🌿 सर्ग 73: श्रीराम आदि चारों भाइयों का विवाह
The marriage of Shri Rama and his three brothers
कुल श्लोक: 40
यस्मिंस्तु दिवसे राजा चक्रे गोदानमुत्तमम्।
तस्मिंस्तु दिवसे वीरो युधाजित् समुपेयिवान्॥ पुत्रः केकयराजस्य साक्षाद्भरतमातुलः।
॥ 1.73.1 ॥
हिंदी अनुवाद:
राजा दशरथ ने जिस दिन अपने पुत्रों के विवाह के निमित्त उत्तम गोदान किया, उसी दिन भरत के सगे मामा केकय राजकुमार वीर युधाजित् वहाँ आ पहुँचे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यस्मिन् |
जिस (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| दिवसे |
दिन (सप्तमी विभक्ति) |
| राजा |
राजा दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| चक्रे |
किया (कृ धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| गोदानम् |
गोदान (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्मिन् |
उसी (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| दिवसे |
दिन (सप्तमी विभक्ति) |
| वीरः |
वीर (प्रथमा विभक्ति) |
| युधाजित् |
युधाजित् (प्रथमा विभक्ति) |
| समुपेयिवान् |
आ पहुँचे (प्रथमा विभक्ति, क्वसु प्रत्ययान्त) |
| पुत्रः |
राजकुमार (प्रथमा विभक्ति) |
| केकयराजस्य |
केकयराज के (षष्ठी विभक्ति) |
| साक्षात् |
सगे (अव्यय) |
| भरतमातुलः |
भरत के मामा (प्रथमा विभक्ति) |
दृष्ट्वा पृष्ट्वा च कुशलं राजानमिदमब्रवीत्॥
॥ 1.73.2 ॥
हिंदी अनुवाद:
उन्होंने महाराज का दर्शन करके कुशल-मंगल पूछा और इस प्रकार कहा- ॥ २॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दृष्ट्वा |
दर्शन करके (क्त्वान्त अव्यय, दृश् धातु) |
| पृष्ट्वा |
पूछकर (क्त्वान्त अव्यय, प्रच्छ् धातु) |
| च |
और (अव्यय) |
| कुशलम् |
कुशल-मंगल (द्वितीया विभक्ति) |
| राजानम् |
महाराज से (द्वितीया विभक्ति) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
केकयाधिपती राजा स्नेहात् कुशलमब्रवीत्।
येषां कुशलकामोऽसि तेषां सम्प्रत्यनामयम्॥ स्वस्रीयं मम राजेन्द्र द्रष्टुकामो महीपतिः।
॥ 1.73.3 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘रघुनन्दन! केकयदेश के महाराज ने बड़े स्नेह के साथ आपका कुशल-समाचार पूछा है और आप भी हमारे यहाँ के जिन-जिन लोगों की कुशलवार्ता जानना चाहते होंगे, वे सब इस समय स्वस्थ और सानन्द हैं। राजेन्द्र! केकयनरेश मेरे भान्जे भरत को देखना चाहते हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| केकयाधिपतिः |
केकयदेश के महाराज ने (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| स्नेहात् |
बड़े स्नेह के साथ (पञ्चमी विभक्ति) |
| कुशलम् |
कुशल-समाचार (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
पूछा है (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| येषाम् |
जिन-जिन लोगों की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| कुशलकामः |
कुशलवार्ता जानना चाहते होंगे (प्रथमा विभक्ति) |
| असि |
हैं (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| तेषाम् |
वे सब (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| सम्प्रति |
इस समय (अव्यय) |
| अनामयम् |
स्वस्थ और सानन्द हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| स्वस्रीयम् |
मेरे भान्जे (द्वितीया विभक्ति) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| राजेन्द्र |
हे राजेन्द्र (सम्बोधन विभक्ति) |
| द्रष्टुकामः |
देखना चाहते हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| महीपतिः |
केकयनरेश (प्रथमा विभक्ति) |
तदर्थमुपयातोऽहमयोध्यां रघुनन्दन॥
॥ 1.73.4 ॥
हिंदी अनुवाद:
अतः इन्हें लेने के लिये ही मैं अयोध्या आया था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तदर्थम् |
इन्हें लेने के लिये ही (अव्यय) |
| उपयातः |
आया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| अयोध्याम् |
अयोध्या (द्वितीया विभक्ति) |
| रघुनन्दन |
हे रघुनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
श्रुत्वा त्वहमयोध्यायां विवाहार्थं तवात्मजान्।
मिथिलामुपयातांस्तु त्वया सह महीपते॥ त्वरयाभ्युपयातोऽहं द्रष्टुकामः स्वसुः सुतम्।
॥ 1.73.5 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘परंतु पृथ्वीनाथ! अयोध्या में यह सुनकर कि “आपके सभी पुत्र विवाह के लिये आपके साथ मिथिला पधारे हैं, मैं तुरंत यहाँ चला आया; क्योंकि मेरे मन में अपनी बहिन के बेटे को देखने की बड़ी लालसा थी’॥ ५ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्रुत्वा |
यह सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| तु |
परंतु (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| अयोध्यायाम् |
अयोध्या में (सप्तमी विभक्ति) |
| विवाहार्थम् |
विवाह के लिये (अव्यय) |
| तव |
आपके (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| आत्मजान् |
सभी पुत्र (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| मिथिलाम् |
मिथिला (द्वितीया विभक्ति) |
| उपयातान् |
पधारे हैं (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| त्वया |
आपके (तृतीया विभक्ति) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| महीपते |
हे पृथ्वीनाथ (सम्बोधन विभक्ति) |
| त्वरया |
तुरंत (तृतीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| अभ्युपयातः |
चला आया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| द्रष्टुकामः |
देखने की बड़ी लालसा थी (प्रथमा विभक्ति) |
| स्वसुः |
अपनी बहिन के (षष्ठी विभक्ति) |
