🌿 सर्ग 32: ब्रह्मपुत्र कुश के चार पुत्रों का वर्णन, शोणभद्र-तटवर्ती प्रदेश को वसु की भूमि बताना, कुशनाभ की सौ कन्याओं का वायु के कोप से ‘कुब्जा’ होना
Description of the four sons of Brahma's son Kusha, identification of the land on the banks of Shonabhadra as the land of Vasu, and the hundred daughters of Kushanabha becoming 'hunchbacks' due to the wrath of Vayu
कुल श्लोक: 26
ब्रह्मयोनिर्महानासीत् कुशो नाम महातपाः।
अक्लिष्टव्रतधर्मज्ञः सज्जनप्रतिपूजकः॥
॥ 1.32.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
(विश्वामित्रजी कहते हैं-) श्रीराम! पूर्वकाल में कुश नाम से प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा हो गये हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजी के पुत्र थे। उनका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाई के ही पूर्ण होता था। वे धर्म के ज्ञाता, सत्पुरुषों का आदर करने वाले और महान् थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्रह्मयोनिः |
साक्षात् ब्रह्माजी के पुत्र थे (प्रथमा विभक्ति) |
| महान् |
महान् थे (प्रथमा विभक्ति) |
| आसीत् |
हो गये हैं (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कुशः |
कुश नाम से प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| महातपाः |
महातपस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| अक्लिष्टव्रतः |
जिसका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाई के ही पूर्ण होता था (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मज्ञः |
धर्म के ज्ञाता (प्रथमा विभक्ति) |
| सज्जनप्रतिपूजकः |
सत्पुरुषों का आदर करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
स महात्मा कुलीनायां युक्तायां सुमहाबलान्।
वैदर्भ्यां जनयामास चतुरः सदृशान् सुतान्॥
॥ 1.32.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उत्तम कुल में उत्पन्न विदर्भदेश की राजकुमारी उनकी पत्नी थी। उसके गर्भ से उन महात्मा नरेश ने चार पुत्र उत्पन्न किये, जो उन्हीं के समान थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
उन (प्रथमा विभक्ति) |
| महात्मा |
महात्मा नरेश ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कुलीनायाम् |
उत्तम कुल में उत्पन्न से (सप्तमी विभक्ति) |
| युक्तायाम् |
युक्ता (पत्नी) से (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुमहाबलान् |
अत्यन्त बलवान् को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| वैदर्भ्याम् |
विदर्भदेश की राजकुमारी के गर्भ से (सप्तमी विभक्ति) |
| जनयामास |
उत्पन्न किये (जन् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| चतुरः |
चार (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सदृशान् |
उन्हीं के समान थे (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सुतान् |
पुत्रों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
कुशाम्बं कुशनाभं च असूर्तरजसं वसुम्।
दीप्तियुक्तान् महोत्साहान् क्षत्रधर्मचिकीर्षया।
तानुवाच कुशः पुत्रान् धर्मिष्ठान् सत्यवादिनः।
क्रियतां पालनं पुत्रा धर्मं प्राप्स्यथ पुष्कलम्॥
॥ 1.32.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनके नाम इस प्रकार हैं-कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्तरजस तथा वसु। ये सब-के-सब तेजस्वी तथा महान् उत्साही थे। राजा कुश ने ‘प्रजारक्षणरूप’ क्षत्रिय-धर्म के पालन की इच्छा से अपने उन धर्मिष्ठ तथा सत्यवादी पुत्रों से कहा—’पुत्रो! प्रजा का पालन करो, इससे तुम्हें धर्म का पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कुशाम्बम् |
कुशाम्ब को (द्वितीया विभक्ति) |
| कुशनाभम् |
कुशनाभ को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| असूर्तरजसम् |
असूर्तरजस को (द्वितीया विभक्ति) |
| वसुम् |
वसु को (द्वितीया विभक्ति) |
| दीप्तियुक्तान् |
तेजस्वी को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| महोत्साहान् |
महान् उत्साही थे (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| क्षत्रधर्मचिकीर्षया |
‘प्रजारक्षणरूप’ क्षत्रिय-धर्म के पालन की इच्छा से (तृतीया विभक्ति) |
| तान् |
अपने उन को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कुशः |
