🌿 सर्ग 33: राजा कुशनाभ द्वारा कन्याओं के धैर्य एवं क्षमाशीलता की प्रशंसा, ब्रह्मदत्त की उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभ की कन्याओं का विवाह
King Kushanabha praises his daughters' patience and forgiveness, the birth of Brahmadatta, and the marriage of Kushanabha's daughters to him
कुल श्लोक: 26
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कुशनाभस्य धीमतः।
शिरोभिश्चरणौ स्पृष्ट्वा कन्याशतमभाषत॥
॥ 1.33.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
बुद्धिमान् महाराज कुशनाभ का वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओं ने पिता के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| कुशनाभस्य |
बुद्धिमान् महाराज कुशनाभ का (षष्ठी विभक्ति) |
| धीमतः |
बुद्धिमान् का (षष्ठी विभक्ति) |
| शिरोभिः |
सिर से (तृतीया विभक्ति) |
| चरणौ |
चरणों में (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| स्पृष्ट्वा |
प्रणाम किया (क्त्वान्त अव्यय) |
| कन्याशतम् |
उन सौ कन्याओं ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अभाषत |
कहा (भाष् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
वायुः सर्वात्मको राजन् प्रधर्षयितुमिच्छति।
अशुभं मार्गमास्थाय न धर्मं प्रत्यवेक्षते॥
॥ 1.33.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजन्! सर्वत्र संचार करने वाले वायुदेव अशुभ मार्ग का अवलम्बन करके हम पर बलात्कार करना चाहते थे। धर्म पर उनकी दृष्टि नहीं थी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वायुः |
सर्वत्र संचार करने वाले वायुदेव (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वात्मकः |
सर्वत्र संचार करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| राजन् |
हे राजन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| प्रधर्षयितुम् |
बलात्कार करना (प्र + धृष्, प्रयोज्यार्थ, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| इच्छति |
चाहते थे (इष् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अशुभम् |
अशुभ (द्वितीया विभक्ति) |
| मार्गम् |
मार्ग का (द्वितीया विभक्ति) |
| आस्थाय |
अवलम्बन करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| धर्मम् |
धर्म पर (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रत्यवेक्षते |
दृष्टि थी (प्रति + अव + ईक्ष्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
पितृमत्यः स्म भद्रं ते स्वच्छन्दे न वयं स्थिताः।
पितरं नो वृणीष्व त्वं यदि नो दास्यते तव॥
॥ 1.33.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
हमने उनसे कहा—’देव! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं। आप पिताजी के पास जाकर हमारा वरण कीजिये। यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायँगी’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पितृमत्यः |
हमारे पिता विद्यमान हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| स्म |
हैं (अव्यय) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति) |
| स्वच्छन्दे |
स्वच्छन्द (सप्तमी विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| वयम् |
हम (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्थिताः |
हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| पितरम् |
पिताजी के पास (द्वितीया विभक्ति) |
| नः |
हमारा (अस्मद्, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| वृणीष्व |
वरण कीजिये (वृ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| यदि |
यदि (अव्यय) |
| नः |
हमें (अस्मद्, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| दास्यते |
सौंप देंगे (दा धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तव |
आपकी (षष्ठी विभक्ति) |
तेन पापानुबन्धेन वचनं न प्रतीच्छता।
एवं ब्रुवन्त्यः सर्वाः स्म वायुनाभिहता भृशम्॥
॥ 1.33.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
परंतु उनका मन तो पाप से बँधा हुआ था। उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी—बिना अपराध के ही हमें पीड़ा दी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेन |
उनका मन तो (तृतीया विभक्ति) |
| पापानुबन्धेन |
पाप से बँधा हुआ था (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वचनम् |
हमारी बात (द्वितीया विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| प्रतीच्छता |
मानी (प्रति + इष्, शतृ प्रत्ययान्त, तृतीया विभक्ति) |
| एवम् |
ये ही (अव्यय) |
| ब्रुवन्त्यः |
कह रही थीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| सर्वाः |
हम सब बहिनें (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्म |
थीं (अव्यय) |
| वायुना |
उन्होंने (तृतीया विभक्ति) |
| अभिहताः |
गहरी चोट पहुँचायी—बिना अपराध के ही पीड़ा दी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| भृशम् |
गहरी (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
तासां तु वचनं श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः।
प्रत्युवाच महातेजाः कन्याशतमनुत्तमम्॥
॥ 1.33.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजा ने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओं को इस प्रकार उत्तर दिया-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तासाम् |
