🌿 सर्ग 13: यज्ञ की तैयारी, राजाओं को बुलाने के आदेश एवं उनका सत्कार तथा पत्नियों सहित राजा दशरथ का यज्ञ की दीक्षा लेना
Preparation for the sacrifice, orders to invite the kings and their reception, and King Dasharatha along with his wives taking the vow for the sacrifice
कुल श्लोक: 40
पुनः प्राप्ते वसन्ते तु पूर्णः संवत्सरोऽभवत्।
प्रसवार्थं गतो यष्टुं हयमेधेन वीर्यवान्॥
॥ 1.13.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वर्तमान वसन्त ऋतु के बीतने पर जब पुनः दूसरा वसन्त आया, तबतक एक वर्षका समय पूरा हो गया। उस समय शक्तिशाली राजा दशरथ संतानके लिये अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा लेने के निमित्त वसिष्ठजी के समीप गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पुनः |
फिर से (अव्यय) |
| प्राप्ते |
आने पर (सप्तमी विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| वसन्ते |
वसन्त ऋतु में (सप्तमी विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| पूर्णः |
पूरा हो गया (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| संवत्सरः |
एक वर्ष का समय (प्रथमा विभक्ति) |
| अभवत् |
हुआ (भू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| प्रसवार्थम् |
सन्तान के लिए (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| गतः |
गए (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| यष्टुम् |
यज्ञ करने / दीक्षा लेने के लिए (यज् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| हयमेधेन |
अश्वमेध यज्ञ से (तृतीया विभक्ति) |
| वीर्यवान् |
शक्तिशाली (राजा दशरथ) (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
अभिवाद्य वसिष्ठं च न्यायतः प्रतिपूज्य च।
अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं प्रसवार्थं द्विजोत्तमम्॥
॥ 1.13.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वसिष्ठजीको प्रणाम करके राजाने न्यायतः उनका पूजन किया और पुत्र-प्राप्तिका उद्देश्य लेकर उन द्विजश्रेष्ठ मुनिसे यह विनययुक्त बात कही।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अभिवाद्य |
प्रणाम करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| वसिष्ठम् |
वसिष्ठ को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| न्यायतः |
न्याय / विधि के अनुसार (अव्यय) |
| प्रतिपूज्य |
पूजन करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| प्रश्रितम् |
विनययुक्त (द्वितीया विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचन को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रसवार्थम् |
पुत्र-प्राप्ति के उद्देश्य से (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| द्विजोत्तमम् |
द्विजश्रेष्ठ से (द्वितीया विभक्ति) |
यज्ञो मे क्रियतां ब्रह्मन् यथोक्तं मुनिपुंगव।
यथा न विघ्नाः क्रियन्ते यज्ञांगेषु विधीयताम्॥
॥ 1.13.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्रह्मन्! मुनिप्रवर! आप शास्त्रविधिके अनुसार मेरा यज्ञ करावें और यज्ञके अंगभूत अश्वसंचारण आदि में ब्रह्मराक्षस आदि जिस तरह विघ्न न डाल सकें, वैसा उपाय कीजिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यज्ञः |
यज्ञ (प्रथमा विभक्ति) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| क्रियताम् |
कराया जाए (कृ धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| यथोक्तम् |
शास्त्रोक्त विधि के अनुसार (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| मुनिपुङ्गव |
हे मुनिप्रवर! (सम्बोधन विभक्ति) |
| यथा |
जिस प्रकार (अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| विघ्नाः |
विघ्न (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| क्रियन्ते |
किए जाएँ (कृ धातु, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यज्ञाङ्गेषु |
यज्ञ के अंगों (कार्यों) में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| विधीयताम् |
उपाय किया जाए (वि + धा, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
भवान् स्निग्धः सुहृन्मह्यं गुरुश्च परमो महान्।
वोढव्यो भवता चैव भारो यज्ञस्य चोद्यतः॥
॥ 1.13.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘आपका मुझपर विशेष स्नेह है, आप मेरे सुहृद्-अकारण हितैषी, गुरु और परम महान् हैं। यह जो यज्ञका भार उपस्थित हुआ है, इसको आप ही वहन कर सकते हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| भवान् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| स्निग्धः |
स्नेही (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुहृत् |
सुहृदय / हितैषी (प्रथमा विभक्ति) |
| मह्यम् |
मेरे लिए (चतुर्थी विभक्ति) |
| गुरुः |
गुरु (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| परमः |
परम (प्रथमा विभक्ति) |
| महान् |
महान् (प्रथमा विभक्ति) |
| वोढव्यः |
वहन करने योग्य (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| भवता |
आपके द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| भारः |
भार (प्रथमा विभक्ति) |
| यज्ञस्य |
यज्ञ का (षष्ठी विभक्ति) |
| चोद्यतः |
उपस्थित / प्रारब्ध का (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तथेति च स राजानमब्रवीद द्विजसत्तमः।
करिष्ये सर्वमेवैतद् भवता यत् समर्थितम्॥
॥ 1.13.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर विप्रवर वसिष्ठ मुनि राजासे इस प्रकार बोले—’नरेश्वर ! तुमने जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं करूँगा’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
