🌿 सर्ग 60: ऋषियोंद्वारा यज्ञ का आरम्भ, त्रिशंकु का सशरीर स्वर्गगमन, इन्द्र द्वारा स्वर्ग से उनके गिराये जाने पर क्षुब्ध हुए विश्वामित्र का नूतन देवसर्ग के लिये उद्योग
The sages begin the sacrifice, Trishanku ascends to heaven in his mortal body, and when Indra casts him down, an enraged Vishwamitra endeavors to create a new heaven
कुल श्लोक: 32
तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान्।
ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत॥
॥ 1.60.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
[शतानन्दजी कहते हैं- श्रीराम!] महोदयसहित वसिष्ठ के पुत्रों को अपने तपोबल से नष्ट हुआ जान महातेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच में इस प्रकार कहा- ॥१॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तपोबलहतान् |
अपने तपोबल से नष्ट हुए (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| ज्ञात्वा |
जानकर (क्त्वान्त अव्यय, ज्ञा धातु) |
| वासिष्ठान् |
वसिष्ठ के पुत्रों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| समहोदयान् |
महोदयसहित (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| ऋषिमध्ये |
ऋषियों के बीच में (सप्तमी विभक्ति) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अभ्यभाषत |
कहा (अभि + भाष् धातु, लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशङ्कुरिति विश्रुतः।
धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः॥
॥ 1.60.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिवरो! ये इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा त्रिशंकु हैं। ये विख्यात नरेश बड़े ही धर्मात्मा और दानी रहे हैं तथा इस समय मेरी शरण में आये हैं॥२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अयम् |
ये (प्रथमा विभक्ति) |
| इक्ष्वाकुदायादः |
इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| त्रिशङ्कुः |
त्रिशंकु (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| विश्रुतः |
विख्यात (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| धर्मिष्ठः |
बड़े ही धर्मात्मा (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| वदान्यः |
दानी (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| माम् |
मेरी (द्वितीया विभक्ति, अस्मद्) |
| च |
ही (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| शरणम् |
शरण में (द्वितीया विभक्ति) |
| गतः |
आये हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया।
यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति॥ तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह।
॥ 1.60.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इनकी इच्छा है कि मैं अपने इसी शरीर से देवलोक पर अधिकार प्राप्त करूँ। अतः आपलोग मेरे साथ रहकर ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करें, जिससे इन्हें इस शरीर से ही देवलोक की प्राप्ति हो सके’॥ ३ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| स्वेन |
अपने (तृतीया विभक्ति) |
| अनेन |
इसी (तृतीया विभक्ति) |
| शरीरेण |
शरीर से (तृतीया विभक्ति) |
| देवलोकजिगीषया |
देवलोक पर अधिकार प्राप्त करने की इच्छा से (तृतीया विभक्ति) |
| यथा |
जिससे (अव्यय) |
| अयम् |
इन्हें (प्रथमा विभक्ति) |
| स्वशरीरेण |
इस शरीर से ही (तृतीया विभक्ति) |
| देवलोकम् |
देवलोक को (द्वितीया विभक्ति) |
| गमिष्यति |
प्राप्ति हो (गम् धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तथा |
ऐसे (अव्यय) |
| प्रवर्त्यताम् |
अनुष्ठान करें (प्र + वृत् धातु, प्रयोज्यार्थ, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यज्ञः |
यज्ञ का (प्रथमा विभक्ति) |
| भवद्भिः |
आपलोग (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| मया |
मेरे (तृतीया विभक्ति, अस्मद्) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः॥ ऊचुः समेताः सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम्।
॥ 1.60.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर धर्म को जानने वाले सभी महर्षियों ने सहसा एकत्र होकर आपस में धर्मयुक्त परामर्श किया—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विश्वामित्रवचः |
विश्वामित्रजी की यह बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| महर्षयः |
महर्षियों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ऊचुः |
परामर्श किया (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| समेताः |
एकत्र होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सहसा |
सहसा (अव्यय) |
| धर्मज्ञाः |
धर्म को जानने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| धर्मसंहितम् |
धर्मयुक्त (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
