🌿 सर्ग 22: राजा दशरथ का स्वस्तिवाचन पूर्वक राम-लक्ष्मण को मुनि के साथ भेजना, विश्वामित्र से बला और अतिबला नामक विद्या की प्राप्ति
King Dasharatha sends Rama and Lakshmana with the sage after performing Svastivachana; Rama receives the knowledge of Bala and Atibala from Vishwamitra
कुल श्लोक: 24
तथा वसिष्ठे ब्रुवति राजा दशरथः स्वयम्।
प्रहृष्टवदनो राममाजुहाव सलक्ष्मणम्।
कृतस्वस्त्ययनं मात्रा पित्रा दशरथेन च।
पुरोधसा वसिष्ठेन मङ्गलैरभिमन्त्रितम्॥
॥ 1.22.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वसिष्ठ के ऐसा कहने पर राजा दशरथ का मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने स्वयं ही लक्ष्मण सहित श्रीराम को अपने पास बुलाया, फिर माता कौसल्या, पिता दशरथ और पुरोहित वसिष्ठ ने स्वस्तिवाचन करने के पश्चात् उनका यात्रा सम्बन्धी मंगलकार्य सम्पन्न किया—श्रीराम को मंगलसूचक मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया गया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
उस प्रकार (अव्यय) |
| वसिष्ठे |
वसिष्ठ के (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| ब्रुवति |
कहने पर (सप्तमी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ का (षष्ठी विभक्ति) |
| स्वयम् |
स्वयं ही (अव्यय) |
| प्रहृष्टवदनः |
प्रसन्नता से खिल उठे मुख वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
| रामम् |
श्रीराम को (द्वितीया विभक्ति) |
| आजुहाव |
बुलाया (आ + ह्वे, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सलक्ष्मणम् |
लक्ष्मण सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| कृतस्वस्त्ययनम् |
स्वस्तिवाचन किये जाने के पश्चात् (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मात्रा |
माता कौसल्या ने (तृतीया विभक्ति) |
| पित्रा |
पिता ने (तृतीया विभक्ति) |
| दशरथेन |
दशरथ ने (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| पुरोधसा |
पुरोहित ने (तृतीया विभक्ति) |
| वसिष्ठेन |
वसिष्ठ ने (तृतीया विभक्ति) |
| मङ्गलैः |
मंगलसूचक मन्त्रों से (तृतीया विभक्ति) |
| अभिमन्त्रितम् |
अभिमन्त्रित किया गया (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
स पुत्रं मूर्ध्न्युपाघ्राय राजा दशरथस्तदा।
ददौ कुशिकपुत्राय सुप्रीतेनान्तरात्मना॥
॥ 1.22.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर राजा दशरथ ने पुत्र का मस्तक सूंघकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त से उसको विश्वामित्र को सौंप दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह राजा दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पुत्रम् |
पुत्र का (द्वितीया विभक्ति) |
| मूर्ध्नि |
मस्तक (सप्तमी विभक्ति) |
| उपाघ्राय |
सूंघकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
तदनन्तर (अव्यय) |
| ददौ |
सौंप दिया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कुशिकपुत्राय |
विश्वामित्र को (चतुर्थी विभक्ति) |
| सुप्रीतेन |
अत्यन्त प्रसन्न (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अन्तरात्मना |
चित्त से (तृतीया विभक्ति) |
ततो वायुः सुखस्पर्शी नीरजस्को ववौ तदा।
विश्वामित्रगतं रामं दृष्ट्वा राजीवलोचनम्।
पुष्पवृष्टिर्महत्यासीद् देवदुन्दुभिनिःस्वनैः।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः प्रयाते तु महात्मनि॥
॥ 1.22.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस समय धूलरहित सुखदायिनी वायु चलने लगी। कमलनयन श्रीराम को विश्वामित्रजी के साथ जाते देख देवताओं ने आकाश से वहाँ फूलों की बड़ी भारी वर्षा की। देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं, महात्मा श्रीराम की यात्रा के समय शङ्खों और नगाड़ों की ध्वनि होने लगी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
उस समय (अव्यय) |
| वायुः |
वायु (प्रथमा विभक्ति) |
| सुखस्पर्शी |
सुखदायिनी (प्रथमा विभक्ति) |
| नीरजस्कः |
धूलरहित (प्रथमा विभक्ति) |
| ववौ |
चलने लगी (वा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| विश्वामित्रगतम् |