| सुतम् |
बेटे को (द्वितीया विभक्ति) |
अथ राजा दशरथः प्रियातिथिमुपस्थितम्॥ दृष्ट्वा परमसत्कारैः पूजनार्हमपूजयत्।
॥ 1.73.6 ॥
हिंदी अनुवाद:
महाराज दशरथ ने अपने प्रिय अतिथि को उपस्थित देख बड़े सत्कार के साथ उनकी आवभगत की; क्योंकि वे सम्मान पाने के ही योग्य थे॥ ६ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| राजा |
महाराज (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रियातिथिम् |
अपने प्रिय अतिथि को (द्वितीया विभक्ति) |
| उपस्थितम् |
उपस्थित (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय, दृश् धातु) |
| परमसत्कारैः |
बड़े सत्कार के साथ (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पूजनार्हम् |
सम्मान पाने के ही योग्य थे (द्वितीया विभक्ति) |
| अपूजयत् |
आवभगत की (पूज् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ततस्तामुषितो रात्रिं सह पुत्रैर्महात्मभिः॥ प्रभाते पुनरुत्थाय कृत्वा कर्माणि तत्त्ववित् ।
॥ 1.73.7 ॥
हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर अपने महामनस्वी पुत्रों के साथ वह रात व्यतीत करके वे तत्त्वज्ञ नरेश प्रातःकाल उठे और नित्यकर्म करके ऋषियों को आगे किये जनक की यज्ञशाला में जा पहुँचे॥ ७-८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| ताम् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| उषितः |
व्यतीत करके (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रात्रिम् |
रात (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| पुत्रैः |
अपने पुत्रों के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| महात्मभिः |
महामनस्वी के साथ (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रभाते |
प्रातःकाल (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| पुनः |
फिर (अव्यय) |
| उत्थाय |
उठकर (ल्यबन्त अव्यय, उत् + स्था धातु) |
| कृत्वा |
करके (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| कर्माणि |
नित्यकर्म (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तत्त्ववित् |
वे तत्त्वज्ञ नरेश (प्रथमा विभक्ति) |
ऋषींस्तदा पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत्॥
॥ 1.73.8 ॥
हिंदी अनुवाद:
ऋषियों को आगे किये जनक की यज्ञशाला में जा पहुँचे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋषीन् |
ऋषियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| पुरस्कृत्य |
आगे किये (ल्यबन्त अव्यय, पुरस् + कृ धातु) |
| यज्ञवाटम् |
जनक की यज्ञशाला में (द्वितीया विभक्ति) |
| उपागमत् |
जा पहुँचे (उप + आ + गम् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
युक्ते मुहूर्ते विजये सर्वाभरणभूषितैः।
।
भ्रातृभिः सहितो रामः कृतकौतुकमंगलः॥ वसिष्ठं पुरतः कृत्वा महर्षीनपरानपि।
॥ 1.73.9 ॥
हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् विवाह के योग्य विजय नामक मुहूर्त आने पर दूल्हे के अनुरूप समस्त वेश-भूषा से अलंकृत हुए भाइयों के साथ श्रीरामचन्द्रजी भी वहाँ आये। वे विवाहकालोचित मंगलाचार पूर्ण कर चुके थे तथा वसिष्ठ मुनि एवं अन्यान्य महर्षियों को आगे करके उस मण्डप में पधारे थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| युक्ते |
आने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| मुहूर्ते |
मुहूर्त (सप्तमी विभक्ति) |
| विजये |
विवाह के योग्य विजय नामक (सप्तमी विभक्ति) |
| सर्वाभरणभूषितैः |
दूल्हे के अनुरूप समस्त वेश-भूषा से अलंकृत हुए (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| भ्रातृभिः |
भाइयों के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सहितः |
साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रामः |
श्रीरामचन्द्रजी भी (प्रथमा विभक्ति) |
| कृतकौतुकमङ्गलः |
विवाहकालोचित मंगलाचार पूर्ण कर चुके थे (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| वसिष्ठम् |
वसिष्ठ मुनि को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरतः |
आगे (अव्यय) |
| कृत्वा |
करके (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| महर्षीन् |
अन्यान्य महर्षियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपरान् |
अन्यान्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
वसिष्ठो भगवानेत्य वैदेहमिदमब्रवीत्॥
॥ 1.73.10 ॥
हिंदी अनुवाद:
उस समय भगवान् वसिष्ठ ने विदेहराज जनक के पास जाकर इस प्रकार कहा- ॥ १०॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वसिष्ठः |
वसिष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| भगवान् |
भगवान् (प्रथमा विभक्ति) |
| एत्य |
पास जाकर (ल्यबन्त अव्यय, आ + इ धातु) |
| वैदेहम् |
विदेहराज जनक से (द्वितीया विभक्ति) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
राजा दशरथो राजन् कृतकौतुकमंगलैः।
पुत्रैर्नरवरश्रेष्ठो दातारमभिकाङ्क्षते॥
॥ 1.73.11 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘राजन्! नरेशों में श्रेष्ठ महाराज दशरथ अपने पुत्रों का वैवाहिक सूत्र-बन्धन रूप मंगलाचार सम्पन्न करके उन सबके साथ पधारे हैं और भीतर आने के लिये दाता के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ ११॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| राजा |
महाराज (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| राजन् |
हे राजन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| कृतकौतुकमङ्गलैः |
