप्तः |
आया हूँ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| धनुः |
एक दूसरा धनुष (द्वितीया विभक्ति) |
| गृह्य |
लेकर (ल्यबन्त अव्यय, ग्रह् धातु) |
| अपरम् |
दूसरा (द्वितीया विभक्ति) |
| शुभम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
तदिदं घोरसंकाशं जामदग्न्यं महद्धनुः।
पूरयस्व शरेणैव स्वबलं दर्शयस्व च॥
॥ 1.75.3 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘यह है वह जमदग्निकुमार परशुराम का भयंकर और विशाल धनुष, तुम इसे खींचकर इसके ऊपर बाण चढ़ाओ और अपना बल दिखाओ॥३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| इदम् |
यह है (प्रथमा विभक्ति) |
| घोरसङ्काशम् |
भयंकर (प्रथमा विभक्ति) |
| जामदग्न्यम् |
जमदग्निकुमार परशुराम का (प्रथमा विभक्ति) |
| महत् |
और विशाल (प्रथमा विभक्ति) |
| धनुः |
धनुष (प्रथमा विभक्ति) |
| पूरयस्व |
इसे खींचकर इसके ऊपर बाण चढ़ाओ (पूर् धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| शरेण |
बाण से (तृतीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| स्वबलम् |
अपना बल (द्वितीया विभक्ति) |
| दर्शयस्व |
दिखाओ (दृश् धातु, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
तदहं ते बलं दृष्ट्वा धनुषोऽप्यस्य पूरणे।
द्वन्द्वयुद्धं प्रदास्यामि वीर्यश्लाघ्यमहं तव॥
॥ 1.75.4 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘इस धनुष के चढ़ाने में भी तुम्हारा बल कैसा है ? यह देखकर मैं तुम्हें ऐसा द्वन्द्वयुद्ध प्रदान करूँगा, जो तुम्हारे पराक्रम के लिये स्पृहणीय होगा’ ॥ ४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
इस (प्रथमा विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| बलम् |
बल (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
यह देखकर (क्त्वान्त अव्यय, दृश् धातु) |
| धनुषः |
इस धनुष के (षष्ठी विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| अस्य |
इस (षष्ठी विभक्ति) |
| पूरणे |
चढ़ाने में (सप्तमी विभक्ति) |
| द्वन्द्वयुद्धम् |
ऐसा द्वन्द्वयुद्ध (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रदास्यामि |
प्रदान करूँगा (प्र + दा धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| वीर्यश्लाघ्यम् |
जो तुम्हारे पराक्रम के लिये स्पृहणीय होगा (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
तुम्हारे (षष्ठी विभक्ति) |
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजा दशरथस्तदा।
विषण्णवदनो दीनः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्॥
॥ 1.75.5 ॥
हिंदी अनुवाद:
परशुरामजी का वह वचन सुनकर उस समय राजा दशरथ के मुखपर विषाद छा गया, वे दीनभाव से हाथ जोड़कर बोले- ॥५॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्य |
उस परशुरामजी का (षष्ठी विभक्ति) |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ के (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| विषण्णवदनः |
मुख पर विषाद छा गया (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| दीनः |
वे दीनभाव से (प्रथमा विभक्ति) |
| प्राञ्जलिः |
हाथ जोड़कर (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
क्षत्ररोषात् प्रशान्तस्त्वं ब्राह्मणश्च महातपाः।
बालानां मम पुत्राणामभयं दातुमर्हसि॥ भार्गवाणां कुले जातः स्वाध्यायव्रतशालिनाम्।
॥ 1.75.6 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन् ! आप स्वाध्याय और व्रत से शोभा पाने वाले भृगुवंशी ब्राह्मणों के कुल में उत्पन्न हुए हैं और स्वयं भी महान् तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी हैं; क्षत्रियों पर अपना रोष प्रकट करके अब शान्त हो चुके हैं; इसलिये मेरे बालक पुत्रों को आप अभयदान देने की कृपा करें।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| क्षत्ररोषात् |
क्षत्रियों पर अपना रोष प्रकट करके (पञ्चमी विभक्ति) |
| प्रशान्तः |
अब शान्त हो चुके हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्राह्मणः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| महातपाः |
स्वयं भी महान् तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| बालानाम् |
मेरे बालक (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| पुत्राणाम् |
पुत्रों को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अभयम् |
