🌿 सर्ग 29: विश्वामित्रजी का श्रीराम से सिद्धाश्रम का पूर्ववृत्तान्त बताना और उन दोनों भाइयों के साथ अपने आश्रम पहुँचकर पूजित होना
Vishwamitra narrates the history of Siddhashrama to Shri Rama and arrives at his hermitage with the two brothers, where he is worshipped
कुल श्लोक: 30
अथ तस्याप्रमेयस्य वचनं परिपृच्छतः।
विश्वामित्रो महातेजा व्याख्यातुमुपचक्रमे॥
॥ 1.29.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अपरिमित प्रभावशाली भगवान् श्रीराम का वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र ने उनके प्रश्न का उत्तर देना आरम्भ किया—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| अप्रमेयस्य |
अपरिमित प्रभावशाली भगवान् श्रीराम का (षष्ठी विभक्ति) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| परिपृच्छतः |
सुनकर (षष्ठी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| विश्वामित्रः |
महातेजस्वी विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| व्याख्यातुम् |
उत्तर देना (वि + आ + ख्या, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| उपचक्रमे |
आरम्भ किया (उप + क्रम्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृतः।
वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च।
तपश्चरणयोगार्थमुवास सुमहातपाः।
एष पूर्वाश्रमो राम वामनस्य महात्मनः॥
॥ 1.29.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में यहाँ देववन्दित भगवान् विष्णु ने बहुत वर्षों एवं सौ युगों तक तपस्या के लिये निवास किया था। उन्होंने यहाँ बहुत बड़ी तपस्या की थी। यह स्थान महात्मा वामन का वामन अवतार धारण करने को उद्यत हुए श्री विष्णु का अवतार ग्रहण से पूर्व आश्रम था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| राम |
हे श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| महाबाहो |
हे महाबाहु! (सम्बोधन विभक्ति) |
| विष्णुः |
देववन्दित भगवान् विष्णु ने (प्रथमा विभक्ति) |
| देवनमस्कृतः |
देववन्दित ने (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वर्षाणि |
बहुत वर्षों तक (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, कालाध्वनोः) |
| सुबहूनि |
बहुत से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, कालाध्वनोः) |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| तथा |
एवं (अव्यय) |
| युगशतानि |
सौ युगों तक (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, कालाध्वनोः) |
| च |
और (अव्यय) |
| तपश्चरणयोगार्थम् |
तपस्या के लिये (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| उवास |
निवास किया था (वस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुमहातपाः |
बहुत बड़ी तपस्या की थी (प्रथमा विभक्ति) |
| एषः |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| पूर्वाश्रमः |
अवतार ग्रहण से पूर्व आश्रम था (प्रथमा विभक्ति) |
| राम |
हे राम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| वामनस्य |
वामन अवतार धारण करने को उद्यत हुए श्री विष्णु का (षष्ठी विभक्ति) |
| महात्मनः |
महात्मा का (षष्ठी विभक्ति) |
सिद्धाश्रम इति ख्यातः सिद्धो ह्यत्र महातपाः।
एतस्मिन्नेव काले तु राजा वैरोचनिर्बलिः।
निर्जित्य दैवतगणान् सेन्द्रान् सहमरुद्गणान्।
कारयामास तद्राज्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥
॥ 1.29.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इसकी सिद्धाश्रम के नाम से प्रसिद्धि थी; क्योंकि यहाँ महातपस्वी विष्णु को सिद्धि प्राप्त हुई थी। जब वे तपस्या करते थे, उसी समय विरोचन कुमार राजा बलि ने इन्द्र और मरुद्गणों सहित समस्त देवताओं को पराजित करके उनका राज्य अपने अधिकार में कर लिया था। वे तीनों लोकों में विख्यात हो गये थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सिद्धाश्रमः |
सिद्धाश्रम के नाम से (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| ख्यातः |
प्रसिद्धि थी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सिद्धः |
सिद्धि प्राप्त हुई थी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| अत्र |
यहाँ (अव्यय) |
| महातपाः |
महातपस्वी विष्णु को (प्रथमा विभक्ति) |
| एतस्मिन् |
जब वे तपस्या करते थे, उसी (सप्तमी विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| काले |
समय (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| वैरोचनिः |
विरोचन कुमार ने (प्रथमा विभक्ति) |
| बलिः |
