🌿 सर्ग 65: विश्वामित्र की घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति तथा राजा जनक का उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवन को लौटना
Vishwamitra's severe penance, his attainment of Brahminhood, and King Janaka praising him and taking leave to return to his palace
कुल श्लोक: 40
अथ हैमवतीं राम दिशं त्यक्त्वा महामुनिः।
पूर्वां दिशमनुप्राप्य तपस्तेपे सुदारुणम्॥
॥ 1.65.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
(शतानन्दजी कहते हैं-) श्रीराम! पूर्वोक्त प्रतिज्ञा के अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशा को त्यागकर पूर्व दिशा में चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥१॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
पूर्वोक्त प्रतिज्ञा के अनन्तर (अव्यय) |
| हैमवतीम् |
उत्तर (हिमालय सम्बन्धी) (द्वितीया विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| दिशम् |
दिशा को (द्वितीया विभक्ति) |
| त्यक्त्वा |
त्यागकर (क्त्वान्त अव्यय, त्यज् धातु) |
| महामुनिः |
महामुनि विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| पूर्वाम् |
पूर्व (द्वितीया विभक्ति) |
| दिशम् |
दिशा में (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुप्राप्य |
चले जाकर (ल्यबन्त अव्यय, अनु + प्र + आप् धातु) |
| तपः |
तपस्या (द्वितीया विभक्ति) |
| तेपे |
करने लगे (तप् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुदारुणम् |
अत्यन्त कठोर (द्वितीया विभक्ति) |
मौनं वर्षसहस्रस्य कृत्वा व्रतमनुत्तमम्।
चकाराप्रतिमं राम तपः परमदुष्करम्॥
॥ 1.65.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
रघुनन्दन ! एक सहस्र वर्षों तक परम उत्तम मौनव्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्या में लगे रहे। उनके उस तप की कहीं तुलना न थी॥२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मौनम् |
मौनव्रत (द्वितीया विभक्ति) |
| वर्षसहस्रस्य |
एक सहस्र वर्षों तक (षष्ठी विभक्ति, कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे षष्ठी) |
| कृत्वा |
धारण करके (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| व्रतम् |
व्रत (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुत्तमम् |
परम उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
| चकार |
लगे रहे (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अप्रतिमम् |
अनुपम, जिसकी तुलना न हो (द्वितीया विभक्ति) |
| राम |
हे रघुनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
| तपः |
तपस्या में (द्वितीया विभक्ति) |
| परमदुष्करम् |
परम दुष्कर (द्वितीया विभक्ति) |
पूर्णे वर्षसहस्रे तु काष्ठभूतं महामुनिम्।
विघ्नैर्बहुभिराधूतं क्रोधो नान्तरमाविशत्॥
॥ 1.65.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
एक हजार वर्ष पूर्ण होने तक वे महामुनि काष्ठ की भाँति निश्चेष्ट बने रहे। बीच-बीच में उन पर बहुत-से विघ्नों का आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके भीतर नहीं घुसने पाया॥३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पूर्णे |
पूर्ण होने तक (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वर्षसहस्रे |
एक हजार वर्ष (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| काष्ठभूतम् |
काष्ठ की भाँति निश्चेष्ट बना हुआ (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महामुनिम् |
उन महामुनि पर (द्वितीया विभक्ति) |
| विघ्नैः |
बहुत-से विघ्नों का (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| बहुभिः |
बहुत-से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| आधूतम् |
आक्रमण हुआ (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| क्रोधः |
क्रोध (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अन्तरम् |
उनके भीतर (द्वितीया विभक्ति) |
| आविशत् |
घुसने पाया (आ + विश् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
स कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम्।
तस्य वर्षसहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः॥ भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन् काले रघूत्तम।
॥ 1.65.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीराम! अपने निश्चय पर अटल रहकर उन्होंने अक्षय तप का अनुष्ठान किया। उनका एक सहस्र वर्षों का व्रत पूर्ण होने पर वे महान् व्रतधारी महर्षि व्रत समाप्त करके अन्न ग्रहण करने को उद्यत हुए।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति) |
| कृत्वा |
रहकर (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| निश्चयम् |
अपने निश्चय पर (द्वितीया विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| तपः |
तप का (द्वितीया विभक्ति) |
| आतिष्ठत |
अनुष्ठान किया (आ + स्था धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अव्ययम् |
अक्षय (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्य |
उनका (षष्ठी विभक्ति) |
| वर्षसहस्रस्य |
एक सहस्र वर्षों का (षष्ठी विभक्ति) |
| व्रते |
व्रत (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| पूर्णे |
पूर्ण होने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महाव्रतः |
वे महान् व्रतधारी महर्षि (प्रथमा विभक्ति) |
| भोक्तुम् |
ग्रहण करने को (तुमुन्नन्त अव्यय, भुज् धातु) |
| आरब्धवान् |
उद्यत हुए (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| अन्नम् |
अन्न (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| काले |
समय (सप्तमी विभक्ति) |
| रघूत्तम |
हे रघुकुलभूषण (सम्बोधन विभक्ति) |
इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत॥
॥ 1.65.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसी समय इन्द्र ने ब्राह्मण के वेष में आकर उनसे तैयार अन्न की याचना की॥ ५॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इन्द्रः |