अभयदान (द्वितीया विभक्ति) |
| दातुम् |
देना (तुमुन्नन्त अव्यय, दा धातु) |
| अर्हसि |
कृपा करें (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भार्गवाणाम् |
भृगुवंशी ब्राह्मणों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| कुले |
कुल में (सप्तमी विभक्ति) |
| जातः |
उत्पन्न हुए हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्वाध्यायव्रतशालिनाम् |
स्वाध्याय और व्रत से शोभा पाने वाले (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
सहस्राक्षे प्रतिज्ञाय शस्त्रं प्रक्षिप्तवानसि॥
॥ 1.75.7 ॥
हिंदी अनुवाद:
क्योंकि आपने इन्द्र के समीप प्रतिज्ञा करके शस्त्र का परित्याग कर दिया है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सहस्राक्षे |
इन्द्र के (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रतिज्ञाय |
प्रतिज्ञा करके (ल्यबन्त अव्यय, प्रति + ज्ञा धातु) |
| शस्त्रम् |
शस्त्र का (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रक्षिप्तवान् |
परित्याग कर दिया है (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| असि |
है (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
स त्वं धर्मपरो भूत्वा कश्यपाय वसुंधराम्।
दत्त्वा वनमुपागम्य महेन्द्रकृतकेतनः॥
॥ 1.75.8 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘इस तरह आप धर्म में तत्पर हो कश्यपजी को पृथ्वी का दान करके वन में आकर महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहते हैं॥८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
इस तरह (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मपरः |
धर्म में तत्पर हुए (प्रथमा विभक्ति) |
| भूत्वा |
होकर (क्त्वान्त अव्यय, भू धातु) |
| कश्यपाय |
कश्यपजी को (चतुर्थी विभक्ति) |
| वसुन्धराम् |
पृथ्वी का (द्वितीया विभक्ति) |
| दत्त्वा |
दान करके (क्त्वान्त अव्यय, दा धातु) |
| वनम् |
वन में (द्वितीया विभक्ति) |
| उपागम्य |
आकर (ल्यबन्त अव्यय, उप + आ + गम् धातु) |
| महेन्द्रकृतकेतनः |
महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
मम सर्वविनाशाय सम्प्राप्तस्त्वं महामुने।
न चैकस्मिन् हते रामे सर्वे जीवामहे वयम्॥
॥ 1.75.9 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘महामुने! (इस प्रकार शस्त्रत्यागकी प्रतिज्ञा करके भी) आप मेरा सर्वनाश करने के लिये कैसे आ गये? (यदि कहें—मेरा रोष तो केवल रामपर है तो) एकमात्र राम के मारे जाने पर ही हम सब लोग अपने जीवन का परित्याग कर देंगे’ ॥९॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मम |
मेरा (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| सर्वविनाशाय |
सर्वनाश करने के लिये (चतुर्थी विभक्ति) |
| सम्प्राप्तः |
कैसे आ गये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| महामुने |
हे महामुने (सम्बोधन विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
तो (अव्यय) |
| एकस्मिन् |
एकमात्र (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| हते |
मारे जाने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रामे |
राम के (सप्तमी विभक्ति) |
| सर्वे |
हम सब लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| जीवामहे |
अपने जीवन का परित्याग कर देंगे (जीव् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| वयम् |
हम (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
ब्रुवत्येवं दशरथे जामदग्न्यः प्रतापवान्।
अनादृत्य तु तद्वाक्यं राममेवाभ्यभाषत॥
॥ 1.75.10 ॥
हिंदी अनुवाद:
राजा दशरथ इस प्रकार कहते ही रह गये; परंतु प्रतापी परशुराम ने उनके उन वचनों की अवहेलना करके राम से ही बातचीत जारी रखी॥ १० ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्रुवति |
इस प्रकार कहते ही रह गये (सप्तमी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| दशरथे |
राजा दशरथ के (सप्तमी विभक्ति) |
| जामदग्न्यः |
परशुराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रतापवान् |
प्रतापी ने (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| अनादृत्य |
अवहेलना करके (ल्यबन्त अव्यय, नञ् + आ + दृ धातु) |
| तु |
परंतु (अव्यय) |
| तत् |
उनके उन (द्वितीया विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचनों की (द्वितीया विभक्ति) |
| रामम् |
