🌿 सर्ग 10: अंगदेश में ऋष्यश्रृंग के आने तथा शान्ता के साथ विवाह होने के प्रसंग का विस्तार के साथ वर्णन
A detailed description of Rishyashringa's arrival in Angadesha and his marriage to Shanta
कुल श्लोक: 33
सुमन्त्रश्चोदितो राज्ञा प्रोवाचेदं वचस्तदा।
यथर्ण्यश्रृंगस्त्वानीतो येनोपायेन मन्त्रिभिः।
तन्मे निगदितं सर्वं शृणु मे मन्त्रिभिः सह ॥
॥ 1.10.1 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
राजाकी आज्ञा पाकर उस समय सुमन्त्रने इस प्रकार कहना आरम्भ किया-“राजन् ! रोमपादके मन्त्रियोंने ऋष्यशृंगको वहाँ जिस प्रकार और जिस उपायसे बुलाया था, वह सब मैं बता रहा हूँ। आप मन्त्रियोंसहित मेरी बात सुनिये।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| सुमन्त्रः |
सुमन्त्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| चोदितः |
प्रेरित / आज्ञा पाकर (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| राज्ञा |
राजा द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| प्रोवाच |
कहा (प्र + वच्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचः |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| यथा |
जिस प्रकार (अव्यय) |
| ऋष्यश्रृङ्गः |
ऋष्यशृंग (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| आनीतः |
बुलाया गया था (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| येन |
जिस (तृतीया विभक्ति) |
| उपायेन |
उपाय से (तृतीया विभक्ति) |
| मन्त्रिभिः |
मन्त्रियों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| तत् |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| मे |
मेरे द्वारा (षष्ठी विभक्ति, कर्तृवाच्य में) |
| निगदितम् |
कहा जा रहा है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| सर्वम् |
सम्पूर्ण (प्रथमा विभक्ति) |
| शृणु |
सुनो (श्रु धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| मे |
मेरी (षष्ठी विभक्ति) |
| मन्त्रिभिः |
मन्त्रियों के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| सह |
सहित (अव्यय) |
रोमपादमुवाचेदं सहामात्यः पुरोहितः।
उपायो निरपायोऽयमस्माभिरभिचिन्तितः॥
॥ 1.10.2 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“उस समय अमात्योसहित पुरोहितने राजा रोमपादसे कहा—’महाराज! हमलोगोंने एक उपाय सोचा है, जिसे काममें लानेसे किसी भी विघ्न-बाधाके आनेकी सम्भावना नहीं है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| रोमपादम् |
रोमपाद से (द्वितीया विभक्ति) |
| उवाच |
कहा (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| सहामात्यः |
अमात्यों / मंत्रियों सहित (प्रथमा विभक्ति) |
| पुरोहितः |
पुरोहित ने (प्रथमा विभक्ति) |
| उपायः |
उपाय (प्रथमा विभक्ति) |
| निरपायः |
बिना विघ्न-बाधा वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| अयम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्माभिः |
हम लोगों द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| अभिचिन्तितः |
सोचा गया है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
ऋष्यशृंगो वनचरस्तपःस्वाध्यायसंयुतः।
अनभिज्ञस्तु नारीणां विषयाणां सुखस्य च॥
॥ 1.10.3 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“ऋष्यशृंग मुनि सदा वनमें ही रहकर तपस्या और स्वाध्यायमें लगे रहते हैं। वे स्त्रियोंको पहचानतेतक नहीं हैं और विषयोंके सुखसे भी सर्वथा अनभिज्ञ हैं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋष्यश्रृङ्गः |
ऋष्यशृंग (प्रथमा विभक्ति) |
| वनचरः |
वन में विचरने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| तपःस्वाध्यायसंयुतः |
तपस्या और स्वाध्याय में लगा हुआ (प्रथमा विभक्ति) |
| अनभिज्ञः |
अनभिज्ञ / न जानने वाला (प्रथमा विभक्ति) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| नारीणाम् |
स्त्रियों के विषय में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| विषयाणाम् |
विषयों के विषय में (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| सुखस्य |
सुख के विषय में (षष्ठी विभक्ति) |
| च |
भी (अव्यय) |
इन्द्रियार्थैरभिमतैर्नरचित्तप्रमाथिभिः।
पुरमानाययिष्यामः क्षिप्रं चाध्यवसीयताम्॥