राजा कुश ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पुत्रान् |
पुत्रों से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| धर्मिष्ठान् |
धर्मिष्ठ से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सत्यवादिनः |
सत्यवादी से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| क्रियताम् |
करो (कृ धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पालनम् |
प्रजा का पालन (द्वितीया विभक्ति) |
| पुत्राः |
हे पुत्रो! (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
| धर्मम् |
धर्म का (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राप्स्यथ |
प्राप्त होगा (प्र + आप्, लृट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
| पुष्कलम् |
पूरा-पूरा फल (द्वितीया विभक्ति) |
कुशस्य वचनं श्रुत्वा चत्वारो लोकसत्तमाः।
निवेशं चक्रिरे सर्वे पुराणां नृवरास्तदा॥
॥ 1.32.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अपने पिता महाराज कुश की यह बात सुनकर उन चारों लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारों ने उस समय अपने-अपने लिये पृथक्-पृथक् नगर निर्माण कराया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कुशस्य |
अपने पिता महाराज कुश की (षष्ठी विभक्ति) |
| वचनम् |
यह बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| चत्वारः |
उन चारों (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| लोकसत्तमाः |
लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| निवेशम् |
अपने-अपने लिये पृथक्-पृथक् नगर (द्वितीया विभक्ति) |
| चक्रिरे |
निर्माण कराया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सर्वे |
सभी ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पुराणाम् |
नगरों का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| नृवराः |
नरश्रेष्ठों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
कुशाम्बस्तु महातेजाः कौशाम्बीमकरोत् पुरीम्।
कुशनाभस्तु धर्मात्मा पुरं चक्रे महोदयम्॥
॥ 1.32.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महातेजस्वी कुशाम्ब ने ‘कौशाम्बी’ पुरी बसायी (जिसे आजकल ‘कोसम’ कहते हैं)। धर्मात्मा कुशनाभ ने ‘महोदय’ नामक नगर का निर्माण कराया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कुशाम्बः |
महातेजस्वी कुशाम्ब ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कौशाम्बीम् |
‘कौशाम्बी’ पुरी को (द्वितीया विभक्ति) |
| अकरोत् |
बसायी (कृ धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुरीम् |
पुरी को (द्वितीया विभक्ति) |
| कुशनाभः |
धर्मात्मा कुशनाभ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पुरम् |
‘महोदय’ नामक नगर का (द्वितीया विभक्ति) |
| चक्रे |
निर्माण कराया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| महोदयम् |
‘महोदय’ नामक का (द्वितीया विभक्ति) |
असूर्तरजसो नाम धर्मारण्यं महामतिः।
चक्रे पुरवरं राजा वसुर्नाम गिरिव्रजम्॥
॥ 1.32.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
परम बुद्धिमान् असूर्तरजस ने ‘धर्मारण्य’ नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसु ने ‘गिरिव्रज’ नगर की स्थापना की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| असूर्तरजसः |
परम बुद्धिमान् असूर्तरजस ने (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| धर्मारण्यम् |
‘धर्मारण्य’ नामक एक श्रेष्ठ नगर (द्वितीया विभक्ति) |
| महामतिः |
परम बुद्धिमान् ने (प्रथमा विभक्ति) |
| चक्रे |
बसाया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुरवरम् |
श्रेष्ठ नगर को (द्वितीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| वसुः |
राजा वसु ने (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| गिरिव्रजम् |
‘गिरिव्रज’ नगर की (द्वितीया विभक्ति) |
एषा वसुमती नाम वसोस्तस्य महात्मनः।
एते शैलवराः पञ्च प्रकाशन्ते समन्ततः॥
॥ 1.32.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महात्मा वसु की यह ‘गिरिव्रज’ नामक राजधानी वसुमती के नाम से प्रसिद्ध हुई। इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एषा |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| वसुमती |
