🌿 सर्ग 20: राजा दशरथ का विश्वामित्र को अपना पुत्र देने से इनकार करना और विश्वामित्र का कुपित होना
King Dasharatha refuses to give his son to Vishwamitra, and Vishwamitra becomes angry
कुल श्लोक: 28
तच्छ्रुत्वा राजशार्दूलो विश्वामित्रस्य भाषितम्।
मुहूर्तमिव निःसंज्ञः संज्ञावानिदमब्रवीत्॥
॥ 1.20.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विश्वामित्रजी का वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ दशरथ दो घड़ी के लिये संज्ञाशून्य-से हो गये। फिर सचेत होकर इस प्रकार बोले-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| राजशार्दूलः |
नृपश्रेष्ठ दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रस्य |
विश्वामित्रजी का (षष्ठी विभक्ति) |
| भाषितम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मुहूर्तम् |
दो घड़ी के लिये (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| इव |
मानो (अव्यय) |
| निःसञ्ज्ञः |
संज्ञाशून्य-से हो गये (प्रथमा विभक्ति) |
| सञ्ज्ञावान् |
सचेत होकर (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| इदम् |
इस प्रकार (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः।
न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः॥
॥ 1.20.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महर्षे! मेरा कमलनयन राम अभी पूरे सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ है। मैं इसमें राक्षसों के साथ युद्ध करने की योग्यता नहीं देखता।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऊनषोडशवर्षः |
पूरे सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ (प्रथमा विभक्ति) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| रामः |
राम (प्रथमा विभक्ति) |
| राजीवलोचनः |
कमलनयन (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| युद्धयोग्यताम् |
युद्ध करने की योग्यता (द्वितीया विभक्ति) |
| अस्य |
इसमें (षष्ठी विभक्ति) |
| पश्यामि |
देखता हूँ (दृश् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| राक्षसैः |
राक्षसों के (तृतीया विभक्ति) |
इयमक्षौहिणी सेना यस्याहं पतिरीश्वरः।
अनया सहितो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः॥
॥ 1.20.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘यह मेरी अक्षौहिणी सेना है, जिसका मैं पालक और स्वामी भी हूँ। इस सेना के साथ मैं स्वयं ही चलकर उन निशाचरों के साथ युद्ध करूँगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| अक्षौहिणी |
अक्षौहिणी (प्रथमा विभक्ति) |
| सेना |
सेना (प्रथमा विभक्ति) |
| यस्याः |
जिसका (षष्ठी विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| पतिः |
पालक (प्रथमा विभक्ति) |
| ईश्वरः |
स्वामी भी (प्रथमा विभक्ति) |
| अनया |
इस सेना के (तृतीया विभक्ति) |
| सहितः |
साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| गत्वा |
चलकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| योद्धा |
युद्ध करूँगा (प्रथमा विभक्ति) |
| अहम् |
मैं स्वयं ही (प्रथमा विभक्ति) |
| तैः |
उन (तृतीया विभक्ति) |
| निशाचरैः |
निशाचरों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
इमे शूराश्च विक्रान्ता भृत्यामेऽस्त्रविशारदाः।
योग्या रक्षोगणैर्योढुं न रामं नेतुमर्हसि॥
॥ 1.20.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ये मेरे शूरवीर सैनिक, जो अस्त्रविद्या में कुशल और पराक्रमी हैं, राक्षसों के साथ जूझने की योग्यता रखते हैं; अतः इन्हें ही ले जाइये; राम को ले जाना उचित नहीं होगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इमे |
ये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शूराः |
शूरवीर सैनिक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| विक्रान्ताः |
पराक्रमी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| भृत्याः |
सेवक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मे |
मेरे (षष्ठी विभक्ति) |
| अस्त्रविशारदाः |
अस्त्रविद्या में कुशल (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| योग्याः |
योग्यता रखते हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| रक्षोगणैः |
राक्षसों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| योढुम् |
