🌿 सर्ग 18: श्रीराम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के जन्म, संस्कार, शीलस्वभाव एवं सद्गुण, राजा के दरबार में विश्वामित्र का आगमन और उनका सत्कार
Birth, rituals, virtues of Shri Rama, Bharata, Lakshmana and Shatrughna; arrival of Vishwamitra at the king's court and his reception
कुल श्लोक: 59
निर्वृत्ते तु क्रतौ तस्मिन् हयमेधे महात्मनः।
प्रतिगृह्यामरा भागान् प्रतिजग्मुर्यथागतम्॥
॥ 1.18.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महामना राजा दशरथ का यज्ञ समाप्त होने पर देवतालोग अपना-अपना भाग ले जैसे आये थे, वैसे लौट गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| निर्वृत्ते |
समाप्त होने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| क्रतौ |
यज्ञ (सप्तमी विभक्ति) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| हयमेधे |
अश्वमेध (सप्तमी विभक्ति) |
| महात्मनः |
महामना राजा दशरथ का (षष्ठी विभक्ति) |
| प्रतिगृह्य |
लेकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| अमराः |
देवता लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भागान् |
अपना-अपना भाग (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रतिजग्मुः |
लौट गये (प्रति + गम्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यथागतम् |
जैसे आये थे, वैसे ही (अव्यय) |
समाप्तदीक्षानियमः पत्नीगणसमन्वितः।
प्रविवेश पुरीं राजा सभृत्यबलवाहनः॥
॥ 1.18.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
दीक्षा का नियम समाप्त होने पर राजा अपनी पत्नियों को साथ ले सेवक, सैनिक और सवारियोंसहित पुरी में प्रविष्ट हुए।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| समाप्तदीक्षानियमः |
दीक्षा का नियम समाप्त होने पर (प्रथमा विभक्ति) |
| पत्नीगणसमन्वितः |
पत्नियों के समूह सहित (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रविवेश |
प्रविष्ट हुए (प्र + विश्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुरीम् |
पुरी में (द्वितीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| सभृत्यबलवाहनः |
सेवक, सैनिक और सवारियों सहित (प्रथमा विभक्ति) |
यथार्हं पूजितास्तेन राज्ञा च पृथिवीश्वराः।
मुदिताः प्रययुर्देशान् प्रणम्य मुनिपुंगवम्॥
॥ 1.18.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
भिन्न-भिन्न देशों के राजा भी (जो उनके यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आये थे) महाराज दशरथ द्वारा यथावत् सम्मानित हो मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग को प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने देश को चले गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यथार्हम् |
यथावत् (अव्यय) |
| पूजिताः |
सम्मानित हो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तेन |
उन (तृतीया विभक्ति) |
| राज्ञा |
महाराज दशरथ द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| पृथिवीश्वराः |
भिन्न-भिन्न देशों के राजा भी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मुदिताः |
प्रसन्नतापूर्वक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रययुः |
चले गये (प्र + या, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| देशान् |
अपने-अपने देश को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रणम्य |
प्रणाम करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| मुनिपुङ्गवम् |
मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग को (द्वितीया विभक्ति) |
श्रीमतां गच्छतां तेषां स्वगृहाणि पुरात् ततः।
बलानि राज्ञां शुभ्राणि प्रहृष्टानि चकाशिरे॥
॥ 1.18.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अयोध्यापुरी से अपने घर को जाते हुए उन श्रीमान् नरेशों के शुभ्र सैनिक अत्यन्त हर्षमग्न होने के कारण बड़ी शोभा पा रहे थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्रीमताम् |
श्रीमान् के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| गच्छताम् |
जाते हुए के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| तेषाम् |
उन (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| स्वगृहाणि |
अपने घर को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पुरात् |
अयोध्यापुरी से (पञ्चमी विभक्ति) |
| ततः |
उस समय (अव्यय) |
| बलानि |
सैनिक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राज्ञाम् |
राजाओं के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| शुभ्राणि |
शुभ्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रहृष्टानि |
अत्यन्त हर्षमग्न होने के कारण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| चकाशिरे |
शोभा पा रहे थे (काश् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
गतेषु पृथिवीशेषु राजा दशरथः पुनः।
प्रविवेश पुरीं श्रीमान् पुरस्कृत्य द्विजोत्तमान्॥
॥ 1.18.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उन राजाओं के विदा हो जाने पर श्रीमान् महाराज दशरथ ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को आगे करके अपनी पुरी में प्रवेश किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गतेषु |
विदा हो जाने पर (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| पृथिवीशेषु |
राजाओं के (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| राजा |
महाराज (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पुनः |
फिर (अव्यय) |
| प्रविवेश |
प्रवेश किया (प्र + विश्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुरीम् |
पुरी में (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रीमान् |
श्रीमान् ने (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| पुरस्कृत्य |
आगे करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| द्विजोत्तमान् |
श्रेष्ठ ब्राह्मणों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
शान्तया प्रययौ सार्धमृष्यश्रृंगः सुपूजितः।
अनुगम्यमानो राज्ञा च सानुयात्रेण धीमता॥
॥ 1.18.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा द्वारा अत्यन्त सम्मानित हो ऋष्यशृंग मुनि भी शान्ता के साथ अपने स्थान को चले गये। उस समय सेवकोंसहित बुद्धिमान् महाराज दशरथ कुछ दूर तक उनके पीछे-पीछे उन्हें पहुँचाने गये थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| शान्तया |
शान्ता के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| प्रययौ |
चले गये (प्र + या, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सार्धम् |
साथ (अव्यय) |
| ऋष्यश्रृङ्गः |
ऋष्यशृंग मुनि भी (प्रथमा विभक्ति) |
| सुपूजितः |
अत्यन्त सम्मानित हो (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अनुगम्यमानः |
पीछे-पीछे जाते हुए (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, कर्मवाच्य) |
| राज्ञा |
महाराज के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| च |
उस समय (अव्यय) |
| सानुयात्रेण |
सेवकों सहित के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| धीमता |
बुद्धिमान् के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
एवं विसृज्य तान् सर्वान् राजा सम्पूर्णमानसः।
उवास सुखितस्तत्र पुत्रोत्पत्तिं विचिन्तयन्॥
॥ 1.18.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार उन सब अतिथियों को विदा करके सफल मनोरथ हुए राजा दशरथ पुत्रोत्पत्ति की प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बड़े सुख से रहने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| विसृज्य |
विदा करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| तान् |
उन (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वान् |
सब अतिथियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| राजा |
राजा दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| सम्पूर्णमानसः |
सफल मनोरथ हुए (प्रथमा विभक्ति) |
| उवास |
रहने लगे (वस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुखितः |
बड़े सुख से (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| पुत्रोत्पत्तिम् |
पुत्रोत्पत्ति की (द्वितीया विभक्ति) |
| विचिन्तयन् |
प्रतीक्षा करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ।