राम से ही (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| अभ्यभाषत |
बातचीत जारी रखी (अभि + भाष् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
इमे द्वे धनुषी श्रेष्ठे दिव्ये लोकाभिपूजिते।
दृढे बलवती मुख्ये सुकृते विश्वकर्मणा ॥
॥ 1.75.11 ॥
हिंदी अनुवाद:
वे बोले—'रघुनन्दन! ये दो धनुष सबसे श्रेष्ठ और दिव्य थे। सारा संसार इन्हें सम्मान की दृष्टिसे देखता था। साक्षात् विश्वकर्मा ने इन्हें बनाया था, ये बड़े प्रबल और दृढ़ थे॥ ११॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इमे |
ये (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| द्वे |
दो (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| धनुषी |
धनुष (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| श्रेष्ठे |
सबसे श्रेष्ठ (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| दिव्ये |
और दिव्य थे (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| लोकाभिपूजिते |
सारा संसार इन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता था (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| दृढे |
दृढ़ थे (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| बलवती |
बड़े प्रबल (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| मुख्ये |
प्रधान (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| सुकृते |
सुन्दर बनाये गये (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| विश्वकर्मणा |
साक्षात् विश्वकर्मा ने इन्हें बनाया था (तृतीया विभक्ति) |
अनुसृष्टं सुरैरेकं त्र्यम्बकाय युयुत्सवे।
त्रिपुरघ्नं नरश्रेष्ठ भग्नं काकुत्स्थ यत्त्वया॥
॥ 1.75.12 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘नरश्रेष्ठ! इनमें से एक को देवताओं ने त्रिपुरासुर से युद्ध करने के लिये भगवान् शङ्कर को दे दिया था। ककुत्स्थनन्दन ! जिससे त्रिपुर का नाश हुआ था, वह वही धनुष था; जिसे तुमने तोड़ डाला है॥ १२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अनुसृष्टम् |
दे दिया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुरैः |
देवताओं ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| एकम् |
इनमें से एक को (द्वितीया विभक्ति) |
| त्र्यम्बकाय |
भगवान् शङ्कर को (चतुर्थी विभक्ति) |
| युयुत्सवे |
त्रिपुरासुर से युद्ध करने के लिये (चतुर्थी विभक्ति, सन्नन्त) |
| त्रिपुरघ्नम् |
जिससे त्रिपुर का नाश हुआ था (द्वितीया विभक्ति) |
| नरश्रेष्ठ |
हे नरश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| भग्नम् |
जिसे तुमने तोड़ डाला है (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| काकुत्स्थ |
हे ककुत्स्थनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
| यत् |
जो (द्वितीया विभक्ति) |
| त्वया |
तुम्हारे द्वारा (तृतीया विभक्ति, युष्मद्) |
इदं द्वितीयं दुर्धर्षं विष्णोर्दत्तं सुरोत्तमैः ।
तदिदं वैष्णवं राम धनुः परपुरंजयम्॥
॥ 1.75.13 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘और दूसरा दुर्धर्ष धनुष यह है, जो मेरे हाथमें है। इसे श्रेष्ठ देवताओं ने भगवान् विष्णु को दिया था। श्रीराम! शत्रुनगरी पर विजय पाने वाला वही यह वैष्णव धनुष है॥१३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इदम् |
और यह है (प्रथमा विभक्ति) |
| द्वितीयम् |
दूसरा (प्रथमा विभक्ति) |
| दुर्धर्षम् |
दुर्धर्ष धनुष (प्रथमा विभक्ति) |
| विष्णोः |
भगवान् विष्णु को (चतुर्थी विभक्ति) |
| दत्तम् |
दिया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुरोत्तमैः |
श्रेष्ठ देवताओं ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तत् |
वही (प्रथमा विभक्ति) |
| इदम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| वैष्णवम् |
वैष्णव धनुष है (प्रथमा विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| धनुः |
धनुष (प्रथमा विभक्ति) |
| परपुरञ्जयम् |
शत्रुनगरी पर विजय पाने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
समानसारं काकुत्स्थ रौद्रेण धनुषा त्विदम्।
तदा तु देवताः सर्वाः पृच्छन्ति स्म पितामहम्॥ शितिकण्ठस्य विष्णोश्च बलाबलनिरीक्षया।
॥ 1.75.14 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘ककुत्स्थनन्दन! यह भी शिवजी के धनुष के समान ही प्रबल है। उन दिनों समस्त देवताओं ने भगवान् शिव और विष्णु के बलाबल की परीक्षा के लिये पितामह ब्रह्माजी से पूछा था कि ‘इन दोनों देवताओं में कौन अधिक बलशाली है’ ॥ १४ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| समानसारम् |