जूझने की (युध् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| रामम् |
राम को (द्वितीया विभक्ति) |
| नेतुम् |
ले जाना (नी धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
उचित होगा (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
अहमेव धनुष्पाणिर्गोप्ता समरमूर्धनि।
यावत् प्राणान् धरिष्यामि तावद् योत्स्ये निशाचरैः॥
॥ 1.20.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मैं स्वयं ही हाथ में धनुष ले युद्ध के मुहाने पर रहकर आपके यज्ञ की रक्षा करूँगा और जब तक इस शरीर में प्राण रहेंगे तबतक निशाचरों के साथ लड़ता रहूँगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| एव |
स्वयं ही (अव्यय) |
| धनुष्पाणिः |
हाथ में धनुष लिये हुए (प्रथमा विभक्ति) |
| गोप्ता |
रक्षा करूँगा (प्रथमा विभक्ति) |
| समरमूर्धनि |
युद्ध के मुहाने पर (सप्तमी विभक्ति) |
| यावत् |
जब तक (अव्यय) |
| प्राणान् |
प्राण (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| धरिष्यामि |
धारण करूँगा / रहेंगे (धृ धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| तावत् |
तब तक (अव्यय) |
| योत्स्ये |
लड़ता रहूँगा (युध् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| निशाचरैः |
निशाचरों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
निर्विघ्ना व्रतचर्या सा भविष्यति सुरक्षिता।
अहं तत्र गमिष्यामि न रामं नेतुमर्हसि॥
॥ 1.20.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मेरे द्वारा सुरक्षित होकर आपका नियमानुष्ठान बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण होगा; अतः मैं ही वहाँ आपके साथ चलूँगा। आप राम को न ले जाइये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| निर्विघ्ना |
बिना किसी विघ्न-बाधा के (प्रथमा विभक्ति) |
| व्रतचर्या |
नियमानुष्ठान (प्रथमा विभक्ति) |
| सा |
वह आपका (प्रथमा विभक्ति) |
| भविष्यति |
होगा (भू धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुरक्षिता |
सुरक्षित होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अहम् |
मैं ही (प्रथमा विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| गमिष्यामि |
चलूँगा (गम् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| रामम् |
राम को (द्वितीया विभक्ति) |
| नेतुम् |
ले जाने के लिए (नी धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम्।
न चास्त्रबलसंयुक्तो न च युद्धविशारदः॥
॥ 1.20.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मेरा राम अभी बालक है। इसने अभी तक युद्ध की विद्या ही नहीं सीखी है। यह दूसरे के बलाबल को नहीं जानता है। न तो यह अस्त्रबल से सम्पन्न है और न युद्ध की कला में निपुण ही।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| बालः |
बालक है (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| अकृतविद्यः |
विद्या नहीं सीखी है (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| वेत्ति |
जानता है (विद् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| बलाबलम् |
बल और अबल को (द्वितीया विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अस्त्रबलसंयुक्तः |
अस्त्रबल से सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| युद्धविशारदः |
युद्ध की कला में निपुण (प्रथमा विभक्ति) |
न चासौ रक्षसां योग्यः कूटयुद्धा हि राक्षसाः।
विप्रयुक्तो हि रामेण मुहूर्तमपि नोत्सहे।
जीवितुं मुनिशार्दूलं न रामं नेतुमर्हसि॥
॥ 1.20.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘अतः यह राक्षसों से युद्ध करने योग्य नहीं है; क्योंकि राक्षस माया से–छल-कपट से युद्ध करते हैं। इसके सिवा राम से वियोग हो जाने पर मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता; मुनिश्रेष्ठ! इसलिये आप मेरे राम को न ले जाइये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| असौ |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| रक्षसाम् |
राक्षसों के साथ (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, तृतीया के अर्थ में) |
| योग्यः |
युद्ध करने योग्य (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कूटयुद्धाः |
माया से युद्ध करने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| राक्षसाः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विप्रयुक्तः |