उनकी (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| वचनम् |
बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| परमधार्मिकः |
परम धर्मात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रत्युवाच |
उत्तर दिया (प्रति + वच्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कन्याशतम् |
अपनी परम उत्तम सौ कन्याओं को (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुत्तमम् |
परम उत्तम को (द्वितीया विभक्ति) |
क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम्।
ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम॥
॥ 1.33.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। यह तुम लोगों के द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है। तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुल की मर्यादा पर ही दृष्टि रखी है, कामभाव को अपने मन में स्थान नहीं दिया है—यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| क्षान्तम् |
वही क्षमा (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| क्षमावताम् |
क्षमाशील महापुरुष ही (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| पुत्र्यः |
हे पुत्रियो! (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
| कर्तव्यम् |
जिसे कर सकते हैं (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| सुमहत् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| कृतम् |
की है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ऐकमत्यम् |
एकमत होकर (द्वितीया विभक्ति) |
| उपागम्य |
होकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| कुलम् |
मेरे कुल की मर्यादा पर ही (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
जो (अव्यय) |
| अवेक्षितम् |
दृष्टि रखी है, कामभाव को अपने मन में स्थान नहीं दिया है—यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति) |
अलंकारो हि नारीणां क्षमा तु पुरुषस्य वा।
दुष्करं तच्च वै क्षान्तं त्रिदशेषु विशेषतः।
यादृशी वः क्षमा पुत्र्यः सर्वासामविशेषतः॥
॥ 1.33.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है। पुत्रियो! तुम सब लोगों में समानरूप से जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओं के लिये भी दुष्कर ही है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अलङ्कारः |
आभूषण है (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| नारीणाम् |
स्त्री के लिये (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| क्षमा |
क्षमा ही (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
या (अव्यय) |
| पुरुषस्य |
पुरुष के लिये (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| वा |
हो (अव्यय) |
| दुष्करम् |
दुष्कर ही है (प्रथमा विभक्ति) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| क्षान्तम् |
क्षमा या सहिष्णुता है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| त्रिदशेषु |
देवताओं के लिये भी (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| विशेषतः |
विशेषतः (अव्यय) |
| यादृशी |
जैसी (प्रथमा विभक्ति) |
| वः |
तुम सब लोगों में (युष्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| क्षमा |
क्षमा या सहिष्णुता (प्रथमा विभक्ति) |
| पुत्र्यः |
हे पुत्रियो! (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वासाम् |
समानरूप से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अविशेषतः |
समानरूप से (अव्यय) |
क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञाश्च पुत्रिकाः।
क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमायां विष्ठितं जगत्॥
॥ 1.33.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘पुत्रियो! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमा पर भी यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| क्षमा |
क्षमा (प्रथमा विभक्ति) |
| दानम् |
दान है (प्रथमा विभक्ति) |
| क्षमा |
क्षमा (प्रथमा विभक्ति) |
| सत्यम् |
सत्य है (प्रथमा विभक्ति) |
| क्षमा |
क्षमा (प्रथमा विभक्ति) |
| यज्ञाः |
यज्ञ है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| पुत्रिकाः |
हे पुत्रियो! (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
| क्षमा |
क्षमा (प्रथमा विभक्ति) |
| यशः |
यश है (प्रथमा विभक्ति) |
| क्षमा |
क्षमा (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मः |
धर्म है (प्रथमा विभक्ति) |
| क्षमायाम् |
क्षमा पर भी (सप्तमी विभक्ति) |
| विष्ठितम् |
टिका हुआ है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| जगत् |
यह सम्पूर्ण जगत् (प्रथमा विभक्ति) |
विसृज्य कन्याः काकुत्स्थ राजा त्रिदशविक्रमः।
मन्त्रज्ञो मन्त्रयामास प्रदानं सह मन्त्रिभिः।
देशे काले च कर्तव्यं सदृशे प्रतिपादनम्॥
॥ 1.33.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभ ने कन्याओं से ऐसा कहकर उन्हें अन्तःपुर में जाने की आज्ञा दे दी और मन्त्रणा के तत्त्व को जानने वाले उन नरेश ने स्वयं मन्त्रियों के साथ बैठकर कन्याओं के विवाह के विषय में विचार आरम्भ किया। विचारणीय विषय यह था कि ‘किस देश में, किस समय और किस सुयोग्य वर के साथ उनका विवाह किया जाय?’
