🌿 सर्ग 66: राजा जनक का विश्वामित्र और राम लक्ष्मण का सत्कार, धनुष का परिचय देना और धनुष चढ़ा देने पर श्रीराम के साथ ब्याह का निश्चय प्रकट करना
King Janaka honors Vishwamitra, Rama, and Lakshmana, introduces the bow, and declares his resolve to marry Sita to Shri Rama if he strings the bow
कुल श्लोक: 26
ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः।
विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम्॥
॥ 1.66.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आने पर धर्मात्मा राजा जनक ने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मण सहित महात्मा विश्वामित्रजी को बुलाया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| प्रभाते |
प्रभातकाल आने पर (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| विमले |
निर्मल (सप्तमी विभक्ति) |
| कृतकर्मा |
अपना नित्य नियम पूरा करने वाला (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| नराधिपः |
धर्मात्मा राजा जनक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्रजी को (द्वितीया विभक्ति) |
| महात्मानम् |
महात्मा को (द्वितीया विभक्ति) |
| आजुहाव |
बुलाया (आ + ह्वे धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सराघवम् |
श्रीराम और लक्ष्मण सहित (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।
राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह॥
॥ 1.66.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
और शास्त्रीय विधि के अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारों का पूजन करके इस प्रकार कहा- ॥ २॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उन मुनि का (द्वितीया विभक्ति) |
| अर्चयित्वा |
पूजन करके (क्त्वान्त अव्यय, अर्च् धातु, प्रयोज्यार्थ) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा (प्रथमा विभक्ति) |
| शास्त्रदृष्टेन |
शास्त्रीय विधि के अनुसार (तृतीया विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| कर्मणा |
कर्म द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| राघवौ |
उन दोनों राजकुमारों का (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| महात्मानौ |
महामनस्वी का (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (अव्यय) |
भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ।
भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम्॥
॥ 1.66.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘भगवन् ! आपका स्वागत है निष्पाप महर्षे! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ’॥३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भगवन् |
हे भगवन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| स्वागतम् |
स्वागत है (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| अस्तु |
हो (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| किम् |
क्या (द्वितीया विभक्ति) |
| करोमि |
करूँ (कृ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| तव |
आपकी (षष्ठी विभक्ति) |
| अनघ |
हे निष्पाप महर्षे (सम्बोधन विभक्ति) |
| भवान् |
आप (प्रथमा विभक्ति, भवत् शब्द) |
| आज्ञापयतु |
आज्ञा दीजिये (ज्ञा धातु, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, मध्यम पुरुष के अर्थ में) |
| माम् |
मुझे (द्वितीया विभक्ति, अस्मद्) |
| आज्ञाप्यः |
आज्ञापालक (प्रथमा विभक्ति, तव्य प्रत्ययान्त) |
| भवता |
आपका (तृतीया विभक्ति, भवत् शब्द) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
एवमुक्तः स धर्मात्मा जनकेन महात्मना।
प्रत्युवाच मुनिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः॥
॥ 1.66.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महात्मा जनक के ऐसा कहनेपर बोलने में कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने उनसे यह बात कही – || ४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा (प्रथमा विभक्ति) |
| जनकेन |
जनक के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| महात्मना |
महात्मा के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| प्रत्युवाच |
कहा (प्रति + वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मुनिश्रेष्ठः |
मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| वाक्यम् |
यह बात (द्वितीया विभक्ति) |
| वाक्यविशारदः |
बोलने में कुशल (प्रथमा विभक्ति) |
पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ।
द्रष्टुकामौ धनुःश्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति॥
॥ 1.66.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महाराज! राजा दशरथ के ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रखा है, उसे देखने की इच्छा रखते हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पुत्रौ |
ये दोनों पुत्र (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| दशरथस्य |
राजा दशरथ के (षष्ठी विभक्ति) |
| इमौ |
ये दोनों (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| क्षत्रियौ |
क्षत्रिय वीर हैं (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| लोकविश्रुतौ |