वियोग हो जाने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| रामेण |
राम से (तृतीया विभक्ति) |
| मुहूर्तम् |
दो घड़ी (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| उत्सहे |
रह सकता हूँ (उत् + सह्, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| जीवितुम् |
जीवित (जीव् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| मुनिशार्दूल |
हे मुनिश्रेष्ठ! (सम्बोधन विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| रामम् |
राम को (द्वितीया विभक्ति) |
| नेतुम् |
ले जाइये (नी धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
यदि वा राघवं ब्रह्मन् नेतुमिच्छसि सुव्रत।
चतुरंगसमायुक्तं मया सह च तं नय॥
॥ 1.20.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अथवा ब्रह्मन् ! यदि आपकी इच्छा राम को ही ले जाने की हो तो चतुरङ्गिणी सेना के साथ मैं भी चलता हूँ। मेरे साथ इसे ले चलिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यदि |
यदि (अव्यय) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| राघवम् |
राम को (द्वितीया विभक्ति) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| नेतुम् |
ले जाने की (नी धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| इच्छसि |
इच्छा हो (इष् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सुव्रत |
हे उत्तम व्रत वाले! (सम्बोधन विभक्ति) |
| चतुरङ्गसमायुक्तम् |
चतुरङ्गिणी सेना के साथ युक्त को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मया |
मेरे (तृतीया विभक्ति) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| च |
भी (अव्यय) |
| तम् |
इसे (द्वितीया विभक्ति) |
| नय |
ले चलिये (नी धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
षष्टिर्वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक।
कृच्छ्रेणोत्पादितश्चायं न रामं नेतुमर्हसि॥
॥ 1.20.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘कुशिकनन्दन! मेरी अवस्था साठ हजार वर्ष की हो गयी। इस बुढ़ापे में बड़ी कठिनाई से मुझे पुत्र की प्राप्ति हुई है, अतः आप राम को न ले जाइये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| षष्टिः |
साठ (प्रथमा विभक्ति) |
| वर्षसहस्राणि |
हजार वर्ष (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| जातस्य |
हो गयी है (षष्ठी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मम |
मेरी (षष्ठी विभक्ति) |
| कौशिक |
हे कुशिकनन्दन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कृच्छ्रेण |
बड़ी कठिनाई से (तृतीया विभक्ति) |
| उत्पादितः |
प्राप्ति हुई है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| अयम् |
यह पुत्र (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| रामम् |
राम को (द्वितीया विभक्ति) |
| नेतुम् |
ले जाने के लिये (नी धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
चतुर्णामात्मजानां हि प्रीतिः परमिका मम।
ज्येष्ठे धर्मप्रधाने च न रामं नेतुमर्हसि॥
॥ 1.20.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘धर्मप्रधान राम मेरे चारों पुत्रों में ज्येष्ठ है; इसलिये उसपर मेरा प्रेम सबसे अधिक है; अतः आप राम को न ले जाइये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| चतुर्णाम् |
चारों (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| आत्मजानाम् |
पुत्रों में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| प्रीतिः |
प्रेम (प्रथमा विभक्ति) |
| परमिका |
सबसे अधिक (प्रथमा विभक्ति) |
| मम |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| ज्येष्ठे |
ज्येष्ठ है (सप्तमी विभक्ति) |
| धर्मप्रधाने |
धर्मप्रधान पर (सप्तमी विभक्ति) |
| च |
इसलिये (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| रामम् |
राम को (द्वितीया विभक्ति) |
| नेतुम् |
ले जाने के लिए (नी धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
किंवीर्या राक्षसास्ते च कस्य पुत्राश्च के च ते।
कथं प्रमाणाः के चैतान् रक्षन्ति मुनिपुंगव।
कथं च प्रतिकर्तव्यं तेषां रामेण रक्षसाम्॥
॥ 1.20.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘वे राक्षस कैसे पराक्रमी हैं, किसके पुत्र हैं और कौन हैं? उनका डील डौल कैसा है? मनीश्वर! उनकी रक्षा कौन करते हैं? राम उन राक्षसों का सामना कैसे कर सकता है?
