🌿 सर्ग 15: ऋष्यशृंग द्वारा राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का आरम्भ, ब्रह्माजी का रावण के वध का उपाय ढूँढ़ निकालना तथा भगवान् विष्णु का देवताओं को आश्वासन देना
Rishyashringa begins the Putreshti Yajna for King Dasharatha, Brahma finds a way to kill Ravana, and Lord Vishnu assures the gods
कुल श्लोक: 34
मेधावी तु ततो ध्यात्वा स किञ्चिदिदमुत्तरम्।
लब्धसंज्ञस्ततस्तं तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत्॥
॥ 1.15.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महात्मा ऋष्यशृंग बड़े मेधावी और वेदोंके ज्ञाता थे। उन्होंने थोड़ी देर तक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्य का निश्चय किया। फिर ध्यानसे विरत हो वे राजा से इस प्रकार बोले-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मेधावी |
मेधावी / बुद्धिमान् ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| ध्यात्वा |
ध्यान लगाकर (क्त्वान्त अव्यय, पूर्वकालिक क्रिया) |
| सः |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति) |
| किञ्चित् |
थोड़ी देर (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तरम् |
भावी कर्तव्य को (द्वितीया विभक्ति) |
| लब्धसञ्ज्ञः |
ध्यान से विरत होकर (प्रथमा विभक्ति) |
| ततः |
फिर (अव्यय) |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| वेदज्ञः |
वेदों के ज्ञाता ने (प्रथमा विभक्ति) |
| नृपम् |
राजा से (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात्।
अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रैः सिद्धां विधानतः॥
॥ 1.15.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महाराज! मैं आपको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये अथर्ववेदके मन्त्रोंसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा। वेदोक्त विधिके अनुसार अनुष्ठान करनेपर वह यज्ञ अवश्य सफल होगा’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इष्टिम् |
इष्टि / यज्ञ को (द्वितीया विभक्ति) |
| ते |
आपके लिए (चतुर्थी विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| करिष्यामि |
करूँगा (कृ धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| पुत्रीयाम् |
पुत्रप्राप्ति के लिए विहित (द्वितीया विभक्ति) |
| पुत्रकारणात् |
पुत्र के कारण से / पुत्रप्राप्ति कराने के लिए (पञ्चमी विभक्ति) |
| अथर्वशिरसि |
अथर्ववेद में (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रोक्तैः |
कहे गए से (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| मन्त्रैः |
मन्त्रों से (तृतीया विभक्ति) |
| सिद्धाम् |
सफल होने वाली को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विधानतः |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
ततः प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात्।
जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा॥
॥ 1.15.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यह कहकर उन तेजस्वी ऋषिने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौत विधि के अनुसार अग्नि में आहुति डाली।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
यह कहकर (अव्यय) |
| प्राक्रमत् |
प्रारम्भ किया (प्र + क्रम्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| इष्टिम् |
इष्टि / यज्ञ को (द्वितीया विभक्ति) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| पुत्रीयाम् |
पुत्रप्राप्ति के लिए विहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुत्रकारणात् |
पुत्र के उद्देश्य से (पञ्चमी विभक्ति) |
| जुहाव |
आहुति डाली (हु धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अग्नौ |
अग्नि में (सप्तमी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| तेजस्वी |
तेजस्वी ऋषि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| मन्त्रदृष्टेन |
श्रौत विधि के अनुसार / मन्त्रों में दृष्ट (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कर्मणा |
कर्म द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।
भागप्रतिग्रहार्थं वै समवेता यथाविधि॥
॥ 1.15.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधि के अनुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिये उस यज्ञमें एकत्र हुए।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| देवाः |
देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सगन्धर्वाः |
गन्धर्वों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सिद्धाः |
सिद्ध (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| परमर्षयः |
महर्षिगण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भागप्रतिग्रहार्थम् |
भाग ग्रहण करने के लिए (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| समवेताः |