॥ 1.10.4 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“हम मनुष्योंके चित्तको मथ डालनेवाले मनोवाञ्छित विषयोंका प्रलोभन देकर उन्हें अपने नगरमें ले आयेंगे; अतः इसके लिये शीघ्र प्रयत्न किया जाय।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इन्द्रियार्थैः |
इन्द्रियों के विषयों से (तृतीया विभक्ति) |
| अभिमतैः |
मनोवांछित / चाहे हुए से (तृतीया विभक्ति) |
| नरचित्तप्रमाथिभिः |
मनुष्यों के चित्त को मथ डालने वालों से (तृतीया विभक्ति) |
| पुरम् |
नगर में (द्वितीया विभक्ति) |
| आनाययिष्यामः |
ले आयेंगे (आ + नी, प्रयोज्यार्थ, लृट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| क्षिप्रम् |
शीघ्र (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| च |
और (अव्यय) |
| अध्यवसीयताम् |
प्रयत्न किया जाय (अधि + अव + सो, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
गणिकास्तत्र गच्छन्तु रूपवत्यः स्वलंकृताः।
प्रलोभ्य विविधोपायैरानेष्यन्तीह सत्कृताः॥
॥ 1.10.5 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“यदि सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित मनोहर रूपवाली वेश्याएँ वहाँ जायँ तो वे भाँति-भाँतिके उपायोंसे उन्हें लुभाकर इस नगरमें ले आयेंगी; अतः इन्हें सत्कारपूर्वक भेजना चाहिये’।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गणिकाः |
वेश्याएँ / गणिकाएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| गच्छन्तु |
जाएँ (गम् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| रूपवत्यः |
सुन्दर रूप वाली (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्वलङ्कृताः |
अच्छी तरह सजी हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| प्रलोभ्य |
लुभाकर / प्रलोभन देकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| विविधोपायैः |
विविध उपायों से (तृतीया विभक्ति) |
| आनेष्यन्ति |
ले आयेंगी (आ + नी, लृट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| सत्कृताः |
सत्कारपूर्वक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन/क्रियाविशेषण) |
श्रुत्वा तथेति राजा च प्रत्युवाच पुरोहितम्।
पुरोहितो मन्त्रिणश्च तदा चक्रुश्च ते तथा॥
॥ 1.10.6 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“यह सुनकर राजाने पुरोहितको उत्तर दिया, बहुत अच्छा, आपलोग ऐसा ही करें।’ आज्ञा पाकर पुरोहित और मन्त्रियोंने उस समय वैसी ही व्यवस्था की।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| तथा |
वैसे ही (अव्यय) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| प्रत्युवाच |
उत्तर दिया (प्रति + वच्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| पुरोहितम् |
पुरोहित को (द्वितीया विभक्ति) |
| पुरोहितः |
पुरोहित ने (प्रथमा विभक्ति) |
| मन्त्रिणः |
मंत्रियों ने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
| चक्रुः |
किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| ते |
उन्होंने (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तथा |
वैसे ही (अव्यय) |
वारमुख्यास्तु तच्छ्रुत्वा वनं प्रविविशुर्महत्।
आश्रमस्याविदूरेऽस्मिन् यत्नं कुर्वन्ति दर्शने॥
॥ 1.10.7 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“तब नगरकी मुख्य-मुख्य वेश्याएँ राजाका आदेश सुनकर उस महान् वनमें गयीं और मुनिके आश्रमसे थोड़ी ही दूरपर ठहरकर उनके दर्शनका उद्योग करने लगीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वारमुख्याः |
मुख्य वेश्याएँ / गणिकाएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| तत् |
वह (आदेश) (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| वनम् |
वन में (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रविविशुः |
प्रवेश किया (प्र + विश्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| महत् |
महान् (द्वितीया विभक्ति) |
| आश्रमस्य |
आश्रम से (षष्ठी विभक्ति) |
| अविदूरे |
दूर नहीं (सप्तमी विभक्ति) |
| अस्मिन् |
इस (सप्तमी विभक्ति) |
| यत्नम् |
प्रयत्न / उद्योग को (द्वितीया विभक्ति) |
| कुर्वन्ति |
करने लगीं (कृ धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| दर्शने |
दर्शन के लिए (सप्तमी विभक्ति) |
ऋषेः पुत्रस्य धीरस्य नित्यमाश्रमवासिनः।
पितुः स नित्यसंतुष्टो नातिचक्राम चाश्रमात्॥
