🌿 सर्ग 14: महाराज दशरथ के द्वारा अश्वमेध यज्ञ का सांगोपांग अनुष्ठान
The complete performance of the Ashwamedha Yajna by King Dasharatha
कुल श्लोक: 60
अथ संवत्सरे पूर्णे तस्मिन् प्राप्ते तुरंगमे।
सरय्वाश्चोत्तरे तीरे राज्ञो यज्ञोऽभ्यवर्तत॥
॥ 1.14.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इधर वर्ष पूरा होनेपर यज्ञसम्बन्धी अश्व भूमण्डलमें भ्रमण करके लौट अया। फिर सरयू नदीके उत्तर तटपर राजाका यज्ञ आरम्भ हुआ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अथ |
तदनन्तर / फिर (अव्यय) |
| संवत्सरे |
वर्ष के (सप्तमी विभक्ति, सति सप्तमी) |
| पूर्णे |
पूर्ण होने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| प्राप्ते |
लौट आने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तुरङ्गमे |
यज्ञ का घोड़ा (सप्तमी विभक्ति) |
| सरय्वाः |
सरयू नदी के (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| उत्तरे |
उत्तर (सप्तमी विभक्ति) |
| तीरे |
तट पर (सप्तमी विभक्ति) |
| राज्ञः |
राजा दशरथ का (षष्ठी विभक्ति) |
| यज्ञः |
यज्ञ (प्रथमा विभक्ति) |
| अभ्यवर्तत |
आरम्भ हुआ (अभि + अव + वृत्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य कर्म चक्रुर्द्विजर्षभाः।
अश्वमेधे महायज्ञे राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः॥
॥ 1.14.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महामनस्वी राजा दशरथके उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऋष्यशृंगको आगे करके श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञसम्बन्धी कर्म करने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋष्यशृङ्गम् |
ऋष्यशृंग को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरस्कृत्य |
आगे करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| कर्म |
कर्म को (द्वितीया विभक्ति) |
| चक्रुः |
करने लगे (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| द्विजर्षभाः |
श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अश्वमेधे |
अश्वमेध नामक (सप्तमी विभक्ति) |
| महायज्ञे |
महायज्ञ में (सप्तमी विभक्ति) |
| राज्ञः |
राजा के (षष्ठी विभक्ति) |
| अस्य |
इस (षष्ठी विभक्ति) |
| सुमहात्मनः |
महामनस्वी के (षष्ठी विभक्ति) |
कर्म कुर्वन्ति विधिवद् याजका वेदपारगाः।
यथाविधि यथान्यायं परिक्रामन्ति शास्त्रतः॥
॥ 1.14.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यज्ञ करानेवाले सभी ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् थे; अतः वे न्याय तथा विधिके अनुसार सब कर्मोंका उचित रीतिसे सम्पादन करते थे और शास्त्रके अनुसार किस क्रमसे किस समय कौन-सी क्रिया करनी चाहिये, इसको स्मरण रखते हुए प्रत्येक कर्ममें प्रवृत्त होते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कर्म |
कर्म को (द्वितीया विभक्ति) |
| कुर्वन्ति |
करते थे (कृ धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| विधिवत् |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| याजकाः |
यज्ञ कराने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वेदपारगाः |
वेदों के पारंगत (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यथाविधि |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| यथान्यायम् |
न्याय के अनुसार (अव्यय) |
| परिक्रामन्ति |
प्रवृत्त होते थे (परि + क्रम्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| शास्त्रतः |
शास्त्र के अनुसार (अव्यय) |
प्रवर्ग्यं शास्त्रतः कृत्वा तथैवोपसदं द्विजाः।
चक्रुश्च विधिवत् सर्वमधिकं कर्म शास्त्रतः॥
॥ 1.14.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ब्राह्मणोंने प्रवर्दी (अश्वमेधके अंगभूत कर्मविशेष) का शास्त्र (विधि, मीमांसा और कल्पसूत्र) के अनुसार सम्पादन करके उपसद नामक इष्टिविशेषका भी शास्त्रके अनुसार ही अनुष्ठान किया। तत्पश्चात् शास्त्रीय उपदेशसे अधिक जो अतिदेशतः प्राप्त कर्म है, उस सबका भी विधिवत् सम्पादन किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रवर्ग्यम् |
प्रवर्ग्य (अश्वमेध का अंगभूत कर्मविशेष) को (द्वितीया विभक्ति) |
| शास्त्रतः |
शास्त्र के अनुसार (अव्यय) |
| कृत्वा |
करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| उपसदम् |
उपसद् नामक इष्टि को (द्वितीया विभक्ति) |
| द्विजाः |
ब्राह्मणों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चक्रुः |
किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| विधिवत् |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| सर्वम् |
सब (द्वितीया विभक्ति) |
| अधिकम् |
अतिदेशतः प्राप्त / अतिरिक्त (द्वितीया विभक्ति) |
| कर्म |
कर्म को (द्वितीया विभक्ति) |
| शास्त्रतः |
शास्त्र के अनुसार (अव्यय) |
अभिपूज्य तदा हृष्टाः सर्वे चक्रुर्यथाविधि।
प्रातःसवनपूर्वाणि कर्माणि मुनिपुंगवाः॥
॥ 1.14.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर तत्तत् कर्मोके अंगभूत देवताओंका पूजन करके हर्षमें भरे हुए उन सभी मुनिवरोंने विधिपूर्वक प्रातःसवन आदि (अर्थात् प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन तथा तृतीय सवन) कर्म किये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अभिपूज्य |
पूजन करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| तदा |
तदनन्तर (अव्यय) |
| हृष्टाः |
हर्ष में भरे हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चक्रुः |
किये (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यथाविधि |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| प्रातःसवनपूर्वाणि |
प्रातःसवन आदि (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| कर्माणि |
कर्मों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| मुनिपुङ्गवाः |
मुनिवरों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
ऐन्द्रश्च विधिवद् दत्तो राजा चाभिषुतोऽनघः।
माध्यन्दिनं च सवनं प्रावर्तत यथाक्रमम्॥
॥ 1.14.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इन्द्रदेवताको विधिपूर्वक हविष्यका भाग अर्पित किया गया। पापनिवर्तक राजा सोम (सोमलता) का रस निकाला गया। फिर क्रमशः माध्यन्दिनसवनका कार्य प्रारम्भ हुआ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऐन्द्रः |
इन्द्र देवता का भाग (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| विधिवत् |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| दत्तः |
दिया गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| राजा |
राजा सोम (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अभिषुतः |
रस निकाला गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अनघः |
पापनिवर्तक (प्रथमा विभक्ति) |
| माध्यन्दिनम् |
माध्यन्दिन का (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| सवनम् |
सवन कर्म (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रावर्तत |
प्रारम्भ हुआ (प्र + वृत्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यथाक्रमम् |
क्रमशः (अव्यय) |
तृतीयसवनं चैव राज्ञोऽस्य सुमहात्मनः।
चक्रुस्ते शास्त्रतो दृष्ट्वा यथा ब्राह्मणपुंगवाः॥
॥ 1.14.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने शास्त्रसे देखभालकर मनस्वी राजा दशरथके तृतीय सवनकर्मका भी विधिवत् सम्पादन किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तृतीयसवनम् |
तृतीय सवन कर्म को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
भी (अव्यय) |
| राज्ञः |
राजा के (षष्ठी विभक्ति) |
| अस्य |
इस (षष्ठी विभक्ति) |
| सुमहात्मनः |
महामनस्वी के (षष्ठी विभक्ति) |
| चक्रुः |
किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| ते |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शास्त्रतः |
शास्त्र से (अव्यय) |
| दृष्ट्वा |
देखभालकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| ब्राह्मणपुङ्गवाः |
श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
आह्वयाञ्चक्रिरे तत्र शक्रादीन्विबुधोत्तमान्।
ऋष्यशृंगादयो मन्त्रैः शिक्षाक्षरसमन्वितैः॥
॥ 1.14.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ऋष्यशृंग आदि महर्षियोंने वहाँ अभ्यासकालमें सीखे गये अक्षरोंसे युक्त-स्वर और वर्णसे सम्पन्न मन्त्रोंद्वारा इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंका आवाहन किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| आह्वयाञ्चक्रिरे |