एकत्र हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| यथाविधि |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
ताः समेत्य यथान्यायं तस्मिन् सदसि देवताः।
अब्रुवँल्लोककर्तारं ब्रह्माणं वचनं ततः॥
॥ 1.15.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस यज्ञ-सभामें क्रमशः एकत्र होकर (दूसरोंकी दृष्टिसे अदृश्य रहते हुए) सब देवता लोककर्ता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| समेत्य |
एकत्र होकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| यथान्यायम् |
क्रमशः (अव्यय) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| सदसि |
सभा में (सप्तमी विभक्ति) |
| देवताः |
देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अब्रुवन् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| लोककर्तारम् |
लोकों के कर्ता को (द्वितीया विभक्ति) |
| ब्रह्माणम् |
ब्रह्मा से (द्वितीया विभक्ति) |
| वचनम् |
वचन को (द्वितीया विभक्ति) |
| ततः |
इस प्रकार (अव्यय) |
भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षसः।
सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं न शक्नुमः॥
॥ 1.15.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘भगवन्! रावण नामक राक्षस आपका कृपाप्रसाद पाकर अपने बलसे हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। हममें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने पराक्रमसे उसको दबा सकें।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भगवन् |
हे भगवन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| त्वत्प्रसादेन |
आपके प्रसाद के कारण (तृतीया विभक्ति) |
| रावणः |
रावण (प्रथमा विभक्ति) |
| नाम |
नाम से (अव्यय) |
| राक्षसः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्वान् |
सब को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| नः |
हमें (अस्मद्, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| बाधते |
कष्ट देता है (बाध् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वीर्यात् |
अपने बल से (पञ्चमी विभक्ति) |
| शासितुम् |
दबाने में (शास् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| तम् |
उसको (द्वितीया विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| शक्नुमः |
शक्त हैं (शक् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
त्वया तस्मै वरो दत्तः प्रीतेन भगवंस्तदा।
मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे॥
॥ 1.15.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘प्रभो! आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है। तबसे हमलोग उस वरका सदा समादर करते हुए उसके सारे अपराधोंको सहते चले आ रहे हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| त्वया |
आपके द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| तस्मै |
उसे (चतुर्थी विभक्ति) |
| वरः |
वर (प्रथमा विभक्ति) |
| दत्तः |
दिया गया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रीतेन |
प्रसन्न हुए के द्वारा (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| भगवन् |
हे भगवन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| मानयन्तः |
समादर करते हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| तम् |
उस वर का (द्वितीया विभक्ति) |
| नित्यम् |
सदा (अव्यय) |
| सर्वम् |
सारे (द्वितीया विभक्ति) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| क्षमामहे |
सहते हैं (क्षम् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
उद्वेजयति लोकांस्त्रीनुच्छ्रितान् द्वेष्टि दुर्मतिः।
शक्रं त्रिदशराजानं प्रधर्षयितुमिच्छति॥
॥ 1.15.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘उसने तीनों लोकोंके प्राणियोंका नाकोंदम कर रखा है। वह दुष्टात्मा जिनको कुछ ऊँची स्थितिमें देखता है, उन्हींके साथ द्वेष करने लगता है देवराज इन्द्रको परास्त करनेकी अभिलाषा रखता है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| उद्वेजयति |
नाकों दम करता है (उद् + विज्, प्रयोज्यार्थ, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| लोकान् |
लोकों के प्राणियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| त्रीन् |
तीनों (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| उच्छ्रितान् |
ऊँची स्थिति वालों से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| द्वेष्टि |
द्वेष करता है (द्विष् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दुर्मतिः |
दुष्टात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| शक्रम् |
इन्द्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| त्रिदशराजानम् |
देवराज को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रधर्षयितुम् |