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम्।
कौसल्याजनयद् रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्॥
॥ 1.18.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यज्ञ-समाप्ति के पश्चात् जब छः ऋतुएँ बीत गयीं, तब बारहवें मास में चैत्र के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौसल्यादेवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त, सर्वलोकवन्दित जगदीश्वर श्रीराम को जन्म दिया। उस समय (सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र ये) पाँच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यमान थे तथा लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
पश्चात् (अव्यय) |
| यज्ञे |
यज्ञ के (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| समाप्ते |
समाप्त होने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
जब (अव्यय) |
| ऋतूनाम् |
ऋतुओं में से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| षट् |
छः (प्रथमा विभक्ति) |
| समत्ययुः |
बीत गयीं (सम् + अति + इ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| द्वादशे |
बारहवें (सप्तमी विभक्ति) |
| मासे |
मास में (सप्तमी विभक्ति) |
| चैत्रे |
चैत्र के (सप्तमी विभक्ति) |
| नावमिके |
शुक्लपक्ष की नवमी (सप्तमी विभक्ति) |
| तिथौ |
तिथि को (सप्तमी विभक्ति) |
| नक्षत्रे |
नक्षत्र में (सप्तमी विभक्ति) |
| अदितिदैवत्ये |
अदिति देवता वाले (पुनर्वसु) (सप्तमी विभक्ति) |
| स्वोच्चसंस्थेषु |
अपने-अपने उच्च स्थान में विद्यमान होने पर (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन, सति सप्तमी) |
| पञ्चसु |
पाँच (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| ग्रहेषु |
ग्रहों के (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| कर्कटे |
कर्क (सप्तमी विभक्ति) |
| लग्ने |
लग्न में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाक्पतौ |
बृहस्पति के (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| इन्दुना |
चन्द्रमा के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| सह |
साथ (अव्यय) |
| प्रोद्यमाने |
विराजमान होने पर (सप्तमी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| जगन्नाथम् |
जगदीश्वर को (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वलोकनमस्कृतम् |
सर्वलोकवन्दित को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कौसल्या |
कौसल्यादेवी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अजनयत् |
जन्म दिया (जन् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रामम् |
श्रीराम को (द्वितीया विभक्ति) |
| दिव्यलक्षणसंयुतम् |
दिव्य लक्षणों से युक्त को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
विष्णोरर्धं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनन्दनम्।
लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्ठं दुन्दुभिस्वनम्॥
॥ 1.18.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे विष्णुस्वरूप हविष्य या खीर के आधे भाग से प्रकट हुए थे। कौसल्या के महाभाग पुत्र श्रीराम इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले थे। उनके नेत्रों में कुछ-कुछ लालिमा थी। उनके ओठ लाल, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और स्वर दुन्दुभि के शब्द के समान गम्भीर था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विष्णोः |
विष्णु के (षष्ठी विभक्ति) |
| अर्धम् |
आधे भाग से (द्वितीया विभक्ति) |
| महाभागम् |
महाभाग को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुत्रम् |
पुत्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| ऐक्ष्वाकुनन्दनम् |
इक्ष्वाकुकुल का आनन्द बढ़ाने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| लोहिताक्षम् |
नेत्रों में कुछ-कुछ लालिमा वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| महाबाहुम् |
बड़ी-बड़ी भुजाओं वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| रक्तोष्ठम् |
लाल ओठ वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| दुन्दुभिस्वनम् |
दुन्दुभि के शब्द के समान गम्भीर स्वर वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेणामिततेजसा।
यथा वरेण देवानामदितिर्वज्रपाणिना॥
॥ 1.18.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस अमिततेजस्वी पुत्र से महारानी कौसल्या की बड़ी शोभा हुई, ठीक उसी तरह, जैसे सुरश्रेष्ठ वज्रपाणि इन्द्र से देवमाता अदिति सुशोभित हुई थीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कौसल्या |
महारानी कौसल्या की (प्रथमा विभक्ति) |
| शुशुभे |
बड़ी शोभा हुई (शुभ् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तेन |
उस (तृतीया विभक्ति) |
| पुत्रेण |
पुत्र से (तृतीया विभक्ति) |
| अमिततेजसा |
अमिततेजस्वी से (तृतीया विभक्ति) |
| यथा |
ठीक उसी तरह, जैसे (अव्यय) |
| वरेण |
सुरश्रेष्ठ से (तृतीया विभक्ति) |
| देवानाम् |
देवताओं के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अदितिः |
देवमाता अदिति (प्रथमा विभक्ति) |
| वज्रपाणिना |
वज्रपाणि इन्द्र से (तृतीया विभक्ति) |
भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रमः।
साक्षाद् विष्णोश्चतुर्भागः सर्वैः समुदितो गुणैः॥
॥ 1.18.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर कैकेयी से सत्यपराक्रमी भरत का जन्म हुआ, जो साक्षात् भगवान् विष्णु के (स्वरूपभूत पायस-खीर के) चतुर्थांश से भी न्यून भाग से प्रकट हुए थे। ये समस्त सद्गुणों से सम्पन्न थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भरतः |
भरत (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| कैकेय्याम् |
कैकेयी से (सप्तमी विभक्ति) |
| जज्ञे |
जन्म हुआ (जन् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सत्यपराक्रमः |
सत्यपराक्रमी (प्रथमा विभक्ति) |
| साक्षात् |
साक्षात् (अव्यय) |
| विष्णोः |
भगवान् विष्णु के (षष्ठी विभक्ति) |
| चतुर्भागः |
चतुर्थांश से भी न्यून भाग से (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वैः |
समस्त से (तृतीया विभक्ति) |
| समुदितः |
सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| गुणैः |
सद्गुणों से (तृतीया विभक्ति) |
अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राजनयत् सुतौ।
वीरौ सर्वास्त्रकुशलौ विष्णोरर्धसमन्वितौ॥
॥ 1.18.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसके बाद रानी सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न -इन दो पुत्रों को जन्म दिया। ये दोनों वीर साक्षात् भगवान् विष्णु के अर्धभाग से सम्पन्न और सब प्रकार के अस्त्रों की विद्या में कुशल थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
इसके बाद (अव्यय) |
| लक्ष्मणशत्रुघ्नौ |
लक्ष्मण और शत्रुघ्न को (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| सुमित्रा |
रानी सुमित्रा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अजनयत् |
जन्म दिया (जन् धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुतौ |
दो पुत्रों को (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| वीरौ |
वीर को (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| सर्वास्त्रकुशलौ |
सब प्रकार के अस्त्रों की विद्या में कुशल को (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन) |
| विष्णोः |
भगवान् विष्णु के (षष्ठी विभक्ति) |
| अर्धसमन्वितौ |
अर्धभाग से सम्पन्न को (द्वितीया विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
पुष्ये जातस्तु भरतो मीनलग्ने प्रसन्नधीः।
सार्पे जातौ तु सौमित्री कुलीरेऽभ्युदिते रवौ॥
॥ 1.18.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
भरत सदा प्रसन्नचित्त रहते थे। उनका जन्म पुष्य नक्षत्र तथा मीन लग्न में हुआ था। सुमित्रा के दोनों पुत्र आश्लेषा नक्षत्र और कर्कलग्न में उत्पन्न हुए थे। उस समय सूर्य अपने उच्च स्थान में विराजमान थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पुष्ये |
पुष्य नक्षत्र में (सप्तमी विभक्ति) |
| जातः |
जन्म हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| भरतः |
भरत (प्रथमा विभक्ति) |
| मीनलग्ने |
मीन लग्न में (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रसन्नधीः |