विश्वामित्रजी के साथ जाते हुए को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रामम् |
श्रीराम को (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| राजीवलोचनम् |
कमलनयन को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुष्पवृष्टिः |
फूलों की वर्षा (प्रथमा विभक्ति) |
| महती |
बड़ी भारी (प्रथमा विभक्ति) |
| आसीत् |
हुई (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| देवदुन्दुभिनिःस्वनैः |
देवदुन्दुभियों के शब्दों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषः |
शङ्खों और नगाड़ों की ध्वनि (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रयाते |
यात्रा के समय (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| महात्मनि |
महात्मा श्रीराम के (सप्तमी विभक्ति) |
विश्वामित्रो ययावग्रे ततो रामो महायशाः।
काकपक्षधरो धन्वी तं च सौमित्रिरन्वगात्॥
॥ 1.22.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे काकपक्षधारी महायशस्वी श्रीराम तथा उनके पीछे सुमित्राकुमार लक्ष्मण जा रहे थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| ययौ |
जा रहे थे (या धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अग्रे |
आगे-आगे (अव्यय) |
| ततः |
उनके पीछे (अव्यय) |
| रामः |
श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| महायशाः |
महायशस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| काकपक्षधरः |
काकपक्षधारी (प्रथमा विभक्ति) |
| धन्वी |
धनुष वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| तम् |
उनके (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| सौमित्रिः |
सुमित्राकुमार लक्ष्मण (प्रथमा विभक्ति) |
| अन्वगात् |
पीछे जा रहे थे (अनु + गम्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
कलापिनौ धनुष्पाणी शोभयानौ दिशो दश।
विश्वामित्रं महात्मानं त्रिशीर्षाविव पन्नगौ॥
॥ 1.22.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उन दोनों भाइयों ने पीठ पर तरकस बाँध रखे थे। उनके हाथों में धनुष शोभा पा रहे थे तथा वे दोनों दसों दिशाओं को सुशोभित करते हुए महात्मा विश्वामित्र के पीछे तीन-तीन फनवाले दो सर्पो के समान चल रहे थे। एक ओर कंधे पर धनुष, दूसरी ओर पीठ पर तूणीर और बीच में मस्तक-इन्हीं तीनों की तीन फन से उपमा दी गयी है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कलापिनौ |
पीठ पर तरकस बाँधे हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| धनुष्पाणी |
हाथों में धनुष धारण किये हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| शोभयानौ |
सुशोभित करते हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, शानच् प्रत्ययान्त) |
| दिशः |
दिशाओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| दश |
दसों (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| विश्वामित्रम् |
महात्मा विश्वामित्र के (द्वितीया विभक्ति) |
| महात्मानम् |
महात्मा के (द्वितीया विभक्ति) |
| त्रिशीर्षौ |
तीन-तीन फनवाले (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| इव |
के समान (अव्यय) |
| पन्नगौ |
दो सर्पो (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
अनुजग्मतुरक्षुद्रौ पितामहमिवाश्विनौ।
अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयन्तावनिन्दितौ॥
॥ 1.22.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनका स्वभाव उच्च एवं उदार था। अपनी अनुपम कान्ति से प्रकाशित होने वाले वे दोनों अनिन्द्य सुन्दर राजकुमार सब ओर शोभा का प्रसार करते हुए विश्वामित्रजी के पीछे उसी तरह जा रहे थे, जैसे ब्रह्माजी के पीछे दोनों अश्विनी कुमार चलते हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अनुजग्मतुः |
जा रहे थे (अनु + गम्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
| अक्षुद्रौ |
उच्च एवं उदार स्वभाव वाले (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| पितामहम् |
ब्रह्माजी के (द्वितीया विभक्ति) |
| इव |
जैसे (अव्यय) |
| अश्विनौ |