वैसे ही / बहुत अच्छा (अव्यय) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| सः |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति) |
| राजानम् |
राजा से (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| द्विजसत्तमः |
विप्रवर / ब्राह्मणश्रेष्ठ (वसिष्ठ) ने (प्रथमा विभक्ति) |
| करिष्ये |
करूँगा (कृ धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| सर्वम् |
सब कुछ (द्वितीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| एतत् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| भवता |
आपके द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| यत् |
जिसके लिए (प्रथमा विभक्ति) |
| समर्थितम् |
प्रार्थना की गई है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
ततोऽब्रवीद् द्विजान् वृद्धान् यज्ञकर्मसुनिष्ठितान्।
स्थापत्ये निष्ठितांश्चैव वृद्धान् परमधार्मिकान्॥
॥ 1.13.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर वसिष्ठजीने यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें निपुण तथा यज्ञविषयक शिल्पकर्ममें कुशल, परम धर्मात्मा, बूढ़े ब्राह्मणों को बुलाकर उनसे कहा—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| द्विजान् |
ब्राह्मणों से (द्वितीया विभक्ति) |
| वृद्धान् |
बूढ़े / वृद्धों को (द्वितीया विभक्ति) |
| यज्ञकर्मसुनिष्ठितान् |
यज्ञ के कर्मों में निपुण को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| स्थापत्ये |
स्थापत्य कला / शिल्पकर्म में (सप्तमी विभक्ति) |
| निष्ठितान् |
निष्ठित / कुशल को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| वृद्धान् |
बूढ़ों को (द्वितीया विभक्ति) |
| परमधार्मिकान् |
परम धर्मात्मा को (द्वितीया विभक्ति) |
कान्तिकान् शिल्पकारान् वर्धकीन् खनकानपि।
गणकान् शिल्पिनश्चैव तथैव नटनर्तकान्॥
॥ 1.13.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
शिल्पकारों, बढ़इयों, भूमि खोदनेवालों, ज्योतिषियों, कारीगरों, नटों, नर्तकों तथा विशुद्ध शास्त्रवेत्ताओं और बहुश्रुत पुरुषोंको बुलाकर उनसे कहा—
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कान्तिकान् |
सुन्दर कान्ति वाले / शिल्पकारों को (द्वितीया विभक्ति) |
| शिल्पकारान् |
शिल्पकारों को (द्वितीया विभक्ति) |
| वर्धकीन् |
बढ़ई / वर्धकियों को (द्वितीया विभक्ति) |
| खनकान् |
खनक / भूमि खोदने वालों को (द्वितीया विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| गणकान् |
ज्योतिषियों / गणकों को (द्वितीया विभक्ति) |
| शिल्पिनः |
शिल्पियों / कारीगरों को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| नटनर्तकान् |
नट और नर्तकों को (द्वितीया विभक्ति) |
तथा शुचीन् शास्त्रविदः पुरुषान् सुबहुश्रुतान्।
यज्ञकर्म समीहन्तां भवन्तो राजशासनात्॥
॥ 1.13.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘तुमलोग महाराजकी आज्ञासे यज्ञकर्मके लिये आवश्यक प्रबन्ध करो।’
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| शुचीन् |
विशुद्ध / पवित्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| शास्त्रविदः |
शास्त्र के ज्ञाता को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरुषान् |
पुरुषों को (द्वितीया विभक्ति) |
| सुबहुश्रुतान् |
बहुत सुनने वाले / बहुश्रुत को (द्वितीया विभक्ति) |
| यज्ञकर्म |
यज्ञ के कर्म का (द्वितीया विभक्ति) |
| समीहन्ताम् |
प्रबन्ध करें (सम् + ईह्, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| भवन्तः |
आप लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राजशासनात् |
राजा की आज्ञा से (पञ्चमी विभक्ति) |
इष्टका बहुसाहस्री शीघ्रमानीयतामिति।
उपकार्याः क्रियन्तां च राज्ञो बहुगुणान्विताः॥
॥ 1.13.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘शीघ्र ही कई हजार ईंटें लायी जायें। राजाओंके ठहरनेके लिये उनके योग्य अन्न-पान आदि अनेक उपकरणों से युक्त बहुत-से महल बनाये जाय।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इष्टकाः |
ईंटें (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| बहुसाहस्री |
अनेक सहस्रों / कई हजार (प्रथमा विभक्ति) |
| शीघ्रम् |
शीघ्र (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| आनीयताम् |
लाई जाएँ (आ + नी, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| उपकार्याः |
उपकार्य / महल / निवास स्थान (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| क्रियन्ताम् |
बनाए जाएँ (कृ धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| राज्ञः |
राजाओं के लिए (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| बहुगुणान्विताः |
बहुत से उपकरणों / गुणों से युक्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
ब्राह्मणावसथाश्चैव कर्तव्याः शतशः शुभाः।
भक्ष्यान्नपानैर्बहुभिः समुपेताः सुनिष्ठिताः॥
॥ 1.13.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी सैकड़ों सुन्दर घर बनाये जाने चाहिये। वे सभी गृह बहुत-से भोजनीय अन्न-पान आदि उपकरणोंसे युक्त तथा आँधी-पानी आदिके निवारणमें समर्थ हों।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ब्राह्मणावसथाः |
ब्राह्मणों के निवास स्थान (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| कर्तव्याः |
किए जाने चाहिए (कृ धातु, तव्यत् प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शतशः |
सैकड़ों (अव्यय) |
| शुभाः |
सुन्दर / शुभ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भक्ष्यान्नपानैः |