परास्त करने की (प्र + धृष्, प्रयोज्यार्थ, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| इच्छति |
अभिलाषा रखता है (इष् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा।
अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहितः॥
॥ 1.15.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘आपके वरदानसे मोहित होकर वह इतना उद्दण्ड हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वो, असुरों तथा ब्राह्मणोंको पीड़ा देता और उनका अपमान करता फिरता है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋषीन् |
ऋषियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| यक्षान् |
यक्षों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सगन्धर्वान् |
गन्धर्वों सहित को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ब्राह्मणान् |
ब्राह्मणों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| असुरान् |
असुरों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| अतिक्रामति |
पीड़ा देता है / अपमान करता है (अति + क्रम्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दुर्धर्षः |
उद्दण्ड (प्रथमा विभक्ति) |
| वरदानेन |
वरदान से (तृतीया विभक्ति) |
| मोहितः |
मोहित होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
नैनं सूर्यः प्रतपति पार्श्वे वाति न मारुतः।
चलोर्मिमाली तं दृष्ट्वा समुद्रोऽपि न कम्पते॥
॥ 1.15.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा सकते। वायु उसके पास जोरसे नहीं चलती तथा जिसकी उत्ताल तरंगें सदा ऊपर-नीचे होती रहती हैं, वह समुद्र भी रावणको देखकर भयके मारे स्तब्ध-सा हो जाता है उसमें कम्पन नहीं होता।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| एनम् |
इसको (द्वितीया विभक्ति) |
| सूर्यः |
सूर्य (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रतपति |
ताप पहुँचाता है (प्र + तप्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पार्श्वे |
पास में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाति |
चलती है (वा धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| मारुतः |
वायु (प्रथमा विभक्ति) |
| चलोर्मिमाली |
चंचल तरंगों की माला वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| तम् |
उस रावण को (द्वितीया विभक्ति) |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| समुद्रः |
समुद्र (प्रथमा विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| कम्पते |
कम्पन करता है (कम्प् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
तन्महन्नो भयं तस्माद् राक्षसाद् घोरदर्शनात्।
वधार्थं तस्य भगवन्नुपायं कर्तुमर्हसि॥
॥ 1.15.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘वह राक्षस देखनेमें भी बड़ा भयंकर है। उससे हमें महान् भय प्राप्त हो रहा है; अतः भगवन्! उसके वधके लिये आपको कोई-न-कोई उपाय अवश्य करना चाहिये’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| महत् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| नः |
हमें (अस्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| भयम् |
भय (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्मात् |
उससे (पञ्चमी विभक्ति) |
| राक्षसात् |
राक्षस से (पञ्चमी विभक्ति) |
| घोरदर्शनात् |
भयंकर दर्शन वाले से (पञ्चमी विभक्ति) |
| वधार्थम् |
वध के लिए (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| भगवन् |
हे भगवन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| उपायम् |
उपाय (द्वितीया विभक्ति) |
| कर्तुम् |
करना (कृ धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
चाहिये (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
एवमुक्तः सुरैः सर्वैश्चिन्तयित्वा ततोऽब्रवीत्।
हन्तायं विदितस्तस्य वधोपायो दुरात्मनः॥
॥ 1.15.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले-‘देवताओ! लो, उस दुरात्माके वधका उपाय मेरी समझमें आ गया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहे जाने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुरैः |
देवताओं द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| सर्वैः |
समस्त के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| चिन्तयित्वा |
सोचकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हन्त |
लो (अव्यय, हर्ष/ध्यानाकर्षण में) |
| अयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| विदितः |
समझ में आ गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| वधोपायः |
वध का उपाय (प्रथमा विभक्ति) |
| दुरात्मनः |
दुरात्मा का (षष्ठी विभक्ति) |
तेन गन्धर्वयक्षाणां देवतानां च रक्षसाम्।
अवध्योऽस्मीति वागुक्ता तथेत्युक्तं च तन्मया॥
॥ 1.15.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उसने वर माँगते समय यह बात कही थी कि मैं गन्धर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसोंके हाथसे न मारा जाऊँ। मैंने भी ‘तथास्तु’ कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तेन |