अयं कुशिकदायादो मुनिः परमकोपनः॥ यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं न संशयः।
॥ 1.60.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्राह्मणो! कुशिक के पुत्र विश्वामित्र मुनि बड़े क्रोधी हैं ये जो बात कह रहे हैं, उसका ठीक तरह से पालन करना चाहिये, इसमें संशय नहीं है॥ ५ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अयम् |
ये (प्रथमा विभक्ति) |
| कुशिकदायादः |
कुशिक के पुत्र विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| मुनिः |
मुनि (प्रथमा विभक्ति) |
| परमकोपनः |
बड़े क्रोधी हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| यत् |
जो (द्वितीया विभक्ति) |
| आह |
कह रहे हैं (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वचनम् |
बात (द्वितीया विभक्ति) |
| सम्यक् |
ठीक तरह से (अव्यय) |
| एतत् |
इसका (द्वितीया विभक्ति) |
| कार्यम् |
पालन करना चाहिये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| संशयः |
संशय है (प्रथमा विभक्ति) |
अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषतः॥ तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवि।
गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा॥
॥ 1.60.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ये भगवान् विश्वामित्र अग्नि के समान तेजस्वी हैं। यदि इनकी बात नहीं मानी गयी तो ये रोषपूर्वक शाप दे देंगे। इसलिये ऐसे यज्ञ का आरम्भ करना चाहिये, जिससे विश्वामित्र के तेज से ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु सशरीर स्वर्गलोक में जा सकें’॥६-७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अग्निकल्पः |
अग्नि के समान तेजस्वी हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| हि |
ही (अव्यय) |
| भगवान् |
ये भगवान् विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| शापम् |
शाप (द्वितीया विभक्ति) |
| दास्यति |
दे देंगे (दा धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रोषतः |
रोषपूर्वक (अव्यय) |
| तस्मात् |
इसलिये (अव्यय) |
| प्रवर्त्यताम् |
आरम्भ करना चाहिये (प्र + वृत् धातु, प्रयोज्यार्थ, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यज्ञः |
यज्ञ का (प्रथमा विभक्ति) |
| सशरीरः |
सशरीर (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| यथा |
जिससे (अव्यय) |
| दिवि |
स्वर्गलोक में (सप्तमी विभक्ति) |
| गच्छेत् |
जा सकें (गम् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| इक्ष्वाकुदायादः |
ये इक्ष्वाकुनन्दन त्रिशंकु (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रस्य |
विश्वामित्र के (षष्ठी विभक्ति) |
| तेजसा |
तेज से (तृतीया विभक्ति) |
ततः प्रवर्त्यतां यज्ञः सर्वे समधितिष्ठत।
एवमुक्त्वा महर्षयः संजह्रुस्ताः क्रियास्तदा ॥
॥ 1.60.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस तरह विचार करके उन्होंने सर्वसम्मति से यह निश्चय किया कि ‘यज्ञ आरम्भ किया जाय।’ ऐसा निश्चय करके महर्षियों ने उस समय अपना-अपना कार्य आरम्भ किया॥ ८॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
इस तरह (अव्यय) |
| प्रवर्त्यताम् |
आरम्भ किया जाय (प्र + वृत् धातु, प्रयोज्यार्थ, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यज्ञः |
यज्ञ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वे |
सर्वसम्मति से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्रियाविशेषण) |
| समधितिष्ठत |
निश्चय किया (सम् + अधि + स्था धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, प्रथमा बहुवचन के अर्थ में) |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
निश्चय करके (क्त्वान्त अव्यय, वच् धातु) |
| महर्षयः |
महर्षियों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सञ्जह्रुः |
आरम्भ किया (सम् + हृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| ताः |
उस समय अपना-अपना (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| क्रियाः |
कार्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ।
ऋत्विजश्चानुपूर्व्येण मन्त्रवन्मन्त्रकोविदाः॥ चक्रुः सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि।
॥ 1.60.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं ही उस यज्ञमें याजक (अध्वर्यु) हुए। फिर क्रमशः अनेक मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण ऋत्विज् हुए; जिन्होंने कल्पशास्त्रके अनुसार विधि एवं मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारे कार्य सम्पन्न किये॥९ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| याजकः |
याजक (अध्वर्यु) (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
ही (अव्यय) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| अभवत् |
हुए (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| क्रतौ |