भोज्य अन्न और पानीय से (तृतीया विभक्ति) |
| बहुभिः |
बहुत से (तृतीया विभक्ति) |
| समुपेताः |
युक्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सुनिष्ठिताः |
अच्छी तरह स्थिर / समर्थ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
तथा पौरजनस्यापि कर्तव्याश्च सुविस्तराः।
आगतानां सुदूराच्च पार्थिवानां पृथक् पृथक्॥
॥ 1.13.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इसी तरह पुरवासियोंके लिये भी विस्तृत मकान बनने चाहिये। दूरसे आये हुए भूपालोंके लिये पृथक्-पृथक् महल बनाये जायें।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
इसी तरह (अव्यय) |
| पौरजनस्य |
पुरवासियों के लिए (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| कर्तव्याः |
किए जाने चाहिए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| सुविस्तराः |
बहुत विस्तृत (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| आगतानाम् |
आए हुए के लिए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| सुदूरात् |
सुदूर से (पञ्चमी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| पार्थिवानाम् |
राजाओं के लिए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| पृथक् पृथक् |
अलग-अलग (अव्यय) |
वाजिवारणशालाश्च तथा शय्यागृहाणि च।
भटानां महदावासा वैदेशिकनिवासिनाम्॥
॥ 1.13.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘घोड़े और हाथियोंके लिये भी शालाएँ बनायी जायँ। साधारण लोगोंके सोनेके लिये भी घरों की व्यवस्था हो। विदेशी सैनिकों के लिये भी बड़ी बड़ी छावनियाँ बननी चाहिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वाजिवारणशालाः |
घोड़ों और हाथियों के लिए शालाएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| शय्यागृहाणि |
सोने के घर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| भटानाम् |
सैनिकों / भटों के लिए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| महत् |
बड़े (प्रथमा विभक्ति) |
| आवासाः |
निवास स्थान / छावनियाँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वैदेशिकनिवासिनाम् |
विदेशियों के रहने वालों के लिए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
आवासा बहुभक्ष्या वै सर्वकामैरुपस्थिताः।
तथा पौरजनस्यापि जनस्य बहुशोभनम्।
दातव्यमन्नं विधिवत् सत्कृत्य न तु लीलया॥
॥ 1.13.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘जो घर बनाये जायँ, उनमें खाने-पीनेकी प्रचुर सामग्री संचित रहे। उनमें सभी मनोवांछित पदार्थ सुलभ हों तथा नगरवासियों को भी बहुत सुन्दर अन्न भोजन के लिये देना चाहिये। वह भी विधिवत् सत्कारपूर्वक दिया जाय, अवहेलना करके नहीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| आवासाः |
निवास स्थान (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| बहुभक्ष्याः |
बहुत से भोज्य पदार्थों वाले (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| सर्वकामैः |
सभी इच्छित वस्तुओं से (तृतीया विभक्ति) |
| उपस्थिताः |
युक्त / सुलभ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| पौरजनस्य |
नगरवासियों को (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| जनस्य |
लोगों को (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| बहुशोभनम् |
बहुत सुन्दर / उत्तम (प्रथमा विभक्ति) |
| दातव्यम् |
देना चाहिए (दा धातु, तव्यत् प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| अन्नम् |
अन्न / भोजन (प्रथमा विभक्ति) |
| विधिवत् |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| सत्कृत्य |
सत्कार करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| तु |
किन्तु (अव्यय) |
| लीलया |
अवहेलना / खिलवाड़ से (तृतीया विभक्ति) |
सर्वे वर्णा यथा पूजां प्राप्नुवन्ति सुसत्कृताः।
न चावज्ञा प्रयोक्तव्या कामक्रोधवशादपि॥
॥ 1.13.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे सभी वर्ण के लोग भलीभाँति सत्कृत हो सम्मान प्राप्त करें। काम और क्रोध के वशीभूत होकर भी किसीका अनादर नहीं करना चाहिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वर्णाः |
वर्ण के लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यथा |
जिससे (अव्यय) |
| पूजाम् |
पूजा / सम्मान को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राप्नुवन्ति |
प्राप्त करें (प्र + आप्, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सुसत्कृताः |
भलीभाँति सत्कार किए हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अवज्ञा |
अनादर / अवज्ञा (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रयोक्तव्या |
किया जाना चाहिए (प्र + युज्, तव्यत् प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| कामक्रोधवशात् |
काम और क्रोध के वश में होकर (पञ्चमी विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
यज्ञकर्मसु ये व्यग्राः पुरुषाः शिल्पिनस्तथा।
तेषामपि विशेषेण पूजा कार्या यथाक्रमम्॥
॥ 1.13.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘जो शिल्पी मनुष्य यज्ञकर्म की आवश्यक तैयारी में लगे हों, उनका तो बड़े-छोटे का खयाल रखकर विशेषरूप से समादर करना चाहिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यज्ञकर्मसु |
यज्ञ के कार्यों में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| ये |
जो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| व्यग्राः |
लगे हुए / व्यस्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पुरुषाः |