बलि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| निर्जित्य |
पराजित करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| दैवतगणान् |
समस्त देवताओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सेन्द्रान् |
इन्द्र सहित को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सहमरुद्गणान् |
मरुद्गणों सहित को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कारयामास |
अपने अधिकार में कर लिया था (कृ धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तत् |
उनका (द्वितीया विभक्ति) |
| राज्यम् |
राज्य (द्वितीया विभक्ति) |
| त्रिषु |
तीनों (सप्तमी विभक्ति) |
| लोकेषु |
लोकों में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| विश्रुतः |
विख्यात हो गये थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
यज्ञं चकार सुमहानसुरेन्द्रो महाबलः।
बलेस्तु यजमानस्य देवाः साग्निपुरोगमाः।
समागम्य स्वयं चैव विष्णुमूचुरिहाश्रमे॥
॥ 1.29.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘उन महाबली महान् असुरराज ने एक यज्ञ का आयोजन किया। उधर बलि यज्ञ में लगे हुए थे, इधर अग्नि आदि देवता स्वयं इस आश्रम में पधार कर भगवान् विष्णु से बोले—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यज्ञम् |
एक यज्ञ का (द्वितीया विभक्ति) |
| चकार |
आयोजन किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुमहान् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| असुरेन्द्रः |
महान् असुरराज ने (प्रथमा विभक्ति) |
| महाबलः |
महाबली ने (प्रथमा विभक्ति) |
| बलेः |
बलि के (षष्ठी विभक्ति) |
| तु |
उधर (अव्यय) |
| यजमानस्य |
यज्ञ में लगे हुए के (षष्ठी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| देवाः |
अग्नि आदि देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| साग्निपुरोगमाः |
अग्नि आदि देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| समागम्य |
पधार कर (ल्यबन्त अव्यय) |
| स्वयम् |
स्वयं (अव्यय) |
| च |
इधर (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| विष्णुम् |
भगवान् विष्णु से (द्वितीया विभक्ति) |
| ऊचुः |
बोले (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| इह |
इस (अव्यय) |
| आश्रमे |
आश्रम में (सप्तमी विभक्ति) |
बलिर्वैरोचनिर्विष्णो यजते यज्ञमुत्तमम्।
असमाप्तव्रते तस्मिन् स्वकार्यमभिपद्यताम्॥
॥ 1.29.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“सर्वव्यापी परमेश्वर! विरोचन कुमार बलि एक उत्तम यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं। उनका वह यज्ञ सम्बन्धी नियम पूर्ण होने से पहले ही हमें अपना कार्य सिद्ध कर लेना चाहिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| बलिः |
बलि (प्रथमा विभक्ति) |
| वैरोचनिः |
विरोचन कुमार (प्रथमा विभक्ति) |
| विष्णो |
हे सर्वव्यापी परमेश्वर! (सम्बोधन विभक्ति) |
| यजते |
अनुष्ठान कर रहे हैं (यज् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यज्ञम् |
एक उत्तम यज्ञ का (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम का (द्वितीया विभक्ति) |
| असमाप्तव्रते |
यज्ञ सम्बन्धी नियम पूर्ण होने से पहले (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| तस्मिन् |
उनका वह (सप्तमी विभक्ति) |
| स्वकार्यम् |
अपना कार्य (प्रथमा विभक्ति) |
| अभिपद्यताम् |
सिद्ध कर लेना चाहिये (अभि + पद्, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ये चैनमभिवर्तन्ते याचितार इतस्ततः।
यच्च यत्र यथावच्च सर्वं तेभ्यः प्रयच्छति॥
॥ 1.29.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“इस समय जो भी याचक इधर-उधर से आकर उनके यहाँ याचना के लिये उपस्थित होते हैं, वे गो, भूमि और सुवर्ण आदि सम्पत्तियों में से जिस वस्तु को भी लेना चाहते हैं, उनको वे सारी वस्तुएँ राजा बलि यथावत्-रूप से अर्पित करते हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ये |
जो भी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एनम् |
उनके यहाँ (द्वितीया विभक्ति) |
| अभिवर्तन्ते |
याचना के लिये उपस्थित होते हैं (अभि + वृत्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| याचितारः |
याचक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| इतः |
इधर से (अव्यय) |
| ततः |
उधर से (अव्यय) |
| यत् |
जिस वस्तु को भी (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| यत्र |
जहाँ (अव्यय) |
| यथावत् |
यथावत्-रूप से (अव्यय) |
| च |
भी (अव्यय) |
| सर्वम् |
सारी वस्तुएँ (द्वितीया विभक्ति) |