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| किम्वीर्याः |
कैसे पराक्रमी हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राक्षसाः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| कस्य |
किसके (षष्ठी विभक्ति) |
| पुत्राः |
पुत्र हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| के |
कौन (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| कथम् |
कैसा (अव्यय) |
| प्रमाणाः |
डील डौल (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| के |
कौन (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एतान् |
इनकी (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| रक्षन्ति |
रक्षा करते हैं (रक्ष् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मनीश्वर! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कथम् |
कैसे (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| प्रतिकर्तव्यम् |
सामना करना चाहिये (प्रति + कृ, तव्यत् प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| तेषाम् |
उन (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| रामेण |
राम के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| रक्षसाम् |
राक्षसों का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
मामकैर्वा बलैर्ब्रह्मन् मया वा कूटयोधिनाम्।
सर्वं मे शंस भगवन् कथं तेषां मया रणे।
स्थातव्यं दुष्टभावानां वीर्योत्सिक्ता हि राक्षसाः॥
॥ 1.20.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन्! मेरे सैनिकों को या स्वयं मुझे ही उन मायायोधी राक्षसों का प्रतीकार कैसे करना चाहिये? भगवन्! ये सारी बातें आप मुझे बताइये। उन दुष्टों के साथ युद्ध में मुझे कैसे खड़ा होना चाहिये? क्योंकि राक्षस बड़े बलाभिमानी होते हैं’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मामकैः |
मेरे (तृतीया विभक्ति) |
| वा |
या (अव्यय) |
| बलैः |
सैनिकों को (तृतीया विभक्ति) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| मया |
स्वयं मुझे (तृतीया विभक्ति) |
| वा |
या (अव्यय) |
| कूटयोधिनाम् |
मायायोधी राक्षसों का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वम् |
सारी बातें (द्वितीया विभक्ति) |
| मे |
मुझे (चतुर्थी विभक्ति) |
| शंस |
बताइये (शंस् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| भगवन् |
हे भगवन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कथम् |
कैसे (अव्यय) |
| तेषाम् |
उन (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| मया |
मुझे (तृतीया विभक्ति) |
| रणे |
युद्ध में (सप्तमी विभक्ति) |
| स्थातव्यम् |
खड़ा होना चाहिये (स्था धातु, तव्यत् प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| दुष्टभावानाम् |
दुष्टों के साथ (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, तृतीया के अर्थ में) |
| वीर्योत्सिक्ताः |
बलाभिमानी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| राक्षसाः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत।
पौलस्त्यवंशप्रभवो रावणो नाम राक्षसः।
स ब्रह्मणा दत्तवरस्त्रैलोक्यं बाधते भृशम्।
महाबलो महावीर्यो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः॥
॥ 1.20.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा दशरथ की इस बात को सुनकर विश्वामित्रजी बोले—’महाराज! रावण नाम से प्रसिद्ध एक राक्षस है, जो महर्षि पुलस्त्य के कुल में उत्पन्न हुआ है। उसे ब्रह्माजी से मुँहमाँगा वरदान प्राप्त हुआ है। जिससे महान् बलशाली और महापराक्रमी होकर बहुसंख्यक राक्षसों से घिरा हुआ वह निशाचर तीनों लोकों के निवासियों को अत्यन्त कष्ट दे रहा है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्य |
राजा दशरथ की (षष्ठी विभक्ति) |
| तत् |
इस (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
बात को (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्रजी (प्रथमा विभक्ति) |
| अभ्यभाषत |
बोले (अभि + भाष्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पौलस्त्यवंशप्रभवः |
पुलस्त्य के कुल में उत्पन्न (प्रथमा विभक्ति) |
| रावणः |
रावण (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय/द्वितीया विभक्ति का अव्ययीभाव) |
| राक्षसः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति) |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्रह्मणा |
ब्रह्माजी से (तृतीया विभक्ति) |
| दत्तवरः |
वरदान प्राप्त हुआ (प्रथमा विभक्ति) |
| त्रैलोक्यम् |
तीनों लोकों के निवासियों को (द्वितीया विभक्ति) |