आवाहन किया (आ + ह्वे, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| शक्रादीन् |
इन्द्र आदि को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| विबुधोत्तमान् |
श्रेष्ठ देवताओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋष्यशृङ्गादयः |
ऋष्यशृंग आदि ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मन्त्रैः |
मन्त्रों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| शिक्षाक्षरसमन्वितैः |
शिक्षा (उच्चारण विज्ञान) के अनुसार अक्षरों से युक्त (तृतीया विभक्ति) |
गीतिभिर्मधुरैः स्निग्धैर्मन्त्राह्वानैर्यथार्हतः।
होतारो ददुरावाह्य हविर्भागान् दिवौकसाम्॥
॥ 1.14.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
मधुर एवं मनोरम सामगानके लयमें गाये हुए आह्वान-मन्त्रोंद्वारा देवताओंका आवाहन करके होताओं ने उन्हें उनके योग्य हविष्यके भाग समर्पित किये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गीतिभिः |
गीतियों से / गाये हुए (तृतीया विभक्ति) |
| मधुरैः |
मधुर से (तृतीया विभक्ति) |
| स्निग्धैः |
मनोरम से (तृतीया विभक्ति) |
| मन्त्राह्वानैः |
आह्वान मन्त्रों से (तृतीया विभक्ति) |
| यथार्हतः |
योग्यता के अनुसार (अव्यय) |
| होतारः |
होताओं ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ददुः |
दिये (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| आवाह्य |
आवाहन करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| हविर्भागान् |
हविष्य के भागों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| दिवौकसाम् |
देवताओं के लिए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
न चाहुतमभूत् तत्र स्खलितं वा न किंचन।
दृश्यते ब्रह्मवत् सर्वं क्षेमयुक्तं हि चक्रिरे॥
॥ 1.14.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस यज्ञमें कोई अयोग्य अथवा विपरीत आहुति नहीं पड़ी। कहीं कोई भूल नहीं हुईअनजानमें भी कोई कर्म छूटने नहीं पाया; क्योंकि वहाँ सारा कर्म मन्त्रोच्चारण-पूर्वक सम्पन्न होता दिखायी देता था। महर्षियोंने सब कर्म क्षेमयुक्त एवं निर्विघ्न परिपूर्ण किये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अहुतम् |
अयोग्य या विपरीत आहुति (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अभूत् |
हुई (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| स्खलितम् |
भूल / स्खलन (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वा |
या (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| किञ्चन |
कुछ भी (प्रथमा विभक्ति) |
| दृश्यते |
दिखायी देता था (दृश् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ब्रह्मवत् |
मन्त्रोच्चारण-पूर्वक (अव्यय) |
| सर्वम् |
सारा (प्रथमा विभक्ति) |
| क्षेमयुक्तम् |
क्षेमयुक्त / निर्विघ्न (द्वितीया विभक्ति/क्रियाविशेषण) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| चक्रिरे |
किये (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
न तेष्वहःसु श्रान्तो वा क्षुधितो वा न दृश्यते।
नाविद्वान् ब्राह्मणः कश्चिन्नाशतानुचरस्तथा॥
॥ 1.14.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यज्ञके दिनोंमें कोई भी ऋत्विज् थका-माँदा या भूखा-प्यासा नहीं दिखायी देता था। उसमें कोई भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था, जो विद्वान् न हो अथवा जिसके सौसे कम शिष्य या सेवक रहे हों।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| तेषु |
उन (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| अहःसु |
दिनों में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| श्रान्तः |
थका-माँदा (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वा |
या (अव्यय) |
| क्षुधितः |
भूखा-प्यासा (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वा |
या (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| दृश्यते |
दिखायी देता था (दृश् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अविद्वान् |
अज्ञानी (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्राह्मणः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति) |
| कश्चित् |
कोई भी (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अशतानुचरः |
सौ से कम शिष्य या सेवक वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
ब्राह्मणा भुञ्जते नित्यं नाथवन्तश्च भुञ्जते।
तापसा भुञ्जते चापि श्रमणाश्चैव भुञ्जते॥
॥ 1.14.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस यज्ञमें प्रतिदिन ब्राह्मण भोजन करते थे (क्षत्रिय और वैश्य भी भोजन पाते थे) तथा शूद्रोंको भी भोजन उपलब्ध होता था। तापस और श्रमण भी भोजन करते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्राह्मणाः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भुञ्जते |
भोजन करते थे (भुज् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| नित्यम् |
प्रतिदिन (अव्यय) |
| नाथवन्तः |
क्षत्रिय और वैश्य / शूद्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| भुञ्जते |
भोजन करते थे (भुज् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तापसाः |
तापस (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भुञ्जते |
भोजन करते थे (भुज् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| श्रमणाः |
श्रमण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| भुञ्जते |
भोजन करते थे (भुज् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
वृद्धाश्च व्याधिताश्चैव स्त्रीबालाश्च तथैव च।
अनिशं भुञ्जमानानां न तृप्तिरुपलभ्यते॥
॥ 1.14.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
बूढ़े, रोगी, स्त्रियाँ तथा बच्चे भी यथेष्ट भोजन पाते थे। भोजन इतना स्वादिष्ट होता था कि निरन्तर खाते रहनेपर भी किसीका मन नहीं भरता था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वृद्धाः |
बूढ़े (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| व्याधिताः |
रोगी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| स्त्रीबालाः |
स्त्रियाँ और बच्चे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अनिशम् |
निरन्तर (अव्यय) |
| भुञ्जमानानाम् |
खाते रहने वालों की (शानच् प्रत्ययान्त, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| तृप्तिः |
तृप्ति / मन भरना (प्रथमा विभक्ति) |
| उपलभ्यते |
होती थी (उप + लभ्, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
दीयतां दीयतामन्नं वासांसि विविधानि च।
इति संचोदितास्तत्र तथा चक्रुरनेकशः॥
॥ 1.14.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘अन्न दो, नाना प्रकारके वस्त्र दो’ अधिकारियोंकी ऐसी आज्ञा पाकर कार्यकर्ता लोग बारम्बार वैसा ही करते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दीयताम् |
दो (दा धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दीयताम् |
दो (दा धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अन्नम् |
अन्न (प्रथमा विभक्ति) |
| वासांसि |
वस्त्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विविधानि |
नाना प्रकार के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| सञ्चोदिताः |
आज्ञा पाकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| तथा |
वैसा ही (अव्यय) |
| चक्रुः |
करते थे (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| अनेकशः |
बारम्बार (अव्यय) |
अन्नकूटाश्च दृश्यन्ते बहवः पर्वतोपमाः।
दिवसे दिवसे तत्र सिद्धस्य विधिवत् तदा॥
॥ 1.14.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वहाँ प्रतिदिन विधिवत् पके हुए अन्नके बहुतसे पर्वतों-जैसे ढेर दिखायी देते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अन्नकूटाः |
अन्न के ढेर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| दृश्यन्ते |
दिखायी देते थे (दृश् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| बहवः |
बहुत से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पर्वतोपमाः |
पर्वतों के समान (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| दिवसे दिवसे |
प्रतिदिन (सप्तमी विभक्ति, वीप्सा) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| सिद्धस्य |
पके हुए का (षष्ठी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विधिवत् |
विधिपूर्वक (अव्यय) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
नानादेशादनुप्राप्ताः पुरुषाः स्त्रीगणास्तथा।