पुरुष (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| शिल्पिनः |
शिल्पी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| तेषाम् |
उनका (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| विशेषेण |
विशेष रूप से (तृतीया विभक्ति) |
| पूजा |
पूजा / सम्मान (प्रथमा विभक्ति) |
| कार्या |
किया जाना चाहिए (प्रथमा विभक्ति, तव्यत् प्रत्ययान्त) |
| यथाक्रमम् |
बड़े-छोटे के क्रम के अनुसार (अव्यय) |
ये स्युः सम्पूजिताः सर्वे वसुभिर्भोजनेन च।
यथा सर्वं सुविहितं न किंचित् परिहीयते।
तथा भवन्तः कुर्वन्तु प्रीतियुक्तेन चेतसा॥
॥ 1.13.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘जो सेवक या कारीगर धन और भोजन आदिके द्वारा सम्मानित किये जाते हैं, वे सब परिश्रमपूर्वक कार्य करते हैं। उनका किया हुआ सारा कार्य सुन्दर ढंगसे सम्पन्न होता है। उनका कोई काम बिगड़ने नहीं पाता; अतः तुम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर ऐसा ही करो’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ये |
जो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्युः |
हों (अस् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सम्पूजिताः |
सम्मानित किए जाते हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वसुभिः |
धन के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| भोजनेन |
भोजन के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| यथा |
जिस प्रकार (अव्यय) |
| सर्वम् |
सब कुछ (प्रथमा विभक्ति) |
| सुविहितम् |
सुन्दर ढंग से व्यवस्थित / सम्पन्न होता है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| किञ्चित् |
कुछ भी (प्रथमा विभक्ति) |
| परिहीयते |
बिगड़ता / कम नहीं पड़ता (परि + हा, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तथा |
उसी प्रकार (अव्यय) |
| भवन्तः |
आप लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| कुर्वन्तु |
करें (कृ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष बहुवचन) |
| प्रीतियुक्तेन |
प्रीति / प्रसन्नता से युक्त (तृतीया विभक्ति) |
| चेतसा |
चित्त से (तृतीया विभक्ति) |
ततः सर्वे समागम्य वसिष्ठमिदमब्रुवन्।
यथेष्टं तत् सुविहितं न किंचित् परिहीयते।
यथोक्तं तत् करिष्यामो न किंचित्परिहास्यते॥
॥ 1.13.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तब वे सब लोग वसिष्ठजीसे मिलकर बोले –’आपको जैसा अभीष्ट है, उसके अनुसार ही करनेके लिये अच्छी व्यवस्था की जायगी। कोई भी काम बिगड़ने नहीं पायेगा। आपने जैसा कहा है, हमलोग वैसा ही करेंगे। उसमें कोई त्रुटि नहीं आने देंगे’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| समागम्य |
एकत्र होकर / मिलकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| वसिष्ठम् |
वसिष्ठ से (द्वितीया विभक्ति) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रुवन् |
बोले (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| यथेष्टम् |
जैसी इच्छा / अभीष्ट है (अव्यय) |
| तत् |
उसके अनुसार (प्रथमा विभक्ति) |
| सुविहितम् |
अच्छी व्यवस्था की जाएगी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| किञ्चित् |
कुछ भी (प्रथमा विभक्ति) |
| परिहीयते |
बिगड़ता / कम नहीं पड़ेगा (परि + हा, कर्मवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यथोक्तम् |
जैसा आपने कहा है (अव्यय) |
| तत् |
वैसा ही (द्वितीया विभक्ति) |
| करिष्यामः |
करेंगे (कृ धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| किञ्चित् |
कुछ भी (प्रथमा विभक्ति) |
| परिहास्यते |
त्रुटि / कमी नहीं आने देंगे (परि + हा, कर्मवाच्य, लृट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ततः सुमन्त्रमाहूय वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्।
निमन्त्रयस्व नृपतीन् पृथिव्यां ये च धार्मिकाः।
ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रांश्चैव सहस्रशः॥
॥ 1.13.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर वसिष्ठजीने सुमन्त्रको बुलाकर कहा —’इस पृथ्वीपर जो-जो धार्मिक राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सहस्रों शूद्र हैं, उन सबको इस यज्ञमें आनेके लिये निमन्त्रित करो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| सुमन्त्रम् |
सुमन्त्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| आहूय |
बुलाकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| वसिष्ठः |
वसिष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| वाक्यम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| निमन्त्रयस्व |
निमन्त्रित करो (नि + मन्त्र्, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| नृपतीन् |
राजाओं को (द्वितीया विभक्ति) |
| पृथिव्याम् |
पृथ्वी पर (सप्तमी विभक्ति) |
| ये |
जो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| धार्मिकाः |
धार्मिक हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ब्राह्मणान् |
ब्राह्मणों को (द्वितीया विभक्ति) |
| क्षत्रियान् |
क्षत्रियों को (द्वितीया विभक्ति) |
| वैश्यान् |
वैश्यों को (द्वितीया विभक्ति) |
| शूद्रान् |
शूद्रों को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| सहस्रशः |
सहस्रों (अव्यय) |
समानयस्व सत्कृत्य सर्वदेशेषु मानवान्।
मिथिलाधिपतिं शूरं जनकं सत्यवादिनम्।
तमानय महाभागं स्वयमेव सुसत्कृतम्।
पूर्वं सम्बन्धिनं ज्ञात्वा ततः पूर्वं ब्रवीमि ते॥