वैवाहिक सूत्र-बन्धन रूप मंगलाचार सम्पन्न करने वाले (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| पुत्रैः |
अपने पुत्रों के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| नरवरश्रेष्ठः |
नरेशों में श्रेष्ठ (प्रथमा विभक्ति) |
| दातारम् |
दाता के आदेश की (द्वितीया विभक्ति) |
| अभिकाङ्क्षते |
प्रतीक्षा कर रहे हैं (अभि + काङ्क्ष् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
दातृप्रतिग्रहीतृभ्यां सर्वार्थाः सम्भवन्ति हि।
स्वधर्मं प्रतिपद्यस्व कृत्वा वैवाह्यमुत्तमम्॥
॥ 1.73.12 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘क्योंकि दाता और प्रतिग्रहीता (दान ग्रहण करने वाले) का संयोग होने पर ही समस्त दानधर्मो का सम्पादन सम्भव होता है; अतः आप विवाह कालोपयोगी शुभ कर्मों का अनुष्ठान करके उन्हें बुलाइये और कन्यादान रूप स्वधर्म का पालन कीजिये’ ॥ १२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दातृप्रतिग्रहीतृभ्याम् |
दाता और प्रतिग्रहीता (दान ग्रहण करने वाले) का (तृतीया विभक्ति, द्विवचन) |
| सर्वार्थाः |
समस्त दानधर्मो का (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सम्भवन्ति |
सम्पादन सम्भव होता है (सम् + भू धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| स्वधर्मम् |
कन्यादान रूप स्वधर्म का (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रतिपद्यस्व |
पालन कीजिये (प्रति + पद् धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| कृत्वा |
करके (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| वैवाह्यम् |
विवाह कालोपयोगी शुभ कर्मों का (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
इत्युक्तः परमोदारो वसिष्ठेन महात्मना।
प्रत्युवाच महातेजा वाक्यं परमधर्मवित्॥
॥ 1.73.13 ॥
हिंदी अनुवाद:
महात्मा वसिष्ठ के ऐसा कहने पर परम उदार, परम धर्मज्ञ और महातेजस्वी राजा जनक ने इस प्रकार उत्तर दिया- ॥१३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| परमोदारः |
परम उदार (प्रथमा विभक्ति) |
| वसिष्ठेन |
वसिष्ठ के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| महात्मना |
महात्मा के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| प्रत्युवाच |
उत्तर दिया (प्रति + वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी राजा जनक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| परमधर्मवित् |
परम धर्मज्ञ (प्रथमा विभक्ति) |
कः स्थितः प्रतिहारो मे कस्याज्ञां सम्प्रतीक्षते।
स्वगृहे को विचारोऽस्ति यथा राज्यमिदं तव॥ कृतकौतुकसर्वस्वा वेदिमूलमुपागताः।
॥ 1.73.14 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘मुनिश्रेष्ठ! महाराज के लिये मेरे यहाँ कौन-सा पहरेदार खड़ा है। वे किसके आदेश की प्रतीक्षा करते हैं। अपने घर में आने के लिये कैसा सोच-विचार है? यह जैसे मेरा राज्य है, वैसे ही आपका है। मेरी कन्याओं का वैवाहिक सूत्र-बन्धन रूप मंगलकृत्य सम्पन्न हो चुका है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कः |
कौन-सा (प्रथमा विभक्ति) |
| स्थितः |
खड़ा है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रतिहारः |
पहरेदार (प्रथमा विभक्ति) |
| मे |
मेरे यहाँ (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| कस्य |
किसके (षष्ठी विभक्ति) |
| आज्ञाम् |
आदेश की (द्वितीया विभक्ति) |
| सम्प्रतीक्षते |
प्रतीक्षा करते हैं (सम् + प्रति + ईक्ष् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| स्वगृहे |
अपने घर में (सप्तमी विभक्ति) |
| कः |
कैसा (प्रथमा विभक्ति) |
| विचारः |
सोच-विचार है (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्ति |
है (अस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| राज्यम् |
राज्य है (प्रथमा विभक्ति) |
| इदम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
आपका है (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| कृतकौतुकसर्वस्वाः |
वैवाहिक सूत्र-बन्धन रूप मंगलकृत्य सम्पन्न करने वाली (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| वेदिमूलम् |
यज्ञवेदी के पास (द्वितीया विभक्ति) |
| उपागताः |
आकर बैठी हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
मम कन्या मुनिश्रेष्ठ दीप्ता वह्नेरिवार्चिषः॥
॥ 1.73.15 ॥
हिंदी अनुवाद:
अब वे यज्ञवेदी के पास आकर बैठी हैं और अग्नि की प्रज्वलित शिखाओं के समान प्रकाशित हो रही हैं॥ १५॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मम |
मेरी (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| कन्याः |
कन्याओं का (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मुनिश्रेष्ठ |
हे मुनिश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| दीप्ताः |
प्रकाशित हो रही हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| वह्नेः |
अग्नि की (षष्ठी विभक्ति) |
| इव |
के समान (अव्यय) |
| अर्चिषः |
प्रज्वलित शिखाओं के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
सद्योऽहं त्वत्प्रतीक्षोऽस्मि वेद्यामस्यां प्रतिष्ठितः ।
अविघ्नं क्रियतां सर्वं किमर्थं हि विलम्ब्यते॥
॥ 1.73.16 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘इस समय तो मैं आपकी ही प्रतीक्षामें वेदीपर बैठा हूँ। आप निर्विघ्नतापूर्वक सब कार्य पूर्ण कीजिये। विलम्ब किसलिये करते हैं?’ ॥ १६ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सद्यः |
इस समय तो (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वत्प्रतीक्षः |