इन्द्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| द्विजातिः |
ब्राह्मण के वेष में (प्रथमा विभक्ति) |
| भूत्वा |
होकर (क्त्वान्त अव्यय, भू धातु) |
| तम् |
उनसे (द्वितीया विभक्ति) |
| सिद्धम् |
तैयार किया हुआ (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अन्नम् |
अन्न की (द्वितीया विभक्ति) |
| अयाचत |
याचना की (याच् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
तस्मै दत्त्वा तदा सिद्धं सर्वं विप्राय निश्चितः।
निःशेषितेऽन्ने भगवानभुक्त्वैव महातपाः॥
॥ 1.65.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब उन्होंने वह सारा तैयार किया हुआ भोजन उस ब्राह्मण को देनेका निश्चय करके दे डाला। उस अन्न में से कुछ भी शेष नहीं बचा। इसलिये वे महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र बिना खाये-पीये ही रह गये॥६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्मै |
उस (चतुर्थी विभक्ति) |
| दत्त्वा |
देकर (क्त्वान्त अव्यय, दा धातु) |
| तदा |
तब (अव्यय) |
| सिद्धम् |
वह सारा तैयार किया हुआ भोजन (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वम् |
सारा (द्वितीया विभक्ति) |
| विप्राय |
उस ब्राह्मण को (चतुर्थी विभक्ति) |
| निश्चितः |
निश्चय करके (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| निःशेषिते |
शेष नहीं बचा (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| अन्ने |
उस अन्न में से (सप्तमी विभक्ति) |
| भगवान् |
वे भगवान् विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| अभुक्त्वा |
बिना खाये-पीये (क्त्वान्त अव्यय, नञ् + भुज्) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| महातपाः |
महातपस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
न किंचिदवदद् विप्रं मौनव्रतमुपास्थितः।
।
तथैवासीत् पुनर्मौनमनुच्छ्वासं चकार ह॥
॥ 1.65.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मण से कुछ कहा नहीं। अपने मौन-व्रत का यथार्थ रूप से पालन किया। इसके बाद पुनः पहले की ही भाँति श्वासोच्छ्वास से रहित मौन-व्रत का अनुष्ठान आरम्भ किया॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
कुछ नहीं (अव्यय) |
| किञ्चित् |
कुछ (द्वितीया विभक्ति) |
| अवदत् |
कहा (वद् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| विप्रम् |
उस ब्राह्मण से (द्वितीया विभक्ति) |
| मौनव्रतम् |
अपने मौन-व्रत का (द्वितीया विभक्ति) |
| उपास्थितः |
यथार्थ रूप से पालन किया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तथा |
पहले की ही भाँति (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| आसीत् |
था (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुनः |
पुनः (अव्यय) |
| मौनम् |
श्वासोच्छ्वास से रहित मौन-व्रत का (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुच्छ्वासम् |
श्वासोच्छ्वास से रहित (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| चकार |
आरम्भ किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (अव्यय) |
अथ वर्षसहस्रं च नोच्छ्वसन् मुनिपुंगवः।
तस्यानुच्छ्वसमानस्य मूर्ध्नि धूमो व्यजायत॥
॥ 1.65.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
पूरे एक हजार वर्षां तक उन मुनिश्रेष्ठ ने साँस तक नहीं ली। इस तरह साँस न लेने के कारण उनके मस्तक से धुआँ उठने लगा॥८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| वर्षसहस्रम् |
पूरे एक हजार वर्षां तक (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे द्वितीया) |
| च |
भी (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| उच्छ्वसन् |
साँस लेता हुआ (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त, उत् + श्वस्) |
| मुनिपुङ्गवः |
उन मुनिश्रेष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उनके (षष्ठी विभक्ति) |
| अनुच्छ्वसमानस्य |
साँस न लेने के कारण (षष्ठी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, नञ् + उत् + श्वस्) |
| मूर्ध्नि |
मस्तक से (सप्तमी विभक्ति) |
| धूमः |
धुआँ (प्रथमा विभक्ति) |
| व्यजायत |
उठने लगा (वि + जन् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
त्रैलोक्यं येन सम्भ्रान्तमातापितमिवाभवत्।
ततो देवर्षिगन्धर्वाः पन्नगोरगराक्षसाः॥ मोहितास्तपसा तस्य तेजसा मन्दरश्मयः।
॥ 1.65.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उससे तीनों लोकों के प्राणी घबरा उठे, सभी संतप्त-से होने लगे। उस समय देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, सर्प और राक्षस सब मुनि की तपस्या से मोहित हो गये। उनके तेज से सब की कान्ति फीकी पड़ गयी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| त्रैलोक्यम् |
तीनों लोकों के प्राणी (प्रथमा विभक्ति) |
| येन |
जिससे (तृतीया विभक्ति) |
| सम्भ्रान्तम् |
घबरा उठे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| आतापितम् |
संतप्त-से (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| इव |
के समान (अव्यय) |
| अभवत् |
होने लगे (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ततः |
उस समय (अव्यय) |
| देवर्षिगन्धर्वाः |
देवता, ऋषि और गन्धर्व (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पन्नगोरगराक्षसाः |
नाग, सर्प और राक्षस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मोहिताः |
मोहित हो गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तपसा |
मुनि की तपस्या से (तृतीया विभक्ति) |
| तस्य |
उन मुनि की (षष्ठी विभक्ति) |
| तेजसा |
उनके तेज से (तृतीया विभक्ति) |
| मन्दरश्मयः |
कान्ति फीकी पड़ गयी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
कश्मलोपहताः सर्वे पितामहमथाब्रुवन्॥