| बाधते |
कष्ट देता है (बाध् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भृशम् |
अत्यन्त (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| महाबलः |
महान् बलशाली (प्रथमा विभक्ति) |
| महावीर्यः |
महापराक्रमी (प्रथमा विभक्ति) |
| राक्षसैः |
राक्षसों से (तृतीया विभक्ति) |
| बहुभिः |
बहुसंख्यक से (तृतीया विभक्ति) |
| वृतः |
घिरा हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
श्रूयते च महाराज रावणो राक्षसाधिपः।
साक्षाद्वैश्रवणभ्राता पुत्रो विश्रवसो मुनेः॥
॥ 1.20.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
सुना जाता है कि राक्षसराज रावण विश्रवा मुनि का औरस पुत्र तथा साक्षात् कुबेर का भाई है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्रूयते |
सुना जाता है (श्रु धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| च |
कि (अव्यय) |
| महाराज |
हे महाराज! (सम्बोधन विभक्ति) |
| रावणः |
रावण (प्रथमा विभक्ति) |
| राक्षसाधिपः |
राक्षसराज (प्रथमा विभक्ति) |
| साक्षात् |
साक्षात् (अव्यय) |
| वैश्रवणभ्राता |
कुबेर का भाई (प्रथमा विभक्ति) |
| पुत्रः |
औरस पुत्र (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्रवसः |
विश्रवा मुनि का (षष्ठी विभक्ति) |
| मुनेः |
मुनि का (षष्ठी विभक्ति) |
यदा न खलु यज्ञस्य विघ्नकर्ता महाबलः।
तेन संचोदितौ तौ तु राक्षसौ च महाबलौ।
मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यतः॥
॥ 1.20.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘वह महाबली निशाचर इच्छा रहते हुए भी स्वयं आकर यज्ञ में विघ्न नहीं डालता (अपने लिये इसे तुच्छ कार्य समझता है); इसलिये उसी की प्रेरणा से दो महान् बलवान् राक्षस मारीच और सुबाहु यज्ञों में विघ्न डाला करते हैं’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यदा |
जबकि (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| खलु |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| यज्ञस्य |
यज्ञ में (षष्ठी विभक्ति) |
| विघ्नकर्ता |
विघ्न डालने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| महाबलः |
वह महाबली निशाचर (प्रथमा विभक्ति) |
| तेन |
उसी की (तृतीया विभक्ति) |
| सञ्चोदितौ |
प्रेरणा से (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तौ |
वे दो (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| तु |
ही (अव्यय) |
| राक्षसौ |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| महाबलौ |
महान् बलवान् (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| मारीचः |
मारीच (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुबाहुः |
सुबाहु (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| यज्ञविघ्नम् |
यज्ञों में विघ्न (द्वितीया विभक्ति) |
| करिष्यतः |
डाला करते हैं (कृ धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष द्विवचन) |
इत्युक्तो मुनिना तेन राजोवाच मुनिं तदा।
नहि शक्तोऽस्मि संग्रामे स्थातुं तस्य दुरात्मनः॥
॥ 1.20.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विश्वामित्र मुनि के ऐसा कहने पर राजा दशरथ उनसे इस प्रकार बोले—’मुनिवर! मैं उस दुरात्मा रावण के सामने युद्ध में नहीं ठहर सकता।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मुनिना |
विश्वामित्र मुनि के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| तेन |
उस (तृतीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| उवाच |
बोले (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मुनिम् |
मुनि से (द्वितीया विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| नहि |
नहीं (अव्यय) |
| शक्तः |
समर्थ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अस्मि |
हूँ (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| सङ्ग्रामे |
युद्ध में (सप्तमी विभक्ति) |
| स्थातुम् |
ठहरने के लिए (स्था धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| दुरात्मनः |
दुरात्मा रावण के (षष्ठी विभक्ति) |
स त्वं प्रसादं धर्मज्ञ कुरुष्व मम पुत्रके।
मम चैवाल्पभाग्यस्य दैवतं हि भवान् गुरुः॥
॥ 1.20.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘धर्मज्ञ महर्षे! आप मेरे पुत्र पर तथा मुझ मन्दभागी दशरथ पर भी कृपा कीजिये; क्योंकि आप मेरे देवता तथा गुरु हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
इसलिए (अव्यय) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रसादम् |
कृपा (द्वितीया विभक्ति) |
| धर्मज्ञ |