॥ 1.13.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘सब देशोंके अच्छे लोगोंको सत्कारपूर्वक यहाँ ले आओ। मिथिलाके स्वामी शूरवीर महाभाग जनक सत्यवादी नरेश हैं। उनको अपना पुराना सम्बन्धी जानकर तुम स्वयं ही जाकर उन्हें बड़े आदर-सत्कारके साथ यहाँ ले आओ; इसीलिये पहले तुम्हें यह बात बता देता हूँ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| समानयस्व |
ले आओ (सम् + आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| सत्कृत्य |
सत्कार करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| सर्वदेशेषु |
सभी देशों में (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| मानवान् |
मनुष्यों / लोगों को (द्वितीया विभक्ति) |
| मिथिलाधिपतिम् |
मिथिला के अधिपति को (द्वितीया विभक्ति) |
| शूरम् |
शूरवीर को (द्वितीया विभक्ति) |
| जनकम् |
जनक को (द्वितीया विभक्ति) |
| सत्यवादिनम् |
सत्यवादी को (द्वितीया विभक्ति) |
| तम् |
उनको (द्वितीया विभक्ति) |
| आनय |
लाओ (आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| महाभागम् |
महाभाग को (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वयम् |
स्वयं (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| सुसत्कृतम् |
बड़े आदर-सत्कार के साथ (द्वितीया विभक्ति/क्रियाविशेषण) |
| पूर्वम् |
पुराना (द्वितीया विभक्ति) |
| सम्बन्धिनम् |
सम्बन्धी को (द्वितीया विभक्ति) |
| ज्ञात्वा |
जानकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| ततः |
इसलिए (अव्यय) |
| पूर्वम् |
पहले (अव्यय) |
| ब्रवीमि |
बता देता हूँ (ब्रू धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| ते |
तुम्हें (चतुर्थी विभक्ति) |
तथा काशिपतिं स्निग्धं सततं प्रियवादिनम्।
सदवृत्तं देवसंकाशं स्वयमेवानयस्व ह॥
॥ 1.13.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘इसी प्रकार काशीके राजा अपने स्नेही मित्र हैं और सदा प्रिय वचन बोलने वाले हैं। वे सदाचारी तथा देवताओं के तुल्य तेजस्वी हैं; अतः उन्हें भी स्वयं ही जाकर ले आओ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
इसी प्रकार (अव्यय) |
| काशिपतिम् |
काशी के राजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| स्निग्धम् |
स्नेही मित्र को (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सततम् |
सदा (अव्यय) |
| प्रियवादिनम् |
प्रिय वचन बोलने वाले को (द्वितीया विभक्ति) |
| सदवृत्तम् |
सदाचारी को (द्वितीया विभक्ति) |
| देवसङ्काशम् |
देवताओं के समान तेजस्वी को (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वयम् |
स्वयं (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| आनयस्व |
ले आओ (आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
तथा केकयराजानं वृद्धं परमधार्मिकम्।
श्वशुरं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय॥
॥ 1.13.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘केकयदेशके बूढ़े राजा बड़े धर्मात्मा हैं, वे राजसिंह महाराज दशरथ के श्वशुर हैं; अतः उन्हें भी पुत्रसहित यहाँ ले आओ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| केकयराजानम् |
केकय देश के राजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| वृद्धम् |
बूढ़े / वृद्ध को (द्वितीया विभक्ति) |
| परमधार्मिकम् |
परम धार्मिक को (द्वितीया विभक्ति) |
| श्वशुरम् |
श्वशुर को (द्वितीया विभक्ति) |
| राजसिंहस्य |
राजसिंह (दशरथ) के (षष्ठी विभक्ति) |
| सपुत्रम् |
पुत्र सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| तम् |
उन्हें (द्वितीया विभक्ति) |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| आनय |
ले आओ (आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
अंगेश्वरं महेष्वासं रोमपादं सुसत्कृतम्।
वयस्यं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय॥
॥ 1.13.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘अंगदेशके स्वामी महाधनुर्धर राजा रोमपाद हमारे महाराज के मित्र हैं, अतः उन्हें पुत्रसहित यहाँ सत्कारपूर्वक ले आओ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अङ्गेश्वरम् |
अंग देश के ईश्वर / स्वामी को (द्वितीया विभक्ति) |
| महेष्वासम् |
महान धनुष वाले / महाधनुर्धर को (द्वितीया विभक्ति) |
| रोमपादम् |
रोमपाद को (द्वितीया विभक्ति) |
| सुसत्कृतम् |
सत्कारपूर्वक (द्वितीया विभक्ति/क्रियाविशेषण) |
| वयस्यम् |
मित्र को (द्वितीया विभक्ति) |
| राजसिंहस्य |
राजसिंह (दशरथ) के (षष्ठी विभक्ति) |
| सपुत्रम् |
पुत्र सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| तम् |
उन्हें (द्वितीया विभक्ति) |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| आनय |
ले आओ (आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
तथा कोसलराजानं भानुमन्तं सुसत्कृतम्।
मगधाधिपतिं शूरं सर्वशास्त्रविशारदम्।
प्राप्तिशं परमोदारं सत्कृतं पुरुषर्षभम्॥
॥ 1.13.26 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘कोशलराज भानुमान् को भी सत्कारपूर्वक ले आओ। मगधदेशके राजा प्राप्तिज्ञ को, जो शूरवीर, सर्वशास्त्रविशारद, परम उदार तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं, स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक बुला ले आओ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
तथा (अव्यय) |
| कोसलराजानम् |
कोशल देश के राजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| भानुमन्तम् |
भानुमान् को (द्वितीया विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| सुसत्कृतम् |
सत्कारपूर्वक (द्वितीया विभक्ति/क्रियाविशेषण) |
| मगधाधिपतिम् |
