🌿 सर्ग 77: राजा दशरथ का पुत्रों और वधुओं के साथ अयोध्या में प्रवेश, सीता और श्रीराम का पारस्परिक प्रेम
King Dasharatha enters Ayodhya with his sons and daughters-in-law, and the mutual love between Sita and Shri Rama
कुल श्लोक: 29
गते रामे प्रशान्तात्मा रामो दाशरथिर्धनुः ।
वरुणायाप्रमेयाय ददौ हस्ते महायशाः॥
॥ 1.77.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
जमदग्निकुमार परशुरामजी के चले जाने पर महायशस्वी दशरथनन्दन श्रीराम ने शान्तचित्त होकर अपार शक्तिशाली वरुण के हाथ में वह धनुष दे दिया।१॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गते |
चले जाने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| रामे |
जमदग्निकुमार परशुरामजी के (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रशान्तात्मा |
शान्तचित्त हुआ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| रामः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| दाशरथिः |
दशरथनन्दन ने (प्रथमा विभक्ति) |
| धनुः |
वह धनुष (द्वितीया विभक्ति) |
| वरुणाय |
अपार शक्तिशाली वरुण के (चतुर्थी विभक्ति) |
| अप्रमेयाय |
अपार शक्तिशाली के (चतुर्थी विभक्ति) |
| ददौ |
दे दिया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हस्ते |
हाथ में (सप्तमी विभक्ति) |
| महायशाः |
महायशस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
अभिवाद्य ततो रामो वसिष्ठप्रमुखानृषीन्।
पितरं विकलं दृष्ट्वा प्रोवाच रघुनन्दनः॥
॥ 1.77.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि ऋषियों को प्रणाम करके रघुनन्दन श्रीराम ने अपने पिता को विकल देखकर उनसे कहा- ॥२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अभिवाद्य |
प्रणाम करके (ल्यबन्त अव्यय, अभि + वद् धातु) |
| ततः |
तत्पश्चात् (अव्यय) |
| रामः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| वसिष्ठप्रमुखान् |
वसिष्ठ आदि (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| ऋषीन् |
ऋषियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पितरम् |
अपने पिता को (द्वितीया विभक्ति) |
| विकलम् |
विकल (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय, दृश् धातु) |
| प्रोवाच |
कहा (प्र + वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रघुनन्दनः |
रघुनन्दन ने (प्रथमा विभक्ति) |
जामदग्न्यो गतो रामः प्रयातु चतुरंगिणी।
अयोध्याभिमुखी सेना त्वया नाथेन पालिता॥
॥ 1.77.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘पिताजी! जमदग्निकुमार परशुराम जी चले गये। अब आपके अधिनायकत्व में सुरक्षित यह चतुरंगिणी सेना अयोध्या की ओर प्रस्थान करे’ ॥३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| जामदग्न्यः |
जमदग्निकुमार परशुराम जी (प्रथमा विभक्ति) |
| गतः |
चले गये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रामः |
परशुराम जी (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रयातु |
प्रस्थान करे (प्र + या धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| चतुरङ्गिणी |
यह चतुरंगिणी (प्रथमा विभक्ति) |
| अयोध्याभिमुखी |
अयोध्या की ओर (प्रथमा विभक्ति) |
| सेना |
सेना (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वया |
आपके (तृतीया विभक्ति, युष्मद्) |
| नाथेन |
अधिनायकत्व में (तृतीया विभक्ति) |
| पालिता |
सुरक्षित (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
रामस्य वचनं श्रुत्वा राजा दशरथः सुतम्।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्न्युपाघ्राय राघवम्॥ गतो राम इति श्रुत्वा हृष्टः प्रमुदितो नृपः।
॥ 1.77.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीराम का यह वचन सुनकर राजा दशरथ ने अपने पुत्र रघुनाथजी को दोनों भुजाओं से खींचकर छाती से लगा लिया और उनका मस्तक सूंघा। ‘परशुरामजी चले गये’ यह सुनकर राजा दशरथ को बड़ा हर्ष हुआ, वे आनन्दमग्न हो गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| रामस्य |
श्रीराम का (षष्ठी विभक्ति) |
| वचनम् |
यह वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सुतम् |
अपने पुत्र रघुनाथजी को (द्वितीया विभक्ति) |
| बाहुभ्याम् |
दोनों भुजाओं से (तृतीया विभक्ति, द्विवचन) |
| सम्परिष्वज्य |
खींचकर छाती से लगा लिया (ल्यबन्त अव्यय, सम् + परि + स्वज् धातु) |
| मूर्ध्नि |
उनका मस्तक (सप्तमी विभक्ति) |