हे धर्मज्ञ महर्षे! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कुरुष्व |
कीजिये (कृ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति) |
| पुत्रके |
पुत्र पर (सप्तमी विभक्ति) |
| मम |
मुझ (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| एव |
भी (अव्यय) |
| अल्पभाग्यस्य |
मन्दभागी दशरथ पर (षष्ठी विभक्ति) |
| दैवतम् |
देवता (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| भवान् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| गुरुः |
गुरु हैं (प्रथमा विभक्ति) |
देवदानवगन्धर्वा यक्षाः पतगपन्नगाः।
न शक्ता रावणं सोढुं किं पुनर्मानवा युधि॥
॥ 1.20.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘युद्ध में रावण का वेग तो देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, गरुड़ और नाग भी नहीं सह सकते; फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| देवदानवगन्धर्वाः |
देवता, दानव और गन्धर्व (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यक्षाः |
यक्ष (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पतगपन्नगाः |
गरुड़ और नाग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| शक्ताः |
सह सकते (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| रावणम् |
रावण का वेग (द्वितीया विभक्ति) |
| सोढुम् |
सहन करने में (सह् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| किम् |
क्या (अव्यय) |
| पुनः |
फिर (अव्यय) |
| मानवाः |
मनुष्यों की (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| युधि |
युद्ध में (सप्तमी विभक्ति) |
स तु वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युधि रावणः।
तेन चाहं न शक्तोऽस्मि संयोद्धुं तस्य वा बलैः।
सबलो वा मुनिश्रेष्ठ सहितो वा ममात्मजैः॥
॥ 1.20.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मुनिश्रेष्ठ! रावण समरांगण में बलवानों के बल का अपहरण कर लेता है, अतः मैं अपनी सेना और पुत्रों के साथ रहकर भी उससे तथा उसके सैनिकों से युद्ध करने में असमर्थ हूँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह रावण (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| वीर्यवताम् |
बलवानों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| वीर्यम् |
बल का (द्वितीया विभक्ति) |
| आदत्ते |
अपहरण कर लेता है (आ + दा, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| युधि |
समरांगण में (सप्तमी विभक्ति) |
| रावणः |
रावण (प्रथमा विभक्ति) |
| तेन |
उससे (तृतीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| शक्तः |
असमर्थ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अस्मि |
हूँ (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| संयोद्धुम् |
युद्ध करने में (सम् + युध्, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| बलैः |
सैनिकों से (तृतीया विभक्ति) |
| सबलः |
अपनी सेना के साथ (प्रथमा विभक्ति) |
| वा |
और (अव्यय) |
| मुनिश्रेष्ठ |
हे मुनिश्रेष्ठ! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सहितः |
रहकर भी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| मम |
मेरे (षष्ठी विभक्ति) |
| आत्मजैः |
पुत्रों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
कथमप्यमरप्रख्यं संग्रामाणामकोविदम्।
बालं मे तनयं ब्रह्मन् नैव दास्यामि पुत्रकम्॥
॥ 1.20.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन्! यह मेरा देवोपम पुत्र युद्ध की कला से सर्वथा अनभिज्ञ है। इसकी अवस्था भी अभी बहुत थोड़ी है; इसलिये मैं इसे किसी तरह नहीं दूंगा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कथमपि |
किसी तरह (अव्यय) |
| अमरप्रख्यम् |
देवोपम को (द्वितीया विभक्ति) |
| सङ्ग्रामाणाम् |
युद्ध की कला से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अकोविदम् |
सर्वथा अनभिज्ञ है (द्वितीया विभक्ति) |
| बालम् |
बालक को (द्वितीया विभक्ति) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| तनयम् |
पुत्र (द्वितीया विभक्ति) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| दास्यामि |
दूंगा (दा धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| पुत्रकम् |
पुत्र को (द्वितीया विभक्ति) |
अथ कालोपमौ युद्धे सुतौ सुन्दोपसुन्दयोः।
यज्ञविघ्नकरौ तौ ते नैव दास्यामि पुत्रकम्।
मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ॥