मगध देश के अधिपति को (द्वितीया विभक्ति) |
| शूरम् |
शूरवीर को (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वशास्त्रविशारदम् |
सभी शास्त्रों में विशारद / निपुण को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राप्तिशम् |
प्राप्तिज्ञ को (द्वितीया विभक्ति) |
| परमोदारम् |
परम उदार को (द्वितीया विभक्ति) |
| सत्कृतम् |
सत्कारपूर्वक (द्वितीया विभक्ति/क्रियाविशेषण) |
| पुरुषर्षभम् |
पुरुषश्रेष्ठ को (द्वितीया विभक्ति) |
राज्ञः शासनमादाय चोदयस्व नृपर्षभान्।
प्राचीनान् सिन्धुसौवीरान् सौराष्ट्रेयांश्च पार्थिवान्॥
॥ 1.13.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘महाराजकी आज्ञा लेकर तुम पूर्वदेशके श्रेष्ठ नरेशों को तथा सिन्धु-सौवीर एवं सुराष्ट्र देशके भूपालों को यहाँ आनेके लिये निमन्त्रण दो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| राज्ञः |
राजा (दशरथ) की (षष्ठी विभक्ति) |
| शासनम् |
आज्ञा को (द्वितीया विभक्ति) |
| आदाय |
लेकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| चोदयस्व |
प्रेरित करो / निमन्त्रण दो (चुद् धातु, प्रयोज्यार्थ, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| नृपर्षभान् |
नरेशों को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्राचीनान् |
पूर्व देश के (द्वितीया विभक्ति) |
| सिन्धुसौवीरान् |
सिन्धु और सौवीर देशों के राजाओं को (द्वितीया विभक्ति) |
| सौराष्ट्रेयान् |
सौराष्ट्र देश के (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| पार्थिवान् |
राजाओं को (द्वितीया विभक्ति) |
दाक्षिणात्यान् नरेन्द्रांश्च समस्तानानयस्व ह।
सन्ति स्निग्धाश्च ये चान्ये राजानः पृथिवीतले।
तानानय यथा क्षिप्रं सानुगान् सहबान्धवान्।
एतान् दूतैर्महाभागैरानयस्व नृपाज्ञया॥
॥ 1.13.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘दक्षिण भारतके समस्त नरेशोंको भी आमन्त्रित करो। इस भूतलपर और भी जो-जो नरेश महाराजके प्रति स्नेह रखते हैं, उन सबको सेवकों और सगे-सम्बन्धियों सहित यथासम्भव शीघ्र बुला लो। महाराजकी आज्ञासे बड़भागी दूतोंद्वारा इन सबके पास बुलावा भेज दो’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दाक्षिणात्यान् |
दक्षिण भारत के (द्वितीया विभक्ति) |
| नरेन्द्रान् |
राजाओं को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| समस्तान् |
समस्त को (द्वितीया विभक्ति) |
| आनयस्व |
बुला लो (आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| सन्ति |
हैं (अस् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| स्निग्धाः |
स्नेही (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| ये |
जो (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अन्ये |
अन्य (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| राजानः |
राजा (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| पृथिवीतले |
पृथ्वी पर (सप्तमी विभक्ति) |
| तान् |
उन सबको (द्वितीया विभक्ति) |
| आनय |
बुला लो (आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| यथा |
जैसे (अव्यय) |
| क्षिप्रम् |
शीघ्र (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| सानुगान् |
अनुचरों / सेवकों सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| सहबान्धवान् |
बान्धवों / सगे-सम्बन्धियों सहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| एतान् |
इन सबको (द्वितीया विभक्ति) |
| दूतैः |
दूतों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| महाभागैः |
महाभाग / बड़भागी के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| आनयस्व |
बुला लो (आ + नी, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| नृपाज्ञया |
राजा की आज्ञा से (तृतीया विभक्ति) |
वसिष्ठवाक्यं तच्छ्रुत्वा सुमन्त्रस्त्वरितं तदा।
व्यादिशत् पुरुषांस्तत्र राज्ञामानयने शुभान्॥
॥ 1.13.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
वसिष्ठका यह वचन सुनकर सुमन्त्रने तुरंत ही अच्छे पुरुषों को राजाओं की बुलाहट के लिये जाने का आदेश दे दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वसिष्ठवाक्यम् |
वसिष्ठ का वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| तत् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| सुमन्त्रः |
सुमन्त्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वरितम् |
तुरंत (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| व्यादिशत् |
आदेश दिया (वि + आ + दिश्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुरुषान् |
पुरुषों को (द्वितीया विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| राज्ञाम् |
राजाओं को (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
| आनयने |
बुलाने के लिए (सप्तमी विभक्ति) |
| शुभान् |
अच्छे / योग्य को (द्वितीया विभक्ति) |
स्वयमेव हि धर्मात्मा प्रयातो मुनिशासनात्।
सुमन्त्रस्त्वरितो भूत्वा समानेतुं महामतिः॥
॥ 1.13.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
परम बुद्धिमान् धर्मात्मा सुमन्त्र वसिष्ठ मुनिकी आज्ञा से खास-खास राजाओं को बुलाने के लिये स्वयं ही गये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| स्वयम् |
स्वयं (अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| धर्मात्मा |
धर्मात्मा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रयातः |
गए (प्र + या, क्त प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| मुनिशासनात् |
मुनि (वसिष्ठ) की आज्ञा से (पञ्चमी विभक्ति) |
| सुमन्त्रः |