सदा प्रसन्नचित्त रहने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| सार्पे |
आश्लेषा नक्षत्र में (सप्तमी विभक्ति) |
| जातौ |
उत्पन्न हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| सौमित्री |
सुमित्रा के दोनों पुत्र (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| कुलीरे |
कर्कलग्न में (सप्तमी विभक्ति) |
| अभ्युदिते |
उच्च स्थान में विराजमान होने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| रवौ |
सूर्य के (सप्तमी विभक्ति) |
राज्ञः पुत्रा महात्मानश्चत्वारो जज्ञिरे पृथक्।
गुणवन्तोऽनुरूपाश्च रुच्या प्रोष्ठपदोपमाः॥
॥ 1.18.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा दशरथ के ये चारों महामनस्वी पुत्र पृथक्पृथक् गुणों से सम्पन्न और सुन्दर थे। ये भाद्रपदा नामक चार तारों के समान कान्तिमान् थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| राज्ञः |
राजा दशरथ के (षष्ठी विभक्ति) |
| पुत्राः |
पुत्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| महात्मानः |
महामनस्वी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चत्वारः |
चारों (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| जज्ञिरे |
उत्पन्न हुए (जन् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| पृथक् |
पृथक्पृथक् (अव्यय) |
| गुणवन्तः |
गुणों से सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| अनुरूपाः |
सुन्दर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| रुच्या |
कान्ति से (तृतीया विभक्ति) |
| प्रोष्ठपदोपमाः |
भाद्रपदा नामक चार तारों के समान (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
जगुः कलं च गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः।
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खात् पतत्॥
॥ 1.18.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इनके जन्म के समय गन्धर्वो ने मधुर गीत गाये। अप्सराओं ने नृत्य किया। देवताओं की दुन्दुभियाँ बजने लगीं तथा आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| जगुः |
गाये (गै धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| कलम् |
मधुर गीत (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| गन्धर्वाः |
गन्धर्वो ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ननृतुः |
नृत्य किया (नृत् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अप्सरोगणाः |
अप्सराओं के समूह ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| देवदुन्दुभयः |
देवताओं की दुन्दुभियाँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| नेदुः |
बजने लगीं (नद् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| पुष्पवृष्टिः |
फूलों की वर्षा (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| खात् |
आकाश से (पञ्चमी विभक्ति) |
| पतत् |
होने लगी (पत् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
उत्सवश्च महानासीदयोध्यायां जनाकुलः।
रथ्याश्च जनसम्बाधा नटनर्तकसंकुलाः॥
॥ 1.18.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अयोध्या में बहुत बड़ा उत्सव हुआ। मनुष्यों की भारी भीड़ एकत्र हुई। गलियाँ और सड़कें लोगों से खचाखच भरी थीं। बहुत-से नट और नर्तक वहाँ अपनी कलाएँ दिखा रहे थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| उत्सवः |
उत्सव (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| महान् |
बहुत बड़ा (प्रथमा विभक्ति) |
| आसीत् |
हुआ (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अयोध्यायाम् |
अयोध्या में (सप्तमी विभक्ति) |
| जनाकुलः |
मनुष्यों की भीड़ से युक्त (प्रथमा विभक्ति) |
| रथ्याः |
गलियाँ और सड़कें (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| जनसम्बाधाः |
लोगों से खचाखच भरी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| नटनर्तकसङ्कुलाः |
नट और नर्तकों से भरी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
गायनैश्च विराविण्यो वादनैश्च तथापरैः।
विरेजुर्विपुलास्तत्र सर्वरत्नसमन्विताः॥
॥ 1.18.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वहाँ सब ओर गाने-बजाने वाले तथा दूसरे लोगों के शब्द गूंज रहे थे। दीन-दुःखियों के लिये लुटाये गये सब प्रकार के रत्न वहाँ बिखरे पड़े थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गायनैः |
गाने वालों के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| विराविण्यः |
गूंज रही थीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वादनैः |
बजाने वालों के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| अपरैः |
दूसरे लोगों के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| विरेजुः |
बिखरे पड़े थे (वि + राज्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| विपुलाः |
बहुत-से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| सर्वरत्नसमन्विताः |
सब प्रकार के रत्नों से युक्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
प्रदेयांश्च ददौ राजा सूतमागधवन्दिनाम्।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं गोधनानि सहस्रशः॥
॥ 1.18.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा दशरथ ने सूत, मागध और वन्दीजनों को देने योग्य पुरस्कार दिये तथा ब्राह्मणों को धन एवं सहस्रों गोधन प्रदान किये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रदेयान् |
देने योग्य पुरस्कार (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| ददौ |
दिये (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राजा |
राजा दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सूतमागधवन्दिनाम् |
सूत, मागध और वन्दीजनों को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| ब्राह्मणेभ्यः |
ब्राह्मणों को (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| ददौ |
प्रदान किये (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वित्तम् |
धन (द्वितीया विभक्ति) |
| गोधनानि |
गोधन (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सहस्रशः |
सहस्रों (अव्यय) |
अतीत्यैकादशाहं तु नामकर्म तथाकरोत्।
ज्येष्ठं रामं महात्मानं भरतं कैकयीसुतम्।
सौमित्रिं लक्ष्मणमिति शत्रुघ्नमपरं तथा।
वसिष्ठः परमप्रीतो नामानि कुरुते तदा॥
॥ 1.18.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ग्यारह दिन बीतने पर महाराजने बालकों का नामकरण संस्कार किया। उस समय महर्षि वसिष्ठ ने प्रसन्नता के साथ सबके नाम रखे। उन्होंने ज्येष्ठ पुत्र का नाम ‘राम’ रखा। श्रीराम महात्मा (परमात्मा) थे। कैकेयीकुमार का नाम भरत तथा सुमित्रा के एक पुत्र का नाम लक्ष्मण और दूसरे का शत्रुघ्न निश्चित किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अतीत्य |
बीतने पर (ल्यबन्त अव्यय) |
| एकादशाहम् |
ग्यारह दिन (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| नामकर्म |
नामकरण संस्कार (द्वितीया विभक्ति) |
| तथा |
उस समय (अव्यय) |
| अकरोत् |
किया (कृ धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ज्येष्ठम् |
ज्येष्ठ पुत्र का (द्वितीया विभक्ति) |
| रामम् |
‘राम’ (द्वितीया विभक्ति) |
| महात्मानम् |
महात्मा (परमात्मा) का (द्वितीया विभक्ति) |
| भरतम् |
भरत (द्वितीया विभक्ति) |
| कैकयीसुतम् |
कैकेयीकुमार का (द्वितीया विभक्ति) |
| सौमित्रिम् |
सुमित्रा के पुत्र का (द्वितीया विभक्ति) |
| लक्ष्मणम् |
लक्ष्मण (द्वितीया विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| शत्रुघ्नम् |
शत्रुघ्न (द्वितीया विभक्ति) |
| अपरम् |
दूसरे का (द्वितीया विभक्ति) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| वसिष्ठः |
महर्षि वसिष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| परमप्रीतः |
प्रसन्नता के साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| नामानि |
नाम (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कुरुते |
रखे (कृ धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
ब्राह्मणान् भोजयामास पौरजानपदानपि।
अददद् ब्राह्मणानां च रत्नौघममलं बहु॥
॥ 1.18.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा ने ब्राह्मणों, पुरवासियों तथा जनपदवासियों को भी भोजन कराया। ब्राह्मणों को बहुत-से उज्ज्वल रत्नसमूह दान किये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्राह्मणान् |