अन्नपानैः सुविहितास्तस्मिन् यज्ञे महात्मनः॥
॥ 1.14.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
महामनस्वी राजा दशरथके उस यज्ञमें नाना देशोंसे आये हुए स्त्री-पुरुष अन्न-पानद्वारा भलीभाँति तृप्त किये गये थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| नानादेशात् |
नाना देशों से (पञ्चमी विभक्ति) |
| अनुप्राप्ताः |
आये हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| पुरुषाः |
पुरुष (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्त्रीगणाः |
स्त्रियों के समूह (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| अन्नपानैः |
अन्न और पान से (तृतीया विभक्ति) |
| सुविहिताः |
भलीभाँति तृप्त किये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| यज्ञे |
यज्ञ में (सप्तमी विभक्ति) |
| महात्मनः |
महामनस्वी राजा दशरथ के (षष्ठी विभक्ति) |
अन्नं हि विधिवत्स्वादु प्रशंसन्ति द्विजर्षभाः।
अहो तृप्ताः स्म भद्रं ते इति शुश्राव राघवः॥
॥ 1.14.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
श्रेष्ठ ब्राह्मण ‘भोजन विधिवत् बनाया गया है। बहुत स्वादिष्ट है’—ऐसा कहकर अन्नकी प्रशंसा करते थे। भोजन करके उठे हुए लोगोंके मुखसे राजा सदा यही सुनते थे कि ‘हमलोग खूब तृप्त हुए। आपका कल्याण हो’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अन्नम् |
अन्न की (द्वितीया विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| विधिवत् |
विधिवत् (अव्यय) |
| स्वादु |
स्वादिष्ट (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रशंसन्ति |
प्रशंसा करते थे (प्र + शंस्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| द्विजर्षभाः |
श्रेष्ठ ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अहो |
अहो (आश्चर्यसूचक अव्यय) |
| तृप्ताः |
तृप्त हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्म |
हैं (अतीतकाल सूचक अव्यय) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| शुश्राव |
सुनते थे (श्रु धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राघवः |
राजा दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
स्वलंकृताश्च पुरुषा ब्राह्मणान् पर्यवेषयन्।
उपासन्ते च तानन्ये सुमृष्टमणिकुण्डलाः॥
॥ 1.14.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत हुए पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे और उन लोगोंकी जो दूसरे लोग सहायता करते थे, उन्होंने भी विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण कर रखे थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| स्वलङ्कृताः |
अच्छी तरह अलंकृत हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| पुरुषाः |
पुरुष (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ब्राह्मणान् |
ब्राह्मणों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| पर्यवेषयन् |
भोजन परोसते थे (परि + अव + विष्, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| उपासन्ते |
सहायता करते थे (उप + आस्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| तान् |
उनकी (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अन्ये |
दूसरे लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सुमृष्टमणिकुण्डलाः |
विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
कर्मान्तरे तदा विप्रा हेतुवादान् बहूनपि।
प्राहुः सुवाग्मिनो धीराः परस्परजिगीषया॥
॥ 1.14.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
एक सवन समाप्त करके दूसरे सवनके आरम्भ होनेसे पूर्व जो अवकाश मिलता था, उसमें उत्तम वक्ता धीर ब्राह्मण एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे बहुतेरे युक्तिवाद उपस्थित करते हुए शास्त्रार्थ करते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कर्मान्तरे |
कर्म के अन्तराल / अवकाश में (सप्तमी विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| विप्राः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| हेतुवादान् |
युक्तिवादों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| बहून् |
बहुतेरे (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| प्राहुः |
उपस्थित करते हुए / कहते थे (प्र + ब्रू, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सुवाग्मिनः |
उत्तम वक्ता (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| धीराः |
धीर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| परस्परजिगीषया |
एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से (तृतीया विभक्ति) |
दिवसे दिवसे तत्र संस्तरे कुशला द्विजाः।
सर्वकर्माणि चक्रुस्ते यथाशास्त्रं प्रचोदिताः॥
॥ 1.14.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस यज्ञमें नियुक्त हुए कर्मकुशल ब्राह्मण प्रतिदिन शास्त्रके अनुसार सब कार्योंका सम्पादन करते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दिवसे दिवसे |
प्रतिदिन (सप्तमी विभक्ति, वीप्सा) |
| तत्र |
उस यज्ञ में (अव्यय) |
| संस्तरे |
यज्ञ में नियुक्त (सप्तमी विभक्ति) |
| कुशलाः |
कर्मकुशल (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| द्विजाः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वकर्माणि |
सब कार्यों का (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| चक्रुः |
सम्पादन करते थे (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यथाशास्त्रम् |
शास्त्र के अनुसार (अव्यय) |
| प्रचोदिताः |
प्रेरित होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
नाषडंगविदत्रासीन्नाव्रतो नाबहुश्रुतः।
सदस्यास्तस्य वै राज्ञो नावादकुशलो द्विजः॥
॥ 1.14.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजाके उस यज्ञमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो व्याकरण आदि छहों अंगोंका ज्ञाता न हो, जिसने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन न किया हो तथा जो बहुश्रुत न हो। वहाँ कोई ऐसा द्विज नहीं था, जो वाद-विवादमें कुशल न हो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अषडङ्गवित् |
छहों अंगों का ज्ञाता न होने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| अत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| आसीत् |
था (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अव्रतः |
व्रतहीन (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अबहुश्रुतः |
बहुश्रुत न होने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| सदस्याः |
सदस्य (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| राज्ञः |
राजा के (षष्ठी विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अवादकुशलः |
वाद-विवाद में कुशल न होने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| द्विजः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति) |
प्राप्ते यूपोच्छ्रये तस्मिन् षड् बैल्वाः खादिरास्तथा।
तावन्तो बिल्वसहिताः पर्णिनश्च तथा परे॥
॥ 1.14.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
जब यूप खड़ा करनेका समय आया, तब बेलकी लकड़ी के छः यूप गाड़े गये। उतने ही खैर के यूप खड़े किये गये तथा पलाशके भी उतने ही यूप थे, जो बिल्वनिर्मित यूपोंके साथ खड़े किये गये थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्राप्ते |
आने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| यूपोच्छ्रये |
यूप खड़ा करने के समय (सप्तमी विभक्ति) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| षड् |
छः (प्रथमा विभक्ति) |
| बैल्वाः |
बेल की लकड़ी के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| खादिराः |
खैर की लकड़ी के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| तावन्तः |
उतने ही (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| बिल्वसहिताः |
बिल्वनिर्मित यूपों के साथ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पर्णिनः |
पलाश के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| परे |
दूसरे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
श्लेष्मातकमयो दिष्टो देवदारुमयस्तथा।
द्वावेव तत्र विहितौ बाहुव्यस्तपरिग्रहौ॥
॥ 1.14.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
बहेड़े के वृक्षका एक यूप अश्वमेध यज्ञके लिये विहित है। देवदारुके बने हुए यूपका भी विधान है; परंतु उसकी संख्या न एक है न छः । देवदारुके दो ही यूप विहित हैं। दोनों बाँहें फैला देनेपर जितनी दूरी होती है, उतनी ही दूरपर वे दोनों स्थापित किये गये थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्लेष्मातकमयः |