शिवजी के धनुष के समान ही प्रबल है (प्रथमा विभक्ति) |
| काकुत्स्थ |
हे ककुत्स्थनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
| रौद्रेण |
शिवजी के (तृतीया विभक्ति) |
| धनुषा |
धनुष के (तृतीया विभक्ति) |
| तु |
भी (अव्यय) |
| इदम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उन दिनों (अव्यय) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| देवताः |
समस्त देवताओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वाः |
सबने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पृच्छन्ति |
पूछा था (प्रच्छ् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन, भूतकालिक अर्थ में) |
| स्म |
भूतकालिक अर्थ में (अव्यय) |
| पितामहम् |
पितामह ब्रह्माजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| शितिकण्ठस्य |
भगवान् शिव के (षष्ठी विभक्ति) |
| विष्णोः |
और विष्णु के (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| बलाबलनिरीक्षया |
बलाबल की परीक्षा के लिये (तृतीया विभक्ति) |
अभिप्रायं तु विज्ञाय देवतानां पितामहः॥ विरोधं जनयामास तयोः सत्यवतां वरः।
।
॥ 1.75.15 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘देवताओं के इस अभिप्राय को जानकर सत्यवादियों में श्रेष्ठ पितामह ब्रह्माजी ने उन दोनों देवताओं (शिव और विष्णु) में विरोध उत्पन्न कर दिया॥ १५ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अभिप्रायम् |
इस अभिप्राय को (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| विज्ञाय |
जानकर (ल्यबन्त अव्यय, वि + ज्ञा धातु) |
| देवतानाम् |
देवताओं के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| पितामहः |
पितामह ब्रह्माजी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विरोधम् |
विरोध (द्वितीया विभक्ति) |
| जनयामास |
उत्पन्न कर दिया (जन् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तयोः |
उन दोनों देवताओं (शिव और विष्णु) में (षष्ठी विभक्ति, द्विवचन) |
| सत्यवताम् |
सत्यवादियों में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वरः |
श्रेष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
विरोधे तु महद् युद्धमभवद् रोमहर्षणम्॥ शितिकण्ठस्य विष्णोश्च परस्परजयैषिणोः।
॥ 1.75.16 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘विरोध पैदा होने पर एक-दूसरे को जीतने की इच्छावाले शिव और विष्णु में बड़ा भारी युद्ध हुआ,जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था॥ १६ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विरोधे |
विरोध पैदा होने पर (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| महत् |
बड़ा भारी (प्रथमा विभक्ति) |
| युद्धम् |
युद्ध (प्रथमा विभक्ति) |
| अभवत् |
हुआ (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रोमहर्षणम् |
जो रोंगटे खड़े कर देने वाला था (प्रथमा विभक्ति) |
| शितिकण्ठस्य |
शिव के (षष्ठी विभक्ति) |
| विष्णोः |
और विष्णु में (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| परस्परजयैषिणोः |
एक-दूसरे को जीतने की इच्छा वाले (षष्ठी विभक्ति, द्विवचन, बहुव्रीहि समास) |
तदा तु जृम्भितं शैवं धनुर्भीमपराक्रमम्॥ हुङ्कारेण महादेवः स्तम्भितोऽथ त्रिलोचनः।
॥ 1.75.17 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘उस समय भगवान् विष्णुने हुङ्कार मात्र से शिवजीके भयंकर बलशाली धनुष को शिथिल तथा त्रिनेत्रधारी महादेवजी को भी स्तम्भित कर दिया। १७ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| जृम्भितम् |
शिथिल कर दिया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| शैवम् |
शिवजी के (द्वितीया विभक्ति) |
| धनुः |
धनुष को (द्वितीया विभक्ति) |
| भीमपराक्रमम् |
भयंकर बलशाली को (द्वितीया विभक्ति) |
| हुङ्कारेण |
हुङ्कार मात्र से (तृतीया विभक्ति) |
| महादेवः |
महादेवजी को (प्रथमा विभक्ति) |
| स्तम्भितः |
भी स्तम्भित कर दिया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अथ |
तथा (अव्यय) |
| त्रिलोचनः |
त्रिनेत्रधारी को (प्रथमा विभक्ति) |
देवैस्तदा समागम्य सर्षिसङ्घैः सचारणैः॥ याचितौ प्रशमं तत्र जग्मतुस्तौ सुरोत्तमौ।