उस यज्ञ में (सप्तमी विभक्ति) |
| ऋत्विजः |
ऋत्विज् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
फिर (अव्यय) |
| आनुपूर्व्येण |
क्रमशः (तृतीया विभक्ति) |
| मन्त्रवत् |
मन्त्रोच्चारणपूर्वक (अव्यय) |
| मन्त्रकोविदाः |
मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चक्रुः |
सम्पन्न किये (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सर्वाणि |
सारे (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कर्माणि |
कार्य (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| यथाकल्पम् |
कल्पशास्त्र के अनुसार (अव्यय) |
| यथाविधि |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
ततः कालेन महता विश्वामित्रो महातपाः॥ चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवताः।
॥ 1.60.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर बहुत समयतक यत्नपूर्वक मन्त्रपाठ करके महातपस्वी विश्वामित्र ने अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये सम्पूर्ण देवताओं का आवाहन किया; परंतु उस समय वहाँ भाग लेने के लिये वे सब देवता नहीं आये॥१०-११॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| कालेन |
बहुत समय तक (तृतीया विभक्ति) |
| महता |
बहुत (तृतीया विभक्ति) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| महातपाः |
महातपस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| चकार |
किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| आवाहनम् |
आवाहन (द्वितीया विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| भागार्थम् |
अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये (अव्यय) |
| सर्वदेवताः |
सम्पूर्ण देवताओं का (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
नाभ्यागमंस्तदा तत्र भागार्थं सर्वदेवताः॥
॥ 1.60.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
परंतु उस समय वहाँ भाग लेने के लिये वे सब देवता नहीं आये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अभ्यागमन् |
आये (अभि + आ + गम् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| भागार्थम् |
भाग लेने के लिये (अव्यय) |
| सर्वदेवताः |
वे सब देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
ततः कोपसमाविष्टो विश्वामित्रो महामुनिः।
स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशङ्कुमिदमब्रवीत्॥
॥ 1.60.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इससे महामुनि विश्वामित्र को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने स्रुवा उठाकर रोष के साथ राजा त्रिशंकु से इस प्रकार कहा- ॥ १२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
इससे (अव्यय) |
| कोपसमाविष्टः |
बड़ा क्रोध आया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र को (प्रथमा विभक्ति) |
| महामुनिः |
महामुनि को (प्रथमा विभक्ति) |
| स्रुवम् |
स्रुवा (द्वितीया विभक्ति) |
| उद्यम्य |
उठाकर (ल्यबन्त अव्यय, उत् + यम् धातु) |
| सक्रोधः |
रोष के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| त्रिशङ्कुम् |
राजा त्रिशंकु से (द्वितीया विभक्ति) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर।
एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा ॥
॥ 1.60.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘नरेश्वर! अब तुम मेरे द्वारा उपार्जित तपस्या का बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्ति से सशरीर स्वर्गलोक में पहुँचाता हूँ॥ १३॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पश्य |
देखो (दृश् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मे |
मेरे द्वारा (षष्ठी विभक्ति, अस्मद्) |
| तपसः |
तपस्या का (षष्ठी विभक्ति) |
| वीर्यम् |
बल (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वार्जितस्य |
उपार्जित (षष्ठी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| नरेश्वर |
हे नरेश्वर (सम्बोधन विभक्ति) |
| एषः |
यह मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वाम् |
तुम्हें (द्वितीया विभक्ति, युष्मद्) |
| स्वशरीरेण |
सशरीर (तृतीया विभक्ति) |
| नयामि |
पहुँचाता हूँ (नी धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| स्वर्गम् |
स्वर्गलोक में (द्वितीया विभक्ति) |
| ओजसा |
अपनी शक्ति से (तृतीया विभक्ति) |
दुष्प्रापं स्वशरीरेण स्वर्गं गच्छ नरेश्वर।
स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपसः फलम्॥ राजंस्त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज।
॥ 1.60.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘राजन्! आज तुम अपने इस शरीर के साथ ही दुर्लभ स्वर्गलोक को जाओ। नरेश्वर! यदि मैंने तपस्या का कुछ भी फल प्राप्त किया है तो उसके प्रभाव से तुम सशरीर स्वर्गलोक को जाओ’॥ १४ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दुष्प्रापम् |