ब्राह्मणों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| भोजयामास |
भोजन कराया (भुज् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पौरजानपदान् |
पुरवासियों तथा जनपदवासियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| अददत् |
दान किये (दा धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ब्राह्मणानाम् |
ब्राह्मणों को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| च |
और (अव्यय) |
| रत्नौघम् |
रत्नसमूह (द्वितीया विभक्ति) |
| अमलम् |
उज्ज्वल (द्वितीया विभक्ति) |
| बहु |
बहुत-से (द्वितीया विभक्ति) |
तेषां जन्मक्रियादीनि सर्वकर्माण्यकारयत्।
तेषां केतुरिव ज्येष्ठो रामो रतिकरः पितुः॥
॥ 1.18.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महर्षि वसिष्ठ ने समय-समयपर राजा से उन बालकों के जातकर्म आदि सभी संस्कार करवाये थे। उन सबमें श्रीरामचन्द्रजी ज्येष्ठ होने के साथ ही अपने कुल की कीर्ति-ध्वजा को फहराने वाली पताका के समान थे। वे अपने पिता की प्रसन्नता को बढानेवाले थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेषाम् |
उन बालकों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| जन्मक्रियादीनि |
जातकर्म आदि (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वकर्माणि |
सभी संस्कार (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अकारयत् |
करवाये थे (कृ धातु, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तेषाम् |
उन सबमें (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| केतुः |
कीर्ति-ध्वजा को फहराने वाली पताका के (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
समान (अव्यय) |
| ज्येष्ठः |
ज्येष्ठ होने के साथ ही (प्रथमा विभक्ति) |
| रामः |
श्रीरामचन्द्रजी (प्रथमा विभक्ति) |
| रतिकरः |
प्रसन्नता को बढानेवाले (प्रथमा विभक्ति) |
| पितुः |
अपने पिता की (षष्ठी विभक्ति) |
बभूव भूयो भूतानां स्वयम्भूरिव सम्मतः।
सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे लोकहिते रताः॥
॥ 1.18.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
सभी भूतों के लिये वे स्वयम्भू ब्रह्माजी के समान विशेष प्रिय थे। राजा के सभी पुत्र वेदों के विद्वान् और शूरवीर थे। सब-के-सब लोकहितकारी कार्यों में संलग्न रहते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| बभूव |
थे (भू धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भूयः |
विशेष रूप से (अव्यय) |
| भूतानाम् |
सभी भूतों के लिये (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| स्वयम्भूः |
स्वयम्भू ब्रह्माजी के (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
समान (अव्यय) |
| सम्मतः |
प्रिय (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
राजा के सभी पुत्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वेदविदः |
वेदों के विद्वान् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शूराः |
शूरवीर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सब-के-सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| लोकहिते |
लोकहितकारी कार्यों में (सप्तमी विभक्ति) |
| रताः |
संलग्न रहते थे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
सर्वे ज्ञानोपसम्पन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः।
तेषामपि महातेजा रामः सत्यपराक्रमः।
इष्टः सर्वस्य लोकस्य शशाङ्क इव निर्मलः।
गजस्कन्धेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु सम्मतः।
धनुर्वेदे च निरतः पितुः शुश्रूषणे रतः॥
॥ 1.18.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
सभी ज्ञानवान् और समस्त सद्गुणों से सम्पन्न थे। उनमें भी सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक तेजस्वी और सब लोगों के विशेष प्रिय थे। वे निष्कलङ्क चन्द्रमा के समान शोभा पाते थे। उन्होंने हाथी के कंधे और घोड़े की पीठपर बैठने तथा रथ हाँकने की कला में भी सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त किया था। वे सदा धनुर्वेद का अभ्यास करते और पिताजी की सेवा में लगे रहते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ज्ञानोपसम्पन्नाः |
ज्ञानवान् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| समुदिताः |
सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| गुणैः |
सद्गुणों से (तृतीया विभक्ति) |
| तेषाम् |
उनमें (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, सप्तमी के अर्थ में) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| महातेजाः |
सबसे अधिक तेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| रामः |
श्रीरामचन्द्रजी (प्रथमा विभक्ति) |
| सत्यपराक्रमः |
सत्यपराक्रमी (प्रथमा विभक्ति) |
| इष्टः |
प्रिय थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वस्य |
सब के (षष्ठी विभक्ति) |
| लोकस्य |
लोगों के (षष्ठी विभक्ति) |
| शशाङ्कः |
चन्द्रमा के (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
समान (अव्यय) |
| निर्मलः |
निष्कलङ्क (प्रथमा विभक्ति) |
| गजस्कन्धे |
हाथी के कंधे पर (सप्तमी विभक्ति) |
| अश्वपृष्ठे |
घोड़े की पीठ पर (सप्तमी विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| रथचर्यासु |
रथ हाँकने की कला में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| सम्मतः |
सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त करने वाले (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| धनुर्वेदे |
धनुर्वेद का (सप्तमी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| निरतः |
अभ्यास करने वाले (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| पितुः |
पिताजी की (षष्ठी विभक्ति) |
| शुश्रूषणे |
सेवा में (सप्तमी विभक्ति) |
| रतः |
लगे रहने वाले (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
बाल्यात् प्रभृति सुस्निग्धो लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः।
रामस्य लोकरामस्य भ्रातुर्येष्ठस्य नित्यशः।
सर्वप्रियकरस्तस्य रामस्यापि शरीरतः॥
॥ 1.18.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
लक्ष्मी की वृद्धि करने वाले लक्ष्मण बाल्यावस्था से ही श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अत्यन्त अनुराग रखते थे। वे अपने बड़े भाई लोकाभिराम श्रीराम का सदा ही प्रिय करते थे और शरीर से भी उनकी सेवा में ही जुटे रहते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| बाल्यात् |
बाल्यावस्था से (पञ्चमी विभक्ति) |
| प्रभृति |
से ही (अव्यय) |
| सुस्निग्धः |
अत्यन्त अनुराग रखने वाले (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| लक्ष्मणः |
लक्ष्मण (प्रथमा विभक्ति) |
| लक्ष्मिवर्धनः |
लक्ष्मी की वृद्धि करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| रामस्य |
श्रीरामचन्द्रजी के प्रति (षष्ठी विभक्ति) |
| लोकरामस्य |
लोकाभिराम के (षष्ठी विभक्ति) |
| भ्रातुः |
भाई का (षष्ठी विभक्ति) |
| ज्येष्ठस्य |
बड़े का (षष्ठी विभक्ति) |
| नित्यशः |
सदा ही (अव्यय) |
| सर्वप्रियकरः |
सब प्रिय करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उन (षष्ठी विभक्ति) |
| रामस्य |
श्रीराम की (षष्ठी विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| शरीरतः |
शरीर से (पञ्चमी विभक्ति का अव्यय) |
लक्ष्मणो लक्ष्मिसम्पन्नो बहिःप्राण इवापरः।
न च तेन विना निद्रां लभते पुरुषोत्तमः।
मृष्टमन्नमुपानीतमश्नाति न हि तं विना॥
॥ 1.18.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
शोभासम्पन्न लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी के लिये बाहर विचरने वाले दूसरे प्राण के समान थे। पुरुषोत्तम श्रीराम को उनके बिना नींद भी नहीं आती थी। यदि उनके पास उत्तम भोजन लाया जाता तो श्रीरामचन्द्रजी उसमें से लक्ष्मण को दिये बिना नहीं खाते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| लक्ष्मणः |
शोभासम्पन्न लक्ष्मण (प्रथमा विभक्ति) |
| लक्ष्मिसम्पन्नः |
शोभा से सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| बहिःप्राणः |
बाहर विचरने वाले दूसरे प्राण के (प्रथमा विभक्ति) |
| इव |
समान (अव्यय) |
| अपरः |
दूसरे (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
भी (अव्यय) |
| तेन |
उनके (तृतीया विभक्ति) |