दोनों अश्विनी कुमार (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| अनुयातौ |
पीछे चलने वाले (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| श्रिया |
अपनी अनुपम कान्ति से (तृतीया विभक्ति) |
| दीप्तौ |
प्रकाशित होने वाले (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| शोभयन्तौ |
शोभा का प्रसार करते हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| अनिन्दितौ |
अनिन्द्य सुन्दर (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
तदा कुशिकपुत्रं तु धनुष्पाणी स्वलंकृतौ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणौ खड्गवन्तौ महाद्युती।
कुमारौ चारुवपुषौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ।
अनुयातौ श्रिया दीप्तौ शोभयेतामनिन्दितौ।
स्थाणुं देवमिवाचिन्त्यं कुमाराविव पावकी॥
॥ 1.22.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे दोनों भाई कुमार श्रीराम और लक्ष्मण वस्त्र और आभूषणों से अच्छी तरह अलंकृत थे। उनके हाथों में धनुष थे। उन्होंने अपने हाथों की अंगुलियों में गोहटी के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहन रखे थे। उनके कटिप्रदेश में तलवारें लटक रही थीं। उनके श्रीअंग बड़े मनोहर थे। वे महातेजस्वी श्रेष्ठ वीर अद्भुत कान्ति से उद्भासित हो सब ओर अपनी शोभा फैलाते हुए कुशिक पुत्र विश्वामित्र का अनुसरण कर रहे थे। उस समय वे दोनों वीर अचिन्त्य शक्तिशाली स्थाणुदेव (महादेव) के पीछे चलने वाले दो अग्निकुमार स्कन्द और विशाख की भाँति शोभा पाते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| कुशिकपुत्रम् |
कुशिक पुत्र विश्वामित्र का (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| धनुष्पाणी |
हाथों में धनुष धारण किये हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| स्वलङ्कृतौ |
अच्छी तरह अलंकृत (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| बद्धगोधाङ्गुलित्राणौ |
हाथों की अंगुलियों में गोहटी के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहने हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| खड्गवन्तौ |
कटिप्रदेश में तलवारें लटक रही थीं (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| महाद्युती |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| कुमारौ |
दोनों भाई कुमार (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| चारुवपुषौ |
बड़े मनोहर श्रीअंग वाले (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| भ्रातरौ |
दोनों भाई (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| रामलक्ष्मणौ |
श्रीराम और लक्ष्मण (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| अनुयातौ |
अनुसरण कर रहे थे (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| श्रिया |
अद्भुत कान्ति से (तृतीया विभक्ति) |
| दीप्तौ |
उद्भासित हो (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| शोभयेताम् |
शोभा फैलाते हुए (शुभ् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
| अनिन्दितौ |
श्रेष्ठ (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्थाणुम् |
स्थाणुदेव (महादेव) के (द्वितीया विभक्ति) |
| देवम् |
देव के (द्वितीया विभक्ति) |
| इव |
भाँति (अव्यय) |
| अचिन्त्यम् |
अचिन्त्य शक्तिशाली के (द्वितीया विभक्ति) |
| कुमारौ |
दोनों कुमार (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| इव |
जैसे (अव्यय) |
| पावकी |
अग्निकुमार स्कन्द और विशाख (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
अध्यर्धयोजनं गत्वा सरय्वा दक्षिणे तटे।
रामेति मधुरां वाणीं विश्वामित्रोऽभ्यभाषत।
गृहाण वत्स सलिलं मा भूत् कालस्य पर्ययः॥
॥ 1.22.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अयोध्या से डेढ़ योजन दूर जाकर सरयू के दक्षिण तट पर विश्वामित्र ने मधुर वाणी में राम को सम्बोधित किया और कहा—’वत्स राम! अब सरयू के जल से आचमन करो। इस आवश्यक कार्य में विलम्ब न हो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अध्यर्धयोजनम् |
डेढ़ योजन (द्वितीया विभक्ति, क्रियाविशेषण) |
