🌿 सर्ग 26: श्रीराम द्वारा ताटका का वध
The slaying of Tataka by Shri Rama
कुल श्लोक: 36
मुनेर्वचनमक्लीबं श्रुत्वा नरवरात्मजः।
राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रत्युवाच दृढव्रतः॥
॥ 1.26.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
मुनि के ये उत्साह भरे वचन सुनकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले राजकुमार श्रीराम ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मुनेः |
मुनि के (षष्ठी विभक्ति) |
| वचनम् |
ये उत्साह भरे वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| अक्लीबम् |
उत्साह भरे को (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| नरवरात्मजः |
राजकुमार ने (प्रथमा विभक्ति) |
| राघवः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्राञ्जलिः |
हाथ जोड़कर (प्रथमा विभक्ति) |
| भूत्वा |
होकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| प्रत्युवाच |
उत्तर दिया (प्रति + वच्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दृढव्रतः |
दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
पितुर्वचननिर्देशात् पितुर्वचनगौरवात्।
वचनं कौशिकस्येति कर्तव्यमविशङ्कया।
अनुशिष्टोऽस्म्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना।
पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं हि तद्वचः॥
॥ 1.26.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘भगवन्! अयोध्या में मेरे पिता महामना महाराज दशरथ ने अन्य गुरुजनों के बीच मुझे यह उपदेश दिया था कि ‘बेटा! तुम पिता के कहने से पिता के वचनों का गौरव रखने के लिये कुशिकनन्दन विश्वामित्र की आज्ञा का निःशङ्क होकर पालन करना। कभी भी उनकी बात की अवहेलना न करना’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पितुः |
पिता के (षष्ठी विभक्ति) |
| वचननिर्देशात् |
कहने से (पञ्चमी विभक्ति) |
| पितुः |
पिता के (षष्ठी विभक्ति) |
| वचनगौरवात् |
वचनों का गौरव रखने के लिये (पञ्चमी विभक्ति) |
| वचनम् |
आज्ञा का (द्वितीया विभक्ति) |
| कौशिकस्य |
कुशिकनन्दन विश्वामित्र की (षष्ठी विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| कर्तव्यम् |
पालन करना चाहिये (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| अविशङ्कया |
निःशङ्क होकर (तृतीया विभक्ति) |
| अनुशिष्टः |
उपदेश दिया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अस्मि |
मुझे (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| अयोध्यायाम् |
अयोध्या में (सप्तमी विभक्ति) |
| गुरुमध्ये |
अन्य गुरुजनों के बीच (सप्तमी विभक्ति) |
| महात्मना |
महामना के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| पित्रा |
पिता के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| दशरथेन |
महाराज दशरथ के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| अहम् |
मैंने (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अवज्ञेयम् |
अवहेलना करनी चाहिये (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| तत् |
उनकी (द्वितीया विभक्ति) |
| वचः |
बात की (द्वितीया विभक्ति) |
सोऽहं पितुर्वचः श्रुत्वा शासनाद् ब्रह्मवादिनः।
करिष्यामि न संदेहस्ताटकावधमुत्तमम्॥
॥ 1.26.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘अतः मैं पिताजी के उस उपदेश को सुनकर आप ब्रह्मवादी महात्मा की आज्ञा से ताटका वध सम्बन्धी कार्य को उत्तम मानकर करूँगा—इसमें संदेह नहीं है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
अतः (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| पितुः |
पिताजी के (षष्ठी विभक्ति) |
| वचः |
उस उपदेश को (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| शासनात् |
आज्ञा से (पञ्चमी विभक्ति) |
| ब्रह्मवादिनः |
आप ब्रह्मवादी महात्मा की (षष्ठी विभक्ति) |
| करिष्यामि |
करूँगा (कृ धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| सन्देहः |
संदेह है (प्रथमा विभक्ति) |
| ताटकावधम् |
ताटका वध सम्बन्धी कार्य को (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम मानकर (द्वितीया विभक्ति) |
गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय च।
तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः॥
॥ 1.26.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘गौ, ब्राह्मण तथा समूचे देश का हित करने के लिये मैं आप-जैसे अनुपम प्रभावशाली महात्मा के आदेश का पालन करने को सब प्रकार से तैयार हूँ’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गोब्राह्मणहितार्थाय |
गौ, ब्राह्मण का हित करने के लिये (चतुर्थी विभक्ति) |
| देशस्य |
समूचे देश का (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| हिताय |
हित करने के लिये (चतुर्थी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| तव |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| अप्रमेयस्य |
अनुपम प्रभावशाली महात्मा के (षष्ठी विभक्ति) |
| वचनम् |
आदेश का (द्वितीया विभक्ति) |