॥ 1.65.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे सब-के-सब दुःख से व्याकुल हो पितामह ब्रह्माजी से बोले- ॥ १० ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कश्मलोपहताः |
दुःख से व्याकुल हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| सर्वे |
वे सब-के-सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पितामहम् |
पितामह ब्रह्माजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| अब्रुवन् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
बहुभिः कारणैर्देव विश्वामित्रो महामुनिः।
लोभितः क्रोधितश्चैव तपसा चाभिवर्धते॥
॥ 1.65.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘देव! अनेक प्रकार के निमित्तों द्वारा महामुनि विश्वामित्र को लोभ और क्रोध दिलाने की चेष्टा की गयी; किंतु वे अपनी तपस्या के प्रभाव से निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं।॥ ११॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| बहुभिः |
अनेक (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कारणैः |
प्रकार के निमित्तों द्वारा (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| देव |
हे देव (सम्बोधन विभक्ति) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र को (प्रथमा विभक्ति) |
| महामुनिः |
महामुनि को (प्रथमा विभक्ति) |
| लोभितः |
लोभ दिलाने की चेष्टा की गयी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| क्रोधितः |
क्रोध दिलाने की चेष्टा की गयी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| तपसा |
अपनी तपस्या के प्रभाव से (तृतीया विभक्ति) |
| च |
किंतु (अव्यय) |
| अभिवर्धते |
निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं (अभि + वृध् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
नह्यस्य वृजिनं किंचिद् दृश्यते सूक्ष्ममप्युत।
न दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम्॥ विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम्।
॥ 1.65.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘हमें उनमें कोई छोटा-सा भी दोष नहीं दिखायी देता। यदि इन्हें इनकी मनचाही वस्तु नहीं दी गयी तो ये अपनी तपस्या से चराचर प्राणियोंसहित तीनोंलोकों का नाश कर डालेंगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| हि |
ही (अव्यय) |
| अस्य |
उनमें (षष्ठी विभक्ति) |
| वृजिनम् |
कोई दोष (प्रथमा विभक्ति) |
| किञ्चित् |
कोई (प्रथमा विभक्ति) |
| दृश्यते |
दिखायी देता (दृश् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सूक्ष्मम् |
छोटा-सा (प्रथमा विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| उत |
भी (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| दीयते |
दी गयी (दा धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यदि |
यदि (अव्यय) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| अस्य |
इन्हें (षष्ठी विभक्ति) |
| मनसा |
मन से (तृतीया विभक्ति) |
| यत् |
जो (प्रथमा विभक्ति) |
| अभीप्सितम् |
इनकी मनचाही वस्तु (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सन्नन्त) |
| विनाशयति |
नाश कर डालेंगे (वि + नश् धातु, प्रयोज्यार्थ, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| त्रैलोक्यम् |
तीनों लोकों का (द्वितीया विभक्ति) |
| तपसा |
अपनी तपस्या से (तृतीया विभक्ति) |
| सचराचरम् |
चराचर प्राणियों सहित (द्वितीया विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
व्याकुलाश्च दिशः सर्वा न च किंचित् प्रकाशते॥
॥ 1.65.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस समय सारी दिशाएँ धूम से आच्छादित हो गयी हैं, कहीं कुछ भी सूझता नहीं है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| व्याकुलाः |
धूम से आच्छादित हो गयी हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| दिशः |
सारी दिशाएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वाः |
सारी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| किञ्चित् |
कुछ भी (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रकाशते |
सूझता है (प्र + काश् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
सागराः क्षुभिताः सर्वे विशीर्यन्ते च पर्वताः।
प्रकम्पते च वसुधा वायुर्वातीह संकुलः॥
॥ 1.65.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘समुद्र क्षुब्ध हो उठे हैं, सारे पर्वत विदीर्ण हुए जाते हैं, धरती डगमग हो रही है और प्रचण्ड आँधी चलने लगी है॥ १४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सागराः |
समुद्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| क्षुभिताः |
क्षुब्ध हो उठे हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सारे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विशीर्यन्ते |
विदीर्ण हुए जाते हैं (वि + शॄ धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| पर्वताः |
पर्वत (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रकम्पते |
डगमग हो रही है (प्र + कम्प् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| वसुधा |
धरती (प्रथमा विभक्ति) |
| वायुः |
आँधी (प्रथमा विभक्ति) |
| वाति |
चलने लगी है (वा धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| सङ्कुलः |
प्रचण्ड (प्रथमा विभक्ति) |
ब्रह्मन् न प्रतिजानीमो नास्तिको जायते जनः।
सम्मूढमिव त्रैलोक्यं सम्प्रक्षुभितमानसम्॥
॥ 1.65.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन् ! हमें इस उपद्रव के निवारण का कोई उपाय नहीं समझमें आता है। सब लोग नास्तिक की भाँति कर्मानुष्ठान से शून्य हो रहे हैं। तीनों लोकों के प्राणियों का मन क्षुब्ध हो गया है। सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो रहे हैं।॥ १५ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| न |
कोई उपाय नहीं (अव्यय) |
| प्रतिजानीमः |
समझ में आता है (प्रति + ज्ञा धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| नास्तिकः |