॥ 1.20.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मारीच और सुबाहु सुप्रसिद्ध दैत्य सुन्द और उपसुन्द के पुत्र हैं। वे दोनों युद्ध में यमराज के समान हैं। यदि वे ही आपके यज्ञ में विघ्न डालने वाले हैं तो मैं उनका सामना करने के लिये अपने पुत्र को नहीं दूंगा; क्योंकि वे दोनों प्रबल पराक्रमी और युद्धविषयक उत्तम शिक्षा से सम्पन्न हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
और (अव्यय) |
| कालोपमौ |
यमराज के समान (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| युद्धे |
युद्ध में (सप्तमी विभक्ति) |
| सुतौ |
पुत्र हैं (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| सुन्दोपसुन्दयोः |
सुन्द और उपसुन्द के (षष्ठी विभक्ति, द्विवचन) |
| यज्ञविघ्नकरौ |
यज्ञ में विघ्न डालने वाले (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| तौ |
वे दोनों (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| दास्यामि |
दूंगा (दा धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| पुत्रकम् |
पुत्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| मारीचः |
मारीच (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुबाहुः |
सुबाहु (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| वीर्यवन्तौ |
प्रबल पराक्रमी (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| सुशिक्षितौ |
युद्धविषयक उत्तम शिक्षा से सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
तयोरन्यतरं योद्धुं यास्यामि ससुहृद्गणः।
अन्यथा त्वनुनेष्यामि भवन्तं सहबान्धवः॥
॥ 1.20.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मैं उन दोनों में से किसी एक के साथ युद्ध करने के लिये अपने सुहृदों के साथ चलूँगा; अन्यथा—यदि आप मुझे न ले जाना चाहें तो मैं भाई-बन्धुओंसहित आपसे अनुनय-विनय करूँगा कि आप राम को छोड़ दें’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तयोः |
उन दोनों में से (षष्ठी विभक्ति, द्विवचन) |
| अन्यतरम् |
किसी एक के (द्वितीया विभक्ति) |
| योद्धुम् |
युद्ध करने के लिये (युध् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| यास्यामि |
चलूँगा (या धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| ससुहृद्गणः |
सुहृदों के समूह के साथ (प्रथमा विभक्ति) |
| अन्यथा |
अन्यथा—यदि नहीं तो (अव्यय) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| अनुनेष्यामि |
अनुनय-विनय करूँगा (अनु + नी, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| भवन्तम् |
आपसे (द्वितीया विभक्ति) |
| सहबान्धवः |
भाई-बन्धुओंसहित (प्रथमा विभक्ति) |
इति नरपतिजल्पनाद् द्विजेन्द्रं कुशिकसुतं सुमहान् विवेश मन्युः।
सुहुत इव मखेऽग्निराज्यसिक्तः समभवदुज्ज्वलितो महर्षिवह्निः॥
॥ 1.20.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा दशरथ के ऐसे वचन सुनकर विप्रवर कुशिकनन्दन विश्वामित्र के मन में महान् क्रोध का आवेश हो आया, जैसे यज्ञशाला में अग्नि को भलीभाँति आहुति देकर घी की धारा से अभिषिक्त कर दिया जाय और वह प्रज्वलित हो उठे, उसी तरह अग्नितुल्य तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र भी क्रोध से जल उठे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
ऐसे (अव्यय) |
| नरपतिजल्पनात् |
राजा दशरथ के वचन सुनकर (पञ्चमी विभक्ति) |
| द्विजेन्द्रम् |
विप्रवर को (द्वितीया विभक्ति) |
| कुशिकसुतम् |
कुशिकनन्दन विश्वामित्र के (द्वितीया विभक्ति) |
| सुमहान् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| विवेश |
हो आया (विश् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| मन्युः |
क्रोध का आवेश (प्रथमा विभक्ति) |
| सुहुतः |
भलीभाँति आहुति देकर प्रज्वलित किया हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| इव |
जैसे (अव्यय) |
| मखे |
यज्ञशाला में (सप्तमी विभक्ति) |
| अग्निः |
अग्नि (प्रथमा विभक्ति) |
| आज्यसिक्तः |
घी की धारा से अभिषिक्त (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| समभवत् |
हो उठे (सम् + भू, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| उज्ज्वलितः |
प्रज्वलित (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महर्षिवह्निः |
अग्नितुल्य तेजस्वी महर्षि विश्वामित्र भी (प्रथमा विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे विंशः सर्गः ॥२०॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥२०॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| विंशः |
बीसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥२०॥ |
॥२०॥ (सर्ग संख्या) |
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