सुमन्त्र (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वरितः |
शीघ्र (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| भूत्वा |
होकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| समानेतुम् |
बुलाने के लिए (सम् + आ + नी, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| महामतिः |
महान बुद्धि वाले ने (प्रथमा विभक्ति) |
ते च कर्मान्तिकाः सर्वे वसिष्ठाय महर्षये।
सर्वं निवेदयन्ति स्म यज्ञे यदुपकल्पितम्॥
॥ 1.13.32 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यज्ञकर्म की व्यवस्था के लिये जो सेवक नियुक्त किये गये थे, उन सबने आकर उस समय तक यज्ञसम्बन्धी जो-जो कार्य सम्पन्न हो गया था, उस सबकी सूचना महर्षि वसिष्ठको दी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ते |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| कर्मान्तिकाः |
कर्मान्त / यज्ञ कर्म के सेवक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वसिष्ठाय |
वसिष्ठ को (चतुर्थी विभक्ति) |
| महर्षये |
महर्षि को (चतुर्थी विभक्ति) |
| सर्वम् |
सब कुछ (द्वितीया विभक्ति) |
| निवेदयन्ति स्म |
निवेदन करते थे (नि + विद्, प्रयोज्यार्थ, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन, 'स्म' अतीतकाल सूचक अव्यय) |
| यज्ञे |
यज्ञ के लिए (सप्तमी विभक्ति) |
| यत् |
जो कुछ (प्रथमा विभक्ति) |
| उपकल्पितम् |
व्यवस्था / तैयारी की गई थी (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
ततः प्रीतो द्विजश्रेष्ठस्तान् सर्वान् मुनिरब्रवीत्।
अवज्ञया न दातव्यं कस्यचिल्लीलयापि वा।
अवज्ञया कृतं हन्याद् दातारं नात्र संशयः॥
॥ 1.13.33 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यह सुनकर वे द्विजश्रेष्ठ मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन सबसे बोले—’भद्र पुरुषो! किसीको जो कुछ देना हो; उसे अवहेलना या अनादरपूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि अनादरपूर्वक दिया हुआ दान दाता को नष्ट कर देता है— इसमें संशय नहीं है’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| प्रीतः |
प्रसन्न होकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| द्विजश्रेष्ठः |
द्विजश्रेष्ठ (वसिष्ठ) ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तान् |
उन (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वान् |
सभी से (द्वितीया विभक्ति) |
| मुनिः |
मुनि ने (प्रथमा विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अवज्ञया |
अवहेलना / अनादर से (तृतीया विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| दातव्यम् |
देना चाहिए (दा धातु, तव्यत् प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| कस्यचित् |
किसी को (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| लीलया |
खिलवाड़ / उपेक्षा से (तृतीया विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| वा |
या (अव्यय) |
| अवज्ञया |
अनादर से (तृतीया विभक्ति) |
| कृतम् |
किया हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| हन्यात् |
नष्ट कर देता है (हन् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दातारम् |
दाता को (द्वितीया विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अत्र |
इसमें (अव्यय) |
| संशयः |
संशय है (प्रथमा विभक्ति) |
ततः कैश्चिदहोरात्रैरुपयाता महीक्षितः।
बहूनि रत्नान्यादाय राज्ञो दशरथस्य ह॥
॥ 1.13.34 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद राजा लोग महाराज दशरथके लिये बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर अयोध्यामें आये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| कैश्चित् |
कुछ (तृतीया विभक्ति) |
| अहोरात्रैः |
दिनों के बाद (तृतीया विभक्ति) |
| उपयाताः |
आए (उप + या, क्त प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| महीक्षितः |
राजा लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| बहूनि |
बहुत से (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| रत्नानि |
रत्नों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| आदाय |
लेकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| राज्ञः |
राजा (दशरथ) के लिए (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| दशरथस्य |
दशरथ के लिए (षष्ठी विभक्ति, चतुर्थी के अर्थ में) |
| ह |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
ततो वसिष्ठः सुप्रीतो राजानमिदमब्रवीत्।
उपयाता नरव्याघ्र राजानस्तव शासनात्।
मयापि सत्कृताः सर्वे यथार्ह राजसत्तम॥
॥ 1.13.35 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इससे वसिष्ठजी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने राजासे कहा—’पुरुषसिंह! तुम्हारी आज्ञासे राजालोग यहाँ आ गये। नृपश्रेष्ठ! मैंने भी यथायोग्य उन सबका सत्कार किया है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
इससे (अव्यय) |
| वसिष्ठः |
वसिष्ठ ने (प्रथमा विभक्ति) |
| सुप्रीतः |
बड़ी प्रसन्नता से (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| राजानम् |
राजा से (द्वितीया विभक्ति) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रवीत् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| उपयाताः |
आ गए (उप + या, क्त प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| नरव्याघ्र |
हे पुरुषसिंह! (सम्बोधन विभक्ति) |
| राजानः |
राजा लोग (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तव |
तुम्हारी (षष्ठी विभक्ति) |