| कर्तुम् |
पालन करने को (कृ धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| उद्यतः |
सब प्रकार से तैयार हूँ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
एवमुक्त्वा धनुर्मध्ये बद्ध्वा मुष्टिमरिंदमः।
ज्याघोषमकरोत् तीव्रं दिशः शब्देन नादयन्॥
॥ 1.26.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ऐसा कहकर शत्रुदमन श्रीराम ने धनुष के मध्यभाग में मुट्ठी बाँधकर उसे जोर से पकड़ा और उसकी प्रत्यञ्चा पर तीव्र टङ्कार दी। उसकी आवाज से सम्पूर्ण दिशाएँ गूंज उठीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| धनुर्मध्ये |
धनुष के मध्यभाग में (सप्तमी विभक्ति) |
| बद्ध्वा |
बाँधकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| मुष्टिम् |
मुट्ठी को (द्वितीया विभक्ति) |
| अरिन्दमः |
शत्रुदमन श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ज्याघोषम् |
प्रत्यञ्चा पर तीव्र टङ्कार (द्वितीया विभक्ति) |
| अकरोत् |
दी (कृ धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तीव्रम् |
तीव्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| दिशः |
सम्पूर्ण दिशाएँ (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| शब्देन |
उसकी आवाज से (तृतीया विभक्ति) |
| नादयन् |
गूंज उठीं (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त, प्रयोज्यार्थ) |
तेन शब्देन वित्रस्तास्ताटकावनवासिनः।
ताटका च सुसंक्रुद्धा तेन शब्देन मोहिता॥
॥ 1.26.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस शब्द से ताटका वन में रहने वाले समस्त प्राणी थर्रा उठे। ताटका भी उस टङ्कार-घोष से पहले तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठी; परंतु फिर कुछ सोचकर अत्यन्त क्रोध में भर गयी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेन |
उस (तृतीया विभक्ति) |
| शब्देन |
शब्द से (तृतीया विभक्ति) |
| वित्रस्ताः |
थर्रा उठे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| ताटकावनवासिनः |
ताटका वन में रहने वाले समस्त प्राणी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ताटका |
ताटका भी (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुसंक्रुद्धा |
अत्यन्त क्रोध में भर गयी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तेन |
उस (तृतीया विभक्ति) |
| शब्देन |
टङ्कार-घोष से (तृतीया विभक्ति) |
| मोहिता |
किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तं शब्दमभिनिध्याय राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता।
श्रुत्वा चाभ्यद्रवत् क्रुद्धा यत्र शब्दो विनिःसृतः॥
॥ 1.26.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस शब्द को सुनकर वह राक्षसी क्रोध से अचेत-सी हो गयी थी। उसे सुनते ही वह जहाँ से आवाज आयी थी, उसी दिशा की ओर रोषपूर्वक दौड़ी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| शब्दम् |
शब्द को (द्वितीया विभक्ति) |
| अभिनिध्याय |
सुनकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| राक्षसी |
वह राक्षसी (प्रथमा विभक्ति) |
| क्रोधमूर्च्छिता |
क्रोध से अचेत-सी हो गयी थी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| श्रुत्वा |
सुनते ही (क्त्वान्त अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अभ्यद्रवत् |
दौड़ी (अभि + द्रु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| क्रुद्धा |
रोषपूर्वक (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| यत्र |
जहाँ से (अव्यय) |
| शब्दः |
आवाज (प्रथमा विभक्ति) |
| विनिःसृतः |
आयी थी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तां दृष्ट्वा राघवः क्रुद्धां विकृतां विकृताननाम्।
प्रमाणेनातिवृद्धां च लक्ष्मणं सोऽभ्यभाषत॥
॥ 1.26.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उसके शरीर की ऊँचाई बहुत अधिक थी। उसकी मुखाकृति विकृत दिखायी देती थी। क्रोध में भरी हुई उस विकराल राक्षसी की ओर दृष्टिपात करके श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
दृष्टिपात करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| राघवः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| क्रुद्धाम् |
क्रोध में भरी हुई को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विकृताम् |
विकराल को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विकृताननाम् |
विकृत मुखाकृति वाली को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रमाणेन |
शरीर की ऊँचाई (तृतीया विभक्ति) |
| अतिवृद्धाम् |
बहुत अधिक थी (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| लक्ष्मणम् |
लक्ष्मण से (द्वितीया विभक्ति) |
| सः |
उसने (प्रथमा विभक्ति) |
| अभ्यभाषत |
कहा (अभि + भाष्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
पश्य लक्ष्मण यक्षिण्या भैरवं दारुणं वपुः।
भिद्येरन् दर्शनादस्या भीरूणां हृदयानि च॥