उसने (तृतीया विभक्ति) |
| गन्धर्वयक्षाणाम् |
गन्धर्व और यक्षों के हाथ से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, तृतीया के अर्थ में) |
| देवतानाम् |
देवताओं के हाथ से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, तृतीया के अर्थ में) |
| च |
और (अव्यय) |
| रक्षसाम् |
राक्षसों के हाथ से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, तृतीया के अर्थ में) |
| अवध्यः |
न मारा जाने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्मि |
हूँ (अस् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| वाक् |
बात (प्रथमा विभक्ति) |
| उक्ता |
कही गई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तथा |
वैसे ही (अव्यय) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| उक्तम् |
कहा गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| मया |
मेरे द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
नाकीर्तयदवज्ञानात् तद् रक्षो मानुषांस्तदा।
तस्मात् स मानुषाद् वध्यो मृत्युरन्योऽस्य विद्यते॥
॥ 1.15.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘मनुष्योंको तो वह तुच्छ समझता था, इसलिये उनके प्रति अवहेलना होनेके कारण उनसे अवध्य होने का वरदान नहीं माँगा। इसलिये अब मनुष्यके हाथसे ही उसका वध होगा। मनुष्यके सिवा दूसरा कोई उसकी मृत्यु का कारण नहीं है’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अकीर्तयत् |
नहीं माँगा (कीर्तय् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अवज्ञानात् |
अवहेलना के कारण (पञ्चमी विभक्ति) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| रक्षः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति) |
| मानुषान् |
मनुष्यों के प्रति (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| तस्मात् |
इसलिये (पञ्चमी विभक्ति) |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| मानुषात् |
मनुष्य के हाथ से (पञ्चमी विभक्ति) |
| वध्यः |
वध के योग्य (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| मृत्युः |
मृत्यु का कारण (प्रथमा विभक्ति) |
| अन्यः |
दूसरा (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्य |
उसकी (षष्ठी विभक्ति) |
| विद्यते |
है (विद् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
एतच्छ्रुत्वा प्रियं वाक्यं ब्रह्मणा समुदाहृतम्।
देवा महर्षयः सर्वे प्रहृष्टास्तेऽभवंस्तदा॥
॥ 1.15.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ब्रह्माजीकी कही हुई यह प्रिय बात सुनकर उस समय समस्त देवता और महर्षि बड़े प्रसन्न हुए।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एतत् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| प्रियम् |
प्रिय (द्वितीया विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचन को (द्वितीया विभक्ति) |
| ब्रह्मणा |
ब्रह्मा द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| समुदाहृतम् |
कही हुई (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| देवाः |
देवता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| महर्षयः |
महर्षि (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
समस्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रहृष्टाः |
बड़े प्रसन्न हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अभवन् |
हुए (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युतिः।
शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा जगत्पतिः।
वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा॥
॥ 1.15.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भाँति गरुड़पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे। उनके शरीरपर पीताम्बर और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एतस्मिन् |
इसी (सप्तमी विभक्ति) |
| अन्तरे |
बीच में / समय में (सप्तमी विभक्ति) |
| विष्णुः |
विष्णु (प्रथमा विभक्ति) |
| उपयातः |
आ पहुँचे (उप + या, क्त प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| महाद्युतिः |
महान् तेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| शङ्खचक्रगदापाणिः |
शङ्ख, चक्र और गदा हाथ में धारण करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| पीतवासाः |
पीताम्बर धारण करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| जगत्पतिः |
जगत्पति ने (प्रथमा विभक्ति) |
| वैनतेयम् |
गरुड़ पर (द्वितीया विभक्ति) |
| समारुह्य |
सवार होकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| भास्करः |
सूर्य (प्रथमा विभक्ति) |
| तोयदम् |
मेघ पर (द्वितीया विभक्ति) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः।