| उपाघ्राय |
सूंघा (ल्यबन्त अव्यय, उप + आ + घ्रा धातु) |
| राघवम् |
रघुनाथजी का (द्वितीया विभक्ति) |
| गतः |
चले गये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रामः |
परशुरामजी (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
यह (अव्यय) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| हृष्टः |
बड़ा हर्ष हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रमुदितः |
वे आनन्दमग्न हो गये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| नृपः |
राजा दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
पुनर्जातं तदा मेने पुत्रमात्मानमेव च॥
॥ 1.77.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस समय उन्होंने अपना और अपने पुत्र का पुनर्जन्म हुआ माना॥५॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पुनर्जातम् |
पुनर्जन्म हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| मेने |
माना (मन् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुत्रम् |
अपने पुत्र का (द्वितीया विभक्ति) |
| आत्मानम् |
और अपना (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
चोदयामास तां सेनां जगामाशु ततः पुरीम्।
पताकाध्वजिनीं रम्यां तूर्योद्घुष्टनिनादिताम्॥
॥ 1.77.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर उन्होंने सेना को नगर की ओर कूच करने की आज्ञा दी और वहाँ से चलकर बड़ी शीघ्रता के साथ वे अयोध्यापुरी में जा पहुँचे। उस समय उस पुरी में सब ओर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं। सजावट से नगर की रमणीयता बढ़ गयी थी और भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि से सारी अयोध्या गूंज उठी थी॥६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| चोदयामास |
कूच करने की आज्ञा दी (चुद् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| सेनाम् |
सेना को (द्वितीया विभक्ति) |
| जगाम |
चलकर जा पहुँचे (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| आशु |
बड़ी शीघ्रता के साथ (अव्यय) |
| ततः |
वहाँ से (अव्यय) |
| पुरीम् |
अयोध्यापुरी में (द्वितीया विभक्ति) |
| पताकाध्वजिनीम् |
सब ओर ध्वजा-पताकाएँ फहरा रही थीं (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| रम्याम् |
रमणीयता बढ़ गयी थी (द्वितीया विभक्ति) |
| तूर्योद्घुष्टनिनादिताम् |
भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि से गूंज उठी थी (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
सिक्तराजपथरम्यां प्रकीर्णकुसुमोत्कराम्।
राजप्रवेशसुमुखैः पौरैर्मङ्गलपाणिभिः॥ सम्पूर्णां प्राविशद् राजा जनौघैः समलंकृताम्।
॥ 1.77.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
सड़कों पर जलका छिड़काव हुआ था, जिससे पुरी की सुरम्य शोभा बढ़ गयी थी। यत्र-तत्र ढेर-के-ढेर फूल बिखेरे गये थे। पुरवासी मनुष्य हाथों में मांगलिक वस्तुएँ लेकर राजा के प्रवेश मार्ग पर प्रसन्नमुख होकर खड़े थे। इन सबसे भरी-पूरी तथा भारी जनसमुदाय से अलंकृत हुई अयोध्यापुरी में राजा ने प्रवेश किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सिक्तराजपथरम्याम् |
सड़कों पर जल के छिड़काव से सुरम्य शोभा बढ़ी हुई (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| प्रकीर्णकुसुमोत्कराम् |
यत्र-तत्र ढेर-के-ढेर फूल बिखेरे गये थे (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| राजप्रवेशसुमुखैः |
राजा के प्रवेश मार्ग पर प्रसन्नमुख हुए (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| पौरैः |
पुरवासी मनुष्य (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| मङ्गलपाणिभिः |
हाथों में मांगलिक वस्तुएँ लिये हुए (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| सम्पूर्णाम् |
इन सबसे भरी-पूरी (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्राविशत् |
प्रवेश किया (प्र + विश् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| जनौघैः |
भारी जनसमुदाय से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| समलङ्कृताम् |
अलंकृत हुई (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
पौरैः प्रत्युद्गतो दूरं द्विजैश्च पुरवासिभिः॥
॥ 1.77.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
नागरिकों तथा पुरवासी ब्राह्मणों ने दूर तक आगे जाकर महाराज की अगवानी की थी॥ ८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पौरैः |