॥ 1.26.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘लक्ष्मण! देखो तो सही, इस यक्षिणी का शरीर कैसा दारुण एवं भयङ्कर है! इसके दर्शन मात्र से भीरु पुरुषों के हृदय विदीर्ण हो सकते हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पश्य |
देखो तो सही (दृश् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| लक्ष्मण |
हे लक्ष्मण! (सम्बोधन विभक्ति) |
| यक्षिण्या |
इस यक्षिणी का (षष्ठी विभक्ति) |
| भैरवम् |
भयङ्कर (प्रथमा विभक्ति) |
| दारुणम् |
दारुण एवं (प्रथमा विभक्ति) |
| वपुः |
शरीर (प्रथमा विभक्ति) |
| भिद्येरन् |
विदीर्ण हो सकते हैं (भिद् धातु, कर्मवाच्य, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| दर्शनात् |
दर्शन मात्र से (पञ्चमी विभक्ति) |
| अस्याः |
इसके (षष्ठी विभक्ति) |
| भीरूणाम् |
भीरु पुरुषों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| हृदयानि |
हृदय (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
भी (अव्यय) |
एतां पश्य दुराधर्षां मायाबलसमन्विताम्।
विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रनासिकाम्॥
॥ 1.26.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मायाबल से सम्पन्न होने के कारण यह अत्यन्त दुर्जय हो रही है। देखो, मैं अभी इसके कान और नाक काटकर इसे पीछे लौटने को विवश किये देता हूँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एताम् |
इसको (द्वितीया विभक्ति) |
| पश्य |
देखो (दृश् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| दुराधर्षाम् |
अत्यन्त दुर्जय हो रही है (द्वितीया विभक्ति) |
| मायाबलसमन्विताम् |
मायाबल से सम्पन्न होने के कारण (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विनिवृत्ताम् |
पीछे लौटने को विवश (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| करोमि |
किये देता हूँ (कृ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| अद्य |
अभी (अव्यय) |
| हृतकर्णाग्रनासिकाम् |
कान और नाक काटकर (द्वितीया विभक्ति) |
न ह्येनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम्।
वीर्यं चास्या गतिं चैव हन्यामिति हि मे मतिः॥
॥ 1.26.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘यह अपने स्त्री स्वभाव के कारण रक्षित है; अतः मुझे इसे मारने में उत्साह नहीं है। मेरा विचार यह है कि मैं इसके बल-पराक्रम तथा गमन शक्ति को नष्ट कर दूँ (अर्थात् इसके हाथ-पैर काट डालूँ)’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| एनाम् |
इसे (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्सहे |
उत्साह है (उत् + सह्, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| हन्तुम् |
मारने में (हन् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| स्त्रीस्वभावेन |
अपने स्त्री स्वभाव के कारण (तृतीया विभक्ति) |
| रक्षिताम् |
रक्षित है (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वीर्यम् |
बल-पराक्रम को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| अस्याः |
इसके (षष्ठी विभक्ति) |
| गतिम् |
गमन शक्ति को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| हन्याम् |
नष्ट कर दूँ (हन् धातु, विधिलिङ् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| इति |
यह (अव्यय) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| मतिः |
विचार है (प्रथमा विभक्ति) |
एवं ब्रुवाणे रामे तु ताटका क्रोधमूर्च्छिता।
उद्यम्य बाहू गर्जन्ती राममेवाभ्यधावत॥
॥ 1.26.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि क्रोध से अचेत हुई ताटका वहाँ आ पहुँची और दोनों बाँहें उठाकर गर्जना करती हुई उन्हीं की ओर झपटी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| ब्रुवाणे |
कह ही रहे थे (सप्तमी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| रामे |
श्रीराम के (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| ताटका |
ताटका (प्रथमा विभक्ति) |
| क्रोधमूर्च्छिता |
क्रोध से अचेत हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| उद्यम्य |
उठाकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| बाहू |
दोनों बाँहें (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| गर्जन्ती |
गर्जना करती हुई (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| रामम् |
उन्हीं की ओर (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| अभ्यधावत |
झपटी (अभि + धाव्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
विश्वामित्रस्तु ब्रह्मर्षिर्हुङ्कारेणाभिभर्त्स्य ताम्।
स्वस्ति राघवयोरस्तु जयं चैवाभ्यभाषत॥
॥ 1.26.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यह देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने अपने हुंकार के द्वारा उसे डाँटकर कहा–’रघुकुल के इन दोनों राजकुमारों का कल्याण हो, इनकी विजय हो’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विश्वामित्रः |
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
यह देख (अव्यय) |
| ब्रह्मर्षिः |
ब्रह्मर्षि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| हुङ्कारेण |