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विसृज्य |
अन्तःपुर में जाने की आज्ञा दे दी (ल्यबन्त अव्यय) |
| कन्याः |
कन्याओं से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| काकुत्स्थ |
हे ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| राजा |
राजा कुशनाभ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| त्रिदशविक्रमः |
देवतुल्य पराक्रमी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| मन्त्रज्ञः |
मन्त्रणा के तत्त्व को जानने वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
| मन्त्रयामास |
विचार आरम्भ किया (मन्त्र् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| प्रदानम् |
कन्याओं के विवाह के विषय में (द्वितीया विभक्ति) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| मन्त्रिभिः |
मन्त्रियों के (तृतीया विभक्ति) |
| देशे |
किस देश में (सप्तमी विभक्ति) |
| काले |
किस समय (सप्तमी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| कर्तव्यम् |
किया जाय (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| सदृशे |
किस सुयोग्य वर के साथ (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रतिपादनम् |
उनका विवाह (प्रथमा विभक्ति) |
एतस्मिन्नेव काले तु चूली नाम महाद्युतिः।
ऊर्ध्वरेताः शुभाचारो ब्राह्मं तप उपागमत्॥
॥ 1.33.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उन्हीं दिनों चूली नाम से प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) मुनि वेदोक्त तप का अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्या में संलग्न थे)।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एतस्मिन् |
उन्हीं (सप्तमी विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| काले |
दिनों (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| चूली |
चूली नाम से प्रसिद्ध एक (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| महाद्युतिः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| ऊर्ध्वरेताः |
ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) (प्रथमा विभक्ति) |
| शुभाचारः |
सदाचारी (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्राह्मम् |
वेदोक्त (द्वितीया विभक्ति) |
| तपः |
तप का (द्वितीया विभक्ति) |
| उपागमत् |
अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्या में संलग्न थे) (उप + आ + गम्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
तपस्यन्तमृषिं तत्र गन्धर्वी पर्युपासते।
सोमदा नाम भद्रं ते ऊर्मिलातनया तदा॥
॥ 1.33.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीराम! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्वकुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनि की उपासना (अनुग्रह की इच्छा से सेवा) करती थी। उसका नाम था सोमदा, वह ऊर्मिला की पुत्री थी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तपस्यन्तम् |
उन तपस्वी की (द्वितीया विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| ऋषिम् |
मुनि की (द्वितीया विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| गन्धर्वी |
एक गन्धर्वकुमारी (प्रथमा विभक्ति) |
| पर्युपासते |
उपासना (अनुग्रह की इच्छा से सेवा) करती थी (परि + उप + आस्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सोमदा |
सोमदा (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम था (अव्यय) |
| भद्रम् |
भला (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति) |
| ऊर्मिलातनया |
ऊर्मिला की पुत्री थी (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
सा च तं प्रणता भूत्वा शुश्रूषणपरायणा।
उवास काले धर्मिष्ठा तस्यास्तुष्टोऽभवद् गुरुः॥
॥ 1.33.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वह प्रतिदिन मुनि को प्रणाम करके उनकी सेवा में लगी रहती थी तथा धर्म में स्थित रहकर समय-समय पर सेवा के लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सा |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| तम् |
मुनि को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रणता |
प्रणाम करके (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| भूत्वा |
होकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| शुश्रूषणपरायणा |
उनकी सेवा में लगी रहती थी (प्रथमा विभक्ति) |
| उवास |
उपस्थित होती थी (वस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| काले |
समय-समय पर (सप्तमी विभक्ति) |
| धर्मिष्ठा |
धर्म में स्थित रहकर (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्याः |
उसके ऊपर (षष्ठी विभक्ति) |
| तुष्टः |
बहुत संतुष्ट हुए (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अभवत् |
हुए (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| गुरुः |
वे गौरवशाली मुनि (प्रथमा विभक्ति) |
स च तां कालयोगेन प्रोवाच रघुनन्दन।
परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते किं करोमि तव प्रियम्॥
॥ 1.33.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