| विना |
बिना (अव्यय) |
| निद्राम् |
नींद भी (द्वितीया विभक्ति) |
| लभते |
नहीं आती थी (लभ् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुरुषोत्तमः |
पुरुषोत्तम श्रीराम को (प्रथमा विभक्ति) |
| मृष्टम् |
उत्तम (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अन्नम् |
भोजन (प्रथमा विभक्ति) |
| उपानीतम् |
लाया जाता (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अश्नाति |
नहीं खाते थे (अश् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| तम् |
उसमें से (द्वितीया विभक्ति) |
| विना |
बिना (अव्यय) |
यदा हि हयमारूढो मृगयां याति राघवः।
अथैनं पृष्ठतोऽभ्येति सधनुः परिपालयन्।
भरतस्यापि शत्रुघ्नो लक्ष्मणावरजो हि सः।
प्राणैः प्रियतरो नित्यं तस्य चासीत् तथा प्रियः॥
॥ 1.18.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
जब श्रीरामचन्द्रजी घोड़े पर चढ़कर शिकार खेलने के लिये जाते, उस समय लक्ष्मण धनुष लेकर उनके शरीर की रक्षा करते हुए पीछे-पीछे जाते थे। इसी प्रकार लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्न भरतजी को प्राणों से भी अधिक प्रिय थे और वे भी भरतजी को सदा प्राणों से भी अधिक प्रिय मानते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यदा |
जब (अव्यय) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| हयम् |
घोड़े पर (द्वितीया विभक्ति) |
| आरूढः |
चढ़कर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मृगयाम् |
शिकार खेलने के लिये (द्वितीया विभक्ति) |
| याति |
जाते (या धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राघवः |
श्रीरामचन्द्रजी (प्रथमा विभक्ति) |
| अथ |
उस समय (अव्यय) |
| एनम् |
उनके (द्वितीया विभक्ति) |
| पृष्ठतः |
पीछे-पीछे (अव्यय) |
| अभ्येति |
जाते थे (अभि + आ + इ, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सधनुः |
धनुष लेकर (प्रथमा विभक्ति) |
| परिपालयन् |
रक्षा करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| भरतस्य |
भरतजी को (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| शत्रुघ्नः |
शत्रुघ्न (प्रथमा विभक्ति) |
| लक्ष्मणावरजः |
लक्ष्मण के छोटे भाई (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| प्राणैः |
प्राणों से भी (तृतीया विभक्ति) |
| प्रियतरः |
अधिक प्रिय (प्रथमा विभक्ति) |
| नित्यम् |
सदा (अव्यय) |
| तस्य |
उनको (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| च |
और (अव्यय) |
| आसीत् |
था (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तथा |
उसी प्रकार (अव्यय) |
| प्रियः |
प्रिय (प्रथमा विभक्ति) |
स चतुर्भिर्महाभागैः पुत्रैर्दशरथः प्रियैः।
बभूव परमप्रीतो देवैरिव पितामहः॥
॥ 1.18.33 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इन चार महान् भाग्यशाली प्रिय पुत्रों से राजा दशरथ को बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती थी, ठीक वैसे ही जैसे चार देवताओं (दिक्पालों) से ब्रह्माजी को प्रसन्नता होती है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह राजा दशरथ को (प्रथमा विभक्ति) |
| चतुर्भिः |
चार (तृतीया विभक्ति) |
| महाभागैः |
महान् भाग्यशाली से (तृतीया विभक्ति) |
| पुत्रैः |
पुत्रों से (तृतीया विभक्ति) |
| दशरथः |
राजा दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रियैः |
प्रिय से (तृतीया विभक्ति) |
| बभूव |
प्राप्त होती थी (भू धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| परमप्रीतः |
बड़ी प्रसन्नता (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| देवैः |
देवताओं (दिक्पालों) से (तृतीया विभक्ति) |
| इव |
ठीक वैसे ही जैसे (अव्यय) |
| पितामहः |
ब्रह्माजी को (प्रथमा विभक्ति) |
ते यदा ज्ञानसम्पन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः।
ह्रीमन्तः कीर्तिमन्तश्च सर्वज्ञा दीर्घदर्शिनः।
तेषामेवंप्रभावाणां सर्वेषां दीप्ततेजसाम्।
पिता दशरथो हृष्टो ब्रह्मा लोकाधिपो यथा॥
॥ 1.18.34 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे सब बालक जब समझदार हुए, तब समस्त सद्गुणों से सम्पन्न हो गये। वे सभी लज्जाशील, यशस्वी, सर्वज्ञ और दूरदर्शी थे। ऐसे प्रभावशाली और अत्यन्त तेजस्वी उन सभी पुत्रों की प्राप्ति से राजा दशरथ लोकेश्वर ब्रह्मा की भाँति बहुत प्रसन्न थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ते |
वे सब बालक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यदा |
जब (अव्यय) |
| ज्ञानसम्पन्नाः |
समझदार हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| समुदिताः |
सम्पन्न हो गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| गुणैः |
सद्गुणों से (तृतीया विभक्ति) |
| ह्रीमन्तः |
लज्जाशील (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| कीर्तिमन्तः |
यशस्वी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| सर्वज्ञाः |
सर्वज्ञ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| दीर्घदर्शिनः |
दूरदर्शी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तेषाम् |
उन सभी की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| एवंप्रभावाणाम् |
ऐसे प्रभावशाली की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वेषाम् |
सभी की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| दीप्ततेजसाम् |
अत्यन्त तेजस्वी की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| पिता |
पिता (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
राजा दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| हृष्टः |
बहुत प्रसन्न थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ब्रह्मा |
लोकेश्वर ब्रह्मा की (प्रथमा विभक्ति) |
| लोकाधिपः |
लोकाधिपति (प्रथमा विभक्ति) |
| यथा |
भाँति (अव्यय) |
ते चापि मनुजव्याघ्रा वैदिकाध्ययने रताः।
पितृशुश्रूषणरता धनुर्वेदे च निष्ठिताः॥
॥ 1.18.36 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे पुरुषसिंह राजकुमार प्रतिदिन वेदों के स्वाध्याय, पिता की सेवा तथा धनुर्वेद के अभ्यास में दत्त-चित्त रहते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| मनुजव्याघ्राः |
पुरुषसिंह राजकुमार (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वैदिकाध्ययने |
वेदों के स्वाध्याय में (सप्तमी विभक्ति) |
| रताः |
दत्त-चित्त रहते थे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| पितृशुश्रूषणरताः |
पिता की सेवा में दत्त-चित्त रहने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| धनुर्वेदे |
धनुर्वेद के (सप्तमी विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| निष्ठिताः |
अभ्यास में दत्त-चित्त रहने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
अथ राजा दशरथस्तेषां दारक्रियां प्रति।
चिन्तयामास धर्मात्मा सोपाध्यायः सबान्धवः।
तस्य चिन्तयमानस्य मन्त्रिमध्ये महात्मनः।
अभ्यागच्छन्महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः॥
॥ 1.18.37 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
एक दिन धर्मात्मा राजा दशरथ पुरोहित तथा बन्धु-बान्धवों के साथ बैठकर पुत्रों के विवाह के विषय में विचार कर रहे थे। मन्त्रियों के बीच में विचार करते हुए उन महामना नरेश के यहाँ महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र पधारे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
एक दिन (अव्यय) |
| राजा |
राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ (प्रथमा विभक्ति) |
| तेषाम् |
पुत्रों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| दारक्रियाम् |
विवाह के विषय में (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रति |
के विषय में (कर्मप्रवचनीय अव्यय) |
| चिन्तयामास |
विचार कर रहे थे (चिन्त् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा (प्रथमा विभक्ति) |
| सोपाध्यायः |
पुरोहित के साथ (प्रथमा विभक्ति) |
| सबान्धवः |
बन्धु-बान्धवों के साथ (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उन (षष्ठी विभक्ति) |
| चिन्तयमानस्य |
विचार करते हुए के (षष्ठी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| मन्त्रिमध्ये |
मन्त्रियों के बीच में (सप्तमी विभक्ति) |
| महात्मनः |
महामना नरेश के (षष्ठी विभक्ति) |
| अभ्यागच्छत् |