॥ 1.10.8 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“मुनिकुमार ऋष्यशृंग बड़े ही धीर स्वभावके थे। सदा आश्रममें ही रहा करते थे। उन्हें सर्वदा अपने पिताके पास रहनेमें ही अधिक सुख मिलता था। अतः वे कभी आश्रमके बाहर नहीं निकलते थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋषेः |
ऋषि (विभाण्डक) के (षष्ठी विभक्ति) |
| पुत्रस्य |
पुत्र का (षष्ठी विभक्ति) |
| धीरस्य |
धीर / स्थिर स्वभाव वाले का (षष्ठी विभक्ति) |
| नित्यम् |
सदा (अव्यय) |
| आश्रमवासिनः |
आश्रम में रहने वाले का (षष्ठी विभक्ति) |
| पितुः |
पिता के (षष्ठी विभक्ति, सप्तमी के अर्थ में) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| नित्यसन्तुष्टः |
सदा सन्तुष्ट रहने वाले (प्रथमा विभक्ति) |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| अतिचक्राम |
बाहर निकले (अति + क्रम्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| आश्रमात् |
आश्रम से (पञ्चमी विभक्ति) |
न तेन जन्मप्रभृति दृष्टपूर्वं तपस्विना।
स्त्री वा पुमान् वा यच्चान्यत् सत्त्वं नगरराष्ट्रजम्॥
॥ 1.10.9 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“उन तपस्वी ऋषिकुमारने जन्मसे लेकर उस समयतक पहले कभी न तो कोई स्त्री देखी थी और न पिताके सिवा दूसरे किसी पुरुषका ही दर्शन किया था। नगर या राष्ट्रके गाँवोंमें उत्पन्न हुए दूसरे-दूसरे प्राणियोंको भी वे नहीं देख पाये थे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| न |
नहीं (अव्यय) |
| तेन |
उसके द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| जन्मप्रभृति |
जन्म से लेकर (अव्यय) |
| दृष्टपूर्वम् |
पहले कभी देखा हुआ (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| तपस्विना |
तपस्वी द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| स्त्री |
स्त्री (प्रथमा विभक्ति) |
| वा |
या (अव्यय) |
| पुमान् |
पुरुष (प्रथमा विभक्ति) |
| वा |
या (अव्यय) |
| यत् |
जो (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| अन्यत् |
अन्य (प्रथमा विभक्ति) |
| सत्त्वम् |
प्राणी (प्रथमा विभक्ति) |
| नगरराष्ट्रजम् |
नगर या राष्ट्र में उत्पन्न (प्रथमा विभक्ति) |
ततः कदाचित् तं देशमाजगाम यदृच्छया।
विभाण्डकसुतस्तत्र ताश्चापश्यद् वरांगनाः॥
॥ 1.10.10 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“तदनन्तर एक दिन विभाण्डककुमार ऋष्यशृंग अकस्मात् घूमते-फिरते उस स्थानपर चले आये, जहाँ वे वेश्याएँ ठहरी हुई थीं। वहाँ उन्होंने उन सुन्दरी वनिताओंको देखा।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| कदाचित् |
एक दिन (अव्यय) |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| देशम् |
स्थान / देश में (द्वितीया विभक्ति) |
| आजगाम |
आ गया (आ + गम्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| यदृच्छया |
अकस्मात् / संयोगवश (तृतीया विभक्ति) |
| विभाण्डकसुतः |
विभाण्डक के पुत्र (ऋष्यशृंग) ने (प्रथमा विभक्ति) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| ताः |
उन (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| अपश्यत् |
देखा (दृश् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वराङ्गनाः |
उत्तम स्त्रियों / सुन्दरी वनिताओं को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
ताश्चित्रवेषाः प्रमदा गायन्त्यो मधुरस्वरम्।
ऋषिपुत्रमुपागम्य सर्वा वचनमब्रुवन्॥
॥ 1.10.11 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“उन प्रमदाओंका वेष बड़ा ही सुन्दर और अद्भुत था। वे मीठे स्वरमें गा रही थीं। ऋषिकुमारको आया देख सभी उनके पास चली आयीं और इस प्रकार पूछने लगीं-
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| चित्रवेषाः |
विचित्र / सुन्दर वेष वाली (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रमदाः |
प्रमदाएँ / सुन्दर स्त्रियाँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| गायन्त्यः |
गाती हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, शतृ प्रत्ययान्त) |
| मधुरस्वरम् |
मधुर स्वर में (क्रियाविशेषण) |
| ऋषिपुत्रम् |
ऋषि के पुत्र के पास (द्वितीया विभक्ति) |
| उपागम्य |
आकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| सर्वाः |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वचनम् |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| अब्रुवन् |