आपकी ही प्रतीक्षा में (प्रथमा विभक्ति, षष्ठी तत्पुरुष समास) |
| अस्मि |
हूँ (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| वेद्याम् |
वेदी पर (सप्तमी विभक्ति) |
| अस्याम् |
इस (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रतिष्ठितः |
बैठा (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अविघ्नम् |
निर्विघ्नतापूर्वक (अव्यय, क्रियाविशेषण) |
| क्रियताम् |
पूर्ण कीजिये (कृ धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सर्वम् |
सब कार्य (प्रथमा विभक्ति) |
| किमर्थम् |
किसलिये (अव्यय) |
| हि |
ही (अव्यय) |
| विलम्ब्यते |
विलम्ब करते हैं (वि + लम्ब् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
तद् वाक्यं जनकेनोक्तं श्रुत्वा दशरथस्तदा।
प्रवेशयामास सुतान् सर्वानृषिगणानपि॥
॥ 1.73.17 ॥
हिंदी अनुवाद:
वसिष्ठजी के मुख से राजा जनक की कही हुई बात सुनकर महाराज दशरथ उस समय अपने पुत्रों और सम्पूर्ण महर्षियों को महल के भीतर ले आये॥१७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| वाक्यम् |
राजा जनक की कही हुई बात (द्वितीया विभक्ति) |
| जनकेन |
जनक के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| उक्तम् |
कही हुई (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| दशरथः |
महाराज दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| प्रवेशयामास |
महल के भीतर ले आये (प्र + विश् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुतान् |
अपने पुत्रों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वान् |
सम्पूर्ण (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋषिगणान् |
महर्षियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
ततो राजा विदेहानां वसिष्ठमिदमब्रवीत्।
कारयस्व ऋषे सर्वामृषिभिः सह धार्मिक॥ रामस्य लोकरामस्य क्रियां वैवाहिकीं प्रभो।
॥ 1.73.18 ॥
हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर विदेहराज ने वसिष्ठजी से इस प्रकार कहा —'धर्मात्मा महर्षे! प्रभो! आप ऋषियों को साथ लेकर लोकाभिराम श्रीराम के विवाह की सम्पूर्ण क्रिया कराइये'॥ १८ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विदेहानाम् |
विदेहराज ने (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वसिष्ठम् |
वसिष्ठजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कारयस्व |
कराइये (कृ धातु, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| ऋषे |
हे महर्षे (सम्बोधन विभक्ति) |
| सर्वाम् |
सम्पूर्ण (द्वितीया विभक्ति) |
| ऋषिभिः |
ऋषियों को (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सह |
साथ लेकर (अव्यय) |
| धार्मिक |
हे धर्मात्मा (सम्बोधन विभक्ति) |
| रामस्य |
श्रीराम के (षष्ठी विभक्ति) |
| लोकरामस्य |
लोकाभिराम के (षष्ठी विभक्ति) |
| क्रियाम् |
विवाह की क्रिया (द्वितीया विभक्ति) |
| वैवाहिकीम् |
विवाह सम्बन्धी (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रभो |
हे प्रभो (सम्बोधन विभक्ति) |
तथेत्युक्त्वा तु जनकं वसिष्ठो भगवानृषिः॥ विश्वामित्रं पुरस्कृत्य शतानन्दं च धार्मिकम्।
॥ 1.73.19 ॥
हिंदी अनुवाद:
तब जनकजी से ‘बहुत अच्छा’ कहकर महातपस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनि ने विश्वामित्र और धर्मात्मा शतानन्दजी को आगे करके विवाह-मण्डप के मध्यभाग में विधिपूर्वक वेदी बनायी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
बहुत अच्छा (अव्यय) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| जनकम् |
जनकजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| वसिष्ठः |
वसिष्ठ मुनि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| भगवान् |
भगवान् (प्रथमा विभक्ति) |
| ऋषिः |
महातपस्वी मुनि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरस्कृत्य |
आगे करके (ल्यबन्त अव्यय, पुरस् + कृ धातु) |
| शतानन्दम् |
शतानन्दजी को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| धार्मिकम् |
धर्मात्मा को (द्वितीया विभक्ति) |
प्रपामध्ये तु विधिवद् वेदिं कृत्वा महातपाः॥ अलंचकार तां वेदिं गन्धपुष्पैः समन्ततः।
॥ 1.73.20 ॥
हिंदी अनुवाद:
विवाह-मण्डप के मध्यभाग में विधिपूर्वक वेदी बनायी और गन्ध तथा फूलों के द्वारा उसे चारों ओर से सुन्दर रूप में सजाया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रपामध्ये |
विवाह-मण्डप के मध्यभाग में (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| विधिवत् |
विधिपूर्वक (अव्यय) |
| वेदिम् |
वेदी (द्वितीया विभक्ति) |
| कृत्वा |
बनाकर (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| महातपाः |
महातपस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अलञ्चकार |
सुन्दर रूप में सजाया (अलम् + कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ताम् |
उसे (द्वितीया विभक्ति) |
| वेदिम् |
वेदी को (द्वितीया विभक्ति) |
| गन्धपुष्पैः |
गन्ध तथा फूलों के द्वारा (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| समन्ततः |
चारों ओर से (अव्यय) |
सुवर्णपालिकाभिश्च चित्रकुम्भैश्च साङ्कुरैः॥ अङ्कुराढ्यैः शरावैश्च धूपपात्रैः सधूपकैः।
॥ 1.73.21 ॥
हिंदी अनुवाद:
साथ ही बहुत-सी सुवर्ण-पालिकाएँ, यव के अंकुरों से युक्त चित्रित कलश, अंकुर जमाये हुए सकोरे, धूपयुक्त धूपपात्र, शङ्खपात्र, सुवा, मुक्, अर्घ्य आदि पूजनपात्र, लावा (खीलों) से भरे हुए पात्र तथा धोये हुए अक्षत आदि समस्त सामग्रियों को भी यथास्थान रख दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सुवर्णपालिकाभिः |