वसुमती के नाम से (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| वसोः |
महात्मा वसु की (षष्ठी विभक्ति) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| महात्मनः |
महात्मा की (षष्ठी विभक्ति) |
| एते |
ये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शैलवराः |
श्रेष्ठ पर्वत (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पञ्च |
पाँच (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रकाशन्ते |
सुशोभित होते हैं (प्र + काश्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| समन्ततः |
इसके चारों ओर (अव्यय) |
सुमागधी नदी रम्या मागधान् विश्रुताऽऽययौ।
पञ्चानां शैलमुख्यानां मध्ये मालेव शोभते॥
॥ 1.32.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यह रमणीय (सोन) नदी दक्षिण-पश्चिम की ओर से बहती हुई मगध देश में आयी है, इसलिये यहाँ ‘सुमागधी’ नाम से विख्यात हुई है। यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतों के बीच में माला की भाँति सुशोभित हो रही है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सुमागधी |
‘सुमागधी’ नाम से (प्रथमा विभक्ति) |
| नदी |
यह रमणीय (सोन) नदी (प्रथमा विभक्ति) |
| रम्या |
रमणीय (प्रथमा विभक्ति) |
| मागधान् |
मगध देश में (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| विश्रुता |
विख्यात हुई है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| आययौ |
दक्षिण-पश्चिम की ओर से बहती हुई आयी है (आ + या, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पञ्चानाम् |
इन पाँच (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| शैलमुख्यानाम् |
श्रेष्ठ पर्वतों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| मध्ये |
बीच में (सप्तमी विभक्ति) |
| माला |
माला की (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
भाँति (अव्यय) |
| शोभते |
सुशोभित हो रही है (शुभ् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
सैषा हि मागधी राम वसोस्तस्य महात्मनः।
पूर्वाभिचरिता राम सुक्षेत्रा सस्यमालिनी॥
॥ 1.32.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीराम! इस प्रकार ‘मागधी’ नाम से प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसु से सम्बन्ध रखती है। रघुनन्दन! यह दक्षिण-पश्चिम से आकर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रवाहित हुई है। इसके दोनों तटों पर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं, अतः यह सदा सस्य-मालाओं से अलंकृत (हरी-भरी खेती से सुशोभित) रहती है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सा |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| एषा |
इस प्रकार (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| मागधी |
‘मागधी’ नाम से प्रसिद्ध हुई (प्रथमा विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| वसोः |
पूर्वोक्त महात्मा वसु से (षष्ठी विभक्ति) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| महात्मनः |
महात्मा से (षष्ठी विभक्ति) |
| पूर्वाभिचरिता |
दक्षिण-पश्चिम से आकर पूर्वोत्तर दिशा की ओर प्रवाहित हुई है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| राम |
हे रघुनन्दन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सुक्षेत्रा |
इसके दोनों तटों पर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| सस्यमालिनी |
यह सदा सस्य-मालाओं से अलंकृत (हरी-भरी खेती से सुशोभित) रहती है (प्रथमा विभक्ति) |
कुशनाभस्तु राजर्षिः कन्याशतमनुत्तमम्।
जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन॥
॥ 1.32.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
रघुकुल को आनन्दित करने वाले श्रीराम! धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभ ने घृताची अप्सरा के गर्भ से परम उत्तम सौ कन्याओं को जन्म दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कुशनाभः |
धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| राजर्षिः |
राजर्षि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कन्याशतम् |
परम उत्तम सौ कन्याओं को (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुत्तमम् |
परम उत्तम को (द्वितीया विभक्ति) |