नास्तिक की भाँति (प्रथमा विभक्ति) |
| जायते |
हो रहे हैं (जन् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन, बहुवचन के अर्थ में) |
| जनः |
सब लोग (प्रथमा विभक्ति) |
| सम्मूढम् |
किंकर्तव्यविमूढ़-से हो रहे हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| इव |
के समान (अव्यय) |
| त्रैलोक्यम् |
तीनों लोकों के प्राणियों का (प्रथमा विभक्ति) |
| सम्प्रक्षुभितमानसम् |
मन क्षुब्ध हो गया है (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
भास्करो निष्प्रभश्चैव महर्षेस्तस्य तेजसा।
बुद्धिं न कुरुते यावन्नाशे देव महामुनिः॥ तावत् प्रसादो भगवन्नग्निरूपो महाद्युतिः।
॥ 1.65.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महर्षि विश्वामित्र के तेज से सूर्य की प्रभा फीकी पड़ गयी है। भगवन्! ये महाकान्तिमान् मुनि अग्निस्वरूप हो रहे हैं देव! महामुनि विश्वामित्र जबतक जगत् के विनाश का विचार नहीं करते तब तक ही इन्हें प्रसन्न कर लेना चाहिये। १६ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भास्करः |
सूर्य की (प्रथमा विभक्ति) |
| निष्प्रभः |
प्रभा फीकी पड़ गयी है (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| च |
ही (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| महर्षेः |
महर्षि विश्वामित्र के (षष्ठी विभक्ति) |
| तस्य |
उनके (षष्ठी विभक्ति) |
| तेजसा |
तेज से (तृतीया विभक्ति) |
| बुद्धिम् |
जगत् के विनाश का विचार (द्वितीया विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| कुरुते |
करते हैं (कृ धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यावत् |
जब तक (अव्यय) |
| नाशे |
विनाश का (सप्तमी विभक्ति) |
| देव |
हे देव (सम्बोधन विभक्ति) |
| महामुनिः |
महामुनि विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| तावत् |
तब तक ही (अव्यय) |
| प्रसादः |
प्रसन्न कर लेना चाहिये (प्रथमा विभक्ति) |
| भगवन् |
हे भगवन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| अग्निरूपः |
अग्निस्वरूप (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| महाद्युतिः |
ये महाकान्तिमान् मुनि (प्रथमा विभक्ति) |
कालाग्निना यथा पूर्वं त्रैलोक्यं दह्यतेऽखिलम्॥ देवराज्यं चिकीर्षते दीयतामस्य यन्मनः।
॥ 1.65.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘जैसे पूर्वकाल में प्रलयकालिक अग्नि ने सम्पूर्ण त्रिलोकी को दग्ध कर डाला था, उसी प्रकार ये भी सबको जलाकर भस्म कर देंगे। यदि ये देवताओं का राज्य प्राप्त करना चाहें तो वह भी इन्हें दे दिया जाय इनके मन में जो भी अभिलाषा हो, उसे पूर्ण किया जाय॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कालाग्निना |
प्रलयकालिक अग्नि ने (तृतीया विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| पूर्वम् |
पूर्वकाल में (अव्यय) |
| त्रैलोक्यम् |
सम्पूर्ण त्रिलोकी को (द्वितीया विभक्ति) |
| दह्यते |
दग्ध कर डाला था (दह् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, भूतकालिक अर्थ में) |
| अखिलम् |
सम्पूर्ण (द्वितीया विभक्ति) |
| देवराज्यम् |
देवताओं का राज्य (द्वितीया विभक्ति) |
| चिकीर्षते |
प्राप्त करना चाहें (कृ धातु, सन्नन्त, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दीयताम् |
दे दिया जाय (दा धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अस्य |
इन्हें (चतुर्थी विभक्ति) |
| यत् |
जो भी (प्रथमा विभक्ति) |
| मनः |
इनके मन में अभिलाषा हो (प्रथमा विभक्ति) |
ततः सुरगणाः सर्वे पितामहपुरोगमाः॥ विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यं मधुरमब्रुवन्।
॥ 1.65.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवता महात्मा विश्वामित्र के पास जाकर मधुर वाणी में बोले- ॥ १८ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| सुरगणाः |
सब देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पितामहपुरोगमाः |
ब्रह्मा आदि (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्र के पास जाकर (द्वितीया विभक्ति) |
| महात्मानम् |
महात्मा के पास (द्वितीया विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| मधुरम् |
मधुर (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रुवन् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
ब्रह्मर्षे स्वागतं तेऽस्तु तपसा स्म सुतोषिताः॥ ब्राह्मण्यं तपसोग्रेण प्राप्तवानसि कौशिक।
॥ 1.65.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मर्षे! तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारी तपस्या से बहुत संतुष्ट हुए हैं। कुशिकनन्दन! तुमने अपनी उग्र तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया। १९ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्रह्मर्षे |
हे ब्रह्मर्षे (सम्बोधन विभक्ति) |
| स्वागतम् |
स्वागत है (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| अस्तु |
हो (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तपसा |
तुम्हारी तपस्या से (तृतीया विभक्ति) |
| स्म |
हम (अव्यय, भूतकालिक अर्थ में प्रयुक्त) |
| सुतोषिताः |
बहुत संतुष्ट हुए हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| ब्राह्मण्यम् |
ब्राह्मणत्व (द्वितीया विभक्ति) |
| तपसा |
अपनी तपस्या से (तृतीया विभक्ति) |
| उग्रेण |
उग्र (तृतीया विभक्ति) |
| प्राप्तवान् |
प्राप्त कर लिया (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| असि |
हो (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| कौशिक |
हे कुशिकनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
दीर्घमायुश्च ते ब्रह्मन् ददामि समरुद्गणः॥ स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गच्छ सौम्य यथासुखम्।