विश्वविख्यात (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| द्रष्टुकामौ |
देखने की इच्छा रखते हैं (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| धनुःश्रेष्ठम् |
श्रेष्ठ धनुष को (द्वितीया विभक्ति) |
| यत् |
जो (प्रथमा विभक्ति) |
| एतत् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वयि |
आपके यहाँ (सप्तमी विभक्ति, युष्मद्) |
| तिष्ठति |
रखा है (स्था धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
एतद् दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ।
दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यतः॥
॥ 1.66.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुष के दर्शन मात्र से संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानी को लौट जायँगे’ ॥६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एतत् |
वह धनुष (द्वितीया विभक्ति) |
| दर्शय |
दिखा दीजिये (दृश् धातु, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| कृतकामौ |
इच्छा पूरी हुई (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, बहुव्रीहि समास) |
| नृपात्मजौ |
ये दोनों राजकुमार (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| दर्शनात् |
दर्शन मात्र से (पञ्चमी विभक्ति) |
| अस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| धनुषः |
धनुष के (षष्ठी विभक्ति) |
| यथेष्टम् |
इच्छानुसार (अव्यय) |
| प्रतियास्यतः |
लौट जायँगे (प्रति + या धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
एवमुक्तस्तु जनकः प्रत्युवाच महामुनिम्।
श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति॥
॥ 1.66.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
मुनि के ऐसा कहने पर राजा जनक महामुनि विश्वामित्र से बोले—'मुनिवर! इस धनुष का वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्य से यह धनुष यहाँ रखा गया, वह सब बताता हूँ॥ ७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| जनकः |
राजा जनक (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रत्युवाच |
बोले (प्रति + वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| महामुनिम् |
महामुनि विश्वामित्र से (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रूयताम् |
सुनिये (श्रु धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अस्य |
इस (षष्ठी विभक्ति) |
| धनुषः |
धनुष का (षष्ठी विभक्ति) |
| यदर्थम् |
जिस उद्देश्य से (अव्यय) |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| तिष्ठति |
रखा गया (स्था धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
देवरात इति ख्यातो निमेर्ज्येष्ठो महीपतिः।
न्यासोऽयं तस्य भगवन् हस्ते दत्तो महात्मनः॥
॥ 1.66.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘भगवन् ! निमि के ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरात के नाम से विख्यात थे। उन्हीं महात्मा के हाथ में यह धनुष धरोहर के रूप में दिया गया था॥८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| देवरातः |
देवरात (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| ख्यातः |
विख्यात थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| निमेः |
निमि के (षष्ठी विभक्ति) |
| ज्येष्ठः |
ज्येष्ठ पुत्र (प्रथमा विभक्ति) |
| महीपतिः |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| न्यासः |
धरोहर के रूप में (प्रथमा विभक्ति) |
| अयम् |
यह धनुष (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उन्हीं (षष्ठी विभक्ति) |
| भगवन् |
हे भगवन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| हस्ते |
हाथ में (सप्तमी विभक्ति) |
| दत्तः |
दिया गया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महात्मनः |
उन्हीं महात्मा के (षष्ठी विभक्ति) |
दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान्।
विध्वंस्य त्रिदशान् रोषात् सलीलमिदमब्रवीत्॥ यस्माद् भागार्थिनो भागं नाकल्पयत मे सुराः।
॥ 1.66.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘कहते हैं, पूर्वकाल में दक्षयज्ञ-विध्वंस के समय परम पराक्रमी भगवान् शङ्कर ने खेल-खेल में ही रोषपूर्वक इस धनुष को उठाकर यज्ञ-विध्वंस के पश्चात् देवताओं से कहा—’देवगण ! मैं यज्ञ में भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुम लोगों ने नहीं दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दक्षयज्ञवधे |
दक्षयज्ञ-विध्वंस के समय (सप्तमी विभक्ति) |
| पूर्वम् |
पूर्वकाल में (अव्यय) |
| धनुः |
इस धनुष को (द्वितीया विभक्ति) |
| आयम्य |
उठाकर (ल्यबन्त अव्यय, आ + यम् धातु) |
| वीर्यवान् |
परम पराक्रमी भगवान् शङ्कर ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विध्वंस्य |
यज्ञ-विध्वंस के पश्चात् (ल्यबन्त अव्यय, वि + ध्वंस् धातु) |
| त्रिदशान् |
देवताओं से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| रोषात् |
रोषपूर्वक (पञ्चमी विभक्ति) |
| सलीलम् |
खेल-खेल में ही (अव्यय) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यस्मात् |
जिस कारण से (अव्यय) |
| भागार्थिनः |
भाग प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भागम् |