पधारे (अभि + आ + गम्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रः |
विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| महामुनिः |
महामुनि (प्रथमा विभक्ति) |
स राज्ञो दर्शनाकांक्षी द्वाराध्यक्षानुवाच ह।
शीघ्रमाख्यात मां प्राप्तं कौशिकं गाधिनः सुतम्॥
॥ 1.18.39 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे राजा से मिलना चाहते थे। उन्होंने द्वारपालों से कहा—’तुमलोग शीघ्र जाकर महाराज को यह सूचना दो कि कुशिकवंशी गाधिपुत्र विश्वामित्र आये हैं’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| राज्ञः |
राजा से (षष्ठी विभक्ति) |
| दर्शनाकाङ्क्षी |
मिलना चाहते थे (प्रथमा विभक्ति) |
| द्वाराध्यक्षान् |
द्वारपालों से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| शीघ्रम् |
शीघ्र (अव्यय) |
| आख्यात |
सूचना दो (आ + ख्या, लोट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
| माम् |
मुझे (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राप्तम् |
आये हुए (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कौशिकम् |
कुशिकवंशी को (द्वितीया विभक्ति) |
| गाधिनः |
गाधि के (षष्ठी विभक्ति) |
| सुतम् |
पुत्र को (द्वितीया विभक्ति) |
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य राज्ञो वेश्म प्रदुद्रुवुः।
सम्भ्रान्तमनसः सर्वे तेन वाक्येन चोदिताः॥
॥ 1.18.40 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनकी यह बात सुनकर वे द्वारपाल दौड़े हुए राजा के दरबार में गये। वे सब विश्वामित्र के उस वाक्य से प्रेरित होकर मन-ही-मन घबराये हुए थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
उनकी यह (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| वचनम् |
बात (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्य |
उनकी (षष्ठी विभक्ति) |
| राज्ञः |
राजा के (षष्ठी विभक्ति) |
| वेश्म |
दरबार में (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रदुद्रुवुः |
दौड़े हुए गये (प्र + द्रु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सम्भ्रान्तमनसः |
मन-ही-मन घबराये हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
वे सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तेन |
उस (तृतीया विभक्ति) |
| वाक्येन |
वाक्य से (तृतीया विभक्ति) |
| चोदिताः |
प्रेरित होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
ते गत्वा राजभवनं विश्वामित्रमृषिं तदा।
प्राप्तमावेदयामासुर्नृपायेक्ष्वाकवे तदा॥
॥ 1.18.41 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा के दरबार में पहुँचकर उन्होंने इक्ष्वाकुकुलनन्दन अवधनरेश से कहा—’महाराज! महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ते |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| गत्वा |
पहुँचकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| राजभवनम् |
राजा के दरबार में (द्वितीया विभक्ति) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| ऋषिम् |
महर्षि (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| प्राप्तम् |
पधारे हैं (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| आवेदयामासुः |
कहा (आ + विद्, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| नृपाय |
अवधनरेश से (चतुर्थी विभक्ति) |
| इक्ष्वाकवे |
इक्ष्वाकुकुलनन्दन से (चतुर्थी विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सपुरोधाः समाहितः।
प्रत्युज्जगाम संहृष्टो ब्रह्माणमिव वासवः॥
॥ 1.18.42 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनकी वह बात सुनकर राजा सावधान हो गये। उन्होंने पुरोहित को साथ लेकर बड़े हर्ष के साथ उनकी अगवानी की, मानो देवराज इन्द्र ब्रह्माजी का स्वागत कर रहे हों।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेषाम् |
उनकी (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
बात (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| सपुरोधाः |
पुरोहित को साथ लेकर (प्रथमा विभक्ति) |
| समाहितः |
सावधान हो गये (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रत्युज्जगाम |
अगवानी की (प्रति + उद् + गम्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| संहृष्टः |
बड़े हर्ष के साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ब्रह्माणम् |
ब्रह्माजी का (द्वितीया विभक्ति) |
| इव |
मानो (अव्यय) |
| वासवः |
देवराज इन्द्र (प्रथमा विभक्ति) |
स दृष्ट्वा ज्वलितं दीप्त्या तापसं संशितव्रतम्।
प्रहृष्टवदनो राजा ततोऽर्ध्यमुपहारयत्॥
॥ 1.18.43 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विश्वामित्रजी कठोर व्रत का पालन करने वाले तपस्वी थे। वे अपने तेज से प्रज्वलित हो रहे थे। उनका दर्शन करके राजा का मुख प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने महर्षि को अर्घ्य निवेदन किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह राजा (प्रथमा विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
दर्शन करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| ज्वलितम् |
प्रज्वलित हो रहे थे (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| दीप्त्या |
तेज से (तृतीया विभक्ति) |
| तापसम् |
तपस्वी को (द्वितीया विभक्ति) |
| संशितव्रतम् |
कठोर व्रत का पालन करने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रहृष्टवदनः |
प्रसन्नता से खिल उठे मुख वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ततः |
उन्होंने (अव्यय) |
| अर्घ्यम् |
अर्घ्य (द्वितीया विभक्ति) |
| उपहारयत् |
निवेदन किया (उप + हृ, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
स राज्ञः प्रतिगृह्यार्घ्यं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।
कुशलं चाव्ययं चैव पर्यपृच्छन्नराधिपम्॥
॥ 1.18.44 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजा का वह अर्घ्य शास्त्रीय विधि के अनुसार स्वीकार करके महर्षि ने उनसे कुशल-मंगल पूछा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह महर्षि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| राज्ञः |
राजा का (षष्ठी विभक्ति) |
| प्रतिगृह्य |
स्वीकार करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| अर्घ्यम् |
अर्घ्य को (द्वितीया विभक्ति) |
| शास्त्रदृष्टेन |
शास्त्रीय विधि के अनुसार (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कर्मणा |
कर्म से (तृतीया विभक्ति) |
| कुशलम् |
कुशल-मंगल (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अव्ययम् |
अव्यय (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| पर्यपृच्छत् |
पूछा (परि + प्रच्छ्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| नराधिपम् |
उनसे (राजा से) (द्वितीया विभक्ति) |
पुरे कोशे जनपदे बान्धवेषु सुहृत्सु च।
कुशलं कौशिको राज्ञः पर्यपृच्छत् सुधार्मिकः॥
॥ 1.18.45 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
धर्मात्मा विश्वामित्र ने क्रमशः राजा के नगर, खजाना, राज्य, बन्धु-बान्धव तथा मित्रवर्ग आदि के विषय में कुशल प्रश्न किया-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पुरे |
नगर के विषय में (सप्तमी विभक्ति) |
| कोशे |
खजाने के विषय में (सप्तमी विभक्ति) |
| जनपदे |
राज्य के विषय में (सप्तमी विभक्ति) |
| बान्धवेषु |
बन्धु-बान्धव के विषय में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| सुहृत्सु |
मित्रवर्ग के विषय में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
आदि (अव्यय) |
| कुशलम् |
कुशल प्रश्न (द्वितीया विभक्ति) |
| कौशिकः |
धर्मात्मा विश्वामित्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| राज्ञः |
राजा का (षष्ठी विभक्ति) |
| पर्यपृच्छत् |
किया (परि + प्रच्छ्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सुधार्मिकः |
धर्मात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
अपि ते संनताः सर्वे सामन्तरिपवो जिताः।
दैवं च मानुषं चैव कर्म ते साध्वनुष्ठितम्॥
॥ 1.18.46 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘राजन् आपके राज्य की सीमा के निकट रहने वाले शत्रु राजा आपके समक्ष नतमस्तक तो हैं? आपने उनपर विजय तो प्राप्त की है न? आपके यज्ञयाग आदि देवकर्म और अतिथिसत्कार आदि मनुष्यकर्म तो अच्छी तरह सम्पन्न होते हैं न?’