अपने हुंकार के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| अभिभर्त्स्य |
डाँटकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| ताम् |
उसे (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वस्ति |
कल्याण (अव्यय) |
| राघवयोः |
रघुकुल के इन दोनों राजकुमारों का (षष्ठी विभक्ति, द्विवचन) |
| अस्तु |
हो (अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| जयम् |
विजय (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| अभ्यभाषत |
कहा (अभि + भाष्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
उद्धून्वाना रजो घोरं ताटका राघवावुभौ।
रजोमेघेन महता मुहूर्तं सा व्यमोहयत्॥
॥ 1.26.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब ताटका ने उन दोनों रघुवंशी वीरों पर भयङ्कर धूल उड़ाना आरम्भ किया। वहाँ धूल का विशाल बादल-सा छा गया। उसके द्वारा उसने श्रीराम और लक्ष्मण को दो घड़ी तक मोह में डाल दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| उद्धून्वाना |
उड़ाना आरम्भ किया (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| रजः |
भयङ्कर धूल (द्वितीया विभक्ति) |
| घोरम् |
भयङ्कर को (द्वितीया विभक्ति) |
| ताटका |
ताटका ने (प्रथमा विभक्ति) |
| राघवौ |
उन दोनों रघुवंशी वीरों पर (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| उभौ |
दोनों पर (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| रजोमेघेन |
धूल के विशाल बादल के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| महता |
विशाल के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| मुहूर्तम् |
दो घड़ी तक (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| सा |
उसने (प्रथमा विभक्ति) |
| व्यमोहयत् |
मोह में डाल दिया (वि + मुह्, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ततो मायां समास्थाय शिलावर्षेण राघवौ।
अवाकिरत् सुमहता ततश्चुक्रोध राघवः॥
॥ 1.26.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् माया का आश्रय लेकर वह उन दोनों भाइयों पर पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा करने लगी। यह देख रघुनाथ जी उस पर कुपित हो उठे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तत्पश्चात् (अव्यय) |
| मायाम् |
माया का (द्वितीया विभक्ति) |
| समास्थाय |
आश्रय लेकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| शिलावर्षेण |
पत्थरों की बड़ी भारी वर्षा से (तृतीया विभक्ति) |
| राघवौ |
उन दोनों भाइयों पर (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| अवाकिरत् |
करने लगी (अव + कॄ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुमहता |
बड़ी भारी से (तृतीया विभक्ति) |
| ततः |
यह देख (अव्यय) |
| चुक्रोध |
कुपित हो उठे (क्रुध् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राघवः |
रघुनाथ जी (प्रथमा विभक्ति) |
शिलावर्षं महत् तस्याः शरवर्षेण राघवः।
प्रतिवार्योपधावन्त्याः करौ चिच्छेद पत्रिभिः॥
॥ 1.26.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
रघुवीर ने अपनी बाण वर्षा के द्वारा उसकी बड़ी भारी शिलावृष्टि को रोककर अपनी ओर आती हुई उस निशाचरी के दोनों हाथ तीखे सायकों से काट डाले।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| शिलावर्षम् |
बड़ी भारी शिलावृष्टि को (द्वितीया विभक्ति) |
| महत् |
बड़ी भारी को (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्याः |
उसकी (षष्ठी विभक्ति) |
| शरवर्षेण |
अपनी बाण वर्षा के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| राघवः |
रघुवीर ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रतिवार्य |
रोककर (ल्यबन्त अव्यय) |
| उपधावन्त्याः |
अपनी ओर आती हुई के (षष्ठी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| करौ |
दोनों हाथ (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| चिच्छेद |
काट डाले (छिद् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पत्रिभिः |
तीखे सायकों से (तृतीया विभक्ति) |
ततश्छिन्नभुजां श्रान्तामभ्याशे परिगर्जतीम्।
सौमित्रिरकरोत् क्रोधाद्धृतकर्णाग्रनासिकाम्॥
॥ 1.26.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
दोनों भुजाएँ कट जाने से थकी हुई ताटका उनके निकट खड़ी होकर जोर-जोर से गर्जना करने लगी। यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने क्रोध में भरकर उसके नाक-कान काट लिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| छिन्नभुजाम् |
दोनों भुजाएँ कट जाने से थकी हुई को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| श्रान्ताम् |
थकी हुई को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अभ्याशे |
उनके निकट (सप्तमी विभक्ति) |
| परिगर्जतीम् |
जोर-जोर से गर्जना करने लगी (द्वितीया विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| सौमित्रिः |
सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अकरोत् |
काट लिये (कृ धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| क्रोधात् |