भाग (द्वितीया विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अकल्पयत |
दिया (कॢप् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
| मे |
मुझे (चतुर्थी विभक्ति, अस्मद्) |
| सुराः |
हे देवगण (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
वराङ्गानि महार्हाणि धनुषा शातयामि वः॥
॥ 1.66.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसलिये इस धनुष से मैं तुम सब लोगों के परम पूजनीय श्रेष्ठ अंग-मस्तक काट डालूँगा’ ॥ १० ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वराङ्गानि |
श्रेष्ठ अंग-मस्तक (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| महार्हाणि |
परम पूजनीय (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| धनुषा |
इस धनुष से (तृतीया विभक्ति) |
| शातयामि |
काट डालूँगा (शो धातु, प्रयोज्यार्थ, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| वः |
तुम सब लोगों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, युष्मद्) |
ततो विमनसः सर्वे देवा वै मुनिपुंगव।
प्रसादयन्त देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद् भवः॥
॥ 1.66.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुति के द्वारा देवाधिदेव महादेवजी को प्रसन्न करने लगे। अन्त में उन पर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये॥ ११॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
यह सुनकर (अव्यय) |
| विमनसः |
उदास हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| सर्वे |
सम्पूर्ण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| देवाः |
देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वै |
निश्चय ही (अव्यय) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मुनिश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| प्रसादयन्त |
प्रसन्न करने लगे (प्र + सद् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| देवेशम् |
देवाधिदेव महादेवजी को (द्वितीया विभक्ति) |
| तेषाम् |
उन पर (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रीतः |
प्रसन्न हो गये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अभवत् |
हो गये (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भवः |
भगवान् शिव (प्रथमा विभक्ति) |
प्रीतियुक्तस्तु सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम्।
तदेतद् देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मनः॥ न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ।
॥ 1.66.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘प्रसन्न होकर उन्होंने उन सब महामनस्वी देवताओं को यह धनुष अर्पण कर दिया। वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्कर का धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरात के पास धरोहर के रूप में रखा गया था॥ १२ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रीतियुक्तः |
प्रसन्न हुआ (प्रथमा विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| सर्वेषाम् |
उन सब (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| ददौ |
अर्पण कर दिया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तेषाम् |
उन सब (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| महात्मनाम् |
महामनस्वी देवताओं को (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| तत् |
वही (प्रथमा विभक्ति) |
| एतत् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| देवदेवस्य |
देवाधिदेव के (षष्ठी विभक्ति) |
| धनूरत्नम् |
धनुष-रत्न है (प्रथमा विभक्ति) |
| महात्मनः |
महात्मा भगवान् शङ्कर का (षष्ठी विभक्ति) |
| न्यासभूतम् |
धरोहर के रूप में रखा गया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| न्यस्तम् |
रखा गया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अस्माकम् |
हमारे (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, अस्मद्) |
| पूर्वजे |
मेरे पूर्वज महाराज देवरात के पास (सप्तमी विभक्ति) |
| विभौ |
महाराज के पास (सप्तमी विभक्ति) |
अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः॥ क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।
॥ 1.66.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘एक दिन मैं यज्ञ के लिये भूमिशोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्रभाग से जोती गयी भूमि (हराई या सीता) से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हल द्वारा खींची गयी रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| मे |
मैं (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| कृषतः |
हल चलाने वाले (षष्ठी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| क्षेत्रम् |
खेत में (द्वितीया विभक्ति) |
| लाङ्गलात् |
हल के अग्रभाग से (पञ्चमी विभक्ति) |
| उत्थिता |
प्रकट हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ततः |
उसी समय (अव्यय) |
| क्षेत्रम् |
भूमि का (द्वितीया विभक्ति) |
| शोधयता |
शोधन करते समय (तृतीया विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त, प्रयोज्यार्थ) |