नागरिकों ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रत्युद्गतः |
आगे जाकर अगवानी की थी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| दूरम् |
दूर तक (अव्यय) |
| द्विजैः |
तथा पुरवासी ब्राह्मणों ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| पुरवासिभिः |
पुरवासियों ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
पुत्रैरनुगतः श्रीमान् श्रीमद्भिश्च महायशाः।
प्रविवेश गृहं राजा हिमवत्सदृशं प्रियम्॥
॥ 1.77.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अपने कान्तिमान् पुत्रों के साथ महायशस्वी श्रीमान् राजा दशरथ ने अपने प्रिय राजभवन में, जो हिमालय के समान सुन्दर एवं गगनचुम्बी था, प्रवेश किया॥९॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पुत्रैः |
अपने पुत्रों के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अनुगतः |
साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| श्रीमान् |
श्रीमान् (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रीमद्भिः |
कान्तिमान् के साथ (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| महायशाः |
महायशस्वी राजा दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रविवेश |
प्रवेश किया (प्र + विश् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| गृहम् |
अपने राजभवन में (द्वितीया विभक्ति) |
| हिमवत्सदृशम् |
हिमालय के समान सुन्दर एवं गगनचुम्बी था (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| प्रियम् |
प्रिय (द्वितीया विभक्ति) |
ननन्द स्वजनै राजा गृहे कामैः सुपूजितः।
कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च सुमध्यमा॥ वधूप्रतिग्रहे युक्ता याश्चान्या राजयोषितः।
॥ 1.77.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजमहल में स्वजनों द्वारा मनोवाञ्छित वस्तुओं से परम पूजित हो राजा दशरथ ने बड़े आनन्द का अनुभव किया। महारानी कौसल्या, सुमित्रा, सुन्दर कटिप्रदेश वाली कैकेयी तथा जो अन्य राजपत्नियाँ थीं, वे सब बहुओं को उतारने के कार्य में जुट गयीं। १० १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ननन्द |
बड़े आनन्द का अनुभव किया (नन्द् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| स्वजनैः |
स्वजनों द्वारा (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| राजा |
राजा दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| गृहे |
राजमहल में (सप्तमी विभक्ति) |
| कामैः |
मनोवाञ्छित वस्तुओं से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सुपूजितः |
परम पूजित हो (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कौसल्या |
महारानी कौसल्या (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुमित्रा |
सुमित्रा (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| कैकेयी |
कैकेयी (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| सुमध्यमा |
सुन्दर कटिप्रदेश वाली (प्रथमा विभक्ति) |
| वधूप्रतिग्रहे |
बहुओं को उतारने के कार्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| युक्ताः |
जुट गयीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| याः |
जो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अन्याः |
अन्य (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राजयोषितः |
राजपत्नियाँ थीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
ततः सीतां महाभागामूर्मिलां च यशस्विनीम्॥ कुशध्वजसुते चोभे जगृहुर्नृपयोषितः।
॥ 1.77.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर राजपरिवार की उन स्त्रियों ने परम सौभाग्यवती सीता, यशस्विनी ऊर्मिला तथा कुशध्वजकी दोनों कन्याओं—माण्डवी और श्रुतकीर्ति को सवारी से उतारा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| सीताम् |
परम सौभाग्यवती सीता को (द्वितीया विभक्ति) |
| महाभागाम् |
परम सौभाग्यवती को (द्वितीया विभक्ति) |
| ऊर्मिलाम् |
यशस्विनी ऊर्मिला को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| यशस्विनीम् |
यशस्विनी को (द्वितीया विभक्ति) |
| कुशध्वजसुते |
कुशध्वज की दोनों कन्याओं—माण्डवी और श्रुतकीर्ति को (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| उभे |
दोनों को (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| जगृहुः |