॥ 1.75.18 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘तब ऋषिसमूहों तथा चारणों सहित देवताओं ने आकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओं से शान्ति के लिये याचना की; फिर वे दोनों वहाँ शान्त हो गये॥ १८ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| देवैः |
देवताओं ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
तब (अव्यय) |
| समागम्य |
आकर (ल्यबन्त अव्यय, सम् + आ + गम् धातु) |
| सर्षिसङ्घैः |
ऋषिसमूहों सहित (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| सचारणैः |
तथा चारणों सहित (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| याचितौ |
शान्ति के लिये याचना की (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रशमम् |
शान्ति के लिये (द्वितीया विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| जग्मतुः |
हो गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
| तौ |
वे दोनों (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| सुरोत्तमौ |
श्रेष्ठ देवता (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
जृम्भितं तद् धनुर्दृष्ट्वा शैवं विष्णुपराक्रमैः॥ अधिकं मेनिरे विष्णुं देवाः सर्षिगणास्तथा।
॥ 1.75.19 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘भगवान् विष्णु के पराक्रम से शिवजी के उस धनुष को शिथिल हुआ देख ऋषियों सहित देवताओं ने भगवान् विष्णु को श्रेष्ठ माना॥ १९ १/२ ।।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| जृम्भितम् |
शिथिल हुआ (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तत् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| धनुः |
शिवजी के धनुष को (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय, दृश् धातु) |
| शैवम् |
शिवजी के (द्वितीया विभक्ति) |
| विष्णुपराक्रमैः |
भगवान् विष्णु के पराक्रम से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अधिकम् |
श्रेष्ठ (द्वितीया विभक्ति) |
| मेनिरे |
माना (मन् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| विष्णुम् |
भगवान् विष्णु को (द्वितीया विभक्ति) |
| देवाः |
देवताओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्षिगणाः |
ऋषियों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
धनू रुद्रस्तु सङ्क्रुद्धो विदेहेषु महायशाः॥ देवरातस्य राजर्षेर्ददौ हस्ते ससायकम्।
॥ 1.75.20 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘तदनन्तर कुपित हुए महायशस्वी रुद्र ने बाण सहित अपना धनुष विदेह देश के राजर्षि देवरात के हाथ में दे दिया॥ २० १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| धनुः |
अपना धनुष (द्वितीया विभक्ति) |
| रुद्रः |
रुद्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तदनन्तर (अव्यय) |
| सङ्क्रुद्धः |
कुपित हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विदेहेषु |
विदेह देश के (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| महायशाः |
महायशस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| देवरातस्य |
राजर्षि देवरात के (षष्ठी विभक्ति) |
| राजर्षेः |
राजर्षि के (षष्ठी विभक्ति) |
| ददौ |
दे दिया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हस्ते |
हाथ में (सप्तमी विभक्ति) |
| ससायकम् |
बाण सहित (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
इदं च वैष्णवं राम धनुः परपुरंजयम्॥ ऋचीके भार्गवे प्रादाद् विष्णुः स न्यासमुत्तमम्।
॥ 1.75.21 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘श्रीराम! शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले इस वैष्णव धनुष को भगवान् विष्णु ने भृगुवंशी ऋचीक मुनि को उत्तम धरोहर के रूप में दिया था॥ २१ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इदम् |
इस (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| वैष्णवम् |
वैष्णव (द्वितीया विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| धनुः |
धनुष को (द्वितीया विभक्ति) |
| परपुरञ्जयम् |
शत्रुनगरी पर विजय पाने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| ऋचीके |
ऋचीक मुनि को (सप्तमी विभक्ति) |
| भार्गवे |
भृगुवंशी को (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रादात् |