| लब्धा |
प्राप्त हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| नाम्ना |
नाम से (तृतीया विभक्ति) |
| सीता |
सीता (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| विश्रुता |
प्रसिद्ध हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा॥
॥ 1.66.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई। १४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भूतलात् |
पृथ्वी से (पञ्चमी विभक्ति) |
| उत्थिता |
प्रकट हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सा |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| व्यवर्धत |
क्रमशः बढ़कर सयानी हुई (वि + वृध् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मम |
मेरी (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| आत्मजा |
कन्या (प्रथमा विभक्ति) |
वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा।
भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम्॥ वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुंगव।
॥ 1.66.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रम से इस धनुष को चढ़ा देगा, उसी के साथ मैं इसका ब्याह करूँगा। इस तरह इसे वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्क वाली) बनाकर अपने घर में रख छोड़ा है। मुनिश्रेष्ठ! भूतल से प्रकट होकर दिनों-दिन बढ़ने वाली मेरी पुत्री सीता को कई राजाओं ने यहाँ आकर माँगा॥ १५ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वीर्यशुल्का |
वीर्यशुल्का (पराक्रमरूप शुल्क वाली) (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| मे |
मैंने (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| कन्या |
अपनी इस कन्या को (प्रथमा विभक्ति) |
| स्थापिता |
रख छोड़ा है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| इयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| अयोनिजा |
अयोनिजा (प्रथमा विभक्ति) |
| भूतलात् |
भूतल से (पञ्चमी विभक्ति) |
| उत्थिताम् |
प्रकट हुई (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| वर्धमानाम् |
दिनों-दिन बढ़ने वाली (द्वितीया विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| मम |
मेरी (षष्ठी विभक्ति) |
| आत्मजाम् |
पुत्री सीता को (द्वितीया विभक्ति) |
| वरयामासुः |
माँगा (वृ धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| आगत्य |
यहाँ आकर (ल्यबन्त अव्यय, आ + गम् धातु) |
| राजानः |
कई राजाओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मुनिश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम्॥ वीर्यशुल्केति भगवन् न ददामि सुतामहम्।
॥ 1.66.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘परंतु भगवन् ! कन्या का वरण करने वाले उन सभी राजाओं को मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है। (उचित पराक्रम प्रकट करने पर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करने का अधिकारी हो सकता है।) यही कारण है कि मैंने आज तक किसी को अपनी कन्या नहीं दी॥ १६ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेषाम् |
उन (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वरयताम् |
वरण करने वाले (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| कन्याम् |
कन्या का (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वेषाम् |
उन सभी (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| पृथिवीक्षिताम् |
राजाओं को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वीर्यशुल्का |
वीर्यशुल्का है (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| भगवन् |
हे भगवन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| ददामि |
दी है (दा धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| सुताम् |
अपनी कन्या (द्वितीया विभक्ति) |
| अहम् |
मैंने (प्रथमा विभक्ति) |
ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुंगव॥ मिथिलामप्युपागम्य वीर्यं जिज्ञासवस्तदा।
॥ 1.66.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिपुंगव! तब सभी राजा मिलकर मिथिला में आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीता को प्राप्त करने के लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| नृपतयः |
राजा (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| समेत्य |
मिलकर (ल्यबन्त अव्यय, सम् + आ + इ धातु) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मुनिपुंगव (सम्बोधन विभक्ति) |
| मिथिलाम् |
मिथिला में (द्वितीया विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| उपागम्य |
आकर (ल्यबन्त अव्यय, उप + आ + गम् धातु) |
| वीर्यम् |
कौन-सा पराक्रम (द्वितीया विभक्ति) |
| जिज्ञासवः |
जानने की इच्छा वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, सन्नन्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
तेषां जिज्ञासमानानां शैवं धनुरुपाहृतम्॥ न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा ।
॥ 1.66.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मैंने पराक्रम की जिज्ञासा करने वाले उन राजाओं के सामने यह शिवजी का धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलाने में भी समर्थ न हो सके॥ १८ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेषाम् |