| गत्वा |
जाकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| सरय्वाः |
सरयू के (षष्ठी विभक्ति) |
| दक्षिणे |
दक्षिण (सप्तमी विभक्ति) |
| तटे |
तट पर (सप्तमी विभक्ति) |
| राम |
हे राम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| मधुराम् |
मधुर (द्वितीया विभक्ति) |
| वाणीम् |
वाणी में (द्वितीया विभक्ति) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अभ्यभाषत |
सम्बोधित किया और कहा (अभि + भाष्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| गृहाण |
करो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| वत्स |
हे वत्स! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सलिलम् |
जल से (द्वितीया विभक्ति) |
| मा |
नहीं (निषेधार्थक अव्यय) |
| भूत् |
हो (भू धातु, लुङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, मा योग में) |
| कालस्य |
समय का (षष्ठी विभक्ति) |
| पर्ययः |
विलम्ब (प्रथमा विभक्ति) |
मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा।
न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्ययः॥
॥ 1.22.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध इस मन्त्रसमुदाय को ग्रहण करो। इसके प्रभाव से तुम्हें कभी श्रम (थकावट) का अनुभव नहीं होगा। ज्वर (रोग या चिन्ताजनित कष्ट) नहीं होगा। तुम्हारे रूप में किसी प्रकार का विकार या उलट-फेर नहीं होने पायेगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मन्त्रग्रामम् |
मन्त्रसमुदाय को (द्वितीया विभक्ति) |
| गृहाण |
ग्रहण करो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| त्वम् |
तुम (प्रथमा विभक्ति) |
| बलाम् |
बला को (द्वितीया विभक्ति) |
| अतिबलाम् |
अतिबला को (द्वितीया विभक्ति) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| श्रमः |
श्रम (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| ज्वरः |
ज्वर (प्रथमा विभक्ति) |
| वा |
या (अव्यय) |
| ते |
तुम्हें (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| रूपस्य |
रूप में (षष्ठी विभक्ति) |
| विपर्ययः |
विकार या उलट-फेर (प्रथमा विभक्ति) |
न च सुप्तं प्रमत्तं वा धर्षयिष्यन्ति नैर्ऋताः।
न बाह्वोः सदृशो वीर्ये पृथिव्यामस्ति कश्चन॥
॥ 1.22.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘सोते समय अथवा असावधानी की अवस्था में भी राक्षस तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे। इस भूतल पर बाहुबल में तुम्हारी समानता करने वाला कोई न होगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुप्तम् |
सोते हुए को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रमत्तम् |
असावधान को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| धर्षयिष्यन्ति |
आक्रमण कर सकेंगे (धृष् धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| नैर्ऋताः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| बाह्वोः |
बाहुबल में (सप्तमी विभक्ति, द्विवचन) |
| सदृशः |
समानता करने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| वीर्ये |
पराक्रम में (सप्तमी विभक्ति) |
| पृथिव्याम् |
भूतल पर (सप्तमी विभक्ति) |
| अस्ति |
होगा (अस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| कश्चन |
कोई (प्रथमा विभक्ति) |
त्रिषु लोकेषु वा राम न भवेत् सदृशस्तव।
बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव॥
॥ 1.22.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘तात! रघुकुलनन्दन राम! बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रह जायगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| त्रिषु |
तीनों (सप्तमी विभक्ति) |
| लोकेषु |
लोकों में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| वा |
या (अव्यय) |
| राम |
हे राम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| भवेत् |
होगा (भू धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सदृशः |
समान (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
तुम्हारे (षष्ठी विभक्ति) |
| बलाम् |