॥ 1.65.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन्! मरुद्गणों सहित मैं तुम्हें दीर्घायु प्रदान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो सौम्य! तुम मंगल के भागी बनो और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ सुखपूर्वक जाओ’ ॥ २० १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दीर्घम् |
दीर्घ (द्वितीया विभक्ति) |
| आयुः |
आयु (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| ते |
तुम्हें (चतुर्थी विभक्ति, युष्मद्) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| ददामि |
प्रदान करता हूँ (दा धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| समरुद्गणः |
मरुद्गणों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| स्वस्ति |
कल्याण (अव्यय) |
| प्राप्नुहि |
के भागी बनो (प्र + आप् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
मंगल (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति) |
| गच्छ |
जाओ (गम् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सौम्य |
हे सौम्य (सम्बोधन विभक्ति) |
| यथासुखम् |
सुखपूर्वक, जहाँ इच्छा हो (अव्यय) |
पितामहवचः श्रुत्वा सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्॥ कृत्वा प्रणामं मुदितो व्याजहार महामुनिः।
॥ 1.65.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
पितामह ब्रह्माजी की यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने अत्यन्त प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवताओं को प्रणाम किया और कहा— ॥ २१ १/२ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पितामहवचः |
पितामह ब्रह्माजी की यह बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| सर्वेषाम् |
सम्पूर्ण (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| त्रिदिवौकसाम् |
देवताओं को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| कृत्वा |
करके (क्त्वान्त अव्यय, कृ धातु) |
| प्रणामम् |
प्रणाम (द्वितीया विभक्ति) |
| मुदितः |
अत्यन्त प्रसन्न हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| व्याजहार |
कहा (वि + आ + हृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| महामुनिः |
महामुनि विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
ब्राह्मण्यं यदि मे प्राप्तं दीर्घमायुस्तथैव च ॥ ॐकारोऽथ वषट्कारो वेदाश्च वरयन्तु माम्।
॥ 1.65.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘देवगण! यदि मुझे (आपकी कृपा से) ब्राह्मणत्व मिल गया और दीर्घ आयु की भी प्राप्ति हो गयी तो ॐकार, वषट्कार और चारों वेद स्वयं आकर मेरा वरण करें।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्राह्मण्यम् |
ब्राह्मणत्व (प्रथमा विभक्ति) |
| यदि |
यदि (अव्यय) |
| मे |
मुझे (चतुर्थी विभक्ति, अस्मद्) |
| प्राप्तम् |
मिल गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| दीर्घम् |
दीर्घ (प्रथमा विभक्ति) |
| आयुः |
आयु की भी (प्रथमा विभक्ति) |
| तथा |
वैसे ही (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| ॐकारः |
ॐकार (प्रथमा विभक्ति) |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| वषट्कारः |
वषट्कार (प्रथमा विभक्ति) |
| वेदाः |
चारों वेद (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| वरयन्तु |
वरण करें (वृ धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| माम् |
मेरा (द्वितीया विभक्ति, अस्मद्) |
क्षत्रवेदविदां श्रेष्ठो ब्रह्मवेदविदामपि॥ ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठो मामेवं वदतु देवताः।
॥ 1.65.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसके सिवा जो क्षत्रिय-वेद (धनुर्वेद आदि) तथा ब्रह्मवेद (ऋक् आदि चारों वेद) के ज्ञाताओं में भी सबसे श्रेष्ठ हैं, वे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ स्वयं आकर मुझसे ऐसा कहें (कि तुम ब्राह्मण हो गये)।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| क्षत्रवेदविदाम् |
जो क्षत्रिय-वेद (धनुर्वेद आदि) के ज्ञाताओं में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| श्रेष्ठः |
सबसे श्रेष्ठ हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्रह्मवेदविदाम् |
ब्रह्मवेद (ऋक् आदि चारों वेद) के ज्ञाताओं में भी (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| ब्रह्मपुत्रः |
वे ब्रह्मपुत्र (प्रथमा विभक्ति) |
| वसिष्ठः |
वसिष्ठ (प्रथमा विभक्ति) |
| माम् |
मुझसे (द्वितीया विभक्ति, अस्मद्) |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| वदतु |
कहें (वद् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| देवताः |
हे देवगण (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
यद्येवं परमः कामः कृतो यान्तु सुरर्षभाः॥
॥ 1.65.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यदि ऐसा हो जाय तो मैं समझूंगा कि मेरा उत्तम मनोरथ पूर्ण हो गया। उस अवस्था में आप सभी श्रेष्ठ देवगण यहाँ से जा सकते हैं॥ २४ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यदि |
यदि (अव्यय) |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| परमः |
उत्तम (प्रथमा विभक्ति) |
| कामः |
मनोरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| कृतः |
पूर्ण हो गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| यान्तु |
जा सकते हैं (या धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सुरर्षभाः |
हे श्रेष्ठ देवगण (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
ततः प्रसादितो देवैर्वसिष्ठो जपतां वरः।
सख्यं चकार ब्रह्मर्षिरेवमस्त्विति चाब्रवीत्॥
॥ 1.65.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब देवताओं ने मन्त्रजप करने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनि को प्रसन्न किया। इसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठने ‘एवमस्तु’ कहकर विश्वामित्र का ब्रह्मर्षि होना स्वीकार कर लिया और उनके साथ मित्रता स्थापित कर ली॥ २५॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| प्रसादितः |