उन (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| जिज्ञासमानानाम् |
जिज्ञासा करने वाले (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, शानच् प्रत्ययान्त, सन्नन्त) |
| शैवम् |
यह शिवजी का (प्रथमा विभक्ति) |
| धनुः |
धनुष (प्रथमा विभक्ति) |
| उपाहृतम् |
रख दिया गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| शेकुः |
समर्थ हुए (शक् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| ग्रहणे |
उठाने में (सप्तमी विभक्ति) |
| तस्य |
इस (षष्ठी विभक्ति) |
| धनुषः |
धनुष के (षष्ठी विभक्ति) |
| तोलने |
हिलाने में (सप्तमी विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने॥ प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन।
॥ 1.66.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महामुने! उन पराक्रमी नरेशों की शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देने से इनकार कर दिया। तपोधन! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये॥ १९ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेषाम् |
उन (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वीर्यवताम् |
पराक्रमी नरेशों की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वीर्यम् |
शक्ति (द्वितीया विभक्ति) |
| अल्पम् |
बहुत थोड़ी (द्वितीया विभक्ति) |
| ज्ञात्वा |
जानकर (क्त्वान्त अव्यय, ज्ञा धातु) |
| महामुने |
हे महामुने (सम्बोधन विभक्ति) |
| प्रत्याख्याताः |
इनकार कर दिया गया (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| नृपतयः |
उन्हें कन्या देने से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तत् |
इसके बाद जो घटना घटी, उसे (द्वितीया विभक्ति) |
| निबोध |
सुन लीजिये (नि + बुध् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| तपोधन |
हे तपोधन (सम्बोधन विभक्ति) |
ततः परमकोपेन राजानो मुनिपुंगव॥ अरुन्धन् मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागताः।
॥ 1.66.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिप्रवर! मेरे इनकार करने पर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रम के विषय में संशयापन्न हो मिथिला को चारों ओर से घेरकर खड़े हो गये॥ २० १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| परमकोपेन |
अत्यन्त कुपित होने से (तृतीया विभक्ति) |
| राजानः |
ये सब राजा (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मुनिप्रवर (सम्बोधन विभक्ति) |
| अरुन्धन् |
घेरकर खड़े हो गये (रुध् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मिथिलाम् |
मिथिला को (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वे |
सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वीर्यसन्देहम् |
अपने पराक्रम के विषय में संशयापन्न होने को (द्वितीया विभक्ति) |
| आगताः |
प्राप्त हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
आत्मानमवधूतं मे विज्ञाय नृपपुंगवाः॥ रोषेण महताविष्टाः पीडयन् मिथिलां पुरीम्।
॥ 1.66.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशों ने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरी को सब ओर से पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया॥ २१ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| आत्मानम् |
अपना (द्वितीया विभक्ति) |
| अवधूतम् |
तिरस्कार हुआ (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मे |
मेरे द्वारा (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| विज्ञाय |
मानकर (ल्यबन्त अव्यय, वि + ज्ञा धातु) |
| नृपपुङ्गवाः |
उन श्रेष्ठ नरेशों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| रोषेण |
अत्यन्त रुष्ट हो (तृतीया विभक्ति) |
| महता |
अत्यन्त (तृतीया विभक्ति) |
| आविष्टाः |
युक्त हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| पीडयन् |
पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया (पीड् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मिथिलाम् |
मिथिलापुरी को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरीम् |
पुरी को (द्वितीया विभक्ति) |
ततः संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वशः॥ साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदुःखितः।
।
॥ 1.66.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिश्रेष्ठ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे। इस बीच में युद्ध के सारे साधन क्षीण हो गये इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ। २२ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| संवत्सरे |
एक वर्ष (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| पूर्णे |
पूरे होने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| क्षयम् |
क्षीण होने को (द्वितीया विभक्ति) |
| यातानि |
प्राप्त हो गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वशः |
सब प्रकार से (अव्यय) |
| साधनानि |
युद्ध के सारे साधन (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मुनिश्रेष्ठ |