दुर्लभ (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वशरीरेण |
अपने इस शरीर के साथ ही (तृतीया विभक्ति) |
| स्वर्गम् |
स्वर्गलोक को (द्वितीया विभक्ति) |
| गच्छ |
जाओ (गम् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| नरेश्वर |
हे नरेश्वर (सम्बोधन विभक्ति) |
| स्वार्जितम् |
प्राप्त किया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| किञ्चित् |
कुछ भी (प्रथमा विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| अस्ति |
है (अस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मया |
मैंने (तृतीया विभक्ति, अस्मद्) |
| हि |
यदि (अव्यय) |
| तपसः |
तपस्या का (षष्ठी विभक्ति) |
| फलम् |
फल (प्रथमा विभक्ति) |
| राजन् |
हे राजन् (सम्बोधन विभक्ति) |
| त्वम् |
तुम (प्रथमा विभक्ति) |
| तेजसा |
उसके प्रभाव से (तृतीया विभक्ति) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| सशरीरः |
सशरीर (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| दिवम् |
स्वर्गलोक को (द्वितीया विभक्ति) |
| व्रज |
जाओ (व्रज् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वरः॥ दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा।
॥ 1.60.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीराम ! विश्वामित्र मुनि के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु सब मुनियों के देखते-देखते उस समय अपने शरीर के साथ ही स्वर्गलोक को चले गये॥ १५ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| उक्तवाक्ये |
इतना कहते ही (सप्तमी विभक्ति, बहुव्रीहि समास, सति सप्तमी) |
| मुनौ |
विश्वामित्र मुनि के (सप्तमी विभक्ति) |
| तस्मिन् |
उस समय (सप्तमी विभक्ति) |
| सशरीरः |
अपने शरीर के साथ ही (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| नरेश्वरः |
राजा त्रिशंकु (प्रथमा विभक्ति) |
| दिवम् |
स्वर्गलोक को (द्वितीया विभक्ति) |
| जगाम |
चले गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| काकुत्स्थ |
हे श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
| मुनीनाम् |
सब मुनियों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| पश्यताम् |
देखते-देखते (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशङ्कुं पाकशासनः॥ सह सर्वैः सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत्।
॥ 1.60.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
त्रिशंकु को स्वर्गलोक में पहुँचा हुआ देख समस्त देवताओं के साथ पाकशासन इन्द्र ने उनसे इस प्रकार कहा- ॥ १६ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| स्वर्गलोकम् |
स्वर्गलोक में (द्वितीया विभक्ति) |
| गतम् |
पहुँचा हुआ (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय, दृश् धातु) |
| त्रिशङ्कुम् |
त्रिशंकु को (द्वितीया विभक्ति) |
| पाकशासनः |
पाकशासन इन्द्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| सर्वैः |
समस्त (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सुरगणैः |
देवताओं के (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
त्रिशङ्को गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालयः॥ गुरुशापहतो मूढ पत भूमिमवाक्शिराः।
॥ 1.60.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मूर्ख त्रिशंकु ! तू फिर यहाँ से लौट जा, तेरे लिये स्वर्ग में स्थान नहीं है। तू गुरु के शाप से नष्ट हो चुका है, अतः नीचे मुँह किये पुनः पृथ्वी पर गिर जा’ ॥ १७ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| त्रिशङ्को |
हे त्रिशंकु (सम्बोधन विभक्ति) |
| गच्छ |
लौट जा (गम् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भूयः |
फिर (अव्यय) |
| त्वम् |
तू (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| असि |
है (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| स्वर्गकृतालयः |
स्वर्ग में स्थान बनाने वाला (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| गुरुशापहतः |
गुरु के शाप से नष्ट हो चुका है (प्रथमा विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| मूढ |
हे मूर्ख (सम्बोधन विभक्ति) |
| पत |
गिर जा (पत् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भूमिम् |
पुनः पृथ्वी पर (द्वितीया विभक्ति) |
| अवाक्शिराः |
नीचे मुँह किये (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशङ्कुरपतत् पुनः॥ विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम्।
॥ 1.60.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इन्द्र के इतना कहते ही राजा त्रिशंकु तपोधन विश्वामित्र को पुकार कर ‘त्राहि-त्राहि’ की रट लगाते हुए पुनः स्वर्ग से नीचे गिरे॥ १८ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
इतना (अव्यय) |
| उक्तः |