सवारी से उतारा (ग्रह् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| नृपयोषितः |
राजपरिवार की उन स्त्रियों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
मङ्गलालापनैर्होमैः शोभिताः क्षौमवाससः॥
॥ 1.77.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
और मंगल गीत गाती हुई सब वधुओं को घरमें ले गयीं। वे प्रवेशकालिक होमकर्म से सुशोभित तथा रेशमी साड़ियों से अलंकृत थीं॥ १२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मङ्गलालापनैः |
मंगल गीत गाती हुई (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| होमैः |
प्रवेशकालिक होमकर्म से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| शोभिताः |
सुशोभित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| क्षौमवाससः |
रेशमी साड़ियों से अलंकृत थीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
देवतायतनान्याशु सर्वास्ताः प्रत्यपूजयन्।
अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वा राजसुतास्तदा॥ रेमिरे मुदिताः सर्वा भर्तृभिर्मुदिता रहः।
॥ 1.77.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उन सबने देवमन्दिरों में ले जाकर उन बहुओं से देवताओं का पूजन करवाया। तदनन्तर नव-वधूरूप में आयी हुई उन सभी राजकुमारियों ने वन्दनीय सास ससुर आदि के चरणों में प्रणाम किया और अपने अपने पति के साथ एकान्त में रहकर वे सब-की-सब बड़े आनन्द से समय व्यतीत करने लगीं। १३ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| देवतायतनानि |
देवमन्दिरों में ले जाकर (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| आशु |
शीघ्र ही (अव्यय) |
| सर्वाः |
उन सबने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ताः |
उन बहुओं से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रत्यपूजयन् |
देवताओं का पूजन करवाया (प्रति + पूज् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| अभिवाद्य |
प्रणाम किया (ल्यबन्त अव्यय, अभि + वद् धातु) |
| अभिवाद्यान् |
वन्दनीय सास ससुर आदि के चरणों में (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, तव्य प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| सर्वाः |
उन सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राजसुताः |
नव-वधूरूप में आयी हुई राजकुमारियों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
तदनन्तर (अव्यय) |
| रेमिरे |
बड़े आनन्द से समय व्यतीत करने लगीं (रम् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मुदिताः |
प्रसन्न हुईं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वाः |
वे सब-की-सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भर्तृभिः |
अपने अपने पति के साथ (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| मुदिताः |
आनन्दित होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| रहः |
एकान्त में (अव्यय) |
कृतदाराः कृतास्त्राश्च सधनाः ससुहृज्जनाः॥ शुश्रूषमाणाः पितरं वर्तयन्ति नरर्षभाः।
॥ 1.77.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीराम आदि पुरुषश्रेष्ठ चारों भाई अस्त्रविद्या में निपुण और विवाहित होकर धन और मित्रों के साथ रहते हुए पिताकी सेवा करने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कृतदाराः |
विवाहित हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| कृतास्त्राः |
अस्त्रविद्या में निपुण हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| च |
और (अव्यय) |
| सधनाः |
धन सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| ससुहृज्जनाः |
और मित्रों के साथ रहते हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| शुश्रूषमाणाः |
सेवा करते हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शानच् प्रत्ययान्त, सन्नन्त) |
| पितरम् |
पिता की (द्वितीया विभक्ति) |
| वर्तयन्ति |
रहने लगे (वृत् धातु, प्रयोज्यार्थ, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| नरर्षभाः |
श्रीराम आदि पुरुषश्रेष्ठ चारों भाई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
कस्यचित्त्वथ कालस्य राजा दशरथः सुतम्॥ भरतं कैकयीपुत्रमब्रवीद् रघुनन्दनः।
॥ 1.77.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
कुछ काल के बाद रघुकुलनन्दन राजा दशरथ ने अपने पुत्र कैकेयीकुमार भरत से कहा— ॥१५ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कस्यचित् |