बहुत-सी सुवर्ण-पालिकाओं से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| चित्रकुम्भैः |
यव के अंकुरों से युक्त चित्रित कलशों से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| साङ्कुरैः |
यव के अंकुरों से युक्त (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| अङ्कुराढ्यैः |
अंकुर जमाये हुए (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| शरावैः |
सकोरों से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| धूपपात्रैः |
धूपयुक्त धूपपात्रों से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सधूपकैः |
धूपयुक्त (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
शङ्खपात्रैः स्रुवैः स्रग्भिः पात्रैरर्घ्यादिपूजितैः॥ लाजपूर्णैश्च पात्रीभिरक्षतैरपि संस्कृतैः।
॥ 1.73.22 ॥
हिंदी अनुवाद:
शङ्खपात्र, स्रुवा, मालाएँ, अर्घ्य आदि पूजनपात्र, लावा (खीलों) से भरे हुए पात्र तथा धोये हुए अक्षत आदि समस्त सामग्रियों को भी यथास्थान रख दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| शङ्खपात्रैः |
शङ्खपात्रों से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| स्रुवैः |
स्रुवाओं से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| स्रग्भिः |
मालाओं से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पात्रैः |
पूजनपात्रों से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अर्घ्यादिपूजितैः |
अर्घ्य आदि पूजन के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| लाजपूर्णैः |
लावा (खीलों) से भरे हुए (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| च |
और (अव्यय) |
| पात्रीभिः |
पात्रों से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अक्षतैः |
धोये हुए अक्षतों से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| संस्कृतैः |
संस्कार किये हुए (तृतीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
दर्भैः समैः समास्तीर्य विधिवन्मन्त्रपूर्वकम्॥ अग्निमाधाय तं वेद्यां विधिमन्त्रपुरस्कृतम्।
॥ 1.73.23 ॥
हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् महातेजस्वी मुनिवर वसिष्ठजी ने बराबर-बराबर कुशों को वेदी के चारों ओर बिछाकर मन्त्रोच्चारण करते हुए विधिपूर्वक अग्नि-स्थापन किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दर्भैः |
बराबर-बराबर कुशों को (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| समैः |
बराबर-बराबर (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| समास्तीर्य |
वेदी के चारों ओर बिछाकर (ल्यबन्त अव्यय, सम् + आ + स्तॄ धातु) |
| विधिवत् |
विधिपूर्वक (अव्यय) |
| मन्त्रपूर्वकम् |
मन्त्रोच्चारण करते हुए (अव्यय, क्रियाविशेषण) |
| अग्निम् |
अग्नि-स्थापन (द्वितीया विभक्ति) |
| आधाय |
करके (ल्यबन्त अव्यय, आ + धा धातु) |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| वेद्याम् |
वेदी में (सप्तमी विभक्ति) |
| विधिमन्त्रपुरस्कृतम् |
विधि को प्रधानता देते हुए मन्त्रपाठपूर्वक (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
जुहावाग्नौ महातेजा वसिष्ठो मुनिपुंगवः॥
॥ 1.73.24 ॥
हिंदी अनुवाद:
और विधि को प्रधानता देते हुए मन्त्रपाठपूर्वक प्रज्वलित अग्नि में हवन किया। २४ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| जुहाव |
हवन किया (हु धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अग्नौ |
प्रज्वलित अग्नि में (सप्तमी विभक्ति) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| वसिष्ठः |
वसिष्ठजी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| मुनिपुङ्गवः |
मुनिवर ने (प्रथमा विभक्ति) |
ततः सीतां समानीय सर्वाभरणभूषिताम्।
समक्षमग्नेः संस्थाप्य राघवाभिमुखे तदा ॥ अब्रवीज्जनको राजा कौसल्यानन्दवर्धनम्।
॥ 1.73.25 ॥
हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर राजा जनक ने सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित सीता को ले आकर अग्नि के समक्ष श्रीरामचन्द्रजी के सामने बिठा दिया और माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले उन श्रीराम से कहा —
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| सीताम् |
सीता को (द्वितीया विभक्ति) |
| समानीय |
ले आकर (ल्यबन्त अव्यय, सम् + आ + नी धातु) |
| सर्वाभरणभूषिताम् |
सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| समक्षम् |
समक्ष (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| अग्नेः |
अग्नि के (षष्ठी विभक्ति) |
| संस्थाप्य |
बिठा दिया (ल्यबन्त अव्यय, सम् + स्था धातु, प्रयोज्यार्थ) |
| राघवाभिमुखे |
श्रीरामचन्द्रजी के सामने (सप्तमी विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| जनकः |
राजा जनक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कौसल्यानन्दवर्धनम् |
माता कौसल्या का आनन्द बढ़ाने वाले उन श्रीराम से (द्वितीया विभक्ति) |
इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव॥ प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना।
॥ 1.73.26 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो। यह मेरी पुत्री सीता तुम्हारी सहधर्मिणी के रूप में उपस्थित है; इसे स्वीकार करो और इसका हाथ अपने हाथ में लो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| सीता |
सीता (प्रथमा विभक्ति) |
| मम |
मेरी (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| सुता |
