🌿 सर्ग 25: श्रीराम के पूछने पर विश्वामित्रजी का ताटका की उत्पत्ति, विवाह एवं शाप आदि का प्रसंग सुनाकर उन्हें ताटका-वध के लिये प्रेरित करना
Upon Rama's inquiry, Vishwamitra narrates the story of Tataka's origin, marriage, and curse, and motivates him to slay Tataka
कुल श्लोक: 22
श्लोक 1
अथ तस्याप्रमेयस्य मुनेर्वचनमुत्तमम्।
श्रुत्वा पुरुषशार्दूलः प्रत्युवाच शुभां गिरम्॥
श्रुत्वा पुरुषशार्दूलः प्रत्युवाच शुभां गिरम्॥
॥ 1.25.1 ॥
श्लोक 2
अल्पवीर्या यदा यक्षी श्रूयते मुनिपुंगव।
कथं नागसहस्रस्य धारयत्यबला बलम्॥
कथं नागसहस्रस्य धारयत्यबला बलम्॥
॥ 1.25.2 ॥
श्लोक 3
इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा राघवस्यामितौजसः।
हर्षयन् श्लक्ष्णया वाचा सलक्ष्मणमरिन्दमम्।
विश्वामित्रोऽब्रवीद् वाक्यं शृणु येन बलोत्कटा।
वरदानकृतं वीर्यं धारयत्यबला बलम्॥
हर्षयन् श्लक्ष्णया वाचा सलक्ष्मणमरिन्दमम्।
विश्वामित्रोऽब्रवीद् वाक्यं शृणु येन बलोत्कटा।
वरदानकृतं वीर्यं धारयत्यबला बलम्॥
॥ 1.25.3 ॥
श्लोक 5
पूर्वमासीन्महायक्षः सुकेतुर्नाम वीर्यवान्।
अनपत्यः शुभाचारः स च तेपे महत्तपः॥
अनपत्यः शुभाचारः स च तेपे महत्तपः॥
॥ 1.25.5 ॥
श्लोक 6
पितामहस्तु सुप्रीतस्तस्य यक्षपतेस्तदा।
कन्यारत्नं ददौ राम ताटकां नाम नामतः॥
कन्यारत्नं ददौ राम ताटकां नाम नामतः॥
॥ 1.25.6 ॥
श्लोक 7
ददौ नागसहस्रस्य बलं चास्याः पितामहः।
न त्वेव पुत्रं यक्षाय ददौ चासौ महायशाः॥
न त्वेव पुत्रं यक्षाय ददौ चासौ महायशाः॥
॥ 1.25.7 ॥
श्लोक 8
तां तु बालां विवर्धन्तीं रूपयौवनशालिनीम्।
जम्भपुत्राय सुन्दाय ददौ भार्यां यशस्विनीम्॥
जम्भपुत्राय सुन्दाय ददौ भार्यां यशस्विनीम्॥
॥ 1.25.8 ॥
श्लोक 9
कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षी पुत्रं व्यजायत।
मारीचं नाम दुर्धर्षं यः शापाद् राक्षसोऽभवत्॥
मारीचं नाम दुर्धर्षं यः शापाद् राक्षसोऽभवत्॥
॥ 1.25.9 ॥
श्लोक 10
सुन्दे तु निहते राम अगस्त्यमृषिसत्तमम्।
ताटका सहपुत्रेण प्रधर्षयितुमिच्छति॥
ताटका सहपुत्रेण प्रधर्षयितुमिच्छति॥
॥ 1.25.10 ॥
श्लोक 11
भक्षार्थं जातसंरम्भा गर्जन्ती साभ्यधावत।
आपतन्तीं तु तां दृष्ट्वा अगस्त्यो भगवानृषिः।
राक्षसत्वं भजस्वेति मारीचं व्याजहार सः॥
आपतन्तीं तु तां दृष्ट्वा अगस्त्यो भगवानृषिः।
राक्षसत्वं भजस्वेति मारीचं व्याजहार सः॥
॥ 1.25.11 ॥
श्लोक 12
अगस्त्यः परमामर्षस्ताटकामपि शप्तवान्।
पुरुषादी महायक्षी विकृता विकृतानना।
इदं रूपं विहायाशु दारुणं रूपमस्तु ते॥
पुरुषादी महायक्षी विकृता विकृतानना।
इदं रूपं विहायाशु दारुणं रूपमस्तु ते॥
॥ 1.25.12 ॥
श्लोक 14
सैषा शापकृतामर्षा ताटका क्रोधमूर्च्छिता।
देशमुत्सादयत्येनमगस्त्याचरितं शुभम्॥
देशमुत्सादयत्येनमगस्त्याचरितं शुभम्॥
॥ 1.25.14 ॥
श्लोक 15
एनां राघव दुर्वृत्तां यक्षीं परमदारुणाम्।
गोब्राह्मणहितार्थाय जहि दुष्टपराक्रमाम्॥
गोब्राह्मणहितार्थाय जहि दुष्टपराक्रमाम्॥
॥ 1.25.15 ॥
श्लोक 16
नह्येनां शापसंसृष्टां कश्चिदुत्सहते पुमान्।
निहन्तुं त्रिषु लोकेषु त्वामृते रघुनन्दन॥
निहन्तुं त्रिषु लोकेषु त्वामृते रघुनन्दन॥
॥ 1.25.16 ॥
श्लोक 17
नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम।
चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना॥
चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना॥
॥ 1.25.17 ॥
श्लोक 18
नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात्।
पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा॥
पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा॥
॥ 1.25.18 ॥
श्लोक 19
राज्यभारनियुक्तानामेष धर्मः सनातनः।
अधर्मे जहि काकुत्स्थ धर्मो ह्यस्यां न विद्यते॥
अधर्मे जहि काकुत्स्थ धर्मो ह्यस्यां न विद्यते॥
॥ 1.25.19 ॥
श्लोक 20
श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचनसुतां नृप।
पृथिवीं हन्तुमिच्छन्ती मन्थरामभ्यसूदयत्॥
पृथिवीं हन्तुमिच्छन्ती मन्थरामभ्यसूदयत्॥
॥ 1.25.20 ॥
श्लोक 21
विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता।
अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता॥
अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता॥
॥ 1.25.21 ॥
श्लोक 22
एतैश्चान्यैश्च बहुभी राजपुत्रैर्महात्मभिः।
अधर्मसहिता नार्यो हताः पुरुषसत्तमैः।
तस्मादेनां घृणां त्यक्त्वा जहि मच्छासनान्नृप॥
अधर्मसहिता नार्यो हताः पुरुषसत्तमैः।
तस्मादेनां घृणां त्यक्त्वा जहि मच्छासनान्नृप॥
॥ 1.25.22 ॥
सर्ग समाप्ति
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः॥२५॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२५॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| इति | इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे | ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे | श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये | वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये | आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे | बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| पञ्चविंशः | पचीसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः | सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥२५॥ | ॥२५॥ (सर्ग संख्या) |