कुछ (तृतीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| अथ |
बाद (अव्यय) |
| कालस्य |
काल के (तृतीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सुतम् |
अपने पुत्र (द्वितीया विभक्ति) |
| भरतम् |
भरत से (द्वितीया विभक्ति) |
| कैकयीपुत्रम् |
कैकेयीकुमार से (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रघुनन्दनः |
रघुकुलनन्दन ने (प्रथमा विभक्ति) |
अयं केकयराजस्य पुत्रो वसति पुत्रक॥ त्वां नेतुमागतो वीरो युधाजिन्मातुलस्तव।
॥ 1.77.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘बेटा! ये तुम्हारे मामा केकयराजकुमार वीर युधाजित् तुम्हें लेने के लिये आये हैं और कई दिनों से यहाँ ठहरे हुए हैं ॥ १६ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अयम् |
ये (प्रथमा विभक्ति) |
| केकयराजस्य |
केकयराज के (षष्ठी विभक्ति) |
| पुत्रः |
राजकुमार (प्रथमा विभक्ति) |
| वसति |
ठहरे हुए हैं (वस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुत्रक |
हे बेटा (सम्बोधन विभक्ति) |
| त्वाम् |
तुम्हें (द्वितीया विभक्ति, युष्मद्) |
| नेतुम् |
लेने के लिये (तुमुन्नन्त अव्यय, नी धातु) |
| आगतः |
आये हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वीरः |
वीर (प्रथमा विभक्ति) |
| युधाजित् |
युधाजित् (प्रथमा विभक्ति) |
| मातुलः |
तुम्हारे मामा (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
तुम्हारे (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
श्रुत्वा दशरथस्यैतद् भरतः कैकयीसुतः॥ गमनायाभिचक्राम शत्रुघ्नसहितस्तदा।
॥ 1.77.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
दशरथजी की यह बात सुनकर कैकेयीकुमार भरत ने उस समय शत्रुघ्न के साथ मामा के यहाँ जाने का विचार किया। १७ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| दशरथस्य |
दशरथजी की (षष्ठी विभक्ति) |
| एतत् |
यह बात (द्वितीया विभक्ति) |
| भरतः |
भरत ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कैकयीसुतः |
कैकेयीकुमार ने (प्रथमा विभक्ति) |
| गमनाय |
जाने का (चतुर्थी विभक्ति) |
| अभिचक्राम |
विचार किया (अभि + क्रम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| शत्रुघ्नसहितः |
शत्रुघ्न के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
आपृच्छ्य पितरं शूरो रामं चाक्लिष्टकारिणम्॥ मातॄश्चापि नरश्रेष्ठः शत्रुघ्नसहितो ययौ।
॥ 1.77.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे नरश्रेष्ठ शूरवीर भरत अपने पिता राजा दशरथ, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम तथा सभी माताओं से पूछकर उनकी आज्ञा ले शत्रुघ्नसहित वहाँसे चल दिये॥ १८१/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| आपृच्छ्य |
पूछकर उनकी आज्ञा ले (ल्यबन्त अव्यय, आ + प्रच्छ् धातु) |
| पितरम् |
अपने पिता राजा दशरथ से (द्वितीया विभक्ति) |
| शूरः |
शूरवीर (प्रथमा विभक्ति) |
| रामम् |
श्रीराम से (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| अक्लिष्टकारिणम् |
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले से (द्वितीया विभक्ति) |
| मातॄः |
तथा सभी माताओं से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| नरश्रेष्ठः |
वे नरश्रेष्ठ भरत (प्रथमा विभक्ति) |
| शत्रुघ्नसहितः |
शत्रुघ्नसहित (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| ययौ |
वहाँ से चल दिये (या धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
युधाजित् प्राप्य भरतं सशत्रुघ्नं प्रहर्षितः॥ स्वपुरं प्राविशद् वीरः पिता तस्य तुतोष ह।
॥ 1.77.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
शत्रुघ्नसहित भरत को साथ लेकर वीर युधाजित् ने बड़े हर्ष के साथ अपने नगर में प्रवेश किया, इससे उनके पिताको बड़ा संतोष हुआ॥ १९ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| युधाजित् |
वीर युधाजित् ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्राप्य |
साथ लेकर (ल्यबन्त अव्यय, प्र + आप् धातु) |
| भरतम् |
भरत को (द्वितीया विभक्ति) |
| सशत्रुघ्नम् |
शत्रुघ्नसहित (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| प्रहर्षितः |
बड़े हर्ष के साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्वपुरम् |
अपने नगर में (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राविशत् |