ब्रह्मणा च समागत्य तत्र तस्थौ समाहितः॥
॥ 1.15.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनकी दोनों भुजाओंमें तपाये हुए सुवर्ण के बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजीसे मिलकर सावधानीके साथ सभामें विराजमान हो गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तप्तहाटककेयूरः |
तपाये हुए सुवर्ण के केयूर धारण करने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| वन्द्यमानः |
वन्दना किये जाते हुए (प्रथमा विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त) |
| सुरोत्तमैः |
श्रेष्ठ देवताओं द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| ब्रह्मणा |
ब्रह्मा से (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| समागत्य |
मिलकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| तस्थौ |
विराजमान हो गये (स्था धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| समाहितः |
सावधानी के साथ (प्रथमा विभक्ति) |
तमब्रुवन् सुराः सर्वे समभिष्टुत्य संनताः।
त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया॥
॥ 1.15.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब समस्त देवताओंने विनीत भावसे उनकी स्तुति करके कहा—’सर्वव्यापी परमेश्वर! हम तीनों लोकोंके हितकी कामनासे आपके ऊपर एक महान् कार्यका भार दे रहे हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उनसे (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रुवन् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सुराः |
देवताओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
समस्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| समभिष्टुत्य |
भलीभाँति स्तुति करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| संनताः |
विनीत भाव से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| त्वाम् |
आपके ऊपर (द्वितीया विभक्ति) |
| नियोक्ष्यामहे |
भार दे रहे हैं (नि + युज्, लृट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| विष्णो |
हे विष्णो! (सम्बोधन विभक्ति) |
| लोकानाम् |
लोकों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| हितकाम्यया |
हित की कामना से (तृतीया विभक्ति) |
राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो।
धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः।
अस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु च॥
॥ 1.15.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘प्रभो! अयोध्याके राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं। उनके तीन रानियाँ हैं जो ह्री, श्री और कीर्ति—इन तीन देवियोंके समान हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| राज्ञः |
राजा के (षष्ठी विभक्ति) |
| दशरथस्य |
दशरथ के (षष्ठी विभक्ति) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| अयोध्याधिपतेः |
अयोध्या के स्वामी के (षष्ठी विभक्ति) |
| विभो |
हे प्रभो! (सम्बोधन विभक्ति) |
| धर्मज्ञस्य |
धर्मज्ञ के (षष्ठी विभक्ति) |
| वदान्यस्य |
उदार के (षष्ठी विभक्ति) |
| महर्षिसमतेजसः |
महर्षियों के समान तेज वाले के (षष्ठी विभक्ति) |
| अस्य |
इनके (षष्ठी विभक्ति) |
| भार्यासु |
रानियों में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| तिसृषु |
तीन में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु |
ह्री, श्री और कीर्ति के समान में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम्।
तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम्।
अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम्॥
॥ 1.15.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
विष्णुदेव! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजाकी उन तीनों रानियोंके गर्भसे पुत्ररूपमें अवतार ग्रहण कीजिये। इस प्रकार मनुष्यरूपमें प्रकट होकर आप संसारके लिये प्रबल कण्टकरूप रावणको, जो देवताओंके लिये अवध्य है, समरभूमिमें मार डालिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विष्णो |
हे विष्णुदेव! (सम्बोधन विभक्ति) |
| पुत्रत्वम् |
पुत्रभाव को (द्वितीया विभक्ति) |
| आगच्छ |
ग्रहण कीजिये (आ + गम्, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| कृत्वा |
बनाकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| आत्मानम् |
अपने को (द्वितीया विभक्ति) |
| चतुर्विधम् |
चार प्रकार का (द्वितीया विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| मानुषः |
मनुष्य (प्रथमा विभक्ति) |
| भूत्वा |
होकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| प्रवृद्धम् |
प्रबल हुए को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| लोककण्टकम् |
संसार के कण्टक रूप को (द्वितीया विभक्ति) |
| अवध्यम् |
अवध्य को (द्वितीया विभक्ति) |
| दैवतैः |
देवताओं के लिए (तृतीया विभक्ति) |
| विष्णो |