बला का (द्वितीया विभक्ति) |
| अतिबलाम् |
अतिबला का (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| पठतः |
अभ्यास करने से (षष्ठी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| तात |
हे तात! (सम्बोधन विभक्ति) |
| राघव |
हे रघुकुलनन्दन! (सम्बोधन विभक्ति) |
न सौभाग्ये न दाक्षिण्ये न ज्ञाने बुद्धिनिश्चये।
नोत्तरे प्रतिवक्तव्ये समो लोके तवानघ॥
॥ 1.22.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘अनघ! सौभाग्य, चातुर्य, ज्ञान और बुद्धिसम्बन्धी निश्चय में तथा किसी के प्रश्न का उत्तर देने में भी कोई तुम्हारी तुलना नहीं कर सकेगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| सौभाग्ये |
सौभाग्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| दाक्षिण्ये |
चातुर्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| ज्ञाने |
ज्ञान में (सप्तमी विभक्ति) |
| बुद्धिनिश्चये |
बुद्धिसम्बन्धी निश्चय में (सप्तमी विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| उत्तरे |
उत्तर देने में (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रतिवक्तव्ये |
किसी के प्रश्न का उत्तर देने योग्य विषय में (सप्तमी विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| समः |
तुलना करने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| लोके |
संसार में (सप्तमी विभक्ति) |
| तव |
तुम्हारी (षष्ठी विभक्ति) |
| अनघ |
हे अनघ! (सम्बोधन विभक्ति) |
एतद्विद्याद्वये लब्धे न भवेत् सदृशस्तव।
बला चातिबला चैव सर्वज्ञानस्य मातरौ॥
॥ 1.22.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इन दोनों विद्याओं के प्राप्त हो जाने पर कोई तुम्हारी समानता नहीं कर सकेगा; क्योंकि ये बला और अतिबला नामक विद्याएँ सब प्रकार के ज्ञान की जननी हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एतत् |
इन (सप्तमी विभक्ति) |
| विद्याद्वये |
दोनों विद्याओं के (सप्तमी विभक्ति) |
| लब्धे |
प्राप्त हो जाने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| भवेत् |
सकेगा (भू धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सदृशः |
समानता (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
तुम्हारी (षष्ठी विभक्ति) |
| बला |
बला (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अतिबला |
अतिबला (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| सर्वज्ञानस्य |
सब प्रकार के ज्ञान की (षष्ठी विभक्ति) |
| मातरौ |
जननी हैं (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
क्षुत्पिपासे न ते राम भविष्यते नरोत्तम।
बलामतिबलां चैव पठतस्तात राघव।
गृहाण सर्वलोकस्य गुप्तये रघुनन्दन॥
॥ 1.22.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तात रघुनन्दन! बला और अतिबला का अभ्यास कर लेने पर तुम्हें भूख-प्यास का भी कष्ट नहीं होगा; अतः रघुकुल को आनन्दित करने वाले राम! तुम सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये इन दोनों विद्याओं को ग्रहण करो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| क्षुत्पिपासे |
भूख-प्यास (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| ते |
तुम्हें (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| राम |
हे राम! (सम्बोधन विभक्ति) |
| भविष्यते |
होगा (भू धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| नरोत्तम |
हे नरश्रेष्ठ! (सम्बोधन विभक्ति) |
| बलाम् |
बला का (द्वितीया विभक्ति) |
| अतिबलाम् |
अतिबला का (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| पठतः |
अभ्यास कर लेने पर (षष्ठी विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| तात |
हे तात! (सम्बोधन विभक्ति) |
| राघव |
हे राघव! (सम्बोधन विभक्ति) |
| गृहाण |
ग्रहण करो (ग्रह् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सर्वलोकस्य |
सम्पूर्ण जगत् की (षष्ठी विभक्ति) |
| गुप्तये |
रक्षा के लिये (चतुर्थी विभक्ति) |
| रघुनन्दन |
हे रघुकुल को आनन्दित करने वाले राम! (सम्बोधन विभक्ति) |
विद्याद्वयमधीयाने यशश्चाथ भवेद् भुवि।