पुत्री (प्रथमा विभक्ति) |
| सहधर्मचरी |
तुम्हारी सहधर्मिणी के रूप में उपस्थित है (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
तुम्हारी (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| प्रतीच्छ |
स्वीकार करो (प्रति + इष् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एनाम् |
इसे (द्वितीया विभक्ति) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| पाणिम् |
इसका हाथ (द्वितीया विभक्ति) |
| गृह्णीष्व |
अपने हाथ में लो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| पाणिना |
अपने हाथ में (तृतीया विभक्ति) |
पतिव्रता महाभागा छायेवानुगता सदा॥
॥ 1.73.27 ॥
हिंदी अनुवाद:
यह परम पतिव्रता, महान् सौभाग्यवती और छाया की भाँति सदा तुम्हारे पीछे चलनेवाली होगी’। २७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पतिव्रता |
यह परम पतिव्रता (प्रथमा विभक्ति) |
| महाभागा |
महान् सौभाग्यवती (प्रथमा विभक्ति) |
| छाया |
छाया की भाँति (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
की भाँति (अव्यय) |
| अनुगता |
तुम्हारे पीछे चलनेवाली होगी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सदा |
सदा (अव्यय) |
इत्युक्त्वा प्राक्षिपद् राजा मन्त्रपूतं जलं तदा।
साधुसाध्विति देवानामृषीणां वदतां तदा ॥
॥ 1.73.28 ॥
हिंदी अनुवाद:
यह कहकर राजा ने श्रीराम के हाथ में मन्त्र से पवित्र हुआ संकल्प का जल छोड़ दिया। उस समय देवताओं और ऋषियों के मुख से जनक के लिये साधुवाद सुनायी देने लगा॥ २८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
यह (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| प्राक्षिपत् |
छोड़ दिया (प्र + क्षिप् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| मन्त्रपूतम् |
मन्त्र से पवित्र हुआ (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| जलम् |
संकल्प का जल (द्वितीया विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| साधु साधु |
साधुवाद (अव्यय, वीप्सार्थक द्विरुक्ति) |
| इति |
ऐसे (अव्यय) |
| देवानाम् |
देवताओं के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋषीणाम् |
और ऋषियों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वदताम् |
मुख से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
देवदुन्दुभिनिर्घोषः पुष्पवर्षो महानभूत्।
एवं दत्त्वा सुतां सीतां मन्त्रोदकपुरस्कृताम्॥ अब्रवीज्जनको राजा हर्षेणाभिपरिप्लुतः।
॥ 1.73.29 ॥
हिंदी अनुवाद:
देवताओं के नगाड़े बजने लगे और आकाश से फूलों की बड़ी भारी वर्षा हुई। इस प्रकार मन्त्र और संकल्प के जल के साथ अपनी पुत्री सीता का दान करके हर्षमग्न हुए राजा जनक ने लक्ष्मण से कहा —
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| देवदुन्दुभिनिर्घोषः |
देवताओं के नगाड़े बजने लगे (प्रथमा विभक्ति) |
| पुष्पवर्षः |
और आकाश से फूलों की वर्षा (प्रथमा विभक्ति) |
| महान् |
बड़ी भारी (प्रथमा विभक्ति) |
| अभूत् |
हुई (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| दत्त्वा |
दान करके (क्त्वान्त अव्यय, दा धातु) |
| सुताम् |
अपनी पुत्री (द्वितीया विभक्ति) |
| सीताम् |
सीता का (द्वितीया विभक्ति) |
| मन्त्रोदकपुरस्कृताम् |
मन्त्र और संकल्प के जल के साथ (द्वितीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| जनकः |
राजा जनक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| हर्षेण |
हर्ष से (तृतीया विभक्ति) |
| अभिपरिप्लुतः |
हर्षमग्न हुए (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
लक्ष्मणागच्छ भद्रं ते ऊर्मिलामुद्यतां मया॥ प्रतीच्छ पाणिं गृह्णीष्व मा भूत् कालस्य पर्ययः।
॥ 1.73.30 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो, आओ, मैं ऊर्मिला को तुम्हारी सेवा में दे रहा हूँ। इसे स्वीकार करो इसका हाथ अपने हाथ में लो इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’ ॥ ३० १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| लक्ष्मण |
हे लक्ष्मण (सम्बोधन विभक्ति) |
| आगच्छ |
आओ (आ + गम् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| ऊर्मिलाम् |
ऊर्मिला को (द्वितीया विभक्ति) |
| उद्यताम् |
तुम्हारी सेवा में दे रहा हूँ (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मया |
मैं (तृतीया विभक्ति, अस्मद्) |
| प्रतीच्छ |
स्वीकार करो (प्रति + इष् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| पाणिम् |
इसका हाथ (द्वितीया विभक्ति) |
| गृह्णीष्व |
अपने हाथ में लो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मा |
नहीं (निषेधार्थक अव्यय) |
| भूत् |
होना चाहिये (भू धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, 'मा' योग में) |
| कालस्य |
इसमें (षष्ठी विभक्ति) |
| पर्ययः |
विलम्ब (प्रथमा विभक्ति) |
तमेवमुक्त्वा जनको भरतं चाभ्यभाषत ॥ गृहाण पाणिं माण्डव्याः पाणिना रघुनन्दन।
॥ 1.73.31 ॥
हिंदी अनुवाद:
लक्ष्मण से ऐसा कहकर जनक ने भरत से कहा—’रघुनन्दन! माण्डवी का हाथ अपने हाथ में लो’ ॥ ३१ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
लक्ष्मण से (द्वितीया विभक्ति) |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| जनकः |
जनक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| भरतम् |
भरत से (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अभ्यभाषत |
कहा (अभि + भाष् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| गृहाण |