हे विष्णो! (सम्बोधन विभक्ति) |
| समरे |
समरभूमि में (सप्तमी विभक्ति) |
| जहि |
मार डालिये (हन् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| रावणम् |
रावण को (द्वितीया विभक्ति) |
स हि देवान् सगन्धर्वान् सिद्धांश्च ऋषिसत्तमान्।
राक्षसो रावणो मूर्खो वीर्योद्रेकेण बाधते॥
॥ 1.15.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘वह मूर्ख राक्षस रावण अपने बढ़े हुए पराक्रमसे देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा श्रेष्ठ महर्षियोंको बहुत कष्ट दे रहा है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| देवान् |
देवताओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सगन्धर्वान् |
गन्धर्वों सहित को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सिद्धान् |
सिद्धों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| ऋषिसत्तमान् |
श्रेष्ठ ऋषियों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| राक्षसः |
राक्षस (प्रथमा विभक्ति) |
| रावणः |
रावण (प्रथमा विभक्ति) |
| मूर्खः |
मूर्ख (प्रथमा विभक्ति) |
| वीर्योद्रेकेण |
बढ़े हुए पराक्रम से (तृतीया विभक्ति) |
| बाधते |
कष्ट देता है (बाध् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ऋषयश्च ततस्तेन गन्धर्वाप्सरसस्तथा।
क्रीडन्तो नन्दनवने रौद्रेण विनिपातिताः॥
॥ 1.15.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘उस रौद्र निशाचरने ऋषियोंको तथा नन्दनवनमें क्रीड़ा करनेवाले गन्धर्वो और अप्सराओंको भी स्वर्गसे भूमिपर गिरा दिया है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋषयः |
ऋषि (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| ततः |
तब से (अव्यय) |
| तेन |
उस रौद्र निशाचर ने (तृतीया विभक्ति) |
| गन्धर्वाप्सरसः |
गन्धर्व और अप्सराएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| क्रीडन्तः |
क्रीड़ा करने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| नन्दनवने |
नन्दनवन में (सप्तमी विभक्ति) |
| रौद्रेण |
रौद्र निशाचर ने (तृतीया विभक्ति) |
| विनिपातिताः |
गिरा दिये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
वधार्थं वयमायातास्तस्य वै मुनिभिः सह।
सिद्धगन्धर्वयक्षाश्च ततस्त्वां शरणं गताः॥
॥ 1.15.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इसलिये मुनियोंसहित हम सब सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष तथा देवता उसके वधके लिये आपकी शरणमें आये हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वधार्थम् |
वध के लिए (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| वयम् |
हम सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| आयाताः |
आये हैं (आ + या, क्त प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| मुनिभिः |
मुनियों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| सह |
सहित (अव्यय) |
| सिद्धगन्धर्वयक्षाः |
सिद्ध, गन्धर्व और यक्ष (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| ततः |
इसलिये (अव्यय) |
| त्वाम् |
आपकी (द्वितीया विभक्ति) |
| शरणम् |
शरण को (द्वितीया विभक्ति) |
| गताः |
प्राप्त हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
त्वं गतिः परमा देव सर्वेषां नः परंतप।
वधाय देवशत्रूणां नृणां लोके मनः कुरु॥
॥ 1.15.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! आप ही हम सब लोगोंकी परमगति हैं, अतः इन देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये आप मनुष्यलोकमें अवतार लेनेका निश्चय कीजिये’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| गतिः |
गति (प्रथमा विभक्ति) |
| परमा |
परम (प्रथमा विभक्ति) |
| देव |
हे देव! (सम्बोधन विभक्ति) |
| सर्वेषाम् |
सब के लिए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| नः |
हम लोगों के लिए (अस्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| परन्तप |
हे शत्रुओं को संताप देने वाले! (सम्बोधन विभक्ति) |
| वधाय |
वध करने के लिए (चतुर्थी विभक्ति) |
| देवशत्रूणाम् |
देवद्रोहियों का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| नृणाम् |
मनुष्यों के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| लोके |
लोक में (सप्तमी विभक्ति) |
| मनः |
मन / निश्चय (द्वितीया विभक्ति) |
| कुरु |
कीजिये (कृ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
एवं स्तुतस्तु देवेशो विष्णुस्त्रिदशपुंगवः।
पितामहपुरोगांस्तान् सर्वलोकनमस्कृतः।
अब्रवीत् त्रिदशान् सर्वान् समेतान् धर्मसंहितान्॥
॥ 1.15.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वलोकवन्दित देवप्रवर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने वहाँ एकत्र हुए उन समस्त ब्रह्मा आदि धर्मपरायण देवताओंसे कहा-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| स्तुतः |