प्रसन्न किया गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| देवैः |
देवताओं ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| वसिष्ठः |
वसिष्ठ मुनि (प्रथमा विभक्ति) |
| जपताम् |
मन्त्रजप करने वालों में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वरः |
श्रेष्ठ (प्रथमा विभक्ति) |
| सख्यम् |
मित्रता (द्वितीया विभक्ति) |
| चकार |
स्थापित कर ली (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ब्रह्मर्षिः |
ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| अस्तु |
हो (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
कहकर (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ब्रह्मर्षिस्त्वं न संदेहः सर्वं सम्पद्यते तव।
इत्युक्त्वा देवताश्चापि सर्वा जग्मुर्यथागतम्॥
॥ 1.65.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुने! तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें संदेह नहीं है। तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार सम्पन्न हो गया।’ ऐसा कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे वैसे लौट गये॥ २६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्रह्मर्षिः |
ब्रह्मर्षि (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वम् |
तुम (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| सन्देहः |
संदेह है (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वम् |
तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार (प्रथमा विभक्ति) |
| सम्पद्यते |
सम्पन्न हो गया (सम् + पद् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तव |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| देवताः |
सम्पूर्ण देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| सर्वाः |
सम्पूर्ण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| जग्मुः |
लौट गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यथागतम् |
जैसे आये थे वैसे (अव्यय) |
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा लब्ध्वा ब्राह्मण्यमुत्तमम्।
पूजयामास ब्रह्मर्षि वसिष्ठं जपतां वरम्॥
॥ 1.65.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजी ने भी मन्त्र-जप करने वालों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का पूजन किया॥२७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्रजी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| लब्ध्वा |
प्राप्त करके (क्त्वान्त अव्यय, लभ् धातु) |
| ब्राह्मण्यम् |
ब्राह्मणत्व (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
| पूजयामास |
पूजन किया (पूज् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ब्रह्मर्षिम् |
ब्रह्मर्षि का (द्वितीया विभक्ति) |
| वसिष्ठम् |
वसिष्ठ का (द्वितीया विभक्ति) |
| जपताम् |
मन्त्र-जप करने वालों में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| वरम् |
श्रेष्ठ का (द्वितीया विभक्ति) |
कृतकामो महीं सर्वां चचार तपसि स्थितः।
एवं त्वनेन ब्राह्मण्यं प्राप्तं राम महात्मना॥
॥ 1.65.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्या में लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरने लगे। श्रीराम! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्मा ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया॥२८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कृतकामः |
अपना मनोरथ सफल करके (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| महीम् |
सम्पूर्ण पृथ्वी पर (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वाम् |
सम्पूर्ण (द्वितीया विभक्ति) |
| चचार |
विचरने लगे (चर् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तपसि |
तपस्या में (सप्तमी विभक्ति) |
| स्थितः |
लगे रहकर ही (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| अनेन |
इन्होंने (तृतीया विभक्ति) |
| ब्राह्मण्यम् |
ब्राह्मणत्व (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राप्तम् |
प्राप्त किया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| राम |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| महात्मना |
कठोर तपस्या करके इन महात्मा ने (तृतीया विभक्ति) |
एष राम मुनिश्रेष्ठ एष विग्रहवांस्तपः।
एष धर्मः परो नित्यं वीर्यस्यैष परायणम्॥
॥ 1.65.29 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियों में श्रेष्ठ हैं, ये तपस्या के मूर्तिमान् स्वरूप हैं, उत्तम धर्म के साक्षात् विग्रह हैं और पराक्रम की परम निधि हैं। २९॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एषः |
ये विश्वामित्रजी (प्रथमा विभक्ति) |
| राम |
हे रघुनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
| मुनिश्रेष्ठः |
समस्त मुनियों में श्रेष्ठ हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| एषः |
ये (प्रथमा विभक्ति) |
| विग्रहवान् |
मूर्तिमान् स्वरूप हैं (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| तपः |
तपस्या के (प्रथमा विभक्ति) |
| एषः |
ये (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मः |
उत्तम धर्म के (प्रथमा विभक्ति) |
| परः |
उत्तम (प्रथमा विभक्ति) |
| नित्यम् |
साक्षात् विग्रह हैं (अव्यय) |
| वीर्यस्य |
पराक्रम की (षष्ठी विभक्ति) |
| एषः |
ये (प्रथमा विभक्ति) |
| परायणम् |
परम निधि हैं (प्रथमा विभक्ति) |
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम द्विजोत्तमः।
शतानन्दवचः श्रुत्वा रामलक्ष्मणसंनिधौ॥ जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच कुशिकात्मजम्।
॥ 1.65.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये। शतानन्दजी के मुख से यह कथा सुनकर महाराज जनक ने श्रीराम और लक्ष्मण के समीप विश्वामित्रजी से हाथ जोड़कर कहा- ॥ ३० १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| विरराम |