| जनयामास |
जन्म दिया (जन् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| घृताच्याम् |
घृताची अप्सरा के गर्भ से (सप्तमी विभक्ति) |
| रघुनन्दन |
हे रघुकुल को आनन्दित करने वाले श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
तास्तु यौवनशालिन्यो रूपवत्यः स्वलंकृताः।
उद्यानभूमिमागम्य प्रावृषीव शतह्रदाः।
गायन्त्यो नृत्यमानाश्च वादयन्त्यस्तु राघव।
आमोदं परमं जग्मुर्वराभरणभूषिताः॥
॥ 1.32.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्य से सुशोभित थीं। धीरे-धीरे युवावस्था ने आकर उनके सौन्दर्य को और भी बढ़ा दिया। रघुवीर! एक दिन वस्त्र और आभूषणों से विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यानभूमि में आकर वर्षाऋतु में प्रकाशित होने वाली विद्युन्मालाओं की भाँति शोभा पाने लगीं। सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हुई वे अंगनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोद में मग्न हो गयीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताः |
वे सब-की-सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
धीरे-धीरे (अव्यय) |
| यौवनशालिन्यः |
युवावस्था ने आकर उनके सौन्दर्य को और भी बढ़ा दिया (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| रूपवत्यः |
सुन्दर रूप-लावण्य से सुशोभित थीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| स्वलङ्कृताः |
वस्त्र और आभूषणों से विभूषित हो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| उद्यानभूमिम् |
उद्यानभूमि में (द्वितीया विभक्ति) |
| आगम्य |
आकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| प्रावृषि |
वर्षाऋतु में (सप्तमी विभक्ति) |
| इव |
भाँति (अव्यय) |
| शतह्रदाः |
प्रकाशित होने वाली विद्युन्मालाओं की (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| गायन्त्यः |
गाती हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| नृत्यमानाः |
नृत्य करती हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शानच् प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| वादयन्त्यः |
बजाती हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त, प्रयोज्यार्थ) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| राघव |
हे रघुवीर! (सम्बोधन विभक्ति) |
| आमोदम् |
परम आमोद-प्रमोद में (द्वितीया विभक्ति) |
| परमम् |
परम में (द्वितीया विभक्ति) |
| जग्मुः |
मग्न हो गयीं (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| वराभरणभूषिताः |
सुन्दर अलंकारों से अलंकृत हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
अथ ताश्चारुसर्वाङ्ग्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि।
उद्यानभूमिमागम्य तारा इव घनान्तरे॥
॥ 1.32.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। इस भूतल पर उनके रूप-सौन्दर्य की कहीं भी तुलना नहीं थी। उस उद्यान में आकर वे बादलों के ओट में कुछ-कुछ छिपी हुई तारिकाओं के समान शोभा पा रही थीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चारुसर्वाङ्ग्यः |
उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| रूपेण |
इस भूतल पर उनके रूप-सौन्दर्य की (तृतीया विभक्ति) |
| अप्रतिमाः |
कहीं भी तुलना नहीं थी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| भुवि |
इस भूतल पर (सप्तमी विभक्ति) |
| उद्यानभूमिम् |
उस उद्यान में (द्वितीया विभक्ति) |
| आगम्य |
आकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| ताराः |
तारिकाओं के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| इव |
समान (अव्यय) |
| घनान्तरे |
बादलों के ओट में कुछ-कुछ छिपी हुई (सप्तमी विभक्ति) |
ताः सर्वा गुणसम्पन्ना रूपयौवनसंयुताः।
दृष्ट्वा सर्वात्मको वायुरिदं वचनमब्रवीत्॥
॥ 1.32.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस समय उत्तम गुणों से सम्पन्न तथा रूप और यौवन से सुशोभित उन सब राजकन्याओं को देखकर सर्वस्वरूप वायु देवता ने उनसे इस प्रकार कहा-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताः |
उन सब (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वाः |
सब (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| गुणसम्पन्नाः |