बहेड़े के वृक्ष का बना हुआ (प्रथमा विभक्ति) |
| दिष्टः |
विहित है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| देवदारुमयः |
देवदारु का बना हुआ (प्रथमा विभक्ति) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| द्वौ |
दो (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| विहितौ |
विहित हैं (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| बाहुव्यस्तपरिग्रहौ |
बाँहें फैलाने पर जितनी दूरी हो, उतनी दूरी पर स्थित (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
कारिताः सर्व एवैते शास्त्रज्ञैर्यज्ञकोविदैः।
शोभार्थं तस्य यज्ञस्य काञ्चनालंकृता भवन्॥
॥ 1.14.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यज्ञकुशल शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंने ही इन सब यूपोंका निर्माण कराया था। उस यज्ञकी शोभा बढ़ानेके लिये उन सबमें सोमा जड़ा गया था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कारिताः |
निर्माण कराये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त, प्रयोज्यार्थ) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| एते |
ये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शास्त्रज्ञैः |
शास्त्रज्ञों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| यज्ञकोविदैः |
यज्ञकुशलों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| शोभार्थम् |
शोभा के लिए (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| तस्य |
उस (षष्ठी विभक्ति) |
| यज्ञस्य |
यज्ञ की (षष्ठी विभक्ति) |
| काञ्चनालङ्कृताः |
सोने से अलंकृत (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| भवन् |
थे (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
एकविंशतियूपास्ते एकविंशत्यरत्नयः।
वासोभिरेकविंशद्भिरेकैकं समलंकृताः॥
॥ 1.14.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
पूर्वोक्त इक्कीस यूप इक्कीस-इक्कीस अरत्नि (पाँचसौ चार अंगुल) ऊँचे बनाये गये थे। उन सबको पृथक्-पृथक् इक्कीस कपड़ोंसे अलंकृत किया गया था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एकविंशतियूपाः |
इक्कीस यूप (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| एकविंशत्यरत्नयः |
इक्कीस-इक्कीस अरत्नि ऊँचे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वासोभिः |
वस्त्रों से (तृतीया विभक्ति) |
| एकविंशद्भिः |
इक्कीस से (तृतीया विभक्ति) |
| एकैकम् |
पृथक्-पृथक् (अव्यय) |
| समलङ्कृताः |
भलीभाँति अलंकृत किये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
विन्यस्ता विधिवत् सर्वे शिल्पिभिः सुकृता दृढाः।
अष्टास्रयः सर्व एव श्लक्ष्णरूपसमन्विताः॥
॥ 1.14.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
कारीगरोंद्वारा अच्छी तरह बनाये गये वे सभी सुदृढ़ यूप विधिपूर्वक स्थापित किये गये थे। वे सब-के-सब आठ कोणोंसे सुशोभित थे। उनकी आकृति सुन्दर एवं चिकनी थी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| विन्यस्ताः |
स्थापित किये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| विधिवत् |
विधिपूर्वक (अव्यय) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शिल्पिभिः |
कारीगरों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| सुकृताः |
अच्छी तरह बनाये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| दृढाः |
सुदृढ़ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अष्टास्रयः |
आठ कोणों से युक्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सब-के-सब (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| श्लक्ष्णरूपसमन्विताः |
चिकनी आकृति से युक्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
आच्छादितास्ते वासोभिः पुष्पैर्गन्धैश्च पूजिताः।
सप्तर्षयो दीप्तिमन्तो विराजन्ते यथा दिवि॥
॥ 1.14.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उन्हें वस्त्रोंसे ढक दिया गया था और पुष्पचन्दनसे उनकी पूजा की गयी थी। जैसे आकाशमें तेजस्वी सप्तर्षियोंकी शोभा होती है, उसी प्रकार यज्ञमण्डपमें वे दीप्तिमान् यूप सुशोभित होते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| आच्छादिताः |
ढके हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वासोभिः |
वस्त्रों से (तृतीया विभक्ति) |
| पुष्पैः |
पुष्पों से (तृतीया विभक्ति) |
| गन्धैः |
चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| पूजिताः |
पूजित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सप्तर्षयः |
सप्तर्षि (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| दीप्तिमन्तः |
तेजस्वी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| विराजन्ते |
सुशोभित होते हैं (वि + राज्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| दिवि |
आकाश में (सप्तमी विभक्ति) |
इष्टकाश्च यथान्यायं कारिताश्च प्रमाणतः।
चितोऽग्निर्ब्राह्मणैस्तत्र कुशलैः शिल्पकर्मणि॥
॥ 1.14.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
सूत्रग्रन्थों में बताये अनुसार ठीक मापसे ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उन ईंटोंके द्वारा यज्ञसम्बन्धी शिल्पिकर्म में कुशल ब्राह्मणोंने अग्निका चयन किया था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इष्टकाः |
ईंटें (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| यथान्यायम् |
नियम के अनुसार (अव्यय) |
| कारिताः |
तैयार करायी गयीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त, प्रयोज्यार्थ) |
| च |
और (अव्यय) |
| प्रमाणतः |
ठीक माप से (अव्यय) |
| चितः |
चयन किया गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अग्निः |
अग्नि (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्राह्मणैः |
ब्राह्मणों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| कुशलैः |
कुशल के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| शिल्पकर्मणि |
शिल्पकर्म में (सप्तमी विभक्ति) |
स चित्यो राजसिंहस्य संचितः कुशलैर्द्विजैः।
गरुडो रुक्मपक्षो वै त्रिगुणोऽष्टादशात्मकः॥
॥ 1.14.29 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजसिंह महाराज दशरथके यज्ञमें चयनद्वारा सम्पादित अग्निकी कर्मकाण्डकुशल ब्राह्मणोंद्वारा शास्त्रविधिके अनुसार स्थापना की गयी। उस अग्निकी आकृति दोनों पंख और पुच्छ फैलाकर नीचे देखते हुए पूर्वाभिमुख खड़े हुए गरुड़की-सी प्रतीत होती थी। सोनेकी ईंटोंसे पंखका निर्माण होनेसे उस गरुड़के पंख सुवर्णमय दिखायी देते थे। प्रकृत-अवस्थामें चित्य-अग्निके छः प्रस्तार होते हैं; किंतु अश्वमेध यज्ञमें उसका प्रस्तार तीनगुना हो जाता है। इसलिये वह गरुड़ाकृति अग्नि अठारह प्रस्तारोंसे युक्त थी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| चित्यः |
चित्य अग्नि (प्रथमा विभक्ति) |
| राजसिंहस्य |
राजसिंह दशरथ के (षष्ठी विभक्ति) |
| सञ्चितः |
चयन द्वारा सम्पादित (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कुशलैः |
कुशल के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| द्विजैः |
ब्राह्मणों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| गरुडः |
गरुड़ (प्रथमा विभक्ति) |
| रुक्मपक्षः |
सोने के पंख वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| त्रिगुणः |
तीन गुना (प्रथमा विभक्ति) |
| अष्टादशात्मकः |
अठारह प्रस्तारों वाला (प्रथमा विभक्ति) |
नियुक्तास्तत्र पशवस्तत्तदुद्दिश्य दैवतम्।
उरगाः पक्षिणश्चैव यथाशास्त्रं प्रचोदिताः॥
॥ 1.14.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वहाँ पूर्वोक्त यूपोंमें शास्त्रविहित पशु, सर्प और पक्षी विभिन्न देवताओंके उद्देश्यसे बाँधे गये थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| नियुक्ताः |
बाँधे गये थे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| पशवः |
पशु (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तत्तत् |
विभिन्न (द्वितीया विभक्ति) |
| उद्दिश्य |
उद्देश्य से (ल्यबन्त अव्यय) |
| दैवतम् |
देवता को (द्वितीया विभक्ति) |
| उरगाः |
सर्प (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पक्षिणः |
पक्षी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| यथाशास्त्रम् |
शास्त्र के अनुसार (अव्यय) |
| प्रचोदिताः |