चुप हो गये (वि + रम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| द्विजोत्तमः |
विप्रवर शतानन्दजी (प्रथमा विभक्ति) |
| शतानन्दवचः |
शतानन्दजी के मुख से यह कथा (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| रामलक्ष्मणसन्निधौ |
श्रीराम और लक्ष्मण के समीप (सप्तमी विभक्ति) |
| जनकः |
महाराज जनक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्राञ्जलिः |
हाथ जोड़कर (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कुशिकात्मजम् |
विश्वामित्रजी से (द्वितीया विभक्ति) |
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगव॥ यज्ञं काकुत्स्थसहितः प्राप्तवानसि कौशिक।
॥ 1.65.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिप्रवर कौशिक! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण के साथ मेरे यज्ञ में पधारे, इससे मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर बड़ी कृपा की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| धन्यः |
धन्य (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्मि |
हो गया (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| अनुगृहीतः |
कृपा प्राप्त हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अस्मि |
हूँ (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| यस्य |
जिसका (षष्ठी विभक्ति) |
| मे |
मुझ पर (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मुनिप्रवर (सम्बोधन विभक्ति) |
| यज्ञम् |
मेरे यज्ञ में (द्वितीया विभक्ति) |
| काकुत्स्थसहितः |
ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| प्राप्तवान् |
पधारे (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| असि |
हैं (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| कौशिक |
हे कौशिक (सम्बोधन विभक्ति) |
पावितोऽहं त्वया ब्रह्मन् दर्शनेन महामुने॥
॥ 1.65.32 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महामुने! ब्रह्मन् ! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया॥ ३२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पावितः |
पवित्र कर दिया गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वया |
आपने (तृतीया विभक्ति, युष्मद्) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| दर्शनेन |
दर्शन देकर (तृतीया विभक्ति) |
| महामुने |
हे महामुने (सम्बोधन विभक्ति) |
गुणा बहुविधाः प्राप्तास्तव संदर्शनान्मया।
विस्तरेण च वै ब्रह्मन् कीर्त्यमानं महत्तपः॥ श्रुतं मया महातेजो रामेण च महात्मना।
॥ 1.65.33 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘आपके दर्शन से मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकार के गुण उपलब्ध हुए। ब्रह्मन् ! आज इस सभा में आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्यों के साथ आपके महान् तेज (प्रभाव) का वर्णन सुना है, बहुत-से गुण सुने हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गुणाः |
अनेक प्रकार के गुण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| बहुविधाः |
अनेक प्रकार के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्राप्ताः |
उपलब्ध हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तव |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| सन्दर्शनात् |
दर्शन से (पञ्चमी विभक्ति) |
| मया |
मुझे (तृतीया विभक्ति, अस्मद्) |
| विस्तरेण |
विस्तारपूर्वक (तृतीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| च |
और (अव्यय) |
| वै |
निश्चय ही (अव्यय) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| कीर्त्यमानम् |
बताया गया (द्वितीया विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, कर्मवाच्य) |
| महत् |
महान् (द्वितीया विभक्ति) |
| तपः |
तप का वृत्तान्त (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुतम् |
सुना है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मया |
मैंने (तृतीया विभक्ति) |
| महातेजः |
हे महातेजस्वी (सम्बोधन विभक्ति) |
| रामेण |
महात्मा राम के (तृतीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| महात्मना |
महात्मा के साथ (तृतीया विभक्ति) |
सदस्यैः प्राप्य च सदः श्रुतास्ते बहवो गुणाः॥
॥ 1.65.34 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
आज इस सभा में आकर मैंने अन्य सदस्यों के साथ आपके बहुत-से गुण सुने हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सदस्यैः |
अन्य सदस्यों के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्राप्य |
आकर (ल्यबन्त अव्यय, प्र + आप् धातु) |
| च |
और (अव्यय) |
| सदः |
इस सभा में (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुताः |
सुने हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| बहवः |
बहुत-से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| गुणाः |
गुण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
अप्रमेयं तपस्तुभ्यमप्रमेयं च ते बलम्।
अप्रमेया गुणाश्चैव नित्यं ते कुशिकात्मज॥
॥ 1.65.35 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘कुशिकनन्दन! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भी सदा ही माप और संख्यासे परे हैं॥ ३५ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अप्रमेयम् |
अप्रमेय है (प्रथमा विभक्ति) |
| तपः |
आपकी तपस्या (प्रथमा विभक्ति) |
| तुभ्यम् |
आपकी (चतुर्थी विभक्ति, युष्मद्) |
| अप्रमेयम् |
अनन्त है (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति) |
| बलम् |
बल (प्रथमा विभक्ति) |
| अप्रमेयाः |
माप और संख्या से परे हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| गुणाः |
आपके गुण भी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| नित्यम् |