| शासनात् |
आज्ञा से (पञ्चमी विभक्ति) |
| मया |
मैंने (तृतीया विभक्ति) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| सत्कृताः |
सत्कार किया है (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सभी का (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यथार्ह |
यथायोग्य (अव्यय) |
| राजसत्तम |
हे राजश्रेष्ठ! (सम्बोधन विभक्ति) |
यज्ञियं च कृतं सर्वं पुरुषैः सुसमाहितैः।
निर्यातु च भवान् यष्टुं यज्ञायतनमन्तिकात्॥
॥ 1.13.37 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘हमारे कार्यकर्ताओं ने पूर्णतः सावधान रहकर यज्ञके लिये सारी तैयारी की है। अब तुम भी यज्ञ करनेके लिये यज्ञमण्डप के समीप चलो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| यज्ञियम् |
यज्ञ के लिए आवश्यक (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| कृतम् |
किया गया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वम् |
सब कुछ (प्रथमा विभक्ति) |
| पुरुषैः |
कार्यकर्ताओं द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| सुसमाहितैः |
पूर्ण सावधानी से (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| निर्यातु |
निकलिए / चलिए (निर् + या, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| भवान् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| यष्टुम् |
यज्ञ करने के लिए (यज् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| यज्ञायतनम् |
यज्ञमण्डप के (द्वितीया विभक्ति) |
| अन्तिकात् |
समीप (पञ्चमी विभक्ति) |
सर्वकामैरुपहृतैरुपेतं वै समन्ततः।
द्रष्टुमर्हसि राजेन्द्र मनसेव विनिर्मितम्॥
॥ 1.13.38 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
‘राजेन्द्र! यज्ञमण्डपमें सब ओर सभी वाञ्छनीय वस्तुएँ एकत्र कर दी गयी हैं। आप स्वयं चलकर देखें। यह मण्डप इतना शीघ्र तैयार किया गया है, मानो मनके संकल्पसे ही बन गया हो’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सर्वकामैः |
सभी वांछनीय वस्तुओं से (तृतीया विभक्ति) |
| उपहृतैः |
एकत्र की गई से (तृतीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| उपेतम् |
युक्त (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| समन्ततः |
सब ओर (अव्यय) |
| द्रष्टुम् |
देखने के लिए (दृश् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| अर्हसि |
योग्य हैं / चाहिए (अर्ह् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| राजेन्द्र |
हे राजेन्द्र! (सम्बोधन विभक्ति) |
| मनसा |
मन के (तृतीया विभक्ति) |
| इव |
समान (अव्यय) |
| विनिर्मितम् |
निर्मित / बनाया हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
तथा वसिष्ठवचनादृष्यशृंगस्य चोभयोः।
दिवसे शुभनक्षत्रे निर्यातो जगतीपतिः॥
॥ 1.13.39 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृंग दोनोंके आदेशसे शुभ नक्षत्रवाले दिनको राजा दशरथ यज्ञके लिये राजभवनसे निकले।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तथा |
इस प्रकार (अव्यय) |
| वसिष्ठवचनात् |
वसिष्ठ के वचन से (पञ्चमी विभक्ति) |
| ऋष्यशृङ्गस्य |
ऋष्यशृंग के (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| उभयोः |
दोनों के (षष्ठी विभक्ति, द्विवचन) |
| दिवसे |
दिन में (सप्तमी विभक्ति) |
| शुभनक्षत्रे |
शुभ नक्षत्र वाले (सप्तमी विभक्ति) |
| निर्यातः |
निकले / प्रस्थान किया (निर् + या, क्त प्रत्ययान्त, प्रथमा विभक्ति) |
| जगतीपतिः |
राजा (दशरथ) ने (प्रथमा विभक्ति) |
ततो वसिष्ठप्रमुखाः सर्व एव द्विजोत्तमाः।
ऋष्यशृंगं पुरस्कृत्य यज्ञकर्मारभंस्तदा।
यज्ञवाटं गताः सर्वे यथाशास्त्रं यथाविधि।
श्रीमांश्च सह पत्नीभी राजा दीक्षामुपाविशत्॥
॥ 1.13.40 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ द्विजोंने यज्ञमण्डपमें जाकर ऋष्यशृंगको आगे करके शास्त्रोक्त विधिके अनुसार यज्ञकर्मका आरम्भ किया। पत्नियोंसहित श्रीमान् अवधनरेशने यज्ञकी दीक्षा ली।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तत्पश्चात् (अव्यय) |
| वसिष्ठप्रमुखाः |
वसिष्ठ आदि प्रमुख (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| द्विजोत्तमाः |
श्रेष्ठ द्विज / ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋष्यशृङ्गम् |
ऋष्यशृंग को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरस्कृत्य |
आगे करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| यज्ञकर्म |
यज्ञ के कर्म का (द्वितीया विभक्ति) |
| आरभन् |
आरम्भ किया (आ + रभ्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| यज्ञवाटम् |
यज्ञमण्डप में (द्वितीया विभक्ति) |
| गताः |
गए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वे |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यथाशास्त्रम् |
शास्त्र के अनुसार (अव्यय) |
| यथाविधि |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| श्रीमान् |
श्रीमान् (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| सह |
सहित (अव्यय) |
| पत्नीभिः |
पत्नियों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| दीक्षाम् |
दीक्षा को (द्वितीया विभक्ति) |
| उपाविशत् |
ग्रहण की / बैठ गए (उप + आ + विश्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥१३॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥१३॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| त्रयोदशः |
तेरहवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥१३॥ |
॥१३॥ (सर्ग संख्या) |
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