प्रेरित किये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
शामित्रे तु हयस्तत्र तथा जलचराश्च ये।
ऋषिभिः सर्वमेवैतन्नियुक्तं शास्त्रतस्तदा॥
॥ 1.14.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
शामित्र कर्ममें यज्ञिय अश्व तथा कूर्म आदि जलचर जन्तु जो वहाँ लाये गये थे, ऋषियोंने उन सबको शास्त्रविधिके अनुसार पूर्वोक्त यूपोंमें बाँध दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| शामित्रे |
शामित्र कर्म में (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| हयः |
यज्ञिय अश्व (प्रथमा विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| जलचराः |
जलचर जन्तु (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| ये |
जो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋषिभिः |
ऋषियों ने (तृतीया विभक्ति) |
| सर्वम् |
सब को (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| एतत् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| नियुक्तम् |
बाँध दिया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| शास्त्रतः |
शास्त्रविधि के अनुसार (अव्यय) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
पशूनां त्रिशतं तत्र यूपेषु नियतं तदा।
अश्वरत्नोत्तमं तत्र राज्ञो दशरथस्य ह॥
॥ 1.14.32 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस समय उन यूपों में तीन सौ पशु बँधे हुए थे तथा राजा दशरथका वह उत्तम अश्वरत्न भी वहीं बाँधा गया था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पशूनाम् |
पशुओं में से (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, निर्धारण) |
| त्रिशतम् |
तीन सौ (प्रथमा विभक्ति) |
| तत्र |
उन (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| यूपेषु |
यूपों में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| नियतम् |
बँधे हुए थे (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| अश्वरत्नोत्तमम् |
उत्तम अश्वरत्न (प्रथमा विभक्ति) |
| तत्र |
वहीं (अव्यय) |
| राज्ञः |
राजा के (षष्ठी विभक्ति) |
| दशरथस्य |
दशरथ के (षष्ठी विभक्ति) |
| ह |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य समन्ततः।
कृपाणैर्विशशासैनं त्रिभिः परमया मुदा॥
॥ 1.14.33 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
रानी कौसल्या ने वहाँ प्रोक्षण आदि के द्वारा सब ओरसे उस अश्व का संस्कार करके बड़ी प्रसन्नता के साथ तीन तलवारों से उसका स्पर्श किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कौसल्या |
कौसल्या ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| हयम् |
अश्व का (द्वितीया विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| परिचर्य |
प्रोक्षण आदि से संस्कार करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| समन्ततः |
सब ओर से (अव्यय) |
| कृपाणैः |
तलवारों से (तृतीया विभक्ति) |
| विशशास |
स्पर्श किया / मारा (वि + शस्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| एनम् |
इसको (द्वितीया विभक्ति) |
| त्रिभिः |
तीन से (तृतीया विभक्ति) |
| परमया |
बड़ी (तृतीया विभक्ति) |
| मुदा |
प्रसन्नता से (तृतीया विभक्ति) |
पतत्त्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा।
अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया॥
॥ 1.14.34 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर कौसल्या देवीने सुस्थिर चित्त से धर्मपालन की इच्छा रखकर उस अश्व के निकट एक रात निवास किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पतत्त्रिणा |
अश्व के (तृतीया विभक्ति) |
| तदा |
तदनन्तर (अव्यय) |
| सार्धम् |
साथ (अव्यय) |
| सुस्थितेन |
सुस्थिर (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| चेतसा |
चित्त से (तृतीया विभक्ति) |
| अवसत् |
निवास किया (वस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| रजनीम् |
रात (द्वितीया विभक्ति, कालाध्वनोः) |
| एकाम् |
एक (द्वितीया विभक्ति) |
| कौसल्या |
कौसल्या देवी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| धर्मकाम्यया |
धर्मपालन की इच्छा से (तृतीया विभक्ति) |
होताध्वर्युस्तथोद्गाता हस्तेन समयोजयन्।
महिष्या परिवृत्त्यार्थं वावातामपरां तथा॥
॥ 1.14.35 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् होता, अध्वर्यु और उद्गाता ने राजाकी (क्षत्रियजातीय) महिषी ‘कौसल्या’, (वैश्यजातीय स्त्री) ‘वावाता’ तथा (शूद्रजातीय स्त्री) ‘परिवृत्ति’-इन सबके हाथ से उस अश्वका स्पर्श कराया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| होता |
होता ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अध्वर्युः |
अध्वर्यु ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| उद्गाता |
उद्गाता ने (प्रथमा विभक्ति) |
| हस्तेन |
हाथ से (तृतीया विभक्ति) |
| समयोजयन् |
स्पर्श कराया (सम् + आ + युज्, प्रयोज्यार्थ, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| महिष्याः |
महिषी (कौसल्या) का (षष्ठी विभक्ति) |
| परिवृत्त्याः |
परिवृत्ति नामक पत्नी का (षष्ठी विभक्ति) |
| अर्थम् |
के लिए (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| वावाताम् |
वावाता नामक पत्नी का (षष्ठी विभक्ति) |
| अपराम् |
दूसरी का (षष्ठी विभक्ति) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
पतत्त्रिणस्तस्य वपामुद्धृत्य नियतेन्द्रियः।
ऋत्विक्परमसम्पन्नः श्रपयामास शास्त्रतः॥
॥ 1.14.36 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसके बाद परम चतुर जितेन्द्रिय ऋत्विक्ने विधिपूर्वक अश्वकन्द के गूदे को निकालकर शास्त्रोक्त रीतिसे पकाया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पतत्त्रिणः |
अश्व के (षष्ठी विभक्ति) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| वपाम् |
गूदे को (द्वितीया विभक्ति) |
| उद्धृत्य |
निकालकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| नियतेन्द्रियः |
जितेन्द्रिय ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ऋत्विक् |
ऋत्विक् ने (प्रथमा विभक्ति) |
| परमसम्पन्नः |
परम चतुर ने (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रपयामास |
पकाया (श्रा धातु, प्रयोज्यार्थ, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| शास्त्रतः |
शास्त्रोक्त रीति से (अव्यय) |
धूमगन्धं वपायास्तु जिघ्रति स्म नराधिपः।
यथाकालं यथान्यायं निर्णुदन् पापमात्मनः॥
॥ 1.14.37 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् उस गूदेकी आहुति दी गयी। राजा दशरथ ने अपने पाप को दूर करने के लिये ठीक समय पर आकर विधिपूर्वक उसके धूएँ की गन्ध को सूंघा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| धूमगन्धम् |
धूएँ की गन्ध को (द्वितीया विभक्ति) |
| वपायाः |
गूदे की (षष्ठी विभक्ति) |
| तु |
तत्पश्चात् (अव्यय) |
| जिघ्रति स्म |
सूंघता था (घ्रा धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, 'स्म' अतीतकाल सूचक अव्यय) |
| नराधिपः |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| यथाकालम् |
ठीक समय पर (अव्यय) |
| यथान्यायम् |
विधिपूर्वक (अव्यय) |
| निर्णुदन् |
दूर करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| पापम् |
पाप को (द्वितीया विभक्ति) |
| आत्मनः |
अपने (षष्ठी विभक्ति) |
हयस्य यानि चांगानि तानि सर्वाणि ब्राह्मणाः।
अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत् समस्ताः षोडशर्विजः॥
॥ 1.14.38 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उस अश्वमेध यज्ञके अंगभूत जो-जो हवनीय पदार्थ थे, उन सबको लेकर समस्त सोलह ऋत्विज् ब्राह्मण अग्निमें विधिवत् आहुति देने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| हयस्य |
अश्वमेध यज्ञ के (षष्ठी विभक्ति) |
| यानि |
जो-जो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अङ्गानि |
अंगभूत हवनीय पदार्थ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तानि |
उन सबको (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वाणि |
समस्त को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| ब्राह्मणाः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अग्नौ |
अग्नि में (सप्तमी विभक्ति) |
| प्रास्यन्ति |
आहुति देने लगे (प्र + अस्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| विधिवत् |
विधिवत् (अव्यय) |
| समस्ताः |
समस्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| षोडशर्विजः |