हे मुनिश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| ततः |
इससे (अव्यय) |
| अहम् |
मुझे (प्रथमा विभक्ति) |
| भृशदुःखितः |
बड़ा दुःख हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
ततो देवगणान् सर्वांस्तपसाहं प्रसादयम्॥ ददुश्च परमप्रीताश्चतुरंगबलं सुराः।
॥ 1.66.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘तब मैंने तपस्या के द्वारा समस्त देवताओं को प्रसन्न करने की चेष्टा की। देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की॥ २३ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| देवगणान् |
समस्त देवताओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वान् |
सबको (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तपसा |
तपस्या के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| अहम् |
मैंने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रसादयम् |
प्रसन्न करने की चेष्टा की (प्र + सद् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| ददुः |
प्रदान की (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| परमप्रीताः |
बहुत प्रसन्न हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| चतुरङ्गबलम् |
चतुरंगिणी सेना (द्वितीया विभक्ति) |
| सुराः |
देवता ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययुः॥ अवीर्या वीर्यसन्दिग्धाः सामात्याः पापकारिणः।
॥ 1.66.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘फिर तो हमारे सैनिकों की मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होने में संदेह था, मन्त्रियों सहित भागकर विभिन्न दिशाओं में चले गये॥ २४ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
फिर तो (अव्यय) |
| भग्नाः |
मार खाकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| नृपतयः |
वे सभी राजा (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| हन्यमानाः |
मारे जाते हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शानच् प्रत्ययान्त, कर्मवाच्य) |
| दिशः |
विभिन्न दिशाओं में (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ययुः |
चले गये (या धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| अवीर्याः |
बलहीन थे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, नञ् तत्पुरुष समास) |
| वीर्यसन्दिग्धाः |
जिनके बलवान् होने में संदेह था (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| सामात्याः |
मन्त्रियों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| पापकारिणः |
पापाचारी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
तदेतन्मुनिशार्दूल धनुः परमभास्वरम्॥ रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत।
॥ 1.66.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिश्रेष्ठ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मण को भी दिखाऊँगा॥ २५ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| एतत् |
यही (प्रथमा विभक्ति) |
| मुनिशार्दूल |
हे मुनिश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| धनुः |
धनुष है (प्रथमा विभक्ति) |
| परमभास्वरम् |
परम प्रकाशमान (प्रथमा विभक्ति) |
| रामलक्ष्मणयोः |
श्रीराम और लक्ष्मण को (चतुर्थी विभक्ति, द्विवचन) |
| च |
भी (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| दर्शयिष्यामि |
दिखाऊँगा (दृश् धातु, प्रयोज्यार्थ, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| सुव्रत |
हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे (सम्बोधन विभक्ति) |
यद्यस्य धनुषो रामः कुर्यादारोपणं मुने।
सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम्॥
॥ 1.66.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुने! यदि श्रीराम इस धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीता को इन दशरथ कुमार के हाथ में दे दूँ’ ॥२६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यदि |
यदि (अव्यय) |
| अस्य |
इस (षष्ठी विभक्ति) |
| धनुषः |
धनुष की (षष्ठी विभक्ति) |
| रामः |
श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| कुर्यात् |
कर दें (कृ धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| आरोपणम् |
प्रत्यञ्चा चढ़ाना (द्वितीया विभक्ति) |
| मुने |
हे मुने (सम्बोधन विभक्ति) |
| सुताम् |
अपनी कन्या (द्वितीया विभक्ति) |
| अयोनिजाम् |
अयोनिजा (द्वितीया विभक्ति) |
| सीताम् |
सीता को (द्वितीया विभक्ति) |
| दद्याम् |
दे दूँ (दा धातु, विधिलिङ् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| दाशरथेः |
इन दशरथ कुमार के (षष्ठी विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः॥६६॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छियासठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ६६॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आर्षे |
ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| षट्षष्टितमः |
छियासठवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥६६॥ |
संख्या ६६ (सर्ग संख्या) |
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