उत्तम गुणों से सम्पन्न को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| रूपयौवनसंयुताः |
रूप और यौवन से सुशोभित को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| सर्वात्मकः |
सर्वस्वरूप (प्रथमा विभक्ति) |
| वायुः |
वायु देवता ने (प्रथमा विभक्ति) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
अहं वः कामये सर्वा भार्या मम भविष्यथ।
मानुषस्त्यज्यतां भावो दीर्घमायुरवाप्स्यथ॥
॥ 1.32.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘सुन्दरियो! मैं तुम सबको अपनी प्रेयसी के रूप में प्राप्त करना चाहता हूँ, तुम सब मेरी भार्याएँ बनोगी। अब मनुष्य भाव का त्याग करो और मुझे अंगीकार करके देवांगनाओं की भाँति दीर्घ आयु प्राप्त कर लो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| वः |
तुम सबको (युष्मद्, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कामये |
अपनी प्रेयसी के रूप में प्राप्त करना चाहता हूँ (कम् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| सर्वाः |
सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भार्याः |
मेरी भार्याएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मम |
मेरी (षष्ठी विभक्ति) |
| भविष्यथ |
बनोगी (भू धातु, लृट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
| मानुषः |
मनुष्य (प्रथमा विभक्ति) |
| त्यज्यताम् |
त्याग करो (त्यज् धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भावः |
भाव का (प्रथमा विभक्ति) |
| दीर्घम् |
दीर्घ (द्वितीया विभक्ति) |
| आयुः |
आयु (द्वितीया विभक्ति) |
| अवाप्स्यथ |
प्राप्त कर लो (अव + आप्, लृट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
चलं हि यौवनं नित्यं मानुषेषु विशेषतः।
अक्षयं यौवनं प्राप्ता अमर्यश्च भविष्यथ॥
॥ 1.32.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘विशेषतः मानव-शरीर में जवानी कभी स्थिर नहीं रहती–प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है। मेरे साथ सम्बन्ध हो जाने पर तुम लोग अक्षय यौवन प्राप्त करके अमर हो जाओगी’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| चलम् |
कभी स्थिर नहीं रहती–प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| यौवनम् |
जवानी (प्रथमा विभक्ति) |
| नित्यम् |
नित्य (अव्यय) |
| मानुषेषु |
मानव-शरीर में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| विशेषतः |
विशेषतः (अव्यय) |
| अक्षयम् |
अक्षय (द्वितीया विभक्ति) |
| यौवनम् |
यौवन (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राप्ताः |
प्राप्त करके (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| अमर्यः |
अमर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| भविष्यथ |
हो जाओगी (भू धातु, लृट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मणः।
अपहास्य ततो वाक्यं कन्याशतमथाब्रवीत्॥
॥ 1.32.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अनायास ही महान् कर्म करने वाले वायुदेव का यह कथन सुनकर वे सौ कन्याएँ अवहेलनापूर्वक हँसकर बोलीं-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| तत् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
कथन (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| वायोः |
वायुदेव का (षष्ठी विभक्ति) |
| अक्लिष्टकर्मणः |
अनायास ही महान् कर्म करने वाले का (षष्ठी विभक्ति) |
| अपहास्य |
अवहेलनापूर्वक हँसकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| कन्याशतम् |
वे सौ कन्याएँ (प्रथमा विभक्ति) |
| अथ |
फिर (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
बोलीं (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
अन्तश्चरसि भूतानां सर्वेषां सुरसत्तम।
प्रभावज्ञाश्च ते सर्वाः किमर्थमवमन्यसे॥
॥ 1.32.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘सुरश्रेष्ठ! आप प्राणवायु के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर विचरते हैं (अतः सबके मन की बातें जानते हैं; आपको यह मालूम होगा कि हमारे मन में आपके प्रति कोई आकर्षण नहीं है)। हम सब बहिनें आपके अनुपम प्रभाव को भी जानती हैं (तो भी हमारा आपके प्रति अनुराग नहीं है); ऐसी दशा में यह अनुचित प्रस्ताव करके आप हमारा अपमान किसलिये कर रहे हैं?