सदा ही (अव्यय) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| कुशिकात्मज |
हे कुशिकनन्दन (सम्बोधन विभक्ति) |
तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे विभो।
कर्मकालो मुनिश्रेष्ठ लम्बते रविमण्डलम्॥
॥ 1.65.36 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘प्रभो! आपकी आश्चर्यमयी कथाओं के श्रवण से मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ! यज्ञ का समय हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं। ३६ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तृप्तिः |
तृप्ति (प्रथमा विभक्ति) |
| आश्चर्यभूतानाम् |
आपकी आश्चर्यमयी (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| कथानाम् |
कथाओं के श्रवण से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अस्ति |
होती है (अस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मे |
मुझे (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| विभो |
हे प्रभो (सम्बोधन विभक्ति) |
| कर्मकालः |
यज्ञ का समय (प्रथमा विभक्ति) |
| मुनिश्रेष्ठ |
हे मुनिश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| लम्बते |
ढलने लगे हैं (लम्ब् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रविमण्डलम् |
सूर्यदेव (प्रथमा विभक्ति) |
श्वः प्रभाते महातेजो द्रष्टुमर्हसि मां पुनः।
स्वागतं जपतां श्रेष्ठ मामनुज्ञातुमर्हसि ॥
॥ 1.65.37 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘जप करने वालों में श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने! आपका स्वागत है, कल प्रातःकाल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करें’॥ ३७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्वः |
कल (अव्यय) |
| प्रभाते |
प्रातःकाल (सप्तमी विभक्ति) |
| महातेजः |
हे महातेजस्वी मुने (सम्बोधन विभक्ति) |
| द्रष्टुम् |
दर्शन देना (तुमुन्नन्त अव्यय, दृश् धातु) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| माम् |
मुझे (द्वितीया विभक्ति, अस्मद्) |
| पुनः |
फिर (अव्यय) |
| स्वागतम् |
स्वागत है (प्रथमा विभक्ति) |
| जपताम् |
जप करने वालों में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| श्रेष्ठ |
हे श्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| माम् |
मुझे (द्वितीया विभक्ति, अस्मद्) |
| अनुज्ञातुम् |
जाने की आज्ञा देना (तुमुन्नन्त अव्यय, अनु + ज्ञा धातु) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
एवमुक्तो मुनिवरः प्रशस्य पुरुषर्षभम्।
विससर्जाशु जनकं प्रीतं प्रीतमनास्तदा॥
॥ 1.65.38 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा के ऐसा कहने पर मुनिवर विश्वामित्रजी मनही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनक की प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया॥ ३८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मुनिवरः |
मुनिवर विश्वामित्रजी (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रशस्य |
प्रशंसा करके (ल्यबन्त अव्यय, प्र + शंस् धातु) |
| पुरुषर्षभम् |
नरश्रेष्ठ राजा जनक की (द्वितीया विभक्ति) |
| विससर्ज |
विदा कर दिया (वि + सृज् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| आशु |
शीघ्र ही (अव्यय) |
| जनकम् |
राजा जनक को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रीतम् |
प्रीतियुक्त को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रीतमनाः |
मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं वैदेहो मिथिलाधिपः।
प्रदक्षिणं चकाराशु सोपाध्यायः सबान्धवः॥
॥ 1.65.39 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस समय मिथिलापति विदेहराज जनक ने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की फिर वहाँ से वे चल दिये॥ ३९ ॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
पूर्वोक्त बात (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| मुनिश्रेष्ठम् |
मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र से (द्वितीया विभक्ति) |
| वैदेहः |
विदेहराज (प्रथमा विभक्ति) |
| मिथिलाधिपः |
मिथिलापति जनक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रदक्षिणम् |
परिक्रमा (द्वितीया विभक्ति) |
| चकार |
की (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| आशु |
शीघ्र ही (अव्यय) |
| सोपाध्यायः |
अपने उपाध्याय के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| सबान्धवः |
बन्धु-बान्धवों के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा सहरामः सलक्ष्मणः।
स्ववासमभिचक्राम पूज्यमानो महात्मभिः॥
॥ 1.65.40 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओं से पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मण के साथ अपने विश्राम-स्थान पर लौट आये॥ ४०॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा (प्रथमा विभक्ति) |
| सहरामः |
श्रीराम के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| सलक्ष्मणः |
लक्ष्मण के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| स्ववासम् |
अपने विश्राम-स्थान पर (द्वितीया विभक्ति) |
| अभिचक्राम |
लौट आये (अभि + क्रम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पूज्यमानः |
पूजित होते हुए (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, कर्मवाच्य) |
| महात्मभिः |
महात्माओं से (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः॥६५॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ। ६५॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आर्षे |
ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| पञ्चषष्टितमः |
पैंसठवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥६५॥ |
संख्या ६५ (सर्ग संख्या) |
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