रघुनन्दन! शुभ समय आने पर चूली ने उस गन्धर्व कन्या से कहा—’शुभे! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
उस चूली ने (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| ताम् |
उस गन्धर्व कन्या से (द्वितीया विभक्ति) |
| कालयोगेन |
शुभ समय आने पर (तृतीया विभक्ति) |
| प्रोवाच |
कहा (प्र + वच्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रघुनन्दन |
हे रघुनन्दन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| परितुष्टः |
बहुत संतुष्ट (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अस्मि |
हूँ (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति) |
| किम् |
कौन-सा (द्वितीया विभक्ति) |
| करोमि |
सिद्ध करूँ (कृ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| तव |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति) |
| प्रियम् |
प्रिय कार्य (द्वितीया विभक्ति) |
परितुष्टं मुनिं ज्ञात्वा गन्धर्वी मधुरस्वरम्।
उवाच परमप्रीता वाक्यज्ञा वाक्यकोविदम्॥
॥ 1.33.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
मुनि को संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई। वह बोलने की कला जानती थी; उसने वाणी के मर्मज्ञ मुनि से मधुर स्वर में इस प्रकार कहा-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| परितुष्टम् |
संतुष्ट (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मुनिम् |
मुनि को (द्वितीया विभक्ति) |
| ज्ञात्वा |
जानकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| गन्धर्वी |
गन्धर्व-कन्या (प्रथमा विभक्ति) |
| मधुरस्वरम् |
मधुर स्वर में (द्वितीया विभक्ति/क्रियाविशेषण) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| परमप्रीता |
बहुत प्रसन्न हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वाक्यज्ञा |
वह बोलने की कला जानती थी (प्रथमा विभक्ति) |
| वाक्यकोविदम् |
वाणी के मर्मज्ञ मुनि से (द्वितीया विभक्ति) |
लक्ष्म्या समुदितो ब्राह्म्या ब्रह्मभूतो महातपाः।
ब्राह्मेण तपसा युक्तं पुत्रमिच्छामि धार्मिकम्॥
॥ 1.33.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महर्षे! आप ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से सम्पन्न होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं। मैं आपसे ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| लक्ष्म्या |
ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से (तृतीया विभक्ति) |
| समुदितः |
सम्पन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ब्राह्म्या |
ब्राह्मी से (तृतीया विभक्ति) |
| ब्रह्मभूतः |
ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महातपाः |
अतएव आप महान् तपस्वी हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्राह्मेण |
ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से (तृतीया विभक्ति) |
| तपसा |
तप से (तृतीया विभक्ति) |
| युक्तम् |
युक्त (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| पुत्रम् |
धर्मात्मा पुत्र (द्वितीया विभक्ति) |
| इच्छामि |
प्राप्त करना चाहती हूँ (इष् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| धार्मिकम् |
धर्मात्मा को (द्वितीया विभक्ति) |
अपतिश्चास्मि भद्रं ते भार्या चास्मि न कस्यचित्।
ब्राह्मेणोपगतायाश्च दातुमर्हसि मे सुतम्॥
॥ 1.33.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुने! आपका भला हो। मेरे कोई पति नहीं है। मैं न तो किसी की पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी, आपकी सेवा में आयी हूँ; आप अपने ब्राह्म बल (तपःशक्ति) से मुझे पुत्र प्रदान करें’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अपतिः |
मेरे कोई पति नहीं है (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अस्मि |
है (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
भला (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति) |
| भार्या |
मैं न तो किसी की पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अस्मि |
हूँ (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| कस्यचित् |
किसी की (षष्ठी विभक्ति) |
| ब्राह्मेण |
अपने ब्राह्म बल (तपःशक्ति) से (तृतीया विभक्ति) |
| उपगतायाः |
आपकी सेवा में आयी हूँ (षष्ठी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
ही (अव्यय) |
| दातुम् |
प्रदान करें (दा धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मे |
मुझे (चतुर्थी विभक्ति) |
| सुतम् |
पुत्र (द्वितीया विभक्ति) |
तस्याः प्रसन्नो ब्रह्मर्षिर्ददौ ब्राह्ममनुत्तमम्।
ब्रह्मदत्त इति ख्यातं मानसं चूलिनः सुतम्॥
॥ 1.33.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस गन्धर्व कन्या की सेवा से संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूली ने उसे परम उत्तम ब्राह्म तप से सम्पन्न पुत्र प्रदान किया। वह उनके मानसिक संकल्प से प्रकट हुआ मानस पुत्र था। उसका नाम ‘ब्रह्मदत्त’ हुआ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्याः |
उस गन्धर्व कन्या की सेवा से (षष्ठी विभक्ति) |
| प्रसन्नः |
संतुष्ट हुए (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ब्रह्मर्षिः |