प्रवेश किया (प्र + विश् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वीरः |
वीर ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पिता |
उनके पिता को (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उनके (षष्ठी विभक्ति) |
| तुतोष |
बड़ा संतोष हुआ (तुष् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (अव्यय) |
गते च भरते रामो लक्ष्मणश्च महाबलः॥ पितरं देवसंकाशं पूजयामासतुस्तदा।
॥ 1.77.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
भरत के चले जाने पर महाबली श्रीराम और लक्ष्मण उन दिनों अपने देवोपम पिताकी सेवा-पूजा में संलग्न रहने लगे॥ २० १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गते |
चले जाने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| च |
और (अव्यय) |
| भरते |
भरत के (सप्तमी विभक्ति) |
| रामः |
श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| लक्ष्मणः |
और लक्ष्मण (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| महाबलः |
महाबली (प्रथमा विभक्ति) |
| पितरम् |
अपने पिता की (द्वितीया विभक्ति) |
| देवसङ्काशम् |
देवोपम की (द्वितीया विभक्ति) |
| पूजयामासतुः |
सेवा-पूजा में संलग्न रहने लगे (पूज् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
| तदा |
उन दिनों (अव्यय) |
पितुराज्ञां पुरस्कृत्य पौरकार्याणि सर्वशः॥ चकार रामः सर्वाणि प्रियाणि च हितानि च।
॥ 1.77.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
पिताकी आज्ञा शिरोधार्य करके वे नगरवासियों के सब काम देखने तथा उनके समस्त प्रिय तथा हितकर कार्य करने लगे। २१ १/२ ।।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पितुः |
पिता की (षष्ठी विभक्ति) |
| आज्ञाम् |
आज्ञा (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरस्कृत्य |
शिरोधार्य करके (ल्यबन्त अव्यय, पुरस् + कृ धातु) |
| पौरकार्याणि |
नगरवासियों के काम (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वशः |
सब (अव्यय) |
| चकार |
करने लगे (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रामः |
वे श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वाणि |
समस्त (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रियाणि |
प्रिय कार्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| हितानि |
हितकर कार्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
मातृभ्यो मातृकार्याणि कृत्वा परमयन्त्रितः॥ गुरूणां गुरुकार्याणि काले कालेऽन्ववैक्षत।
॥ 1.77.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे अपने को बड़े संयम में रखते थे और समय समय पर माताओं के लिये उनके आवश्यक कार्य पूर्ण करके गुरुजनों के भारी-से-भारी कार्यों को भी सिद्ध करने का ध्यान रखते थे॥ २२ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मातृभ्यः |
माताओं के लिये (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| मातृकार्याणि |
उनके आवश्यक कार्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कृत्वा |
पूर्ण करके (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| परमयन्त्रितः |
वे अपने को बड़े संयम में रखते थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| गुरूणाम् |
गुरुजनों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| गुरुकार्याणि |
भारी-से-भारी कार्यों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| काले काले |
समय समय पर (सप्तमी विभक्ति, वीप्सार्थक द्विरुक्ति) |
| अन्ववैक्षत |
सिद्ध करने का ध्यान रखते थे (अनु + अव + ईक्ष् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
एवं दशरथः प्रीतो ब्राह्मणा नैगमास्तथा ॥ रामस्य शीलवृत्तेन सर्वे विषयवासिनः।
॥ 1.77.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनके इस बर्ताव से राजा दशरथ, वेदवेत्ता ब्राह्मण तथा वैश्यवर्ग बड़े प्रसन्न रहते थे; श्रीरामके उत्तम शील और सद्-व्यवहारसे उस राज्यके भीतर निवास करनेवाले सभी मनुष्य बहुत संतुष्ट रहते थे। २३१/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
उनके इस बर्ताव से (अव्यय) |
| दशरथः |
राजा दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रीतः |
बड़े प्रसन्न रहते थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ब्राह्मणाः |
वेदवेत्ता ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| नैगमाः |