बोलीं (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
कस्त्वं किं वर्तसे ब्रह्मन् ज्ञातुमिच्छामहे वयम्।
एकस्त्वं विजने दूरे वने चरसि शंस नः॥
॥ 1.10.12 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“ब्रह्मन् ! आप कौन हैं? क्या करते हैं? तथा इस निर्जन वनमें आश्रमसे इतनी दूर आकर अकेले क्यों विचर रहे हैं? यह हमें बताइये। हमलोग इस बातको जानना चाहती हैं’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| कः |
कौन (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| किम् |
क्या (द्वितीया विभक्ति) |
| वर्तसे |
करते हैं / रहते हैं (वृत् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| ब्रह्मन् |
हे ब्राह्मण / ब्रह्मन्! (सम्बोधन विभक्ति) |
| ज्ञातुम् |
जानना (ज्ञा धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| इच्छामहे |
चाहती हैं (इष् धातु, लट् लकार, उत्तम पुरुष बहुवचन) |
| वयम् |
हम (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| एकः |
अकेले (प्रथमा विभक्ति) |
| त्वम् |
आप (प्रथमा विभक्ति) |
| विजने |
निर्जन (सप्तमी विभक्ति) |
| दूरे |
दूर (सप्तमी विभक्ति) |
| वने |
वन में (सप्तमी विभक्ति) |
| चरसि |
विचर रहे हैं (चर् धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| शंस |
बताइये (शंस् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| नः |
हमें (अस्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
अदृष्टरूपास्तास्तेन काम्यरूपा वने स्त्रियः।
हार्दी तस्य मतिर्जाता आख्यातुं पितरं स्वकम्॥
॥ 1.10.13 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“ऋष्यशृंगने वनमें कभी स्त्रियोंका रूप नहीं देखा था और वे स्त्रियाँ तो अत्यन्त कमनीय रूपसे सुशोभित थीं; अतः उन्हें देखकर उनके मनमें स्नेह उत्पन्न हो गया। इसलिये उन्होंने उनसे अपने पिताका परिचय देनेका विचार किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अदृष्टरूपाः |
पहले कभी न देखे हुए रूप वाली (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तेन |
उसके द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| काम्यरूपाः |
मनोहर / कमनीय रूप वाली (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| वने |
वन में (सप्तमी विभक्ति) |
| स्त्रियः |
स्त्रियाँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| हार्दी |
हार्दिक / हृदय में (प्रथमा विभक्ति) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| मतिः |
बुद्धि / विचार (प्रथमा विभक्ति) |
| जाता |
हुई (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| आख्यातुम् |
बताने के लिए (आ + ख्या, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| पितरम् |
पिता को (द्वितीया विभक्ति) |
| स्वकम् |
अपने (द्वितीया विभक्ति) |
पिता विभाण्डकोऽस्माकं तस्याहं सुत औरसः।
ऋष्यशृंग इति ख्यातं नाम कर्म च मे भुवि॥
॥ 1.10.14 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“वे बोले—’मेरे पिताका नाम विभाण्डक मुनि है। मैं उनका औरस पुत्र हूँ। मेरा ऋष्यशृंग नाम और तपस्या आदि कर्म इस भूमण्डलमें प्रसिद्ध है।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| पिता |
पिता (प्रथमा विभक्ति) |
| विभाण्डकः |
विभाण्डक (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्माकम् |
मेरे (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| अहम् |
मैं (प्रथमा विभक्ति) |
| सुतः |
पुत्र (प्रथमा विभक्ति) |
| औरसः |
औरस / उत्पन्न (प्रथमा विभक्ति) |
| ऋष्यश्रृङ्गः |
ऋष्यशृंग (प्रथमा विभक्ति) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| ख्यातम् |
प्रसिद्ध है (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| नाम |
नाम (प्रथमा विभक्ति) |
| कर्म |
कर्म (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| मे |
मेरा (षष्ठी विभक्ति) |
| भुवि |
पृथ्वी पर (सप्तमी विभक्ति) |
इहाश्रमपदोऽस्माकं समीपे शुभदर्शनाः।
करिष्ये वोऽत्र पूजां वै सर्वेषां विधिपूर्वकम्॥
॥ 1.10.15 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“यहाँ पास ही मेरा आश्रम है। आपलोग देखनेमें परम सुन्दर हैं। (अथवा आपका दर्शन मेरे लिये शुभकारक है।) आप मेरे आश्रमपर चलें। वहाँ मैं आप सब लोगोंकी विधिपूर्वक पूजा करूँगा’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इह |