| तेभ्यः |
उनको (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रयच्छति |
अर्पित करते हैं (प्र + यम्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
स त्वं सुरहितार्थाय मायायोगमुपाश्रितः।
वामनत्वं गतो विष्णो कुरु कल्याणमुत्तमम्॥
॥ 1.29.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“अतः विष्णो! आप देवताओं के हित के लिये अपनी योगमाया का आश्रय ले वामनरूप धारण करके उस यज्ञ में जाइये और हमारा उत्तम कल्याण साधन कीजिये’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
अतः (अव्यय) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| सुरहितार्थाय |
देवताओं के हित के लिये (चतुर्थी विभक्ति) |
| मायायोगम् |
अपनी योगमाया का (द्वितीया विभक्ति) |
| उपाश्रितः |
आश्रय लेकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वामनत्वम् |
वामनरूप (द्वितीया विभक्ति) |
| गतः |
धारण करके (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विष्णो |
हे विष्णो! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कुरु |
साधन कीजिये (कृ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| कल्याणम् |
कल्याण (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
एतस्मिन्नन्तरे राम कश्यपोऽग्निसमप्रभः।
अदित्या सहितो राम दीप्यमान इवौजसा।
देवीसहायो भगवान् दिव्यं वर्षसहस्रकम्।
व्रतं समाप्य वरदं तुष्टाव मधुसूदनम्॥
॥ 1.29.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘श्रीराम! इसी समय अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि कश्यप धर्मपत्नी अदिति के साथ अपने तेज से प्रकाशित होते हुए वहाँ आये। वे एक सहस्र दिव्य वर्षों तक चालू रहनेवाले महान् व्रत को अदिति देवी के साथ ही समाप्त करके आये थे। उन्होंने वरदायक भगवान् मधुसूदन की इस प्रकार स्तुति की—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एतस्मिन् |
इसी (सप्तमी विभक्ति) |
| अन्तरे |
समय (सप्तमी विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कश्यपः |
महर्षि कश्यप (प्रथमा विभक्ति) |
| अग्निसमप्रभः |
अग्नि के समान तेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| अदित्या |
धर्मपत्नी अदिति के (तृतीया विभक्ति) |
| सहितः |
साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| राम |
हे राम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| दीप्यमानः |
प्रकाशित होते हुए (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| इव |
हुए (अव्यय) |
| ओजसा |
अपने तेज से (तृतीया विभक्ति) |
| देवीसहायः |
अदिति देवी के साथ ही (प्रथमा विभक्ति) |
| भगवान् |
भगवान् ने (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| दिव्यम् |
दिव्य (द्वितीया विभक्ति) |
| वर्षसहस्रकम् |
एक सहस्र वर्षों तक चालू रहनेवाले महान् व्रत को (द्वितीया विभक्ति) |
| व्रतम् |
व्रत को (द्वितीया विभक्ति) |
| समाप्य |
समाप्त करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| वरदम् |
वरदायक को (द्वितीया विभक्ति) |
| तुष्टाव |
स्तुति की (स्तु धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मधुसूदनम् |
भगवान् मधुसूदन की (द्वितीया विभक्ति) |
तपोमयं तपोराशिं तपोमूर्तिं तपात्मकम्।
तपसा त्वां सुतप्तेन पश्यामि पुरुषोत्तमम्॥
॥ 1.29.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“भगवन्! आप तपोमय हैं, तपस्या की राशि हैं, तप आपका स्वरूप है, आप ज्ञानस्वरूप हैं। मैं भलीभाँति तपस्या करके उसके प्रभाव से आप पुरुषोत्तम का दर्शन कर रहा हूँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तपोमयम् |
तपोमय हैं (द्वितीया विभक्ति) |
| तपोराशिम् |
तपस्या की राशि हैं (द्वितीया विभक्ति) |
| तपोमूर्तिम् |
तप आपका स्वरूप है (द्वितीया विभक्ति) |
| तपात्मकम् |
ज्ञानस्वरूप हैं (द्वितीया विभक्ति) |
| तपसा |
तपस्या करके (तृतीया विभक्ति) |
| त्वाम् |
आपका (द्वितीया विभक्ति) |
| सुतप्तेन |
भलीभाँति के प्रभाव से (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| पश्यामि |
दर्शन कर रहा हूँ (दृश् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| पुरुषोत्तमम् |
आप पुरुषोत्तम का (द्वितीया विभक्ति) |
शरीरे तव पश्यामि जगत् सर्वमिदं प्रभो।
त्वमनादिरनिर्देश्यस्त्वामहं शरणं गतः॥
॥ 1.29.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“प्रभो! मैं इस सारे जगत् को आपके शरीर में स्थित देखता हूँ। आप अनादि हैं। देश, काल और वस्तु की सीमा से परे होने के कारण आपका – इदमित्थंरूप से निर्देश नहीं किया जा सकता, मैं आपकी शरण में आया हूँ’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| शरीरे |