तथा वैश्यवर्ग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| रामस्य |
श्रीराम के (षष्ठी विभक्ति) |
| शीलवृत्तेन |
उत्तम शील और सद्-व्यवहार से (तृतीया विभक्ति) |
| सर्वे |
उस राज्य के भीतर निवास करने वाले सभी मनुष्य (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विषयवासिनः |
राज्य के भीतर निवास करने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, उपपद तत्पुरुष समास) |
तेषामतियशा लोके रामः सत्यपराक्रमः॥ स्वयंभूरिव भूतानां बभूव गुणवत्तरः।
॥ 1.77.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा के उन चारों पुत्रों में सत्यपराक्रमी श्रीराम ही लोक में अत्यन्त यशस्वी तथा महान् गुणवान् हुए ठीक उसी तरह जैसे समस्त भूतों में स्वयम्भू ब्रह्मा ही अत्यन्त यशस्वी और महान् गुणवान् हैं ।। २४ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेषाम् |
राजा के उन चारों पुत्रों में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अतियशाः |
अत्यन्त यशस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| लोके |
लोक में (सप्तमी विभक्ति) |
| रामः |
श्रीराम ही (प्रथमा विभक्ति) |
| सत्यपराक्रमः |
सत्यपराक्रमी (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| स्वयम्भूः |
जैसे समस्त भूतों में स्वयम्भू ब्रह्मा ही (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
जैसे (अव्यय) |
| भूतानाम् |
समस्त भूतों में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| बभूव |
हुए (भू धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| गुणवत्तरः |
महान् गुणवान् (प्रथमा विभक्ति) |
रामश्च सीतया सार्धं विजहार बहूनृतून्॥ मनस्वी तद्गतमनास्तस्या हृदि समर्पितः।
॥ 1.77.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीरामचन्द्रजी सदा सीता के हृदयमन्दिर में विराजमान रहते थे तथा मनस्वी श्रीराम का मन भी सीता में ही लगा रहता था; श्रीराम ने सीता के साथ अनेक ऋतुओं तक विहार किया। २५ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| रामः |
श्रीरामचन्द्रजी (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सीतया |
सीता के (तृतीया विभक्ति) |
| सार्धम् |
साथ (अव्यय) |
| विजहार |
विहार किया (वि + हृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| बहून् |
अनेक (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋतून् |
ऋतुओं तक (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया) |
| मनस्वी |
मनस्वी श्रीराम का (प्रथमा विभक्ति) |
| तद्गतमनाः |
मन भी सीता में ही लगा रहता था (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| तस्याः |
सीता के (षष्ठी विभक्ति) |
| हृदि |
हृदयमन्दिर में (सप्तमी विभक्ति) |
| समर्पितः |
विराजमान रहते थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
प्रिया तु सीता रामस्य दाराः पितृकृता इति॥ गुणाद्रूपगुणाच्चापि प्रीतिर्भूयोऽभिवर्धते।
॥ 1.77.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
सीता श्रीराम को बहुत ही प्रिय थीं; क्योंकि वे अपने पिता राजा जनक द्वारा श्रीराम के हाथ में पत्नी-रूप से समर्पित की गयी थीं। सीता के पातिव्रत्य आदि गुण से तथा उनके सौन्दर्य गुण से भी श्रीराम का उनके प्रति अधिकाधिक प्रेम बढ़ता रहता था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रिया |
सीता बहुत ही प्रिय थीं (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| सीता |
सीता (प्रथमा विभक्ति) |
| रामस्य |
श्रीराम को (षष्ठी विभक्ति) |
| दाराः |
वे अपने पिता राजा जनक द्वारा श्रीराम के हाथ में पत्नी-रूप से समर्पित की गयी थीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पितृकृताः |
पिता द्वारा बनायी हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| इति |
इस कारण (अव्यय) |
| गुणात् |
सीता के पातिव्रत्य आदि गुण से (पञ्चमी विभक्ति) |
| रूपगुणात् |
तथा उनके सौन्दर्य गुण से (पञ्चमी विभक्ति) |
| च |
भी (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| प्रीतिः |
श्रीराम का उनके प्रति प्रेम (प्रथमा विभक्ति) |
| भूयः |
अधिकाधिक (अव्यय) |
| अभिवर्धते |
बढ़ता रहता था (अभि + वृध् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
तस्याश्च भर्ता द्विगुणं हृदये परिवर्तते॥