क्रोध में भरकर (पञ्चमी विभक्ति) |
| हृतकर्णाग्रनासिकाम् |
उसके नाक-कान काटकर (द्वितीया विभक्ति) |
कामरूपधरा सा तु कृत्वा रूपाण्यनेकशः।
अन्तर्धानं गता यक्षी मोहयन्ती स्वमायया॥
॥ 1.26.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
परंतु वह तो इच्छानुसार रूप धारण करने वाली यक्षिणी थी; अतः अनेक प्रकार के रूप बनाकर अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण को मोह में डालती हुई अदृश्य हो गयी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कामरूपधरा |
इच्छानुसार रूप धारण करने वाली (प्रथमा विभक्ति) |
| सा |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
परंतु (अव्यय) |
| कृत्वा |
बनाकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| रूपाणि |
रूपों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अनेकशः |
अनेक प्रकार के (अव्यय) |
| अन्तर्धानम् |
अदृश्य (द्वितीया विभक्ति) |
| गता |
हो गयी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| यक्षी |
यक्षिणी थी (प्रथमा विभक्ति) |
| मोहयन्ती |
मोह में डालती हुई (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त, प्रयोज्यार्थ) |
| स्वमायया |
अपनी माया से (तृतीया विभक्ति) |
अश्मवर्षं विमुञ्चन्ती भैरवं विचचार सा।
ततस्तावश्मवर्षेण कीर्यमाणौ समन्ततः।
दृष्ट्वा गाधिसुतः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत्।
अलं ते घृणया राम पापैषा दुष्टचारिणी।
यज्ञविघ्नकरी यक्षी पुरा वर्धेत मायया।
वध्यतां तावदेवैषा पुरा सन्ध्या प्रवर्तते।
रक्षांसि सन्ध्याकाले तु दुर्धर्षाणि भवन्ति हि॥
॥ 1.26.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अब वह पत्थरों की भयङ्कर वर्षा करती हुई आकाश में विचरने लगी। श्रीराम और लक्ष्मण पर चारों ओर से प्रस्तरों की वृष्टि होती देख तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्र ने इस प्रकार कहा—’श्रीराम! इसके ऊपर तुम्हारा दया करना व्यर्थ है। यह बड़ी पापिनी और दुराचारिणी है। सदा यज्ञों में विघ्न डाला करती है। यह अपनी माया से पुनः प्रबल हो उठे, इसके पहले ही इसे मार डालो। अभी संध्याकाल आना चाहता है, इसके पहले ही यह कार्य हो जाना चाहिये; क्योंकि संध्या के समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अश्मवर्षम् |
पत्थरों की भयङ्कर वर्षा (द्वितीया विभक्ति) |
| विमुञ्चन्ती |
करती हुई (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| भैरवम् |
भयङ्कर (द्वितीया विभक्ति) |
| विचचार |
विचरने लगी (वि + चर्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सा |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| तौ |
श्रीराम और लक्ष्मण पर (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| अश्मवर्षेण |
प्रस्तरों की वृष्टि से (तृतीया विभक्ति) |
| कीर्यमाणौ |
होती देख (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन, शानच् प्रत्ययान्त, कर्मवाच्य) |
| समन्ततः |
चारों ओर से (अव्यय) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| गाधिसुतः |
तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रीमान् |
तेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अलम् |
व्यर्थ है (अव्यय) |
| ते |
तुम्हारा (षष्ठी विभक्ति) |
| घृणया |
दया करना (तृतीया विभक्ति) |
| राम |
हे श्रीराम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| पापा |
बड़ी पापिनी (प्रथमा विभक्ति) |
| एषा |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| दुष्टचारिणी |
दुराचारिणी है (प्रथमा विभक्ति) |
| यज्ञविघ्नकरी |
सदा यज्ञों में विघ्न डाला करती है (प्रथमा विभक्ति) |
| यक्षी |
यह यक्षिणी (प्रथमा विभक्ति) |
| पुरा |
पहले ही (अव्यय) |
| वर्धेत |
प्रबल हो उठे (वृध् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मायया |
अपनी माया से (तृतीया विभक्ति) |
| वध्यताम् |
मार डालो (वध् धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तावत् |
इसके पहले ही (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| एषा |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| पुरा |
अभी (अव्यय) |
| सन्ध्या |
संध्याकाल (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रवर्तते |
आना चाहता है (प्र + वृत्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रक्षांसि |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सन्ध्याकाले |
संध्या के समय (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| दुर्धर्षाणि |
दुर्जय (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भवन्ति |
हो जाते हैं (भू धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
इत्युक्तः स तु तां यक्षीमश्मवृष्ट्याभिवर्षिणीम्।
दर्शयन् शब्दवेधित्वं तां रुरोध स सायकैः॥
॥ 1.26.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विश्वामित्रजी के ऐसा कहने पर श्रीराम ने शब्दवेधी बाण चलाने की शक्ति का परिचय देते हुए बाण मारकर प्रस्तरों की वर्षा करने वाली उस यक्षिणी को सब ओर से अवरुद्ध कर दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सः |