पितामहसुते ह्येते विद्ये तेजःसमन्विते॥
॥ 1.22.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इन दोनों विद्याओं का अध्ययन कर लेने पर इस भूतल पर तुम्हारे यश का विस्तार होगा। ये दोनों विद्याएँ ब्रह्माजी की तेजस्विनी पुत्रियाँ हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विद्याद्वयम् |
दोनों विद्याओं का (द्वितीया विभक्ति) |
| अधीयाने |
अध्ययन कर लेने पर (सप्तमी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| यशः |
यश का (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अथ |
इसके बाद (अव्यय) |
| भवेत् |
होगा (भू धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भुवि |
भूतल पर (सप्तमी विभक्ति) |
| पितामहसुते |
ब्रह्माजी की पुत्रियाँ हैं (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| एते |
ये दोनों (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| विद्ये |
विद्याएँ (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| तेजःसमन्विते |
तेजस्विनी (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
प्रदातुं तव काकुत्स्थ सदृशस्त्वं हि पार्थिव।
कामं बहुगुणाः सर्वे त्वय्येते नात्र संशयः।
तपसा सम्भृते चैते बहुरूपे भविष्यतः॥
॥ 1.22.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ककुत्स्थनन्दन! मैंने इन दोनों को तुम्हें देने का विचार किया है। राजकुमार! तुम्हीं इनके योग्य पात्र हो। यद्यपि तुममें इस विद्या को प्राप्त करने योग्य बहुत-से गुण हैं अथवा सभी उत्तम गुण विद्यमान हैं, इसमें संशय नहीं है तथापि मैंने तपोबल से इनका अर्जन किया है। अतः मेरी तपस्या से परिपूर्ण होकर ये तुम्हारे लिये बहुरूपिणी होंगी—अनेक प्रकार के फल प्रदान करेंगी’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रदातुम् |
देने का (प्र + दा, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| तव |
तुम्हें (चतुर्थी विभक्ति) |
| काकुत्स्थ |
हे ककुत्स्थनन्दन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सदृशः |
योग्य पात्र (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वम् |
तुम (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| पार्थिव |
हे राजकुमार! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कामम् |
यद्यपि (अव्यय) |
| बहुगुणाः |
बहुत-से गुण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सभी उत्तम गुण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| त्वयि |
तुममें (सप्तमी विभक्ति) |
| एते |
ये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अत्र |
इसमें (अव्यय) |
| संशयः |
संशय है (प्रथमा विभक्ति) |
| तपसा |
तपोबल से (तृतीया विभक्ति) |
| सम्भृते |
परिपूर्ण होकर (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
तथापि (अव्यय) |
| एते |
ये दोनों (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| बहुरूपे |
बहुरूपिणी होंगी (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| भविष्यतः |
होंगी (भू धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
ततो रामो जलं स्पृष्ट्वा प्रहृष्टवदनः शुचिः।
प्रतिजग्राह ते विद्ये महर्षेर्भावितात्मनः॥
॥ 1.22.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब श्रीराम आचमन करके पवित्र हो गये। उनका मुख प्रसन्नता से खिल उठा। उन्होंने उन शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षि से वे दोनों विद्याएँ ग्रहण की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| रामः |
श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| जलम् |
जल का (द्वितीया विभक्ति) |
| स्पृष्ट्वा |
स्पर्श करके / आचमन करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| प्रहृष्टवदनः |
प्रसन्नता से खिल उठे मुख वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| शुचिः |
पवित्र हो गये (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रतिजग्राह |
ग्रहण की (प्रति + ग्रह्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ते |
वे (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| विद्ये |