कहते ही (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महेन्द्रेण |
इन्द्र के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| त्रिशङ्कुः |
राजा त्रिशंकु (प्रथमा विभक्ति) |
| अपतत् |
गिरे (पत् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुनः |
पुनः (अव्यय) |
| विक्रोशमानः |
पुकार कर (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| त्राहि |
त्राहि-त्राहि की रट लगाते हुए (त्रै धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| इति |
ऐसी (अव्यय) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| तपोधनम् |
तपोधन को (द्वितीया विभक्ति) |
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिकः॥ रोषमाहारयत् तीव्रं तिष्ठ तिष्ठति चाब्रवीत्।
॥ 1.60.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकु की वह करुण पुकार सुनकर कौशिक मुनि को बड़ा क्रोध हुआ। वे त्रिशंकु से बोले– ‘राजन् ! वहीं ठहर जा, वहीं ठहर जा’ (उनके ऐसा कहने पर त्रिशंकु बीच में ही लटके रह गये) ॥ १९ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| वचनम् |
करुण पुकार (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्य |
उस चीखते-चिल्लाते हुए त्रिशंकु की (षष्ठी विभक्ति) |
| क्रोशमानस्य |
चीखते-चिल्लाते हुए (षष्ठी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| कौशिकः |
कौशिक मुनि को (प्रथमा विभक्ति) |
| रोषम् |
बड़ा क्रोध (द्वितीया विभक्ति) |
| आहारयत् |
हुआ (आ + हृ धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तीव्रम् |
बड़ा (द्वितीया विभक्ति) |
| तिष्ठ तिष्ठ |
वहीं ठहर जा, वहीं ठहर जा (स्था धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन, द्विरुक्ति आग्रहार्थ) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ऋषिमध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः॥ सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुनः।
॥ 1.60.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् तेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषिमण्डली के बीच दूसरे प्रजापति के समान दक्षिण मार्ग के लिये नये सप्तर्षियों की सृष्टि की तथा क्रोध से भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रों का भी निर्माण कर डाला॥ २०-२१॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋषिमध्ये |
ऋषिमण्डली के बीच (सप्तमी विभक्ति) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| तेजस्वी |
तेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रजापतिः |
प्रजापति के (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
समान (अव्यय) |
| अपरः |
दूसरे (प्रथमा विभक्ति) |
| सृजन् |
सृष्टि करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| दक्षिणमार्गस्थान् |
दक्षिण मार्ग में स्थित रहने वाले (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, उपपद तत्पुरुष समास) |
| सप्तर्षीन् |
नये सप्तर्षियों की (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपरान् |
दूसरे (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पुनः |
तथा (अव्यय) |
नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छितः॥
॥ 1.60.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
क्रोध से भरकर उन्होंने नवीन नक्षत्रों का भी निर्माण कर डाला।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| नक्षत्रवंशम् |
नक्षत्रों का (द्वितीया विभक्ति) |
| अपरम् |
नवीन (द्वितीया विभक्ति) |
| असृजत् |
निर्माण कर डाला (सृज् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| क्रोधमूर्च्छितः |
क्रोध से भरकर (प्रथमा विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
दक्षिणां दिशमास्थाय ऋषिमध्ये महायशाः।
सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः॥ अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिन्द्रकः।
॥ 1.60.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे महायशस्वी मुनि क्रोध से कलुषित हो दक्षिण दिशा में ऋषिमण्डली के बीच नूतन नक्षत्रमालाओं की सृष्टि करके यह विचार करने लगे कि ‘मैं दूसरे इन्द्र की सृष्टि करूँगा अथवा मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक बिना इन्द्र के ही रहेगा।’
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दक्षिणाम् |
दक्षिण (द्वितीया विभक्ति) |
| दिशम् |
दिशा में (द्वितीया विभक्ति) |
| आस्थाय |
स्थित होकर (ल्यबन्त अव्यय, आ + स्था धातु) |
| ऋषिमध्ये |
ऋषिमण्डली के बीच (सप्तमी विभक्ति) |
| महायशाः |
वे महायशस्वी मुनि (प्रथमा विभक्ति) |
| सृष्ट्वा |
सृष्टि करके (क्त्वान्त अव्यय, सृज् धातु) |
| नक्षत्रवंशम् |
नूतन नक्षत्रमालाओं की (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| क्रोधेन |
क्रोध से (तृतीया विभक्ति) |
| कलुषीकृतः |