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अपि |
तो (प्रश्नार्थक अव्यय) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| संनताः |
नतमस्तक हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सामन्तरिपवः |
सीमा के निकट रहने वाले शत्रु राजा (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| जिताः |
विजय प्राप्त की है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| दैवम् |
देवकर्म (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| मानुषम् |
मनुष्यकर्म (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| कर्म |
कर्म (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| साधु |
अच्छी तरह (अव्यय) |
| अनुष्ठितम् |
सम्पन्न होते हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
वसिष्ठं च समागम्य कुशलं मुनिपुंगवः।
ऋषींश्च तान् यथान्यायं महाभाग उवाच ह॥
॥ 1.18.47 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसके बाद महाभाग मुनिवर विश्वामित्र ने वसिष्ठजी तथा अन्यान्य ऋषियों से मिलकर उन सबका यथावत् कुशल-समाचार पूछा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वसिष्ठम् |
वसिष्ठजी से (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
तथा (अव्यय) |
| समागम्य |
मिलकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| कुशलम् |
कुशल-समाचार (द्वितीया विभक्ति) |
| मुनिपुङ्गवः |
मुनिवर ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ऋषीन् |
ऋषियों का (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| तान् |
उन सबका (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| यथान्यायम् |
यथावत् (अव्यय) |
| महाभागः |
महाभाग ने (प्रथमा विभक्ति) |
| उवाच |
पूछा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
ते सर्वे हृष्टमनसस्तस्य राज्ञो निवेशनम्।
विविशुः पूजितास्तेन निषेदुश्च यथार्हतः॥
॥ 1.18.48 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
फिर वे सब लोग प्रसन्नचित्त होकर राजा के दरबार में गये और उनके द्वारा पूजित हो यथायोग्य आसनों पर बैठे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सब लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| हृष्टमनसः |
प्रसन्नचित्त होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| राज्ञः |
राजा के (षष्ठी विभक्ति) |
| निवेशनम् |
दरबार में (द्वितीया विभक्ति) |
| विविशुः |
गये (विश् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| पूजिताः |
पूजित हो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तेन |
उनके द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| निषेदुः |
बैठे (नि + सद्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| यथार्हतः |
यथायोग्य (अव्यय) |
अथ हृष्टमना राजा विश्वामित्रं महामुनिम्।
उवाच परमोदारो हृष्टस्तमभिपूजयन्॥
॥ 1.18.49 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर प्रसन्नचित्त परम उदार राजा दशरथ ने पुलकित होकर महामुनि विश्वामित्र की प्रशंसा करते हुए कहा-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| हृष्टमनाः |
प्रसन्नचित्त (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वामित्रम् |
विश्वामित्र से (द्वितीया विभक्ति) |
| महामुनिम् |
महामुनि से (द्वितीया विभक्ति) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| परमोदारः |
परम उदार ने (प्रथमा विभक्ति) |
| हृष्टः |
पुलकित होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तम् |
उनकी (द्वितीया विभक्ति) |
| अभिपूजयन् |
प्रशंसा करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
यथामृतस्य सम्प्राप्तिर्यथा वर्षमनूदके।
यथा सदृशदारेषु पुत्रजन्माप्रजस्य वै।
प्रणष्टस्य यथा लाभो यथा हर्षो महोदयः।
तथैवागमनं मन्ये स्वागतं ते महामुने।
कं च ते परमं कामं करोमि किमु हर्षितः॥
॥ 1.18.50 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महामुने! जैसे किसी मरणधर्मा मनुष्य को अमृतकी प्राप्ति हो जाय, निर्जल प्रदेश में पानी बरस जाय, किसी संतानहीन को अपने अनुरूप पत्नी के गर्भ से पुत्र प्राप्त हो जाय, खोयी हुई निधि मिल जाय तथा किसी महान् उत्सव से हर्ष का उदय हो, उसी प्रकार आपका यहाँ शुभागमन हुआ है। ऐसा मैं मानता हूँ। आपका स्वागत है। आपके मन में कौन-सी उत्तम कामना है, जिसको मैं हर्ष के साथ पूर्ण करूँ?
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| अमृतस्य |
अमृत की (षष्ठी विभक्ति) |
| सम्प्राप्तिः |
प्राप्ति (प्रथमा विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| वर्षम् |
पानी बरस जाय (प्रथमा विभक्ति) |
| अनूदके |
निर्जल प्रदेश में (सप्तमी विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| सदृशदारेषु |
अनुरूप पत्नी के गर्भ से (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| पुत्रजन्म |
पुत्र प्राप्त हो जाय (प्रथमा विभक्ति) |
| अप्रजस्य |
सन्तानहीन को (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| प्रणष्टस्य |
खोयी हुई निधि का (षष्ठी विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| लाभः |
मिल जाय (प्रथमा विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| हर्षः |
हर्ष का (प्रथमा विभक्ति) |
| महोदयः |
उदय हो (प्रथमा विभक्ति) |
| तथा |
उसी प्रकार (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| आगमनम् |
शुभागमन हुआ है (प्रथमा विभक्ति) |
| मन्ये |
मैं मानता हूँ (मन् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| स्वागतम् |
स्वागत है (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (चतुर्थी विभक्ति) |
| महामुने |
हे महामुने! (सम्बोधन विभक्ति) |
| कम् |
कौन-सी (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| परमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
| कामम् |
कामना है (द्वितीया विभक्ति) |
| करोमि |
पूर्ण करूँ (कृ धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| किमु |
जिसको (अव्यय) |
| हर्षितः |
हर्ष के साथ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
पात्रभूतोऽसि मे ब्रह्मन् दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद।
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्॥
॥ 1.18.53 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन्! आप मुझसे सब प्रकार की सेवा लेने योग्य उत्तम पात्र हैं। मानद! मेरा अहोभाग्य है, जो आपने यहाँ तक पधारने का कष्ट उठाया। आज मेरा जन्म सफल और जीवन धन्य हो गया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पात्रभूतः |
उत्तम पात्र हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| असि |
हैं (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मे |
मुझसे (षष्ठी विभक्ति) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| दिष्ट्या |
अहोभाग्य है (तृतीया विभक्ति का अव्यय) |
| प्राप्तः |
पधारे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| असि |
हो (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मानद |
हे मानद! (सम्बोधन विभक्ति) |
| अद्य |
आज (अव्यय) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| सफलम् |
सफल (प्रथमा विभक्ति) |
| जन्म |
जन्म (प्रथमा विभक्ति) |
| जीवितम् |
जीवन (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुजीवितम् |
धन्य हो गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
यस्माद् विप्रेन्द्रमद्राक्षं सुप्रभाता निशा मम।
पूर्वं राजर्षिशब्देन तपसा द्योतितप्रभः।
ब्रह्मर्षित्वमनुप्राप्तः पूज्योऽसि बहुधा मया।
तदद्भुतमभूद् विप्र पवित्रं परमं मम।
शुभक्षेत्रगतश्चाहं तव संदर्शनात् प्रभो।
ब्रूहि यत् प्रार्थितं तुभ्यं कार्यमागमनं प्रति॥
॥ 1.18.54 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मेरी बीती हुई रात सुन्दर प्रभात दे गयी, जिससे मैंने आज आप ब्राह्मणशिरोमणि का दर्शन किया। पूर्वकाल में आप राजर्षि शब्द से उपलक्षित होते थे, फिर तपस्या से अपनी अद्भुत प्रभा को प्रकाशित करके आपने ब्रह्मर्षि का पद पाया; अतः आप राजर्षि और ब्रह्मर्षि दोनों ही रूपों में मेरे पूजनीय हैं। आपका जो यहाँ मेरे समक्ष शुभागमन हुआ है, यह परम पवित्र और अद्भुत है। “प्रभो! आपके दर्शनसे आज मेरा घर तीर्थ हो गया। मैं अपने-आपको पुण्यक्षेत्रों की यात्रा करके आया हुआ मानता हूँ। बताइये, आप क्या चाहते हैं? आपके शुभागमन का शुभ उद्देश्य क्या है?