आपके शरीर में (सप्तमी विभक्ति) |
| तव |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| पश्यामि |
देखता हूँ (दृश् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| जगत् |
इस सारे जगत् को (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वम् |
सारे को (द्वितीया विभक्ति) |
| इदम् |
इस को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रभो |
हे प्रभो! (सम्बोधन विभक्ति) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| अनादिः |
अनादि हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| अनिर्देश्यः |
निर्देश नहीं किया जा सकता (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| त्वाम् |
आपकी (द्वितीया विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| शरणम् |
शरण में (द्वितीया विभक्ति) |
| गतः |
आया हूँ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तमुवाच हरिः प्रीतः कश्यपं गतकल्मषम्।
वरं वरय भद्रं ते वरार्होऽसि मतो मम॥
॥ 1.29.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘कश्यप जी के सारे पाप धुल गये थे। भगवान् श्रीहरि ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा—’महर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम अपनी इच्छा के अनुसार कोई वर माँगो; क्योंकि तुम मेरे विचार से वर पाने के योग्य हो’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उनसे (द्वितीया विभक्ति) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हरिः |
भगवान् श्रीहरि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रीतः |
अत्यन्त प्रसन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कश्यपम् |
कश्यप जी के (द्वितीया विभक्ति) |
| गतकल्मषम् |
सारे पाप धुल गये थे (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वरम् |
कोई वर (द्वितीया विभक्ति) |
| वरय |
माँगो (वृ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति) |
| वरार्हः |
वर पाने के योग्य (प्रथमा विभक्ति) |
| असि |
हो (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मतः |
विचार से (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति) |
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मारीचः कश्यपोऽब्रवीत्।
अदित्या देवतानां च मम चैवानुयाचितम्।
वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत।
पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ॥
॥ 1.29.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘भगवान् का यह वचन सुनकर मरीचिनन्दन कश्यप ने कहा-‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले वरदायक परमेश्वर! सम्पूर्ण देवताओं की, अदिति की तथा मेरी भी आपसे एक ही बात के लिये बारम्बार याचना है। आप अत्यन्त प्रसन्न होकर मुझे वह एक ही वर प्रदान करें। भगवन्! निष्पाप नारायणदेव! आप मेरे और अदिति के पुत्र हो जायँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
भगवान् का यह (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्य |
उनका (षष्ठी विभक्ति) |
| मारीचः |
मरीचिनन्दन कश्यप ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कश्यपः |
कश्यप ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अदित्या |
अदिति की (षष्ठी विभक्ति) |
| देवतानाम् |
सम्पूर्ण देवताओं की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| मम |
मेरी भी (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| अनुयाचितम् |
बारम्बार याचना है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वरम् |
वह एक ही वर (द्वितीया विभक्ति) |
| वरद |
हे वरदायक! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सुप्रीतः |
अत्यन्त प्रसन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| दातुम् |
प्रदान करें (दा धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सुव्रत |
हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले! (सम्बोधन विभक्ति) |
| पुत्रत्वम् |
पुत्र हो जायँ (द्वितीया विभक्ति) |
| गच्छ |
हो जायँ (गम् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भगवन् |
हे भगवन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| अदित्याः |
अदिति के (षष्ठी विभक्ति) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अनघ |
हे निष्पाप नारायणदेव! (सम्बोधन विभक्ति) |
भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदन।
शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥
॥ 1.29.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“असुरसूदन! आप इन्द्र के छोटे भाई हों और शोक से पीड़ित हुए इन देवताओं की सहायता करें।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भ्राता |
भाई (प्रथमा विभक्ति) |
| भव |
हों (भू धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| यवीयान् |
छोटे (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| शक्रस्य |
इन्द्र के (षष्ठी विभक्ति) |
| असुरसूदन |
हे असुरसूदन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| शोकार्तानाम् |
शोक से पीड़ित हुए के लिये (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| देवानाम् |
इन देवताओं की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| साहाय्यम् |
सहायता (द्वितीया विभक्ति) |
| कर्तुम् |
करें (कृ धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
अयं सिद्धाश्रमो नाम प्रसादात् ते भविष्यति।
सिद्धे कर्मणि देवेश उत्तिष्ठ भगवन्नितः॥
॥ 1.29.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“देवेश्वर! भगवन्! आपकी कृपा से यह स्थान सिद्धाश्रम के नाम से विख्यात होगा। अब आपका तपरूप कार्य सिद्ध हो गया है, अतः यहाँ से उठिये’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| सिद्धाश्रमः |
सिद्धाश्रम के नाम से (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| प्रसादात् |
आपकी कृपा से (पञ्चमी विभक्ति) |
| ते |
आपकी (षष्ठी विभक्ति) |
| भविष्यति |
होगा (भू धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सिद्धे |
सिद्ध हो गया है (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| कर्मणि |
तपरूप कार्य (सप्तमी विभक्ति) |
| देवेश |
हे देवेश्वर! (सम्बोधन विभक्ति) |
| उत्तिष्ठ |
उठिये (उत् + स्था, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भगवन् |
हे भगवन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| इतः |
यहाँ से (अव्यय) |
अथ विष्णुर्महातेजा अदित्यां समजायत।
वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत्॥
॥ 1.29.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘तदनन्तर महातेजस्वी भगवान् विष्णु अदिति देवी के गर्भ से प्रकट हुए और वामनरूप धारण करके विरोचन कुमार बलि के पास गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| विष्णुः |
महातेजस्वी भगवान् विष्णु (प्रथमा विभक्ति) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| अदित्याम् |
अदिति देवी के गर्भ से (सप्तमी विभक्ति) |
| समजायत |
प्रकट हुए (सम् + जन्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वामनम् |
वामनरूप (द्वितीया विभक्ति) |
| रूपम् |
रूप (द्वितीया विभक्ति) |
| आस्थाय |
धारण करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| वैरोचनिम् |
विरोचन कुमार बलि के पास (द्वितीया विभक्ति) |
| उपागमत् |
गये (उप + आ + गम्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
त्रीन् पदानथ भिक्षित्वा प्रतिगृह्य च मेदिनीम्।
आक्रम्य लोकाँल्लोकार्थी सर्वलोकहिते रतः।
महेन्द्राय पुनः प्रादान्नियम्य बलिमोजसा।
त्रैलोक्यं स महातेजाश्चक्रे शक्रवशं पुनः॥
॥ 1.29.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘सम्पूर्ण लोकों के हित में तत्पर रहने वाले भगवान् विष्णु बलि के अधिकार से त्रिलोकी का राज्य ले लेना चाहते थे; अतः उन्होंने तीन पग भूमि के लिये याचना करके उनसे भूमिदान ग्रहण किया और तीनों लोकों को आक्रान्त करके उन्हें पुनः देवराज इन्द्र को लौटा दिया। महातेजस्वी श्रीहरि ने अपनी शक्ति से बलि का निग्रह करके त्रिलोकी को पुनः इन्द्र के अधीन कर दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| त्रीन् |
तीन (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पदान् |
पग भूमि के लिये (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अथ |
अतः (अव्यय) |
| भिक्षित्वा |
याचना करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| प्रतिगृह्य |
ग्रहण किया (ल्यबन्त अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| मेदिनीम् |
भूमिदान (द्वितीया विभक्ति) |
| आक्रम्य |
आक्रान्त करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| लोकान् |
तीनों लोकों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| लोकार्थी |
त्रिलोकी का राज्य ले लेना चाहते थे (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वलोकहिते |