कलुषित हो (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, च्वि प्रत्यय) |
| अन्यम् |
दूसरे (द्वितीया विभक्ति) |
| इन्द्रम् |
इन्द्र की (द्वितीया विभक्ति) |
| करिष्यामि |
सृष्टि करूँगा (कृ धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| लोकः |
मेरे द्वारा रचित स्वर्गलोक (प्रथमा विभक्ति) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| स्यात् |
रहेगा (अस् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अनिन्द्रकः |
बिना इन्द्र के ही (प्रथमा विभक्ति, नञ् तत्पुरुष समास) |
दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टुं समुपचक्रमे॥
॥ 1.60.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ऐसा निश्चय करके उन्होंने क्रोधपूर्वक नूतन देवताओं की सृष्टि प्रारम्भ की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दैवतानि |
नूतन देवताओं की (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| सः |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति) |
| क्रोधात् |
क्रोधपूर्वक (पञ्चमी विभक्ति) |
| स्रष्टुम् |
सृष्टि करने को (तुमुन्नन्त अव्यय, सृज् धातु) |
| समुपचक्रमे |
प्रारम्भ किया (सम् + उप + क्रम् धातु, लिट् लकार, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ततः परमसम्भ्रान्ताः सर्षिसङ्गाः सुरासुराः।
विश्वामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः॥
॥ 1.60.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इससे समस्त देवता, असुर और ऋषि-समुदाय बहुत घबराये और सभी वहाँ आकर महात्मा विश्वामित्र से विनयपूर्वक बोले- ॥२४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
इससे (अव्यय) |
| परमसम्भ्रान्ताः |
बहुत घबराये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्षिसङ्गाः |
ऋषि-समुदाय सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, बहुव्रीहि समास) |
| सुरासुराः |
समस्त देवता और असुर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्र से (द्वितीया विभक्ति) |
| महात्मानम् |
महात्मा से (द्वितीया विभक्ति) |
| ऊचुः |
बोले (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सानुनयम् |
विनयपूर्वक (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| वचः |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षतः।
सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन॥
॥ 1.60.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महाभाग! ये राजा त्रिशंकु गुरु के शाप से अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं; अतः तपोधन ! ये सशरीर स्वर्ग में जाने के कदापि अधिकारी नहीं हैं’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अयम् |
ये (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा त्रिशंकु (प्रथमा विभक्ति) |
| महाभाग |
हे महाभाग (सम्बोधन विभक्ति) |
| गुरुशापपरिक्षतः |
गुरु के शाप से अपना पुण्य नष्ट करके चाण्डाल हो गये हैं (प्रथमा विभक्ति, तृतीया तत्पुरुष समास) |
| सशरीरः |
सशरीर (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| दिवम् |
स्वर्ग में (द्वितीया विभक्ति) |
| यातुम् |
जाने के (तुमुन्नन्त अव्यय, या धातु) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अर्हति |
अधिकारी हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| एव |
कदापि (अव्यय) |
| तपोधन |
हे तपोधन (सम्बोधन विभक्ति) |
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगवः।
अब्रवीत् सुमहद् वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः॥
॥ 1.60.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उन देवताओं की यह बात सुनकर मुनिवर कौशिक ने सम्पूर्ण देवताओं से परमोत्कृष्ट वचन कहा – |॥ २६॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेषाम् |
उन (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| तत् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय, श्रु धातु) |
| देवानाम् |
देवताओं की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| मुनिपुङ्गवः |
मुनिवर (प्रथमा विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुमहत् |
परमोत्कृष्ट (द्वितीया विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| कौशिकः |
कौशिक ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वदेवताः |
सम्पूर्ण देवताओं से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशङ्कोरस्य भूपतेः।
आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे॥
॥ 1.60.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘देवगण! आपका कल्याण हो मैंने राजा त्रिशंक को सदेह स्वर्ग भेजनेकी प्रतिज्ञा कर ली है। अतः उसे मैं झूठी नहीं कर सकता॥ २७॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सशरीरस्य |
सदेह (षष्ठी विभक्ति) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| वः |