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यस्मात् |
जिससे (पञ्चमी विभक्ति) |
| विप्रेन्द्रम् |
ब्राह्मणशिरोमणि का (द्वितीया विभक्ति) |
| अद्राक्षम् |
दर्शन किया (दृश् धातु, लुङ् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| सुप्रभाता |
सुन्दर प्रभात दे गयी (प्रथमा विभक्ति) |
| निशा |
रात (प्रथमा विभक्ति) |
| मम |
मेरी (षष्ठी विभक्ति) |
| पूर्वम् |
पूर्वकाल में (अव्यय) |
| राजर्षिशब्देन |
राजर्षि शब्द से (तृतीया विभक्ति) |
| तपसा |
तपस्या से (तृतीया विभक्ति) |
| द्योतितप्रभः |
अद्भुत प्रभा को प्रकाशित करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्रह्मर्षित्वम् |
ब्रह्मर्षि का पद (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुप्राप्तः |
पाया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| पूज्यः |
पूजनीय हैं (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| असि |
हो (अस् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| बहुधा |
बहुत प्रकार से (अव्यय) |
| मया |
मेरे द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| अद्भुतम् |
अद्भुत है (प्रथमा विभक्ति) |
| अभूत् |
हुआ (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| विप्र |
हे विप्र! (सम्बोधन विभक्ति) |
| पवित्रम् |
पवित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| परमम् |
परम (प्रथमा विभक्ति) |
| मम |
मेरे लिए (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| शुभक्षेत्रगतः |
तीर्थ हो गया / पुण्यक्षेत्रों की यात्रा करके आया हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| तव |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| सन्दर्शनात् |
दर्शन से (पञ्चमी विभक्ति) |
| प्रभो |
हे प्रभो! (सम्बोधन विभक्ति) |
| ब्रूहि |
बताइये (ब्रू धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| यत् |
जो (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रार्थितम् |
चाहते हैं (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तुभ्यम् |
आपको (चतुर्थी विभक्ति) |
| कार्यम् |
उद्देश्य (प्रथमा विभक्ति) |
| आगमनम् |
शुभागमन का (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रति |
के लिए (कर्मप्रवचनीय अव्यय) |
इच्छाम्यनुगृहीतोऽहं त्वदर्थं परिवृद्धये।
कार्यस्य न विमर्शं च गन्तुमर्हसि सुव्रत॥
॥ 1.18.57 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! मैं चाहता हूँ कि आपकी कृपा से अनुगृहीत होकर आपके अभीष्ट मनोरथ को जान लूँ और अपने अभ्युदय के लिये उसकी पूर्ति करूँ। ‘कार्य सिद्ध होगा या नहीं’ ऐसे संशय को अपने मन में स्थान न दीजिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इच्छामि |
चाहता हूँ (इष् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| अनुगृहीतः |
अनुगृहीत होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वदर्थम् |
आपके अभीष्ट मनोरथ को (द्वितीया विभक्ति) |
| परिवृद्धये |
अभ्युदय के लिये (चतुर्थी विभक्ति) |
| कार्यस्य |
कार्य सिद्धि के विषय में (षष्ठी विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| विमर्शम् |
संशय को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| गन्तुम् |
प्राप्त करने / स्थान देने के लिए (गम् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं / चाहिये (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सुव्रत |
हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले! (सम्बोधन विभक्ति) |
कर्ता चाहमशेषेण दैवतं हि भवान् मम।
मम चायमनुप्राप्तो महानभ्युदयो द्विज।
तवागमनजः कृत्स्नो धर्मश्चानुत्तमो द्विज॥
॥ 1.18.58 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘आप जो भी आज्ञा देंगे, मैं उसका पूर्णरूप से पालन करूँगा; क्योंकि सम्माननीय अतिथि होने के नाते आप मुझ गृहस्थ के लिये देवता हैं। ब्रह्मन्! आज आपके आगमन से मुझे सम्पूर्ण धर्मों का उत्तम फल प्राप्त हो गया। यह मेरे महान् अभ्युदय का अवसर आया है’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कर्ता |
पालन करूँगा (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| अशेषेण |
पूर्णरूप से (तृतीया विभक्ति) |
| दैवतम् |
देवता हैं (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
क्योंकि (अव्यय) |
| भवान् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| मम |
मुझ गृहस्थ के लिये (षष्ठी विभक्ति) |
| मम |
मुझे (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| च |
और (अव्यय) |
| अयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| अनुप्राप्तः |
प्राप्त हो गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| महान् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| अभ्युदयः |
अभ्युदय का अवसर (प्रथमा विभक्ति) |
| द्विज |
हे ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| तव |
आपके (षष्ठी विभक्ति) |
| आगमनजः |
आगमन से उत्पन्न (प्रथमा विभक्ति) |
| कृत्स्नः |
सम्पूर्ण (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मः |
धर्मों का (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अनुत्तमः |
उत्तम फल (प्रथमा विभक्ति) |
| द्विज |
हे द्विज! (सम्बोधन विभक्ति) |
इति हृदयसुखं निशम्य वाक्यं श्रुतिसुखमात्मवता विनीतमुक्तम्।
प्रथितगुणयशा गुणैर्विशिष्टः परमऋषिः परमं जगाम हर्षम्॥
॥ 1.18.59 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
मनस्वी नरेश के कहे हुए ये विनययुक्त वचन, जो हृदय और कानों को सुख देने वाले थे, सुनकर विख्यात गुण और यशवाले, शम-दम आदि सद्गुणों से सम्पन्न महर्षि विश्वामित्र बहुत प्रसन्न हुए।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
ये (अव्यय) |
| हृदयसुखम् |
हृदय को सुख देने वाले (द्वितीया विभक्ति) |
| निशम्य |
सुनकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुतिसुखम् |
कानों को सुख देने वाले (द्वितीया विभक्ति) |
| आत्मवता |
मनस्वी नरेश के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| विनीतमुक्तम् |
विनययुक्त कहे हुए (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रथितगुणयशाः |
विख्यात गुण और यशवाले (प्रथमा विभक्ति) |
| गुणैः |
शम-दम आदि सद्गुणों से (तृतीया विभक्ति) |
| विशिष्टः |
सम्पन्न (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| परमऋषिः |
महर्षि विश्वामित्र (प्रथमा विभक्ति) |
| परमम् |
बहुत (द्वितीया विभक्ति) |
| जगाम |
प्राप्त हुए (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हर्षम् |
प्रसन्नता को (द्वितीया विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे अष्टादशः सर्गः॥१८॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१८॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| अष्टादशः |
अठारहवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥१८॥ |
॥१८॥ (सर्ग संख्या) |
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