सम्पूर्ण लोकों के हित में (सप्तमी विभक्ति) |
| रतः |
तत्पर रहने वाले (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महेन्द्राय |
देवराज इन्द्र को (चतुर्थी विभक्ति) |
| पुनः |
पुनः (अव्यय) |
| प्रादात् |
लौटा दिया (प्र + दा, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| नियम्य |
निग्रह करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| बलिम् |
बलि का (द्वितीया विभक्ति) |
| ओजसा |
अपनी शक्ति से (तृतीया विभक्ति) |
| त्रैलोक्यम् |
त्रिलोकी को (द्वितीया विभक्ति) |
| सः |
वह महातेजस्वी श्रीहरि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| चक्रे |
कर दिया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| शक्रवशम् |
इन्द्र के अधीन (द्वितीया विभक्ति) |
| पुनः |
पुनः (अव्यय) |
तेनैव पूर्वमाक्रान्त आश्रमः श्रमनाशनः।
मयापि भक्त्या तस्यैव वामनस्योपभुज्यते॥
॥ 1.29.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘उन्हीं भगवान् ने पूर्वकाल में यहाँ निवास किया था; इसलिये यह आश्रम सब प्रकार के श्रम (दुःख-शोक) का नाश करनेवाला है। उन्हीं भगवान् वामन में भक्ति होने के कारण मैं भी इस स्थान को अपने उपयोग में लाता हूँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेन |
उन्हीं भगवान् ने (तृतीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| पूर्वम् |
पूर्वकाल में (अव्यय) |
| आक्रान्तः |
यहाँ निवास किया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| आश्रमः |
यह आश्रम (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रमनाशनः |
सब प्रकार के श्रम (दुःख-शोक) का नाश करनेवाला है (प्रथमा विभक्ति) |
| मया |
मैं भी (तृतीया विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| भक्त्या |
उन्हीं भगवान् वामन में भक्ति होने के कारण (तृतीया विभक्ति) |
| तस्य |
उन्हीं के (षष्ठी विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| वामनस्य |
भगवान् वामन के (षष्ठी विभक्ति) |
| उपभुज्यते |
अपने उपयोग में लाता हूँ (उप + भुज्, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
एनमाश्रममायान्ति राक्षसा विघ्नकारिणः।
अत्र ते पुरुषव्याघ्र हन्तव्या दुष्टचारिणः॥
॥ 1.29.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इसी आश्रम पर मेरे यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्षस आते हैं। पुरुषसिंह! यहीं तुम्हें उन दुराचारियों का वध करना है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एनम् |
इसी (द्वितीया विभक्ति) |
| आश्रमम् |
आश्रम पर (द्वितीया विभक्ति) |
| आयान्ति |
आते हैं (आ + या, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| राक्षसाः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विघ्नकारिणः |
मेरे यज्ञ में विघ्न डालने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अत्र |
यहीं (अव्यय) |
| ते |
तुम्हें (चतुर्थी विभक्ति) |
| पुरुषव्याघ्र |
हे पुरुषसिंह! (सम्बोधन विभक्ति) |
| हन्तव्याः |
वध करना है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| दुष्टचारिणः |
उन दुराचारियों का (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम्।
तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम॥
॥ 1.29.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘श्रीराम! अब हम लोग उस परम उत्तम सिद्धाश्रम में पहुँच रहे हैं। तात! वह आश्रम जैसे मेरा है, वैसे ही तुम्हारा भी है’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अद्य |
अब (अव्यय) |
| गच्छामहे |
पहुँच रहे हैं (गम् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| राम |
हे श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सिद्धाश्रमम् |
उस परम उत्तम सिद्धाश्रम में (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुत्तमम् |
परम उत्तम में (द्वितीया विभक्ति) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| आश्रमपदम् |
आश्रम (प्रथमा विभक्ति) |
| तात |
हे तात! (सम्बोधन विभक्ति) |
| तव |
तुम्हारा भी है (षष्ठी विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| एतत् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| मम |
मेरा है (षष्ठी विभक्ति) |
इत्युक्त्वा परमप्रीतो गृह्य रामं सलक्ष्मणम्।
प्रविशन्नाश्रमपदं व्यरोचत महामुनिः।
शशीव गतनीहारः पुनर्वसुसमन्वितः॥