श्रीराम ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| यक्षीम् |
यक्षिणी को (द्वितीया विभक्ति) |
| अश्मवृष्ट्या |
प्रस्तरों की वर्षा से (तृतीया विभक्ति) |
| अभिवर्षिणीम् |
वर्षा करने वाली को (द्वितीया विभक्ति) |
| दर्शयन् |
परिचय देते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| शब्दवेधित्वम् |
शब्दवेधी बाण चलाने की शक्ति का (द्वितीया विभक्ति) |
| ताम् |
उसको (द्वितीया विभक्ति) |
| रुरोध |
अवरुद्ध कर दिया (रुध् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सः |
उसने (प्रथमा विभक्ति) |
| सायकैः |
बाण मारकर (तृतीया विभक्ति) |
सा रुद्धा बाणजालेन मायाबलसमन्विता।
अभिदुद्राव काकुत्स्थं लक्ष्मणं च विनेदुषी।
तामापतन्तीं वेगेन विक्रान्तामशनीमिव।
शरेणोरसि विव्याध सा पपात ममार च॥
॥ 1.26.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनके बाण-समूह से घिर जाने पर मायाबल से युक्त वह यक्षिणी जोर-जोर से गर्जना करती हुई श्रीराम और लक्ष्मण के ऊपर टूट पड़ी। उसे चलाये हुए इन्द्र के वज्र की भाँति वेग से आती देख श्रीराम ने एक बाण मारकर उसकी छाती चीर डाली। तब ताटका पृथ्वी पर गिरी और मर गयी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सा |
वह यक्षिणी (प्रथमा विभक्ति) |
| रुद्धा |
घिर जाने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| बाणजालेन |
बाण-समूह से (तृतीया विभक्ति) |
| मायाबलसमन्विता |
मायाबल से युक्त (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अभिदुद्राव |
टूट पड़ी (अभि + द्रु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| काकुत्स्थम् |
श्रीराम के ऊपर (द्वितीया विभक्ति) |
| लक्ष्मणम् |
लक्ष्मण के ऊपर (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| विनेदुषी |
जोर-जोर से गर्जना करती हुई (प्रथमा विभक्ति, क्तवतु प्रत्ययान्त) |
| ताम् |
उसे (द्वितीया विभक्ति) |
| आपतन्तीम् |
आती हुई को (द्वितीया विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| वेगेन |
वेग से (तृतीया विभक्ति) |
| विक्रान्ताम् |
चलाये हुए को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अशनीम् |
इन्द्र के वज्र की (द्वितीया विभक्ति) |
| इव |
भाँति (अव्यय) |
| शरेण |
एक बाण से (तृतीया विभक्ति) |
| उरसि |
छाती पर (सप्तमी विभक्ति) |
| विव्याध |
चीर डाली (व्यध् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सा |
वह ताटका (प्रथमा विभक्ति) |
| पपात |
गिरी (पत् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ममार |
मर गयी (मृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
तां हतां भीमसंकाशां दृष्ट्वा सुरपतिस्तदा।
साधु साध्विति काकुत्स्थं सुराश्चाप्यभिपूजयन्॥
॥ 1.26.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस भयङ्कर राक्षसी को मारी गयी देख देवराज इन्द्र तथा देवताओं ने श्रीराम को साधुवाद देते हुए उनकी सराहना की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| हताम् |
मारी गयी को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| भीमसङ्काशाम् |
भयङ्कर राक्षसी को (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| सुरपतिः |
देवराज इन्द्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| साधु साधु |
साधुवाद (अव्यय) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| काकुत्स्थम् |
श्रीराम को (द्वितीया विभक्ति) |
| सुराः |
देवताओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| अभिपूजयन् |
उनकी सराहना की (अभि + पूज्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
उवाच परमप्रीतः सहस्राक्षः पुरन्दरः।
सुराश्च सर्वे संहृष्टा विश्वामित्रमथाब्रुवन्॥
॥ 1.26.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस समय सहस्रलोचन इन्द्र तथा समस्त देवताओं ने अत्यन्त प्रसन्न एवं हर्षोत्फुल्ल होकर विश्वामित्रजी से कहा-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| परमप्रीतः |
अत्यन्त प्रसन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सहस्राक्षः |
सहस्रलोचन इन्द्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पुरन्दरः |
इन्द्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सुराः |
देवताओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| सर्वे |
समस्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| संहृष्टाः |
हर्षोत्फुल्ल होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्रजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| अथ |
उस समय (अव्यय) |
| अब्रुवन् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
मुने कौशिक भद्रं ते सेन्द्राः सर्वे मरुद्गणाः।
तोषिताः कर्मणानेन स्नेहं दर्शय राघवे॥
॥ 1.26.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुने! कुशिकनन्दन! आपका कल्याण हो, आपने इस कार्य से इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवताओं को संतुष्ट किया है। अब रघुकुलतिलक श्रीराम पर आप अपना स्नेह प्रकट कीजिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मुने |