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अन्तः |
प्राणवायु के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर (अव्यय) |
| चरसि |
विचरते हैं (चर् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भूतानाम् |
प्राणियों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वेषाम् |
समस्त के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| सुरसत्तम |
हे सुरश्रेष्ठ! (सम्बोधन विभक्ति) |
| प्रभावज्ञाः |
आपके अनुपम प्रभाव को भी जानती हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| सर्वाः |
हम सब बहिनें (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| किमर्थम् |
किसलिये (अव्यय) |
| अवमन्यसे |
अपमान कर रहे हैं (अव + मन्, कर्मवाच्य, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
कुशनाभसुता देव समस्ताः सुरसत्तम।
स्थानाच्च्यावयितुं देवं रक्षामस्तु तपो वयम्॥
॥ 1.32.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘देव! देवशिरोमणे! हम सब-की-सब राजर्षि कुशनाभ की कन्याएँ हैं। देवता होने पर भी आपको शाप देकर वायुपद से भ्रष्ट कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं; क्योंकि हम अपने तप को सुरक्षित रखती हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कुशनाभसुताः |
राजर्षि कुशनाभ की कन्याएँ हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| देव |
हे देव! (सम्बोधन विभक्ति) |
| समस्ताः |
हम सब-की-सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सुरसत्तम |
हे देवशिरोमणे! (सम्बोधन विभक्ति) |
| स्थानात् |
वायुपद से (पञ्चमी विभक्ति) |
| च्यावयितुम् |
शाप देकर भ्रष्ट करना (च्यु धातु, प्रयोज्यार्थ, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| देवम् |
देवता होने पर भी आपको (द्वितीया विभक्ति) |
| रक्षामः |
कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं (रक्ष् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| तु |
क्योंकि (अव्यय) |
| तपः |
अपने तप को (द्वितीया विभक्ति) |
| वयम् |
हम (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
मा भूत् स कालो दुर्मेधः पितरं सत्यवादिनम्।
अवमन्य स्वधर्मेण स्वयंवरमुपास्महे॥
॥ 1.32.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘दुर्मते! वह समय कभी न आवे, जब कि हम अपने सत्यवादी पिता की अवहेलना करके कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मा |
नहीं (निषेधार्थक अव्यय) |
| भूत् |
आवे (भू धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, मा योग में) |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| कालः |
समय (प्रथमा विभक्ति) |
| दुर्मेधः |
हे दुर्मते! (सम्बोधन विभक्ति) |
| पितरम् |
अपने सत्यवादी पिता की (द्वितीया विभक्ति) |
| सत्यवादिनम् |
सत्यवादी की (द्वितीया विभक्ति) |
| अवमन्य |
अवहेलना करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| स्वधर्मेण |
कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक (तृतीया विभक्ति) |
| स्वयम्वरम् |
स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें (द्वितीया विभक्ति) |
| उपास्महे |
प्राप्त करें (उप + आस्, लट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं च सः।
यस्य नो दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति॥
॥ 1.32.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘हम लोगों पर हमारे पिताजी का प्रभुत्व है, वे हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। पिताजी हमें जिसके हाथ में दे देंगे, वही हमारा पति होगा’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पिता |
हमारे पिताजी का (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| प्रभुः |
प्रभुत्व है (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्माकम् |
हम लोगों पर (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| दैवतम् |
सर्वश्रेष्ठ देवता हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| परमम् |
सर्वश्रेष्ठ (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| यस्य |
जिसके (षष्ठी विभक्ति) |
| नः |
हमें (अस्मद्, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| दास्यति |
हाथ में दे देंगे (दा धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पिता |
पिताजी (प्रथमा विभक्ति) |
| सः |
वही (प्रथमा विभक्ति) |
| नः |
हमारा (अस्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| भर्ता |
पति (प्रथमा विभक्ति) |
| भविष्यति |
होगा (भू धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
तासां तु वचनं श्रुत्वा हरिः परमकोपनः।
प्रविश्य सर्वगात्राणि बभञ्ज भगवान् प्रभुः।
अरत्निमात्राकृतयो भग्नगात्रा भयार्दिताः॥
॥ 1.32.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनकी यह बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त कुपित हो उठे। उन ऐश्वर्यशाली प्रभु ने उनके भीतर प्रविष्ट हो सब अंगों को मोड़कर टेढ़ा कर दिया। शरीर मुड़ जाने के कारण वे कुबड़ी हो गयीं। उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथ के बराबर हो गयी। वे भय से व्याकुल हो उठीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तासाम् |
उनकी (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| वचनम् |
यह बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| हरिः |
वायुदेव (प्रथमा विभक्ति) |
| परमकोपनः |
अत्यन्त कुपित हो उठे (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रविश्य |