स्तुति किये जाने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| देवेशः |
देवाधिदेव ने (प्रथमा विभक्ति) |
| विष्णुः |
विष्णु ने (प्रथमा विभक्ति) |
| त्रिदशपुङ्गवः |
देवप्रवर ने (प्रथमा विभक्ति) |
| पितामहपुरोगान् |
ब्रह्मा आदि को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| तान् |
उन (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वलोकनमस्कृतः |
सर्वलोकवन्दित ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| त्रिदशान् |
देवताओं से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वान् |
समस्त से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| समेतान् |
एकत्र हुए से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| धर्मसंहितान् |
धर्मपरायण से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम्।
सपुत्रपौत्रं सामात्यं समित्रज्ञातिबान्धवम्।
हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम्।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।
वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम्॥
॥ 1.15.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘देवगण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भयको त्याग दो। मैं तुम्हारा हित करनेके लिये रावणको पुत्र, पौत्र, अमात्य, मन्त्री और बन्धुबान्धवोंसहित युद्धमें मार डालूँगा। देवताओं तथा ऋषियोंको भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षसका नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षांतक इस पृथ्वीका पालन करता हुआ मनुष्यलोकमें निवास करूँगा’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भयम् |
भय को (द्वितीया विभक्ति) |
| त्यजत |
त्याग दो (त्यज् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| वः |
तुम्हारा (युष्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| हितार्थम् |
हित करने के लिए (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| युधि |
युद्ध में (सप्तमी विभक्ति) |
| रावणम् |
रावण को (द्वितीया विभक्ति) |
| सपुत्रपौत्रम् |
पुत्र-पौत्रों सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| सामात्यम् |
अमात्यों सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| समित्रज्ञातिबान्धवम् |
मित्र, ज्ञाति और बान्धवों सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| हत्वा |
मारकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| क्रूरम् |
क्रूर को (द्वितीया विभक्ति) |
| दुराधर्षम् |
दुर्धर्ष को (द्वितीया विभक्ति) |
| देवर्षीणाम् |
देवताओं और ऋषियों को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| भयावहम् |
भय देने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| दशवर्षसहस्राणि |
दस हजार वर्ष (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, कालाध्वनोः) |
| दशवर्षशतानि |
दस सौ (एक हजार) वर्ष (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन, कालाध्वनोः) |
| च |
और (अव्यय) |
| वत्स्यामि |
निवास करूँगा (वस् धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| मानुषे |
मनुष्य के (सप्तमी विभक्ति) |
| लोके |
लोक में (सप्तमी विभक्ति) |
| पालयन् |
पालन करता हुआ (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| पृथिवीम् |
पृथ्वी का (द्वितीया विभक्ति) |
| इमाम् |
इस (द्वितीया विभक्ति) |
एवं दत्त्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान्।
मानुष्ये चिन्तयामास जन्मभूमिमथात्मनः॥
॥ 1.15.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
देवताओं को ऐसा वर देकर मनस्वी भगवान् विष्णु ने मनुष्यलोक में पहले अपनी जन्मभूमि के सम्बन्ध में विचार किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| दत्त्वा |
देकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| वरम् |
वर (द्वितीया विभक्ति) |
| देवः |
देव ने (प्रथमा विभक्ति) |
| देवानाम् |
देवताओं को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| विष्णुः |
विष्णु ने (प्रथमा विभक्ति) |
| आत्मवान् |
मनस्वी ने (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| मानुष्ये |
मनुष्यलोक में (सप्तमी विभक्ति) |
| चिन्तयामास |
विचार किया (चिन्त् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| जन्मभूमिम् |
जन्मभूमि के सम्बन्ध में (द्वितीया विभक्ति) |
| अथ |
पहले (अव्यय) |
| आत्मनः |
अपनी (षष्ठी विभक्ति) |
ततः पद्मपलाशाक्षः कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम्।
पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम्॥
॥ 1.15.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसके बाद कमलनयन श्रीहरि ने अपने को चार स्वरूपों में प्रकट करके राजा दशरथ को पिता बनाने का निश्चय किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
इसके बाद (अव्यय) |
| पद्मपलाशाक्षः |