हे मुने! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कौशिक |
हे कुशिकनन्दन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति) |
| सेन्द्राः |
इन्द्र सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सम्पूर्ण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मरुद्गणाः |
देवताओं को (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तोषिताः |
संतुष्ट किया है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| कर्मणा |
इस कार्य से (तृतीया विभक्ति) |
| अनेन |
इस से (तृतीया विभक्ति) |
| स्नेहम् |
अपना स्नेह (द्वितीया विभक्ति) |
| दर्शय |
प्रकट कीजिये (दृश् धातु, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| राघवे |
रघुकुलतिलक श्रीराम पर (सप्तमी विभक्ति) |
प्रजापतेः कृशाश्वस्य पुत्रान् सत्यपराक्रमान्।
तपोबलभृतो ब्रह्मन् राघवाय निवेदय॥
॥ 1.26.29 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन्! प्रजापति कृशाश्व के अस्त्र-रूपधारी पुत्रों को, जो सत्यपराक्रमी तथा तपोबल से सम्पन्न हैं, श्रीराम को समर्पित कीजिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रजापतेः |
प्रजापति के (षष्ठी विभक्ति) |
| कृशाश्वस्य |
कृशाश्व के (षष्ठी विभक्ति) |
| पुत्रान् |
अस्त्र-रूपधारी पुत्रों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सत्यपराक्रमान् |
सत्यपराक्रमी को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तपोबलभृतः |
तपोबल से सम्पन्न हैं (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| राघवाय |
श्रीराम को (चतुर्थी विभक्ति) |
| निवेदय |
समर्पित कीजिये (नि + विद्, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
पात्रभूतश्च ते ब्रह्मंस्तवानुगमने रतः।
कर्तव्यं सुमहत् कर्म सुराणां राजसूनुना॥
॥ 1.26.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘विप्रवर! ये आपके अस्त्रदान के सुयोग्य पात्र हैं तथा आपके अनुसरण (सेवा-शुश्रूषा) में तत्पर रहते हैं। राजकुमार श्रीराम के द्वारा देवताओं का महान् कार्य सम्पन्न होने वाला है’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पात्रभूतः |
सुयोग्य पात्र हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| ब्रह्मन् |
हे विप्रवर! (सम्बोधन विभक्ति) |
| तव |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| अनुगमने |
अनुसरण (सेवा-शुश्रूषा) में (सप्तमी विभक्ति) |
| रतः |
तत्पर रहते हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कर्तव्यम् |
सम्पन्न होने वाला है (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| सुमहत् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| कर्म |
कार्य (प्रथमा विभक्ति) |
| सुराणाम् |
देवताओं का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| राजसूनुना |
राजकुमार श्रीराम के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
एवमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा विहायसम्।
विश्वामित्रं पूजयन्तस्ततः सन्ध्या प्रवर्तते॥
॥ 1.26.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ऐसा कहकर सभी देवता विश्वामित्रजी की प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक आकाश मार्ग से चले गये। तत्पश्चात् संध्या हो गयी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्त्वा |
कहकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| सुराः |
सभी देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| जग्मुः |
चले गये (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| हृष्टाः |
प्रसन्नतापूर्वक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| विहायसम् |
आकाश मार्ग से (द्वितीया विभक्ति) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्रजी की (द्वितीया विभक्ति) |
| पूजयन्तः |
प्रशंसा करते हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| ततः |
तत्पश्चात् (अव्यय) |
| सन्ध्या |
संध्या (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रवर्तते |
हो गयी (प्र + वृत्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ततो मुनिवरः प्रीतस्ताटकावधतोषितः।
मूर्ध्नि राममुपाघ्राय इदं वचनमब्रवीत्॥
॥ 1.26.32 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर ताटका वध से संतुष्ट हुए मुनिवर विश्वामित्र ने श्रीरामचन्द्रजी का मस्तक सूंघकर उनसे यह बात कही—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| मुनिवरः |
मुनिवर विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रीतः |
प्रसन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ताटकावधतोषितः |
ताटका वध से संतुष्ट हुए (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मूर्ध्नि |
मस्तक पर (सप्तमी विभक्ति) |
| रामम् |
श्रीरामचन्द्रजी का (द्वितीया विभक्ति) |
| उपाघ्राय |
सूंघकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
बात (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कही (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
इहाद्य रजनीं राम वसाम शुभदर्शन।
श्वः प्रभाते गमिष्यामस्तदाश्रमपदं मम॥
॥ 1.26.33 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘शुभदर्शन राम! आज की रात में हम लोग यहीं निवास करें। कल सबेरे अपने आश्रम पर चलेंगे’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इह |
यहीं (अव्यय) |
| अद्य |
आज की (अव्यय) |
| रजनीम् |
रात में (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| राम |
हे राम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| वसाम |
निवास करें (वस् धातु, विधिलिङ् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| शुभदर्शन |
हे शुभदर्शन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| श्वः |
कल (अव्यय) |
| प्रभाते |
सबेरे (सप्तमी विभक्ति) |
| गमिष्यामः |
चलेंगे (गम् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| तत् |
अपने (द्वितीया विभक्ति) |
| आश्रमपदम् |
आश्रम पर (द्वितीया विभक्ति) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति) |
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथात्मजः।
उवास रजनीं तत्र ताटकाया वने सुखम्॥
॥ 1.26.34 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विश्वामित्रजी की यह बात सुनकर दशरथकुमार श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने ताटका वन में रहकर वह रात्रि बड़े सुख से व्यतीत की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विश्वामित्रवचः |
विश्वामित्रजी की यह बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| हृष्टः |
बड़े प्रसन्न हुए (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| दशरथात्मजः |
दशरथकुमार श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| उवास |
रहकर व्यतीत की (वस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रजनीम् |
रात्रि (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| ताटकायाः |
ताटका के (षष्ठी विभक्ति) |
| वने |
वन में (सप्तमी विभक्ति) |
| सुखम् |
बड़े सुख से (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि।
रमणीयं विबभ्राज यथा चैत्ररथं वनम्॥
॥ 1.26.35 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उसी दिन वह वन शापमुक्त होकर रमणीय शोभा से सम्पन्न हो गया और चैत्ररथ वन की भाँति अपनी मनोहर छटा दिखाने लगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मुक्तशापम् |
शापमुक्त होकर (प्रथमा विभक्ति) |
| वनम् |
वह वन (प्रथमा विभक्ति) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| तस्मिन् |
उसी (सप्तमी विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| तदा |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| अहनि |
दिन (सप्तमी विभक्ति) |
| रमणीयम् |
रमणीय शोभा से सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति) |
| विबभ्राज |
दिखाने लगा (वि + भ्राज्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यथा |
की भाँति (अव्यय) |
| चैत्ररथम् |
चैत्ररथ वन (प्रथमा विभक्ति) |
| वनम् |
वन (प्रथमा विभक्ति) |
निहत्य तां यक्षसुतां स रामः प्रशस्यमानः सुरसिद्धसङ्घैः।
उवास तस्मिन् मुनिना सहैव प्रभातवेलां प्रतिबोध्यमानः॥
॥ 1.26.36 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यक्षकन्या ताटका का वध करके श्रीरामचन्द्र जी देवताओं तथा सिद्ध समूहों की प्रशंसा के पात्र बन गये। उन्होंने प्रातःकाल की प्रतीक्षा करते हुए विश्वामित्रजी के साथ ताटका वन में निवास किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| निहत्य |
वध करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| यक्षसुताम् |
यक्षकन्या ताटका का (द्वितीया विभक्ति) |
| सः |
वह श्रीरामचन्द्र जी (प्रथमा विभक्ति) |
| रामः |
श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रशस्यमानः |
प्रशंसा के पात्र बन गये (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, कर्मवाच्य) |
| सुरसिद्धसङ्घैः |
देवताओं तथा सिद्ध समूहों की (तृतीया विभक्ति) |
| उवास |
निवास किया (वस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| मुनिना |
विश्वामित्रजी के (तृतीया विभक्ति) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| प्रभातवेलाम् |
प्रातःकाल की (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रतिबोध्यमानः |
प्रतीक्षा करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, कर्मवाच्य) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे षड्विंशः सर्गः ॥२६॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२६॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| षड्विंशः |
छब्बीसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥२६॥ |
॥२६॥ (सर्ग संख्या) |
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