यहाँ (अव्यय) |
| आश्रमपदः |
आश्रम (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्माकम् |
मेरा (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| समीपे |
पास में (सप्तमी विभक्ति) |
| शुभदर्शनाः |
शुभ दर्शन वाली / देखने में सुन्दर (सम्बोधन विभक्ति, बहुवचन) |
| करिष्ये |
करूँगा (कृ धातु, लृट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन) |
| वः |
आप सब की (युष्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अत्र |
यहाँ (अव्यय) |
| पूजाम् |
पूजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| सर्वेषाम् |
सब की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| विधिपूर्वकम् |
विधि के अनुसार (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
ऋषिपुत्रवचः श्रुत्वा सर्वासां मतिरास वै।
तदाश्रमपदं द्रष्टुं जग्मुः सर्वास्ततोऽङ्गनाः॥
॥ 1.10.16 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“ऋषिकुमारकी यह बात सुनकर सब उनसे सहमत हो गयीं। फिर वे सब सुन्दरी स्त्रियाँ उनका आश्रम देखनेके लिये वहाँ गयीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ऋषिपुत्रवचः |
ऋषि पुत्र का वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| सर्वासाम् |
सब की (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| मतिः |
मत / सहमति (प्रथमा विभक्ति) |
| आस |
हुई (अस् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| वै |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| तत् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| आश्रमपदम् |
आश्रम को (द्वितीया विभक्ति) |
| द्रष्टुम् |
देखने के लिए (दृश् धातु, तुमुन् प्रत्ययान्त अव्यय) |
| जग्मुः |
गईं (गम् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| सर्वाः |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| अङ्गनाः |
अंगनाएँ / स्त्रियाँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
गतानां तु ततः पूजामृषिपुत्रश्चकार ह।
इदमर्ध्यमिदं पाद्यमिदं मूलं फलं च नः॥
॥ 1.10.17 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“वहाँ जानेपर ऋषिकुमारने ‘यह अर्घ्य है, यह पाद्य है तथा यह भोजनके लिये फल-मूल प्रस्तुत है’ ऐसा कहते हुए उन सबका विधिवत् पूजन किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गतानाम् |
जाने पर / गई हुई के (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| पूजाम् |
पूजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| ऋषिपुत्रः |
ऋषि पुत्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| चकार |
किया (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ह |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| इदम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| अर्घ्यम् |
अर्घ्य है (प्रथमा विभक्ति) |
| इदम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| पाद्यम् |
पाद्य है (प्रथमा विभक्ति) |
| इदम् |
यह (प्रथमा विभक्ति) |
| मूलम् |
मूल है (प्रथमा विभक्ति) |
| फलम् |
फल है (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| नः |
हमारे लिए (अस्मद्, षष्ठी विभक्ति, बहुवचन, चतुर्थी के अर्थ में) |
प्रतिगृह्य तु तां पूजां सर्वा एव समुत्सुकाः।
ऋषेर्भीताश्च शीघ्रं तु गमनाय मतिं दधुः॥
॥ 1.10.18 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“ऋषिकी पूजा स्वीकार करके वे सभी वहाँसे चली जानेको उत्सुक हुईं। उन्हें विभाण्डक मुनिका भय लग रहा था, इसलिये उन्होंने शीघ्र ही वहाँसे चली जानेका विचार किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| प्रतिगृह्य |
स्वीकार करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| ताम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| पूजाम् |
पूजा को (द्वितीया विभक्ति) |
| सर्वाः |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| समुत्सुकाः |
उत्सुक / जाने को इच्छुक (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ऋषेः |
ऋषि (विभाण्डक) से (पञ्चमी विभक्ति) |
| भीताः |
भयभीत (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| च |
और (अव्यय) |
| शीघ्रम् |
शीघ्र (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| गमनाय |