कमलनयन श्रीहरि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| कृत्वा |
प्रकट करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| आत्मानम् |
अपने को (द्वितीया विभक्ति) |
| चतुर्विधम् |
चार स्वरूपों में (द्वितीया विभक्ति) |
| पितरम् |
पिता के रूप में (द्वितीया विभक्ति) |
| रोचयामास |
निश्चय किया (रुच् धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| दशरथम् |
दशरथ को (द्वितीया विभक्ति) |
| नृपम् |
राजा को (द्वितीया विभक्ति) |
ततो देवर्षिगन्धर्वाः सरुद्राः साप्सरोगणाः।
स्तुतिभिर्दिव्यरूपाभिस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम्॥
॥ 1.15.32 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र तथा अप्सराओंने दिव्य स्तुतियोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनका स्तवन किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| देवर्षिगन्धर्वाः |
देवता, ऋषि और गन्धर्व (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सरुद्राः |
रुद्रों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| साप्सरोगणाः |
अप्सराओं के समूहों सहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्तुतिभिः |
स्तुतियों से (तृतीया विभक्ति) |
| दिव्यरूपाभिः |
दिव्य रूप वाली से (तृतीया विभक्ति) |
| तुष्टुवुः |
स्तवन किया (स्तु धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मधुसूदनम् |
मधुसूदन का (द्वितीया विभक्ति) |
तमुद्धतं रावणमुग्रतेजसं प्रवृद्धदर्पं त्रिदशेश्वरद्विषम्।
विरावणं साधुतपस्विकण्टकं तपस्विनामुद्धर तं भयावहम्॥
॥ 1.15.33 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वे कहने लगे—’प्रभो! रावण बड़ा उद्दण्ड है। उसका तेज अत्यन्त उग्र और घमण्ड बहुत बढ़ा-चढ़ा है। वह देवराज इन्द्रसे सदा द्वेष रखता है। तीनों लोकोंको रुलाता है, साधुओं और तपस्वी जनोंके लिये तो वह बहुत बड़ा कण्टक है; अतः तापसों को भय देनेवाले उस भयानक राक्षस की आप जड़ उखाड़ डालिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| उद्धतम् |
उद्दण्ड को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| रावणम् |
रावण को (द्वितीया विभक्ति) |
| उग्रतेजसम् |
उग्र तेज वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रवृद्धदर्पम् |
बढ़े-चढ़े घमण्ड वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| त्रिदशेश्वरद्विषम् |
देवराज इन्द्र से द्वेष रखने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| विरावणम् |
रुलाने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| साधुतपस्विकण्टकम् |
साधुओं और तपस्वियों के लिए कण्टक रूप को (द्वितीया विभक्ति) |
| तपस्विनाम् |
तापसों को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| उद्धर |
जड़ उखाड़ डालिये (उद् + हृ, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| भयावहम् |
भयानक को (द्वितीया विभक्ति) |
तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं विरावणं रावणमुग्रपौरुषम्।
स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम्॥
॥ 1.15.34 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘उपेन्द्र! सारे जगत् को रुलानेवाले उस उग्र पराक्रमी रावणको सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट करके अपनी स्वाभाविक निश्चिन्तताके साथ अपने ही द्वारा सुरक्षित उस चिरन्तन वैकुण्ठधाममें आ जाइये; जिसे राग-द्वेष आदि दोषोंका कलुष कभी छू नहीं पाता है’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| हत्वा |
नष्ट करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| सबलम् |
सेना सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| सबान्धवम् |
बान्धवों सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| विरावणम् |
रुलाने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| रावणम् |
रावण को (द्वितीया विभक्ति) |
| उग्रपौरुषम् |
उग्र पराक्रमी को (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वर्लोकम् |
स्वर्गलोक / वैकुण्ठधाम को (द्वितीया विभक्ति) |
| आगच्छ |
आ जाइये (आ + गम्, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| गतज्वरः |
निश्चिन्तता को प्राप्त होकर (प्रथमा विभक्ति) |
| चिरम् |
चिरन्तन (द्वितीया विभक्ति का अव्ययीभाव/क्रियाविशेषण) |
| सुरेन्द्रगुप्तम् |
सुरेन्द्र द्वारा सुरक्षित को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| गतदोषकल्मषम् |
दोषों का कलुष जहाँ नहीं पहुँचता उसको (द्वितीया विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥१५॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१५॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| पञ्चदशः |
पंद्रहवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥१५॥ |
॥१५॥ (सर्ग संख्या) |
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