ब्रह्मर्षि चूली ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ददौ |
प्रदान किया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ब्राह्मम् |
परम उत्तम ब्राह्म तप से सम्पन्न पुत्र (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुत्तमम् |
परम उत्तम को (द्वितीया विभक्ति) |
| ब्रह्मदत्तः |
‘ब्रह्मदत्त’ (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| ख्यातम् |
हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मानसम् |
मानस पुत्र था (प्रथमा विभक्ति) |
| चूलिनः |
उनके (षष्ठी विभक्ति) |
| सुतम् |
मानसिक संकल्प से प्रकट हुआ मानस पुत्र (द्वितीया विभक्ति) |
स राजा ब्रह्मदत्तस्तु पुरीमध्यवसत् तदा।
काम्पिल्यां परया लक्ष्म्या देवराजो यथा दिवम्॥
॥ 1.33.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
(कुशनाभ के यहाँ जब कन्याओं के विवाह का विचार चल रहा था) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मी से सम्पन्न हो ‘काम्पिल्या’ नामक नगरी में उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्ग की अमरावतीपुरी में देवराज इन्द्र।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह राजा ब्रह्मदत्त (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्रह्मदत्तः |
ब्रह्मदत्त (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| पुरीम् |
‘काम्पिल्या’ नामक नगरी में (द्वितीया विभक्ति) |
| अध्यवसत् |
निवास करते थे (अधि + वस्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| काम्पिल्याम् |
‘काम्पिल्या’ नामक नगरी में (सप्तमी विभक्ति) |
| परया |
उत्तम (तृतीया विभक्ति) |
| लक्ष्म्या |
लक्ष्मी से (तृतीया विभक्ति) |
| देवराजः |
देवराज इन्द्र (प्रथमा विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| दिवम् |
स्वर्ग की अमरावतीपुरी में (द्वितीया विभक्ति) |
स बुद्धिं कृतवान् राजा कुशनाभः सुधार्मिकः।
ब्रह्मदत्ताय काकुत्स्थ दातुं कन्याशतं तदा॥
॥ 1.33.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त के साथ अपनी सौ कन्याओं को ब्याह देने का निश्चय किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| बुद्धिम् |
निश्चय (द्वितीया विभक्ति) |
| कृतवान् |
किया (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कुशनाभः |
परम धर्मात्मा राजा कुशनाभ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सुधार्मिकः |
परम धर्मात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्रह्मदत्ताय |
ब्रह्मदत्त के साथ (चतुर्थी विभक्ति) |
| काकुत्स्थ |
हे ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| दातुम् |
ब्याह देने का (दा धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| कन्याशतम् |
अपनी सौ कन्याओं को (द्वितीया विभक्ति) |
| तदा |
तब (अव्यय) |
तमाहूय महातेजा ब्रह्मदत्तं महीपतिः।
ददौ कन्याशतं राजा सुप्रीतेनान्तरात्मना॥
॥ 1.33.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभ ने ब्रह्मदत्त को बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्त से उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उन्हें (द्वितीया विभक्ति) |
| आहूय |
बुलाकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्रह्मदत्तम् |
ब्रह्मदत्त को (द्वितीया विभक्ति) |
| महीपतिः |
भूपाल ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ददौ |
सौंप दीं (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कन्याशतम् |
अपनी सौ कन्याएँ (द्वितीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा कुशनाभ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सुप्रीतेन |
अत्यन्त प्रसन्न (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अन्तरात्मना |
चित्त से (तृतीया विभक्ति) |
यथाक्रमं तदा पाणिं जग्राह रघुनन्दन।
ब्रह्मदत्तो महीपालस्तासां देवपतिर्यथा॥
॥ 1.33.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
रघुनन्दन! उस समय देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्त ने क्रमशः उन सभी कन्याओं का पाणिग्रहण किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यथाक्रमम् |
क्रमशः (अव्यय) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| पाणिम् |
पाणिग्रहण (द्वितीया विभक्ति) |
| जग्राह |
किया (ग्रह् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रघुनन्दन |
हे रघुनन्दन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| ब्रह्मदत्तः |
ब्रह्मदत्त ने (प्रथमा विभक्ति) |
| महीपालः |
तेजस्वी पृथ्वीपति ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तासाम् |
उन सभी कन्याओं का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| देवपतिः |
देवराज इन्द्र के (प्रथमा विभक्ति) |
| यथा |
समान (अव्यय) |
स्पृष्टमात्रे तदा पाणौ विकुब्जा विगतज्वराः।
युक्ताः परमया लक्ष्म्या बभुः कन्याशतं तदा॥
॥ 1.33.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विवाहकाल में उन कन्याओं के हाथों का ब्रह्मदत्त के हाथ से स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोष से रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभा से सम्पन्न प्रतीत होने लगीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| स्पृष्टमात्रे |