जाने के लिए (चतुर्थी विभक्ति) |
| मतिम् |
विचार / निश्चय को (द्वितीया विभक्ति) |
| दधुः |
किया (धा धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
अस्माकमपि मुख्यानि फलानीमानि हे द्विज।
गृहाण विप्र भद्रं ते भक्षयस्व च मा चिरम्॥
॥ 1.10.19 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“वे बोलीं—’ब्रह्मन् ! हमारे पास भी ये उत्तम-उत्तम फल हैं। विप्रवर! इन्हें ग्रहण कीजिये। आपका कल्याण हो। इन फलोंको शीघ्र ही खा लीजिये, विलम्ब न कीजिये’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अस्माकम् |
हमारे पास (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| मुख्यानि |
उत्तम / मुख्य (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| फलानि |
फल (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| इमानि |
ये (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| हे |
हे (सम्बोधन अव्यय) |
| द्विज |
द्विज / ब्राह्मण! (सम्बोधन विभक्ति) |
| गृहाण |
ग्रहण कीजिये (ग्रह् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| विप्र |
हे विप्रवर! (सम्बोधन विभक्ति) |
| भद्रम् |
कल्याण (प्रथमा विभक्ति) |
| ते |
आपका (षष्ठी विभक्ति) |
| भक्षयस्व |
खाइये (भक्ष् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| मा |
मत (निषेधार्थक अव्यय) |
| चिरम् |
विलम्ब (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
ततस्तास्तं समालिङ्ग्य सर्वा हर्षसमन्विताः।
मोदकान् प्रददुस्तस्मै भक्ष्यांश्च विविधाञ्छुभान्॥
॥ 1.10.20 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“ऐसा कहकर उन सबने हर्षमें भरकर ऋषिका आलिंगन किया और उन्हें खानेयोग्य भाँति-भाँतिके उत्तम पदार्थ तथा बहुत-सी मिठाइयाँ दीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तम् |
उस (ऋषि) को (द्वितीया विभक्ति) |
| समालिङ्ग्य |
आलिंगन करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| सर्वाः |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| हर्षसमन्विताः |
हर्ष से युक्त (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| मोदकान् |
मोदक / मिठाइयाँ (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| प्रददुः |
दीं (प्र + दा, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तस्मै |
उसे (चतुर्थी विभक्ति) |
| भक्ष्यान् |
भोज्य पदार्थों को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| विविधान् |
विविध प्रकार के (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| शुभान् |
उत्तम / शुभ (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
तानि चास्वाद्य तेजस्वी फलानीति स्म मन्यते।
अनास्वादितपूर्वाणि वने नित्यनिवासिनाम्॥
॥ 1.10.21 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“उनका रसास्वादन करके उन तेजस्वी ऋषिने समझा कि ये भी फल हैं; क्योंकि उस दिनके पहले उन्होंने कभी वैसे पदार्थ नहीं खाये थे। भला, सदा वनमें रहनेवालोंके लिये वैसी वस्तुओंके स्वाद लेनेका अवसर ही कहाँ है ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तानि |
उन (पदार्थों) को (द्वितीया विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| आस्वाद्य |
स्वाद लेकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| तेजस्वी |
तेजस्वी ने (प्रथमा विभक्ति) |
| फलानि |
फल हैं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| स्म |
ही (अतीतकाल सूचक अव्यय) |
| मन्यते |
समझा (मन् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| अनास्वादितपूर्वाणि |
पहले कभी स्वाद न लिए हुए (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| वने |
वन में (सप्तमी विभक्ति) |
| नित्यनिवासिनाम् |
सदा रहने वालों के लिए (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
आपृच्छ्य च तदा विप्रं व्रतचर्यां निवेद्य च।
गच्छन्ति स्मापदेशात्ता भीतास्तस्य पितुः स्त्रियः॥
॥ 1.10.22 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“तत्पश्चात् उनके पिता विभाण्डक मुनि के डरसे डरी हुई वे स्त्रियाँ व्रत और अनुष्ठान की बात बता उन ब्राह्मणकुमार से पूछकर उसी बहाने वहाँ से चली गयी।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| आपृच्छ्य |