सोलह ऋत्विज् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
प्लक्षशाखासु यज्ञानामन्येषां क्रियते हविः।
अश्वमेधस्य यज्ञस्य वैतसो भाग इष्यते॥
॥ 1.14.39 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अश्वमेधके अतिरिक्त अन्य यज्ञोंमें जो हवि दी जाती है, वह पाकरकी शाखाओंमें रखकर दी जाती है; परंतु अश्वमेध यज्ञका हविष्य बेंतकी चटाईमें रखकर देनेका नियम है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्लक्षशाखासु |
पाकर की शाखाओं में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| यज्ञानाम् |
यज्ञों की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अन्येषाम् |
अन्य की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| क्रियते |
की जाती है (कृ धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हविः |
हवि (प्रथमा विभक्ति) |
| अश्वमेधस्य |
अश्वमेध (षष्ठी विभक्ति) |
| यज्ञस्य |
यज्ञ का (षष्ठी विभक्ति) |
| वैतसः |
बेंत की चटाई में रखा हुआ (प्रथमा विभक्ति) |
| भागः |
हविष्य (प्रथमा विभक्ति) |
| इष्यते |
नियत है (इष् धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
त्र्यहोऽश्वमेधः संख्यातः कल्पसूत्रेण ब्राह्मणैः।
चतुष्टोममहस्तस्य प्रथमं परिकल्पितम्॥
॥ 1.14.40 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
कल्पसूत्र और ब्राह्मणग्रन्थोंके द्वारा अश्वमेध के तीन सवनीय दिन बताये गये हैं। उनमेंसे प्रथम दिन जो सवन होता है, उसे चतुष्टोम (‘अग्निष्टोम’) कहा गया है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| त्र्यहः |
तीन दिन का (प्रथमा विभक्ति) |
| अश्वमेधः |
अश्वमेध (प्रथमा विभक्ति) |
| सङ्ख्यातः |
बताया गया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| कल्पसूत्रेण |
कल्पसूत्र के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| ब्राह्मणैः |
ब्राह्मणग्रन्थों के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| चतुष्टोमम् |
चतुष्टोम (प्रथमा विभक्ति) |
| अहः |
दिन (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उसका (षष्ठी विभक्ति) |
| प्रथमम् |
प्रथम (प्रथमा विभक्ति) |
| परिकल्पितम् |
कहा गया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
उक्थ्यं द्वितीयं संख्यातमतिरात्रं तथोत्तरम्।
कारितास्तत्र बहवो विहिताः शास्त्रदर्शनात्॥
॥ 1.14.41 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
द्वितीय दिवस साध्य सवनको ‘उक्थ्य’ नाम दिया गया है तथा तीसरे दिन जिस सवनका अनुष्ठान होता है, उसे ‘अतिरात्र’ कहते हैं। उसमें शास्त्रीय दृष्टिसे विहित बहुत-से दूसरे-दूसरे क्रतु भी सम्पन्न किये गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| उक्थ्यम् |
उक्थ्य (प्रथमा विभक्ति) |
| द्वितीयम् |
द्वितीय (प्रथमा विभक्ति) |
| सङ्ख्यातम् |
कहा गया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अतिरात्रम् |
अतिरात्र (प्रथमा विभक्ति) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| उत्तरम् |
बाद का (प्रथमा विभक्ति) |
| कारिताः |
सम्पन्न किये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त, प्रयोज्यार्थ) |
| तत्र |
उसमें (अव्यय) |
| बहवः |
बहुत से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| विहिताः |
विहित (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| शास्त्रदर्शनात् |
शास्त्रीय दृष्टि से (पञ्चमी विभक्ति) |
ज्योतिष्टोमायुषी चैवमतिरात्रौ च निर्मितौ।
अभिजिद्विश्वजिच्चैवमाप्तोर्यामौ महाक्रतुः॥
॥ 1.14.42 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
ज्योतिष्टोम, आयुष्टोम यज्ञ, दो बार अतिरात्र यज्ञ, पाँचवाँ अभिजित् , छठा विश्वजित् तथा सातवें-आठवें आप्तोर्याम—ये सब-के-सब महाक्रतु माने गये हैं, जो अश्वमेधके उत्तर कालमें सम्पादित हुए।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ज्योतिष्टोमायुषी |
ज्योतिष्टोम और आयुष्टोम (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| अतिरात्रौ |
दो अतिरात्र (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| निर्मितौ |
निर्मित हुए (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| अभिजित् |
अभिजित् (प्रथमा विभक्ति) |
| विश्वजित् |
विश्वजित् (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| आप्तोर्यामौ |
दो आप्तोर्याम (प्रथमा विभक्ति, द्विवचन) |
| महाक्रतुः |
महाक्रतु (प्रथमा विभक्ति) |
प्राचीं होत्रे ददौ राजा दिशं स्वकुलवर्धनः।
अध्वर्यवे प्रतीचीं तु ब्रह्मणे दक्षिणां दिशम्॥
॥ 1.14.43 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले राजा दशरथने यज्ञ पूर्ण होनेपर होताको दक्षिणारूपमें अयोध्यासे पूर्व दिशाका सारा राज्य सौंप दिया, अध्वर्युको पश्चिम दिशा तथा ब्रह्माको दक्षिण दिशाका राज्य दे दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्राचीम् |
पूर्व दिशा की (द्वितीया विभक्ति) |
| होत्रे |
होता को (चतुर्थी विभक्ति) |
| ददौ |
दिया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| दिशम् |
दिशा की भूमि को (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वकुलवर्धनः |
अपने कुल की वृद्धि करने वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अध्वर्यवे |
अध्वर्यु को (चतुर्थी विभक्ति) |
| प्रतीचीम् |
पश्चिम दिशा की (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| ब्रह्मणे |
ब्रह्मा को (चतुर्थी विभक्ति) |
| दक्षिणाम् |
दक्षिण (द्वितीया विभक्ति) |
| दिशम् |
दिशा की भूमि को (द्वितीया विभक्ति) |
उद्गात्रे तु तथोदीचीं दक्षिणैषा विनिर्मिता।
अश्वमेधे महायज्ञे स्वयंभूविहिते पुरा॥
॥ 1.14.44 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसी तरह उद्गाताको उत्तर दिशाकी सारी भूमि दे दी। पूर्वकालमें भगवान् ब्रह्माजीने जिसका अनुष्ठान किया था, उस अश्वमेध नामक महायज्ञमें ऐसी ही दक्षिणाका विधान किया गया है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| उद्गात्रे |
उद्गाता को (चतुर्थी विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| तथा |
इसी तरह (अव्यय) |
| उदीचीम् |
उत्तर दिशा की (द्वितीया विभक्ति) |
| दक्षिणा |
दक्षिणा (प्रथमा विभक्ति) |
| एषा |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| विनिर्मिता |
विहित की गई है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अश्वमेधे |
अश्वमेध में (सप्तमी विभक्ति) |
| महायज्ञे |
महायज्ञ में (सप्तमी विभक्ति) |
| स्वयम्भूविहिते |
स्वयंभू ब्रह्मा द्वारा विहित में (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| पुरा |
पूर्वकाल में (अव्यय) |
क्रतुं समाप्य तु तदा न्यायतः पुरुषर्षभः।
ऋत्विग्भ्यो हि ददौ राजा धरां तां कुलवर्धनः॥
॥ 1.14.45 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ समाप्त करके अपने कुलकी वृद्धि करनेवाले पुरुषशिरोमणि राजा दशरथने ऋत्विजोंको सारी पृथ्वी दान कर दी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| क्रतुम् |
यज्ञ को (द्वितीया विभक्ति) |
| समाप्य |
समाप्त करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| न्यायतः |
विधिपूर्वक (अव्यय) |
| पुरुषर्षभः |
पुरुषशिरोमणि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ऋत्विग्भ्यः |
ऋत्विजों को (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| ददौ |
दान कर दी (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| धराम् |
पृथ्वी को (द्वितीया विभक्ति) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| कुलवर्धनः |
कुल की वृद्धि करने वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
एवं दत्त्वा प्रहृष्टोऽभूच्छ्रीमानिक्ष्वाकुनन्दनः।
ब्राह्मणाः ऋत्विजस्त्वब्रुवन् सर्वे राजानं गतकिल्बिषम्॥
॥ 1.14.46 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यों दान देकर इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीमान् महाराज दशरथके हर्षकी सीमा न रही, परंतु समस्त ऋत्विज् उन निष्पाप नरेशसे इस प्रकार बोले-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
यों (अव्यय) |
| दत्त्वा |
दान देकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| प्रहृष्टः |
हर्षित हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| अभूत् |
हुआ (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| श्रीमान् |
श्रीमान् (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| इक्ष्वाकुनन्दनः |