आपका (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, युष्मद्) |
| त्रिशङ्कोः |
राजा त्रिशंकु को (षष्ठी विभक्ति) |
| अस्य |
इन (षष्ठी विभक्ति) |
| भूपतेः |
राजा को (षष्ठी विभक्ति) |
| आरोहणम् |
स्वर्ग भेजने की (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रतिज्ञातम् |
प्रतिज्ञा कर ली है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अनृतम् |
झूठी (द्वितीया विभक्ति) |
| कर्तुम् |
करना (तुमुन्नन्त अव्यय, कृ धातु) |
| उत्सहे |
सकता (उत् + सह् धातु, लट् लकार, आत्मनेपद, उत्तम पुरुष एकवचन) |
स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वतः।
नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ॥ यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः।
यत् कृतानि सुराः सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ॥
॥ 1.60.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इन महाराज त्रिशंकु को सदा स्वर्गलोक का सुख प्राप्त होता रहे। मैंने जिन नक्षत्रों का निर्माण किया है, वे सब सदा मौजूद रहें। जब तक संसार रहे, तब तक ये सभी वस्तुएँ, जिनकी मेरे द्वारा सृष्टि हुई है, सदा बनी रहें। देवताओ! आप सब लोग इन बातों का अनुमोदन करें’॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| स्वर्गः |
स्वर्गलोक का सुख (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्तु |
प्राप्त होता रहे (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सशरीरस्य |
सदेह (षष्ठी विभक्ति) |
| त्रिशङ्कोः |
त्रिशंकु को (षष्ठी विभक्ति) |
| अस्य |
इन महाराज को (षष्ठी विभक्ति) |
| शाश्वतः |
सदा (प्रथमा विभक्ति) |
| नक्षत्राणि |
जिन नक्षत्रों का (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| सर्वाणि |
वे सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मामकानि |
मैंने निर्माण किया है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ध्रुवाणि |
सदा मौजूद रहें (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| यावत् |
जब तक (अव्यय) |
| लोकाः |
संसार (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| धरिष्यन्ति |
रहे (धृ धातु, कर्मवाच्य, लृट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तिष्ठन्तु |
बनी रहें (स्था धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| एतानि |
ये सभी वस्तुएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वशः |
सब प्रकार से (अव्यय) |
| यत् |
जिनकी (प्रथमा विभक्ति) |
| कृतानि |
सृष्टि हुई है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुराः |
हे देवताओ (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
आप सब लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तत् |
इन बातों का (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुज्ञातुम् |
अनुमोदन करना (तुमुन्नन्त अव्यय, अनु + ज्ञा धातु) |
| अर्हथ |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम्।
एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः॥ गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद् बहिः।
॥ 1.60.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनके ऐसा कहने पर सब देवता मुनिवर विश्वामित्र से बोले—'महर्षे! ऐसा ही हो ये सभी वस्तुएँ बनी रहें और आपका कल्याण हो। मुनिश्रेष्ठ ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाश में वैश्वानर पथ से बाहर प्रकाशित होंगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्ताः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुराः |
सब देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रत्यूचुः |
बोले (प्रति + वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मुनिपुङ्गवम् |
मुनिवर विश्वामित्र से (द्वितीया विभक्ति) |
| एवम् |
ऐसा ही (अव्यय) |
| भवतु |
हो (भू धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति, युष्मद्) |
| तिष्ठन्तु |
बनी रहें (स्था धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| एतानि |
ये सभी वस्तुएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वशः |
सब प्रकार से (अव्यय) |
| गगने |
आकाश में (सप्तमी विभक्ति) |
| तानि |
आपके रचे हुए वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अनेकानि |
अनेक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वैश्वानरपथात् |
वैश्वानर पथ से (पञ्चमी विभक्ति) |
| बहिः |
बाहर (अव्यय) |
नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योतिःषु जाज्वलन्॥ अवाक्शिरास्त्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः।
॥ 1.60.29 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