॥ 1.77.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसी प्रकार सीता के हृदय में भी उनके पति श्रीराम अपने गुण और सौन्दर्य के कारण द्विगुण प्रीतिपात्र बनकर रहते थे। २७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्याः |
सीता के (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
भी (अव्यय) |
| भर्ता |
उनके पति श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| द्विगुणम् |
द्विगुण प्रीतिपात्र बनकर (अव्यय, क्रियाविशेषण) |
| हृदये |
हृदय में (सप्तमी विभक्ति) |
| परिवर्तते |
रहते थे (परि + वृत् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
अन्तर्गतमपि व्यक्तमाख्याति हृदयं हृदा।
तस्य भूयो विशेषेण मैथिली जनकात्मजा।
देवताभिः समा रूपे सीता श्रीरिव रूपिणी॥
॥ 1.77.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
जनकनन्दिनी मिथिलेश कुमारी सीता श्रीराम के हार्दिक अभिप्राय को भी अपने हृदय से ही और अधिकरूप से जान लेती थीं तथा स्पष्टरूप से बता भी देती थीं। वे रूप में देवांगनाओं के समान थीं और मूर्तिमती लक्ष्मी-सी प्रतीत होती थीं॥२८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अन्तर्गतम् |
श्रीराम के हार्दिक अभिप्राय को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| व्यक्तम् |
स्पष्टरूप से (अव्यय) |
| आख्याति |
बता भी देती थीं (आ + ख्या धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हृदयम् |
हृदय (प्रथमा विभक्ति) |
| हृदा |
अपने हृदय से ही (तृतीया विभक्ति) |
| तस्य |
उस श्रीराम के (षष्ठी विभक्ति) |
| भूयः |
और अधिकरूप से (अव्यय) |
| विशेषेण |
विशेषरूप से (तृतीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| मैथिली |
मिथिलेश कुमारी (प्रथमा विभक्ति) |
| जनकात्मजा |
जनकनन्दिनी सीता (प्रथमा विभक्ति) |
| देवताभिः |
देवांगनाओं के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| समा |
समान थीं (प्रथमा विभक्ति) |
| रूपे |
रूप में (सप्तमी विभक्ति) |
| सीता |
सीता (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रीः |
मूर्तिमती लक्ष्मी-सी (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
के समान (अव्यय) |
| रूपिणी |
प्रतीत होती थीं (प्रथमा विभक्ति) |
तया स राजर्षिसुतोऽभिकामया समेयिवानुत्तमराजकन्यया।
अतीव रामः शुशुभे मुदान्वितो विभुः श्रिया विष्णुरिवामरेश्वरः॥
॥ 1.77.29 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रेष्ठ राजकुमारी सीता श्रीराम की ही कामना रखती थीं और श्रीराम भी एकमात्र उन्हीं को चाहते थे; जैसे लक्ष्मी के साथ देवेश्वर भगवान् विष्णु की शोभा होती है, उसी प्रकार उन सीतादेवी के साथ राजर्षि दशरथकुमार श्रीराम परम प्रसन्न रहकर बड़ी शोभा पाने लगे॥२९॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तया |
उन सीतादेवी के (तृतीया विभक्ति) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| राजर्षिसुतः |
राजर्षि दशरथकुमार (प्रथमा विभक्ति) |
| अभिकामया |
श्रीराम की ही कामना रखती थीं (तृतीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| समेयिवान् |
मिले हुए (प्रथमा विभक्ति, क्वसु प्रत्ययान्त) |
| उत्तमराजकन्यया |
श्रेष्ठ राजकुमारी के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| अतीव |
बड़ी (अव्यय) |
| रामः |
श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| शुशुभे |
शोभा पाने लगे (शुभ् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मुदान्वितः |
परम प्रसन्न रहकर (प्रथमा विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| विभुः |
प्रभु श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रिया |
लक्ष्मी के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| विष्णुः |
भगवान् विष्णु की (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
जैसे (अव्यय) |
| अमरेश्वरः |
देवेश्वर की (प्रथमा विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सप्तसप्ततितमः सर्गः॥७७॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सतहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७७॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आर्षे |
ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| सप्तसप्ततितमः |
सतहत्तरवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥७७॥ |
संख्या ७७ (सर्ग संख्या) |
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