दोनों विद्याएँ (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| महर्षेः |
महर्षि से (षष्ठी विभक्ति, पञ्चमी के अर्थ में) |
| भावितात्मनः |
शुद्ध अन्तःकरण वाले से (षष्ठी विभक्ति) |
विद्यासमुदितो रामः शुशुभे भीमविक्रमः।
सहस्ररश्मिभगवान्शरदीव दिवाकरः॥
॥ 1.22.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विद्या से सम्पन्न होकर भयङ्कर पराक्रमी श्रीराम सहस्रों किरणों से युक्त शरत्कालीन भगवान् सूर्य के समान शोभा पाने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विद्यासमुदितः |
विद्या से सम्पन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रामः |
श्रीराम (प्रथमा विभक्ति) |
| शुशुभे |
शोभा पाने लगे (शुभ् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भीमविक्रमः |
भयङ्कर पराक्रमी (प्रथमा विभक्ति) |
| सहस्ररश्मिः |
सहस्रों किरणों से युक्त (प्रथमा विभक्ति) |
| भगवान् |
भगवान् (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| शरदि |
शरत्काल में (सप्तमी विभक्ति) |
| इव |
के समान (अव्यय) |
| दिवाकरः |
सूर्य (प्रथमा विभक्ति) |
गुरुकार्याणि सर्वाणि नियुज्य कुशिकात्मजे।
ऊषुस्तां रजनीं तत्र सरय्वां ससुखं त्रयः॥
॥ 1.22.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् श्रीराम ने विश्वामित्रजी की सारी गुरुजनोचित सेवाएँ करके हर्ष का अनुभव किया, फिर वे तीनों वहाँ सरयू के तट पर रात में सुखपूर्वक रहे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गुरुकार्याणि |
गुरुजनोचित सेवाओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वाणि |
सारी (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| नियुज्य |
करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| कुशिकात्मजे |
विश्वामित्रजी के लिये (सप्तमी विभक्ति) |
| ऊषुः |
रहे (वस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| रजनीम् |
रात में (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| सरय्वाम् |
सरयू के तट पर (सप्तमी विभक्ति) |
| ससुखम् |
सुखपूर्वक (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| त्रयः |
तीनों (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
दशरथनृपसूनुसत्तमाभ्यां तृणशयनेऽनुचिते तदोषिताभ्याम्।
कुशिकसुतवचोऽनुलालिताभ्यां सुखमिव सा विबभौ विभावरी च॥
॥ 1.22.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा दशरथ के वे दोनों श्रेष्ठ राजकुमार उस समय वहाँ तृण की शय्या पर, जो उनके योग्य नहीं थी, सोये थे। महर्षि विश्वामित्र अपनी वाणी द्वारा उन दोनों के प्रति लाड़-प्यार प्रकट कर रहे थे, इससे उन्हें वह रात बड़ी सुखमयी-सी प्रतीत हुई।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दशरथनृपसूनुसत्तमाभ्याम् |
राजा दशरथ के उन दोनों श्रेष्ठ राजकुमारों के लिये (तृतीया विभक्ति, द्विवचन) |
| तृणशयने |
तृण की शय्या पर (सप्तमी विभक्ति) |
| अनुचिते |
जो उनके योग्य नहीं थी (सप्तमी विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| उषिताभ्याम् |
सोये हुए के लिये (तृतीया विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| कुशिकसुतवचः |
महर्षि विश्वामित्र की वाणी (प्रथमा विभक्ति) |
| अनुलालिताभ्याम् |
लाड़-प्यार प्रकट करने वाली होने से (तृतीया विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुखम् |
सुख (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
मानो (अव्यय) |
| सा |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| विबभौ |
प्रतीत हुई (वि + भा, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| विभावरी |
रात (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
भी (अव्यय) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥२२॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२२॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| द्वाविंशः |
बाईसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥२२॥ |
॥२२॥ (सर्ग संख्या) |
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