उनके भीतर प्रविष्ट हो (ल्यबन्त अव्यय) |
| सर्वगात्राणि |
सब अंगों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| बभञ्ज |
मोड़कर टेढ़ा कर दिया (भञ्ज् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भगवान् |
उन ऐश्वर्यशाली (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| प्रभुः |
प्रभु ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अरत्निमात्राकृतयः |
उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथ के बराबर हो गयी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भग्नगात्राः |
शरीर मुड़ जाने के कारण वे कुबड़ी हो गयीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| भयार्दिताः |
वे भय से व्याकुल हो उठीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
ताः कन्या वायुना भग्ना विविशुर्नृपतेर्गृहम्।
प्रविश्य च सुसम्भ्रान्ताः सलज्जाः सास्रलोचनाः॥
॥ 1.32.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वायुदेव के द्वारा कुबड़ी की हुई उन कन्याओं ने राजभवन में प्रवेश किया। प्रवेश करके वे लज्जित और उद्विग्न हो गयीं। उनके नेत्रों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताः |
उन (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| कन्याः |
कन्याओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वायुना |
वायुदेव के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| भग्नाः |
कुबड़ी की हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| विविशुः |
प्रवेश किया (विश् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| नृपतेः |
राजभवन में (षष्ठी विभक्ति) |
| गृहम् |
भवन में (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रविश्य |
प्रवेश करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुसम्भ्रान्ताः |
लज्जित और उद्विग्न हो गयीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सलज्जाः |
लज्जित होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सास्रलोचनाः |
उनके नेत्रों से आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
स च ता दयिता भग्नाः कन्याः परमशोभनाः।
दृष्ट्वा दीनास्तदा राजा सम्भ्रान्त इदमब्रवीत्॥
॥ 1.32.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अपनी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियों को कुब्जता के कारण अत्यन्त दयनीय दशा में पड़ी देख राजा कुशनाभ घबरा गये और इस प्रकार बोले-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह राजा कुशनाभ (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| ताः |
अपनी उन (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| दयिताः |
प्यारी पुत्रियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| भग्नाः |
कुब्जता के कारण अत्यन्त दयनीय दशा में पड़ी को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| कन्याः |
कन्याओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| परमशोभनाः |
परम सुन्दरी को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| दीनाः |
दयनीय दशा में पड़ी को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| सम्भ्रान्तः |
घबरा गये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
किमिदं कथ्यतां पुत्र्यः को धर्ममवमन्यते।
कुब्जाः केन कृताः सर्वाश्चेष्टन्त्यो नाभिभाषथ।
एवं राजा विनिःश्वस्य समाधिं संदधे ततः॥
॥ 1.32.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘पुत्रियो! यह क्या हुआ? बताओ, कौन प्राणी धर्म की अवहेलना करता है? किसने तुम्हें कुबड़ी बना दिया, जिससे तुम तड़प रही हो, किंतु कुछ बताती नहीं हो।’ यों कहकर राजा ने लंबी साँस खींची और उनका उत्तर सुनने के लिये वे सावधान होकर बैठ गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| किम् |
क्या (प्रथमा विभक्ति) |
| इदम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| कथ्यताम् |
बताओ (कथ् धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुत्र्यः |
हे पुत्रियो! (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
| कः |
कौन प्राणी (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मम् |
धर्म की (द्वितीया विभक्ति) |
| अवमन्यते |
अवहेलना करता है (अव + मन्, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कुब्जाः |
कुबड़ी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| केन |
किसने (तृतीया विभक्ति) |
| कृताः |
बना दिया (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वाः |
तुम सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चेष्टन्त्यः |
तड़प रही हो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अभिभाषथ |
बताती हो (अभि + भाष्, लट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
| एवम् |
यों (अव्यय) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विनिःश्वस्य |
लंबी साँस खींची (ल्यबन्त अव्यय) |
| समाधिम् |
उनका उत्तर सुनने के लिये वे सावधान होकर बैठ गये (द्वितीया विभक्ति) |
| सन्दधे |
बैठ गये (सम् + धा, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः॥३२॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥३२॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| द्वात्रिंशः |
बत्तीसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥३२॥ |
॥३२॥ (सर्ग संख्या) |
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