दिया था (प्र + दा धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| विष्णुः |
भगवान् विष्णु ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| न्यासम् |
धरोहर के रूप में (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
ऋचीकस्तु महातेजाः पुत्रस्याप्रतिकर्मणः॥ पितुर्मम ददौ दिव्यं जमदग्नेर्महात्मनः।
॥ 1.75.22 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘फिर महातेजस्वी ऋचीक ने प्रतीकार (प्रतिशोध)की भावना से रहित अपने पुत्र एवं मेरे पिता महात्मा जमदग्नि के अधिकार में यह दिव्य धनुष दे दिया॥ २२ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋचीकः |
ऋचीक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
फिर (अव्यय) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पुत्रस्य |
अपने पुत्र के (षष्ठी विभक्ति) |
| अप्रतिकर्मणः |
प्रतीकार (प्रतिशोध) की भावना से रहित के (षष्ठी विभक्ति) |
| पितुः |
मेरे पिता के (षष्ठी विभक्ति) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| ददौ |
दे दिया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दिव्यम् |
यह दिव्य धनुष (द्वितीया विभक्ति) |
| जमदग्नेः |
जमदग्नि के (षष्ठी विभक्ति) |
| महात्मनः |
महात्मा के (षष्ठी विभक्ति) |
न्यस्तशस्त्रे पितरि मे तपोबलसमन्विते॥ अर्जुनो विदधे मृत्युं प्राकृतां बुद्धिमास्थितः।
॥ 1.75.23 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘तपोबल से सम्पन्न मेरे पिता जमदग्नि अस्त्र शस्त्रों का परित्याग करके जब ध्यानस्थ होकर बैठे थे, उस समय प्राकृत बुद्धि का आश्रय लेने वाले कृतवीर्यकुमार अर्जुन ने उनको मार डाला॥ २३ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न्यस्तशस्त्रे |
अस्त्र शस्त्रों का परित्याग करने वाले (सप्तमी विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| पितरि |
मेरे पिता जमदग्नि के (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| मे |
मेरे (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| तपोबलसमन्विते |
तपोबल से सम्पन्न के (सप्तमी विभक्ति) |
| अर्जुनः |
कृतवीर्यकुमार अर्जुन ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विदधे |
मार डाला (वि + धा धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मृत्युम् |
मृत्यु को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राकृताम् |
प्राकृत (द्वितीया विभक्ति) |
| बुद्धिम् |
बुद्धि का (द्वितीया विभक्ति) |
| आस्थितः |
आश्रय लेने वाले (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
वधमप्रतिरूपं तु पितुः श्रुत्वा सुदारुणम्।
।
क्षत्रमुत्सादयं रोषाज्जातं जातमनेकशः॥
॥ 1.75.24 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘पिता के इस अत्यन्त भयंकर वधका, जो उनके योग्य नहीं था, समाचार सुनकर मैंने रोषपूर्वक बारंबार उत्पन्न हुए क्षत्रियों का अनेक बार संहार किया ॥२४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वधम् |
पिता के इस वध का (द्वितीया विभक्ति) |
| अप्रतिरूपम् |
जो उनके योग्य नहीं था (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| पितुः |
पिता के (षष्ठी विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
समाचार सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| सुदारुणम् |
अत्यन्त भयंकर का (द्वितीया विभक्ति) |
| क्षत्रम् |
बारंबार उत्पन्न हुए क्षत्रियों का (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्सादयम् |
अनेक बार संहार किया (उत् + सद् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| रोषात् |
रोषपूर्वक (पञ्चमी विभक्ति) |
| जातम् |
उत्पन्न हुए (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| जातम् |
बारंबार (वीप्सार्थक द्विरुक्ति) |
| अनेकशः |
अनेक बार (अव्यय) |
पृथिवीं चाखिलां प्राप्य कश्यपाय महात्मने।
यज्ञस्यान्तेऽददं राम दक्षिणां पुण्यकर्मणे॥
॥ 1.75.25 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘श्रीराम ! फिर सारी पृथ्वीपर अधिकार करके मैंने एक यज्ञ किया और उस यज्ञके समाप्त होने पर पुण्यकर्मा महात्मा कश्यप को दक्षिणा रूप से यह सारी पृथ्वी दे डाली॥ २५॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पृथिवीम् |
सारी पृथ्वी पर (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अखिलाम् |