स्पर्श होते ही (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| पाणौ |
उन कन्याओं के हाथों का ब्रह्मदत्त के हाथ से (सप्तमी विभक्ति, द्विवचन) |
| विकुब्जाः |
कुब्जत्वदोष से रहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विगतज्वराः |
नीरोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| युक्ताः |
सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| परमया |
उत्तम (तृतीया विभक्ति) |
| लक्ष्म्या |
शोभा से (तृतीया विभक्ति) |
| बभुः |
प्रतीत होने लगीं (भा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| कन्याशतम् |
वे सब-की-सब कन्याएँ (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
विवाहकाल में (अव्यय) |
स दृष्ट्वा वायुना मुक्ताः कुशनाभो महीपतिः।
बभूव परमप्रीतो हर्षं लेभे पुनः पुनः॥
॥ 1.33.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वातरोग के रूप में आये हुए वायुदेव ने उन कन्याओं को छोड़ दिया—यह देख पृथ्वीपति राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार हर्ष का अनुभव करने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| वायुना |
वातरोग के रूप में आये हुए वायुदेव ने (तृतीया विभक्ति) |
| मुक्ताः |
छोड़ दिया—यह देख (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| कुशनाभः |
पृथ्वीपति राजा कुशनाभ (प्रथमा विभक्ति) |
| महीपतिः |
पृथ्वीपति (प्रथमा विभक्ति) |
| बभूव |
हुए (भू धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| परमप्रीतः |
बड़े प्रसन्न (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| हर्षम् |
हर्ष का (द्वितीया विभक्ति) |
| लेभे |
अनुभव करने लगे (लभ् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुनः पुनः |
बारम्बार (अव्यय) |
कृतोद्वाहं तु राजानं ब्रह्मदत्तं महीपतिम्।
सदारं प्रेषयामास सोपाध्यायगणं तदा॥
॥ 1.33.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
भूपाल राजा ब्रह्मदत्त का विवाह-कार्य सम्पन्न हो जाने पर महाराज कुशनाभ ने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितों सहित आदरपूर्वक विदा किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कृतोद्वाहम् |
विवाह-कार्य सम्पन्न हो जाने पर (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| राजानम् |
भूपाल राजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| ब्रह्मदत्तम् |
ब्रह्मदत्त को (द्वितीया विभक्ति) |
| महीपतिम् |
भूपाल को (द्वितीया विभक्ति) |
| सदारम् |
पत्नियों सहित (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रेषयामास |
विदा किया (प्र + इष्, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सोपाध्यायगणम् |
पुरोहितों सहित (द्वितीया विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
सोमदापि सुतं दृष्ट्वा पुत्रस्य सदृशीं क्रियाम्।
यथान्यायं च गन्धर्वी स्नुषास्ताः प्रत्यनन्दत।
स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च ताः कन्याः कुशनाभं प्रशस्य च॥
॥ 1.33.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
गन्धर्वी सोमदा ने अपने पुत्र को तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्ध को देखकर अपनी उन पुत्रवधुओं का यथोचितरूप से अभिनन्दन किया। उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओं को हृदय से लगाया और महाराज कुशनाभ की सराहना करके वहाँ से प्रस्थान किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सोमदा |
गन्धर्वी सोमदा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| सुतम् |
अपने पुत्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| पुत्रस्य |
उसके योग्य (षष्ठी विभक्ति) |
| सदृशीम् |
योग्य को (द्वितीया विभक्ति) |
| क्रियाम् |
विवाह-सम्बन्ध को (द्वितीया विभक्ति) |
| यथान्यायम् |
यथोचितरूप से (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| गन्धर्वी |
गन्धर्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| स्नुषाः |
अपनी उन पुत्रवधुओं का (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ताः |
उनका (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रत्यनन्दत |
अभिनन्दन किया (प्रति + नन्द्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा |
एक-एक करके हृदय से लगाया (क्त्वान्त अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| ताः |
उन सभी (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कन्याः |
राजकन्याओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कुशनाभम् |
महाराज कुशनाभ की (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रशस्य |
सराहना करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः॥३३॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३३॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| त्रयस्त्रिंशः |
तैंतीसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥३३॥ |
॥३३॥ (सर्ग संख्या) |
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