॥ 1.29.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ऐसा कहकर महामुनि ने बड़े प्रेम से श्रीराम और लक्ष्मण के हाथ पकड़ लिये और उन दोनों के साथ आश्रम में प्रवेश किया। उस समय पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रों के बीच में स्थित तुषाररहित चन्द्रमा की भाँति उनकी शोभा हुई।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| परमप्रीतः |
बड़े प्रेम से (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| गृह्य |
हाथ पकड़ लिये (ल्यबन्त अव्यय) |
| रामम् |
श्रीराम के (द्वितीया विभक्ति) |
| सलक्ष्मणम् |
लक्ष्मण सहित के (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रविशन् |
प्रवेश किया (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| आश्रमपदम् |
आश्रम में (द्वितीया विभक्ति) |
| व्यरोचत |
उनकी शोभा हुई (वि + रुच्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| महामुनिः |
महामुनि की (प्रथमा विभक्ति) |
| शशी |
चन्द्रमा की (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
भाँति (अव्यय) |
| गतनीहारः |
तुषाररहित की (प्रथमा विभक्ति) |
| पुनर्वसुसमन्वितः |
पुनर्वसु नामक दो नक्षत्रों के बीच में स्थित के साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तं दृष्ट्वा मुनयः सर्वे सिद्धाश्रमनिवासिनः।
उत्पत्योत्पत्य सहसा विश्वामित्रमपूजयन्।
यथार्हं चक्रिरे पूजां विश्वामित्राय धीमते।
तथैव राजपुत्राभ्यामकुर्वन्नतिथिक्रियाम्॥
॥ 1.29.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विश्वामित्रजी को आया देख सिद्धाश्रम में रहने वाले सभी तपस्वी उछलते-कूदते हुए सहसा उनके पास आये और सबने मिलकर उन बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की यथोचित पूजा की। इसी प्रकार उन्होंने उन दोनों राजकुमारों का भी अतिथि-सत्कार किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उस विश्वामित्रजी को (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
आया देख (क्त्वान्त अव्यय) |
| मुनयः |
सभी तपस्वी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सिद्धाश्रमनिवासिनः |
सिद्धाश्रम में रहने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| उत्पत्य |
उछलते-कूदते हुए (ल्यबन्त अव्यय) |
| उत्पत्य |
उछलते-कूदते हुए (ल्यबन्त अव्यय) |
| सहसा |
सहसा (तृतीया विभक्ति का अव्यय) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्रजी की (द्वितीया विभक्ति) |
| अपूजयन् |
पूजा की (पूज् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यथार्हम् |
यथोचित (अव्यय) |
| चक्रिरे |
की (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| पूजाम् |
पूजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| विश्वामित्राय |
उन बुद्धिमान् विश्वामित्रजी की (चतुर्थी विभक्ति) |
| धीमते |
बुद्धिमान् की (चतुर्थी विभक्ति) |
| तथा |
इसी प्रकार (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| राजपुत्राभ्याम् |
उन दोनों राजकुमारों का भी (षष्ठी विभक्ति, द्विवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| अकुर्वन् |
किया (कृ धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| अतिथिक्रियाम् |
अतिथि-सत्कार को (द्वितीया विभक्ति) |
मुहूर्तमथ विश्रान्तौ राजपुत्रावरिंदमौ।
प्राञ्जली मुनिशार्दूलमूचतू रघुनन्दनौ॥
॥ 1.29.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
दो घड़ी तक विश्राम करने के बाद रघुकुल को आनन्द देने वाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्र से बोले-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मुहूर्तम् |
दो घड़ी तक (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| अथ |
बाद (अव्यय) |
| विश्रान्तौ |
विश्राम करने के (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| राजपुत्रौ |
राजकुमार (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| अरिन्दमौ |
शत्रुदमन (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| प्राञ्जली |
हाथ जोड़कर (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| मुनिशार्दूलम् |
मुनिवर विश्वामित्र से (द्वितीया विभक्ति) |
| ऊचतुः |
बोले (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
| रघुनन्दनौ |
रघुकुल को आनन्द देने वाले ने (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
अद्यैव दीक्षां प्रविश भद्रं ते मुनिपुंगव।
सिद्धाश्रमोऽयं सिद्धः स्यात् सत्यमस्तु वचस्तव॥