लो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| पाणिम् |
हाथ (द्वितीया विभक्ति) |
| माण्डव्याः |
माण्डवी का (षष्ठी विभक्ति) |
| पाणिना |
अपने हाथ में (तृतीया विभक्ति) |
| रघुनन्दन |
हे रघुनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
शत्रुघ्नं चापि धर्मात्मा अब्रवीन्मिथिलेश्वरः॥ श्रुतकीर्तेर्महाबाहो पाणिं गृह्णीष्व पाणिना।
॥ 1.73.32 ॥
हिंदी अनुवाद:
फिर धर्मात्मा मिथिलेश ने शत्रुघ्न को सम्बोधित करके कहा—’महाबाहो! तुम अपने हाथ से श्रुतकीर्ति का पाणिग्रहण करो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| शत्रुघ्नम् |
शत्रुघ्न को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा (प्रथमा विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मिथिलेश्वरः |
मिथिलेश ने (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रुतकीर्तेः |
श्रुतकीर्ति का (षष्ठी विभक्ति) |
| महाबाहो |
हे महाबाहो (सम्बोधन विभक्ति) |
| पाणिम् |
पाणिग्रहण (द्वितीया विभक्ति) |
| गृह्णीष्व |
करो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, आत्मनेपद, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| पाणिना |
अपने हाथ से (तृतीया विभक्ति) |
सर्वे भवन्तः सौम्याश्च सर्वे सुचरितव्रताः॥ पत्नीभिः सन्तु काकुत्स्था मा भूत् कालस्य पर्ययः।
॥ 1.73.33 ॥
हिंदी अनुवाद:
‘तुम चारों भाई शान्तस्वभाव हो, तुम सबने उत्तम व्रत का भलीभाँति आचरण किया है। ककुत्स्थकुल के भूषणरूप तुम चारों भाई पत्नी से संयुक्त हो जाओ, इस कार्य में विलम्ब नहीं होना चाहिये’ ॥ ३३ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सर्वे |
तुम चारों (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भवन्तः |
तुम (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, भवत् शब्द) |
| सौम्याः |
शान्तस्वभाव हो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| सर्वे |
तुम सबने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सुचरितव्रताः |
उत्तम व्रत का भलीभाँति आचरण किया है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| पत्नीभिः |
पत्नी से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सन्तु |
संयुक्त हो जाओ (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| काकुत्स्थाः |
ककुत्स्थकुल के भूषणरूप तुम चारों भाई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मा |
नहीं (निषेधार्थक अव्यय) |
| भूत् |
होना चाहिये (भू धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, 'मा' योग में) |
| कालस्य |
इस कार्य में (षष्ठी विभक्ति) |
| पर्ययः |
विलम्ब (प्रथमा विभक्ति) |
जनकस्य वचः श्रुत्वा पाणीन् पाणिभिरस्पृशन्॥ चत्वारस्ते चतसृणां वसिष्ठस्य मते स्थिताः।
॥ 1.73.34 ॥
हिंदी अनुवाद:
” राजा जनक का यह वचन सुनकर उन चारों राजकुमारों ने चारों राजकुमारियों के हाथ अपने हाथ में लिये। फिर वसिष्ठजी की सम्मति से उन रघुकुलरत्न महामनस्वी राजकुमारों ने अपनी-अपनी पत्नी के साथ अग्नि, वेदी, राजा दशरथ तथा ऋषि-मुनियों की परिक्रमा की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| जनकस्य |
राजा जनक का (षष्ठी विभक्ति) |
| वचः |
यह वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| पाणीन् |
चारों राजकुमारियों के हाथ (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पाणिभिः |
अपने हाथ में (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अस्पृशन् |
लिये (स्पृश् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| चत्वारः |
उन चारों राजकुमारों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ते |
उन (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चतसृणाम् |
चारों का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वसिष्ठस्य |
वसिष्ठजी की (षष्ठी विभक्ति) |
| मते |
सम्मति से (सप्तमी विभक्ति) |
| स्थिताः |
स्थित हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा वेदिं राजानमेव च ॥ ऋषींश्चापि महात्मानः सहभार्या रघूद्वहाः।
॥ 1.73.35 ॥
हिंदी अनुवाद:
और वेदोक्त विधि के अनुसार वैवाहिक कार्य पूर्ण किया॥ ३५-३६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अग्निम् |
अग्नि की (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रदक्षिणम् |
परिक्रमा (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| कृत्वा |
करके (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| वेदिम् |
वेदी की (द्वितीया विभक्ति) |
| राजानम् |
राजा दशरथ की (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| ऋषीन् |
ऋषि-मुनियों की (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
भी (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| महात्मानः |
उन रघुकुलरत्न महामनस्वी राजकुमारों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सहभार्याः |
अपनी-अपनी पत्नी के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| रघूद्वहाः |
रघुकुलरत्न राजकुमारों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
यथोक्तेन ततश्चक्रुर्विवाहं विधिपूर्वकम्॥
॥ 1.73.36 ॥
हिंदी अनुवाद:
और वेदोक्त विधि के अनुसार वैवाहिक कार्य पूर्ण किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यथोक्तेन |
वेदोक्त विधि के अनुसार (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ततः |
फिर (अव्यय) |
| चक्रुः |
पूर्ण किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| विवाहम् |