मुनिश्रेष्ठ ! आपके रचे हुए अनेक नक्षत्र आकाश में वैश्वानर पथ से बाहर प्रकाशित होंगे और उन्हीं ज्योतिर्मय नक्षत्रों के बीच में सिर नीचा किये त्रिशंक भी प्रकाशमान रहेंगे। वहाँ इनकी स्थिति देवताओं के समान होगी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| नक्षत्राणि |
नक्षत्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मुनिश्रेष्ठ |
हे मुनिश्रेष्ठ (सम्बोधन विभक्ति) |
| तेषु |
उन्हीं (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| ज्योतिःषु |
ज्योतिर्मय नक्षत्रों के (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| जाज्वलन् |
प्रकाशित होंगे (ज्वल् धातु, यङन्त, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| अवाक्शिराः |
सिर नीचा किये (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
| त्रिशङ्कुः |
त्रिशंकु (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
भी (अव्यय) |
| तिष्ठतु |
प्रकाशमान रहेंगे (स्था धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अमरसन्निभः |
देवताओं के समान (प्रथमा विभक्ति, बहुव्रीहि समास) |
अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम्॥ कृतार्थं कीर्तिमन्तं च स्वर्गलोकगतं यथा।
॥ 1.60.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ये सभी नक्षत्र इन कृतार्थ एवं यशस्वी नृपश्रेष्ठ का स्वर्गीय पुरुष की भाँति अनुसरण करते रहेंगे’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अनुयास्यन्ति |
अनुसरण करते रहेंगे (अनु + या धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एतानि |
ये सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ज्योतींषि |
नक्षत्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| नृपसत्तमम् |
इन नृपश्रेष्ठ का (द्वितीया विभक्ति) |
| कृतार्थम् |
कृतार्थ एवं (द्वितीया विभक्ति) |
| कीर्तिमन्तम् |
यशस्वी (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| स्वर्गलोकगतम् |
स्वर्गीय पुरुष को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| यथा |
की भाँति (अव्यय) |
विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टुतः॥ ऋषिमध्ये महातेजा बाढमित्येव देवताः।
॥ 1.60.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसके बाद सम्पूर्ण देवताओं ने ऋषियों के बीचमें ही महातेजस्वी धर्मात्मा विश्वामित्र मुनि की स्तुति की, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर देवताओं का अनुरोध स्वीकार कर लिया॥३३ १/२॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र मुनि की (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
इसके बाद (अव्यय) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा की (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वदेवैः |
सम्पूर्ण देवताओं ने (तृतीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अभिष्टुतः |
स्तुति की गयी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ऋषिमध्ये |
ऋषियों के बीच में ही (सप्तमी विभक्ति) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| बाढम् |
बहुत अच्छा (अव्यय) |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| देवताः |
देवताओं का (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधनाः।
जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम ॥
॥ 1.60.32 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
नरश्रेष्ठ श्रीराम! तदनन्तर यज्ञ समाप्त होने पर सब देवता और तपोधन महर्षि जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने-अपने स्थान को लौट गये॥३४॥
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| देवाः |
सब देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| महात्मानः |
महात्मा (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋषयः |
और ऋषि (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| तपोधनाः |
तपोधन महर्षि (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| जग्मुः |
लौट गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यथागतम् |
जैसे आये थे, उसी प्रकार (अव्यय) |
| सर्वे |
सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यज्ञस्य |
यज्ञ के (षष्ठी विभक्ति) |
| अन्ते |
समाप्त होने पर (सप्तमी विभक्ति) |
| नरोत्तम |
हे नरश्रेष्ठ श्रीराम (सम्बोधन विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षष्टितमः सर्गः॥६०॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में साठवाँ सर्ग पूरा हुआ।६०॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आर्षे |
ऋषि द्वारा कथित (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीमद्रामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| षष्टितमः |
साठवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥६०॥ |
संख्या ६० (सर्ग संख्या) |
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