इक्ष्वाकुकुलनन्दन ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्राह्मणाः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋत्विजः |
ऋत्विज् (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
परंतु (अव्यय) |
| अब्रुवन् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सर्वे |
समस्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राजानम् |
राजा से (द्वितीया विभक्ति) |
| गतकिल्बिषम् |
निष्पाप से (द्वितीया विभक्ति) |
भवानेव महीं कृत्स्नामेको रक्षितुमर्हति।
न भूम्या कार्यमस्माकं नहि शक्ताः स्म पालने॥
॥ 1.14.47 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महाराज! अकेले आप ही इस सम्पूर्ण पृथ्वीकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। हममें इसके पालनकी शक्ति नहीं है; अतः भूमिसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भवान् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| महीम् |
पृथ्वी की (द्वितीया विभक्ति) |
| कृत्स्नाम् |
सम्पूर्ण की (द्वितीया विभक्ति) |
| एकः |
अकेले (प्रथमा विभक्ति) |
| रक्षितुम् |
रक्षा करने में (रक्ष् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हति |
समर्थ हैं (अर्ह् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| भूम्या |
भूमि से (तृतीया विभक्ति) |
| कार्यम् |
प्रयोजन है (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| अस्माकम् |
हमारा (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| नहि |
नहीं (अव्यय) |
| शक्ताः |
शक्त हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्म |
हैं (अव्यय) |
| पालने |
पालन करने में (सप्तमी विभक्ति) |
रताः स्वाध्यायकरणे वयं नित्यं हि भूमिप।
निष्क्रयं किंचिदेवेह प्रयच्छतु भवानिति॥
॥ 1.14.48 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘भूमिपाल! हम तो सदा वेदोंके स्वाध्यायमें ही लगे रहते हैं (इस भूमिका पालन हमसे नहीं हो सकता); अतः आप हमें यहाँ इस भूमिका कुछ निष्क्रय (मूल्य) ही दे दें।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| रताः |
लगे रहते हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्वाध्यायकरणे |
स्वाध्याय करने में (सप्तमी विभक्ति) |
| वयम् |
हम (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| नित्यम् |
सदा (अव्यय) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| भूमिप |
हे भूमिपाल! (सम्बोधन विभक्ति) |
| निष्क्रयम् |
मूल्य को (द्वितीया विभक्ति) |
| किञ्चित् |
कुछ (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| प्रयच्छतु |
दे दें (प्र + यम्, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| भवान् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
मणिरत्नं सुवर्णं वा गावो यद्वा समुद्यतम्।
तत् प्रयच्छ नृपश्रेष्ठ धरण्या न प्रयोजनम्॥
॥ 1.14.49 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘नृपश्रेष्ठ! मणि, रत्न, सुवर्ण, गौ अथवा जो भी वस्तु यहाँ उपस्थित हो, वही हमें दक्षिणारूपसे दे दीजिये। इस धरतीसे हमें कोई प्रयोजन नहीं है’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| मणिरत्नम् |
मणि और रत्न (प्रथमा विभक्ति) |
| सुवर्णम् |
सुवर्ण (प्रथमा विभक्ति) |
| वा |
अथवा (अव्यय) |
| गावः |
गौएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यद्वा |
अथवा जो (अव्यय) |
| समुद्यतम् |
उपस्थित है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रयच्छ |
दे दीजिये (प्र + यम्, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| नृपश्रेष्ठ |
हे नृपश्रेष्ठ! (सम्बोधन विभक्ति) |
| धरण्याः |
धरती से (षष्ठी विभक्ति, तृतीया के अर्थ में) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| प्रयोजनम् |
प्रयोजन है (प्रथमा विभक्ति) |
एवमुक्तो नरपतिर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।
गवां शतसहस्राणि दश तेभ्यो ददौ नृपः॥ दशकोटिं सुवर्णस्य रजतस्य चतुर्गुणम्॥
॥ 1.14.50 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर राजाने उन्हें दस लाख गौएँ प्रदान की। दस करोड़ स्वर्णमुद्रा तथा उससे चौगुनी रजतमुद्रा अर्पित की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
ऐसा (अव्यय) |
| उक्तः |
कहे जाने पर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| नरपतिः |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| ब्राह्मणैः |
ब्राह्मणों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| वेदपारगैः |
वेदों के पारगामी द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| गवाम् |
गौओं का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| शतसहस्राणि |
सौ हजार (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| दश |
दस (द्वितीया विभक्ति) |
| तेभ्यः |
उन्हें (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| ददौ |
प्रदान की (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| नृपः |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| दशकोटिम् |
दस करोड़ (द्वितीया विभक्ति) |
| सुवर्णस्य |
स्वर्णमुद्रा (षष्ठी विभक्ति) |
| रजतस्य |
रजतमुद्रा (षष्ठी विभक्ति) |
| चतुर्गुणम् |
चौगुनी (द्वितीया विभक्ति) |
ऋत्विजस्तु ततः सर्वे प्रददुः सहिता वसु।
ऋष्यशृंगाय मुनये वसिष्ठाय च धीमते॥
॥ 1.14.51 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब उस समस्त ऋत्विजोंने एक साथ होकर वह सारा धन मुनिवर ऋष्यशृंग तथा बुद्धिमान् वसिष्ठको सौंप दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋत्विजः |
ऋत्विजों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
तब (अव्यय) |
| ततः |
उसके बाद (अव्यय) |
| सर्वे |
सभी ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रददुः |
सौंप दिया (प्र + दा, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सहिताः |
एक साथ होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| वसु |
धन (द्वितीया विभक्ति) |
| ऋष्यशृङ्गाय |
ऋष्यशृंग को (चतुर्थी विभक्ति) |
| मुनये |
मुनिवर को (चतुर्थी विभक्ति) |
| वसिष्ठाय |
वसिष्ठ को (चतुर्थी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| धीमते |
बुद्धिमान् को (चतुर्थी विभक्ति) |
ततस्ते न्यायतः कृत्वा प्रविभागं द्विजोत्तमाः।
सुप्रीतमनसः सर्वे प्रत्यूचुर्मुदिता भृशम्॥
॥ 1.14.52 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर उन दोनों महर्षियोंके सहयोगसे उस धनका न्यायपूर्वक बँटवारा करके वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और बोलेमहाराज! इस दक्षिणासे हम-लोग बहुत संतुष्ट हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| ते |
उन (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| न्यायतः |
न्यायपूर्वक (अव्यय) |
| कृत्वा |
करके (क्त्वान्त अव्यय) |
| प्रविभागम् |
बँटवारा (द्वितीया विभक्ति) |
| द्विजोत्तमाः |
श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सुप्रीतमनसः |
मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रत्यूचुः |
बोले (प्रति + वच्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मुदिताः |
प्रसन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| भृशम् |
बहुत (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
ततः प्रसर्पकेभ्यस्तु हिरण्यं सुसमाहितः।
जाम्बूनदं कोटिसंख्यं ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा॥
॥ 1.14.53 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इसके बाद एकाग्रचित्त होकर राजा दशरथने अभ्यागत ब्राह्मणोंको एक करोड़ जाम्बूनद सुवर्णकी मुद्राएँ बाँटीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
इसके बाद (अव्यय) |
| प्रसर्पकेभ्यः |
अभ्यागत ब्राह्मणों को (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| हिरण्यम् |
सुवर्ण मुद्राएँ (द्वितीया विभक्ति) |
| सुसमाहितः |
एकाग्रचित्त होकर (प्रथमा विभक्ति) |
| जाम्बूनदम् |
जाम्बूनद सुवर्ण की (द्वितीया विभक्ति) |
| कोटिसङ्ख्यम् |
एक करोड़ संख्या वाली (द्वितीया विभक्ति) |
| ब्राह्मणेभ्यः |
ब्राह्मणों को (चतुर्थी विभक्ति, बहुवचन) |
| ददौ |
बाँटीं (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
दरिद्राय द्विजायाथ हस्ताभरणमुत्तमम्।
कस्मैचिद् याचमानाय ददौ राघवनन्दनः॥
॥ 1.14.54 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