॥ 1.29.29 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिश्रेष्ठ! आप आज ही यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करें, आपका कल्याण हो। यह सिद्धाश्रम वास्तव में यथानाम तथागुण सिद्ध हो और राक्षसों के वध के विषय में आपकी कही हुई बात सच्ची हो’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अद्य |
आज ही (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| दीक्षाम् |
यज्ञ की दीक्षा (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रविश |
ग्रहण करें (प्र + विश्, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मुनिश्रेष्ठ! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सिद्धाश्रमः |
यह सिद्धाश्रम (प्रथमा विभक्ति) |
| अयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| सिद्धः |
वास्तव में यथानाम तथागुण सिद्ध हो (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्यात् |
हो (अस् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सत्यम् |
सच्ची हो (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्तु |
हो (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वचः |
राक्षसों के वध के विषय में आपकी कही हुई बात (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
आपकी (षष्ठी विभक्ति) |
एवमुक्तो महातेजा विश्वामित्रो महानृषिः।
प्रविवेश तदा दीक्षां नियतो नियतेन्द्रियः।
कुमारावपि तां रात्रिमुषित्वा सुसमाहितौ।
प्रभातकाले चोत्थाय पूर्वां संध्यामुपास्य च।
प्रशुची परमं जाप्यं समाप्य नियमेन च।
हुताग्निहोत्रमासीनं विश्वामित्रमवन्दताम्॥
॥ 1.29.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनके ऐसा कहने पर महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र जितेन्द्रिय भाव से नियमपूर्वक यज्ञ की दीक्षा में प्रविष्ट हुए। वे दोनों राजकुमार भी सावधानी के साथ रात व्यतीत करके सबेरे उठे और स्नान आदि से शुद्ध हो प्रातःकाल की संध्योपासना तथा नियमपूर्वक सर्वश्रेष्ठ गायत्री मन्त्र का जप करने लगे। जप पूरा होने पर उन्होंने अग्निहोत्र करके बैठे हुए विश्वामित्रजी के चरणों में वन्दना की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रः |
महर्षि विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| महान् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| ऋषिः |
ऋषि (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रविवेश |
प्रविष्ट हुए (प्र + विश्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तदा |
तब (अव्यय) |
| दीक्षाम् |
यज्ञ की दीक्षा में (द्वितीया विभक्ति) |
| नियतः |
नियमपूर्वक (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| नियतेन्द्रियः |
जितेन्द्रिय भाव से (प्रथमा विभक्ति) |
| कुमारौ |
वे दोनों राजकुमार भी (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| रात्रिम् |
रात (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| उषित्वा |
व्यतीत करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| सुसमाहितौ |
सावधानी के साथ (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रभातकाले |
सबेरे (सप्तमी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| उत्थाय |
उठकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| पूर्वाम् |
प्रातःकाल की (द्वितीया विभक्ति) |
| सन्ध्याम् |
संध्योपासना (द्वितीया विभक्ति) |
| उपास्य |
उपासना करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| प्रशुची |
स्नान आदि से शुद्ध हो (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| परमम् |
सर्वश्रेष्ठ (द्वितीया विभक्ति) |
| जाप्यम् |
गायत्री मन्त्र का जप (द्वितीया विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| समाप्य |
पूरा होने पर (ल्यबन्त अव्यय) |
| नियमेन |
नियमपूर्वक (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| हुताग्निहोत्रम् |
अग्निहोत्र करके बैठे हुए को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| आसीनम् |
बैठे हुए को (द्वितीया विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्रजी के चरणों में (द्वितीया विभक्ति) |
| अवन्दताम् |
वन्दना की (वन्द् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे एकोनत्रिंशः सर्गः ॥२९॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में उन्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२९॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| एकोनत्रिंशः |
उन्तीसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥२९॥ |
॥२९॥ (सर्ग संख्या) |
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