सारी (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राप्य |
अधिकार करके (ल्यबन्त अव्यय, प्र + आप् धातु) |
| कश्यपाय |
कश्यप को (चतुर्थी विभक्ति) |
| महात्मने |
महात्मा को (चतुर्थी विभक्ति) |
| यज्ञस्य |
उस यज्ञ के (षष्ठी विभक्ति) |
| अन्ते |
समाप्त होने पर (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| अददम् |
दे डाली (दा धातु, लङ् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| दक्षिणाम् |
दक्षिणा रूप से (द्वितीया विभक्ति) |
| पुण्यकर्मणे |
पुण्यकर्मा को (चतुर्थी विभक्ति) |
दत्त्वा महेन्द्रनिलयस्तपोबलसमन्वितः।
श्रुत्वा तु धनुषो भेदं ततोऽहं द्रुतमागतः ॥
॥ 1.75.26 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘पृथ्वी का दान करके मैं महेन्द्र पर्वत पर रहने लगा और वहाँ तपस्या करके तपोबल से सम्पन्न हुआ। वहाँ से शिवजी के धनुष के तोड़े जाने का समाचार सुनकर मैं शीघ्रतापूर्वक यहाँ आया हूँ॥ २६ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दत्त्वा |
दान करके (क्त्वान्त अव्यय, दा धातु) |
| महेन्द्रनिलयः |
मैं महेन्द्र पर्वत पर रहने लगा (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| तपोबलसमन्वितः |
वहाँ तपस्या करके तपोबल से सम्पन्न हुआ (प्रथमा विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| श्रुत्वा |
समाचार सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| धनुषः |
शिवजी के धनुष के (षष्ठी विभक्ति) |
| भेदम् |
तोड़े जाने का (द्वितीया विभक्ति) |
| ततः |
वहाँ से (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| द्रुतम् |
शीघ्रतापूर्वक (अव्यय) |
| आगतः |
यहाँ आया हूँ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तदेवं वैष्णवं राम पितृपैतामहं महत्।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य गृह्णीष्व धनुरुत्तमम्॥ योजयस्व धनुःश्रेष्ठे शरं परपुरंजयम्।
॥ 1.75.27 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘श्रीराम! इस प्रकार यह महान् वैष्णव धनुष मेरे पिता-पितामहों के अधिकार में रहता चला आया है; अब तुम क्षत्रिय धर्म को सामने रखकर यह उत्तम धनुष हाथ में लो और इस श्रेष्ठ धनुष पर एक ऐसा बाण चढ़ाओ, जो शत्रु नगरी पर विजय पाने में समर्थ हो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| वैष्णवम् |
यह वैष्णव (प्रथमा विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| पितृपैतामहम् |
मेरे पिता-पितामहों के अधिकार में रहता चला आया है (प्रथमा विभक्ति, द्वन्द्व समास) |
| महत् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| क्षत्रधर्मम् |
क्षत्रिय धर्म को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरस्कृत्य |
सामने रखकर (ल्यबन्त अव्यय, पुरस् + कृ धातु) |
| गृह्णीष्व |
हाथ में लो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| धनुः |
यह उत्तम धनुष (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
| योजयस्व |
चढ़ाओ (युज् धातु, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| धनुःश्रेष्ठे |
इस श्रेष्ठ धनुष पर (सप्तमी विभक्ति) |
| शरम् |
एक बाण (द्वितीया विभक्ति) |
| परपुरञ्जयम् |
जो शत्रु नगरी पर विजय पाने में समर्थ हो (द्वितीया विभक्ति) |
यदि शक्तोऽसि काकुत्स्थ द्वन्द्वं दास्यामि ते ततः॥
॥ 1.75.28 ॥
हिंदी अनुवाद:
यदि तुम ऐसा कर सके तो मैं तुम्हें द्वन्द्व-युद्ध का अवसर दूंगा॥ २८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यदि |
यदि (अव्यय) |
| शक्तः |
तुम ऐसा कर सके (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| असि |
हो (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| काकुत्स्थ |
हे काकुत्स्थ (सम्बोधन विभक्ति) |
| द्वन्द्वम् |
द्वन्द्व-युद्ध का अवसर (द्वितीया विभक्ति) |
| दास्यामि |
दूंगा (दा धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| ते |
तुम्हें (चतुर्थी विभक्ति, युष्मद्) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः॥७५॥
हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७५॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आर्षे |
ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| पञ्चसप्ततितमः |
पचहत्तरवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥७५॥ |
संख्या ७५ (सर्ग संख्या) |
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