सारा धन दे देनेके बाद जब कुछ नहीं बच रहा, तब एक दरिद्र ब्राह्मणने आकर राजासे धनकी याचना की। उस समय उन रघुकुलनन्दन नरेशने उसे अपने हाथका उत्तम आभूषण उतारकर दे दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दरिद्राय |
दरिद्र को (चतुर्थी विभक्ति) |
| द्विजाय |
ब्राह्मण को (चतुर्थी विभक्ति) |
| अथ |
तब (अव्यय) |
| हस्ताभरणम् |
हाथ का आभूषण (द्वितीया विभक्ति) |
| उत्तमम् |
उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
| कस्मैचित् |
किसी एक को (चतुर्थी विभक्ति) |
| याचमानाय |
याचना करते हुए को (शानच् प्रत्ययान्त, चतुर्थी विभक्ति) |
| ददौ |
दे दिया (दा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| राघवनन्दनः |
रघुकुलनन्दन नरेश ने (प्रथमा विभक्ति) |
ततः प्रीतेषु विधिवद् द्विजेषु द्विजवत्सलः।
प्रणाममकरोत् तेषां हर्षव्याकुलितेन्द्रियः॥
॥ 1.14.55 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् जब सभी ब्राह्मण विधिवत् संतुष्ट हो गये, उस समय उनपर स्नेह रखनेवाले नरेशने उन सबको प्रणाम किया। प्रणाम करते समय उनकी सारी इन्द्रियाँ हर्षसे विह्वल हो रही थीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तत्पश्चात् (अव्यय) |
| प्रीतेषु |
सन्तुष्ट होने पर (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| विधिवत् |
विधिवत् (अव्यय) |
| द्विजेषु |
ब्राह्मणों के (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| द्विजवत्सलः |
ब्राह्मणों पर स्नेह रखने वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रणामम् |
प्रणाम (द्वितीया विभक्ति) |
| अकरोत् |
किया (कृ धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तेषाम् |
उन सबको (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| हर्षव्याकुलितेन्द्रियः |
हर्ष से व्याकुल इन्द्रियों वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
तस्याशिषोऽथ विविधा ब्राह्मणैः समुदाहृताः।
उदारस्य नृवीरस्य धरण्यां पतितस्य च॥
॥ 1.14.56 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
पृथ्वीपर पड़े हुए उन उदार नरवीरको ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके आशीर्वाद दिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तस्य |
उन (षष्ठी विभक्ति) |
| आशिषः |
आशीर्वाद (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अथ |
तदनन्तर (अव्यय) |
| विविधाः |
नाना प्रकार के (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ब्राह्मणैः |
ब्राह्मणों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| समुदाहृताः |
दिये गये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| उदारस्य |
उदार के लिए (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| नृवीरस्य |
नरवीर के लिए (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| धरण्याम् |
पृथ्वी पर (सप्तमी विभक्ति) |
| पतितस्य |
पड़े हुए के लिए (षष्ठी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, चतुर्थी के अर्थ में) |
| च |
और (अव्यय) |
ततः प्रीतमना राजा प्राप्य यज्ञमनुत्तमम्।
पापापहं स्वर्नयनं दुस्तरं पार्थिवर्षभैः॥
॥ 1.14.57 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर उस परम उत्तम यज्ञका पुण्यफल पाकर राजा दशरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वह यज्ञ उनके सब पापोंका नाश करनेवाला तथा उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचानेवाला था। साधारण राजाओंके लिये उस यज्ञको आदिसे अन्ततक पूर्ण कर लेना बहुत ही कठिन था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| प्रीतमनाः |
प्रसन्न मन वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| राजा |
राजा दशरथ को (प्रथमा विभक्ति) |
| प्राप्य |
पाकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| यज्ञम् |
यज्ञ का पुण्यफल (द्वितीया विभक्ति) |
| अनुत्तमम् |
परम उत्तम (द्वितीया विभक्ति) |
| पापापहम् |
पापों का नाश करने वाला (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वर्नयनम् |
स्वर्ग लोक में पहुँचाने वाला (द्वितीया विभक्ति) |
| दुस्तरम् |
दुस्तर / कठिनता से पूर्ण होने वाला (द्वितीया विभक्ति) |
| पार्थिवर्षभैः |
राजाओं के लिए (तृतीया विभक्ति) |
ततोऽब्रवीदृष्यश्रृंगं राजा दशरथस्तदा।
कुलस्य वर्धनं तत् तु कर्तुमर्हसि सुव्रत॥
॥ 1.14.58 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यज्ञ समाप्त होनेपर राजा दशरथने ऋष्यशृंगसे कहा—’उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! अब जो कर्म मेरी कुलपरम्पराको बढ़ानेवाला हो, उसका सम्पादन आपको करना चाहिये’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
यज्ञ समाप्त होने पर (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ऋष्यश्रृङ्गम् |
ऋष्यशृंग से (द्वितीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| दशरथः |
दशरथ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| कुलस्य |
कुल की (षष्ठी विभक्ति) |
| वर्धनम् |
वृद्धि करने वाला कर्म (द्वितीया विभक्ति) |
| तत् |
वह (द्वितीया विभक्ति) |
| तु |
अब (अव्यय) |
| कर्तुम् |
सम्पादन करना (कृ धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
चाहिये (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सुव्रत |
हे उत्तम व्रत वाले! (सम्बोधन विभक्ति) |
तथेति च स राजानमुवाच द्विजसत्तमः।
भविष्यन्ति सुता राजंश्चत्वारस्ते कुलोद्वहाः॥
॥ 1.14.59 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब द्विजश्रेष्ठ ऋष्यशृंग ‘तथास्तु’ कहकर राजासे बोले-‘राजन् ! आपके चार पुत्र होंगे, जो इस कुलके भारको वहन करनेमें समर्थ होंगे’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
वैसे ही / तथास्तु (अव्यय) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| सः |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति) |
| राजानम् |
राजा से (द्वितीया विभक्ति) |
| उवाच |
बोले (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| द्विजसत्तमः |
द्विजश्रेष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| भविष्यन्ति |
होंगे (भू धातु, लृट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सुताः |
पुत्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राजन् |
हे राजन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| चत्वारः |
चार (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ते |
आपके (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| कुलोद्वहाः |
कुल का भार वहन करने वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
स तस्य वाक्यं मधुरं निशम्य प्रणम्य तस्मै प्रयतो नृपेन्द्रः।
जगाम हर्षं परमं महात्मा तमृष्यश्रृंगं पुनरप्युवाच॥
॥ 1.14.60 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
उनका यह मधुर वचन सुनकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले महामना महाराज दशरथ उन्हें प्रणाम करके बड़े हर्षको प्राप्त हुए तथा उन्होंने ऋष्यशृंगको पुनः पुत्रप्राप्ति करानेवाले कर्मका अनुष्ठान करनेके लिये प्रेरित किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उनका (षष्ठी विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| मधुरम् |
मधुर (द्वितीया विभक्ति) |
| निशम्य |
सुनकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| प्रणम्य |
प्रणाम करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| तस्मै |
उन्हें (चतुर्थी विभक्ति) |
| प्रयतः |
मन और इन्द्रियों को संयम में रखने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| नृपेन्द्रः |
महाराज ने (प्रथमा विभक्ति) |
| जगाम |
प्राप्त हुए (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| हर्षम् |
हर्ष को (द्वितीया विभक्ति) |
| परमम् |
बड़े (द्वितीया विभक्ति) |
| महात्मा |
महामना ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तम् |
उन (द्वितीया विभक्ति) |
| ऋष्यश्रृङ्गम् |
ऋष्यशृंग को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुनः |
फिर से (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| उवाच |
प्रेरित किया (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे चतुर्दशः सर्गः॥१४॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१४॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| चतुर्दशः |
चौदहवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥१४॥ |
॥१४॥ (सर्ग संख्या) |
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