वैवाहिक कार्य (द्वितीया विभक्ति) |
| विधिपूर्वकम् |
विधिपूर्वक (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
पुष्पवृष्टिर्महत्यासीदन्तरिक्षात् सुभास्वरा।
दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषैर्गीतवादित्रनिःस्वनैः॥ ननृतुश्चाप्सरःसङ्घा गन्धर्वाश्च जगुः कलम्।
॥ 1.73.37 ॥
हिंदी अनुवाद:
उस समय आकाश से फूलों की बड़ी भारी वर्षा हुई, जो सुहावनी लगती थी, दिव्य दुन्दुभियों की गम्भीर ध्वनि, दिव्य गीतों के मनोहर शब्द और दिव्य वाद्यों के मधुर घोष के साथ झुंड-के-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्व मधुर गीत गाने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पुष्पवृष्टिः |
फूलों की वर्षा (प्रथमा विभक्ति) |
| महती |
बड़ी भारी (प्रथमा विभक्ति) |
| आसीत् |
हुई (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अन्तरिक्षात् |
आकाश से (पञ्चमी विभक्ति) |
| सुभास्वरा |
जो सुहावनी लगती थी (प्रथमा विभक्ति) |
| दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषैः |
दिव्य दुन्दुभियों की गम्भीर ध्वनि से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| गीतवादित्रनिःस्वनैः |
दिव्य गीतों के मनोहर शब्द और दिव्य वाद्यों के मधुर घोष के साथ (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ननृतुः |
नृत्य करने लगीं (नृत् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अप्सरःसङ्घाः |
झुंड-के-झुंड अप्सराएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| गन्धर्वाः |
गन्धर्व (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| जगुः |
गाने लगे (गै धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| कलम् |
मधुर गीत (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
विवाहे रघुमुख्यानां तदद्भुतमदृश्यत॥
॥ 1.73.38 ॥
हिंदी अनुवाद:
उन रघुवंशशिरोमणि राजकुमारों के विवाह में वह अद्भुत दृश्य दिखायी दिया॥ ३८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विवाहे |
उन रघुवंशशिरोमणि राजकुमारों के विवाह में (सप्तमी विभक्ति) |
| रघुमुख्यानाम् |
रघुवंशशिरोमणि राजकुमारों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| अद्भुतम् |
अद्भुत दृश्य (प्रथमा विभक्ति) |
| अदृश्यत |
दिखायी दिया (दृश् धातु, कर्मवाच्य, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ईदृशे वर्तमाने तु तूर्योद्घुष्टनिनादिते।
त्रिरग्निं ते परिक्रम्य ऊहुर्भार्या महौजसः॥
॥ 1.73.39 ॥
हिंदी अनुवाद:
शहनाई आदि बाजों के मधुर घोष से गूंजते हुए उस वर्तमान विवाहोत्सव में उन महातेजस्वी राजकुमारों ने अग्नि की तीन बार परिक्रमा करके पत्नियों को स्वीकार करते हुए विवाह कर्म सम्पन्न किया॥ ३९ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ईदृशे |
ऐसे (सप्तमी विभक्ति) |
| वर्तमाने |
उस वर्तमान विवाहोत्सव में (सप्तमी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| तूर्योद्घुष्टनिनादिते |
शहनाई आदि बाजों के मधुर घोष से गूंजते हुए (सप्तमी विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| त्रिः |
तीन बार (अव्यय) |
| अग्निम् |
अग्नि की (द्वितीया विभक्ति) |
| ते |
उन (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| परिक्रम्य |
परिक्रमा करके (ल्यबन्त अव्यय, परि + क्रम् धातु) |
| ऊहुः |
स्वीकार करते हुए विवाह कर्म सम्पन्न किया (वह् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| भार्याः |
पत्नियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| महौजसः |
उन महातेजस्वी राजकुमारों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
अथोपकार्यां जग्मुस्ते सभार्या रघुनन्दनाः।
राजाप्यनुययौ पश्यन् सर्षिसङ्गः सबान्धवः॥
॥ 1.73.40 ॥
हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर रघुकुल को आनन्द प्रदान करने वाले वे चारों भाई अपनी पत्नियों के साथ जनवासे में चले गये। राजा दशरथ भी ऋषियों और बन्धु-बान्धवों के साथ पुत्रों और पुत्र-वधुओं को देखते हुए उनके पीछे-पीछे गये॥ ४०॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| उपकार्याम् |
जनवासे में (द्वितीया विभक्ति) |
| जग्मुः |
चले गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| ते |
वे चारों भाई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सभार्याः |
अपनी पत्नियों के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| रघुनन्दनाः |
रघुकुल को आनन्द प्रदान करने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राजा |
राजा दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| अनुययौ |
पीछे-पीछे गये (अनु + या धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पश्यन् |
देखते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| सर्षिसङ्गः |
ऋषियों के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| सबान्धवः |
और बन्धु-बान्धवों के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रिसप्ततितमः सर्गः॥७३॥
हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तिहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ।७३॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आर्षे |
ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| त्रिसप्ततितमः |
तिहत्तरवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥७३॥ |
संख्या ७३ (सर्ग संख्या) |
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