पूछकर / आज्ञा लेकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| तदा |
तब (अव्यय) |
| विप्रम् |
ब्राह्मण (ऋष्यशृंग) से (द्वितीया विभक्ति) |
| व्रतचर्याम् |
व्रत और अनुष्ठान की बात को (द्वितीया विभक्ति) |
| निवेद्य |
बता / निवेदन करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| गच्छन्ति |
गईं (गम् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| स्म |
ही (अतीतकाल सूचक अव्यय) |
| अपदेशात् |
बहाने से (पञ्चमी विभक्ति) |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| भीताः |
डरी हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| तस्य |
उसके (षष्ठी विभक्ति) |
| पितुः |
पिता से (पञ्चमी विभक्ति) |
| स्त्रियः |
स्त्रियाँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
गतासु तासु सर्वासु काश्यपस्यात्मजो द्विजः।
अस्वस्थहृदयश्चासीद् दुःखाच्च परिवर्तते॥
॥ 1.10.23 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“उन सबके चले जानेपर काश्यपकुमार ब्राह्मण ऋष्यशृंग मन-ही-मन व्याकुल हो उठे और बड़े दुःखसे इधर-उधर टहलने लगे।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| गतासु |
चले जाने पर (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| तासु |
उन (स्त्रियों) के (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वासु |
सबके (सप्तमी विभक्ति, बहुवचन) |
| काश्यपस्य |
काश्यप के (षष्ठी विभक्ति) |
| आत्मजः |
पुत्र (प्रथमा विभक्ति) |
| द्विजः |
ब्राह्मण (प्रथमा विभक्ति) |
| अस्वस्थहृदयः |
अस्थिर हृदय / व्याकुल (प्रथमा विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| आसीत् |
हुआ (अस् धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| दुःखात् |
दुःख से (पञ्चमी विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| परिवर्तते |
इधर-उधर घूमने लगा (परि + वृत्, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
ततोऽपरेधुस्तं देशमाजगाम स वीर्यवान्।
विभाण्डकसुतः श्रीमान् मनसाचिन्तयन्मुहुः।
मनोज्ञा यत्र ता दृष्टा वारमुख्याः स्वलंकृताः॥
॥ 1.10.24 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“तदनन्तर दूसरे दिन फिर मनसे उन्हींका बारम्बार चिन्तन करते हुए शक्तिशाली विभाण्डककुमार श्रीमान् ऋष्यशृंग उसी स्थान पर गये, जहाँ पहले दिन उन्होंने वस्त्र और आभूषणोंसे सजी हुई उन मनोहर रूपवाली वेश्याओं को देखा था।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| ततः |
तदनन्तर (अव्यय) |
| अपरेधुः |
दूसरे दिन (अव्यय) |
| तम् |
उस (द्वितीया विभक्ति) |
| देशम् |
स्थान पर (द्वितीया विभक्ति) |
| आजगाम |
आ गया (आ + गम्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| वीर्यवान् |
वीर्यवान् / शक्तिशाली (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| विभाण्डकसुतः |
विभाण्डक के पुत्र ने (प्रथमा विभक्ति) |
| श्रीमान् |
श्रीमान् ने (प्रथमा विभक्ति, वतुप् प्रत्ययान्त) |
| मनसा |
मन से (तृतीया विभक्ति) |
| अचिन्तयन् |
चिन्तन करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| मुहुः |
बारम्बार (अव्यय) |
| मनोज्ञाः |
मनोहर / सुन्दर (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| यत्र |
जहाँ (अव्यय) |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| दृष्टाः |
देखी गई थीं (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
| वारमुख्याः |
मुख्य वेश्याएँ / गणिकाएँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्वलङ्कृताः |
अच्छी तरह सजी हुई (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन, क्त प्रत्ययान्त) |
दृष्ट्वैव च ततो विप्रमायान्तं हृष्टमानसाः।
उपसृत्य ततः सर्वास्तास्तमूचुरिदं वचः।
एह्याश्रमपदं सौम्य अस्माकमिति चाब्रुवन्॥
॥ 1.10.25 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“ब्राह्मण ऋष्यशृंग को आते देख तुरंत ही उन वेश्याओं का हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सब-की सब उनके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहने लगी —’सौम्य! आओ, आज हमारे आश्रम पर चलो।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| दृष्ट्वा |
देखकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| विप्रम् |
ब्राह्मण को (द्वितीया विभक्ति) |
| आयान्तम् |
आते हुए (शतृ प्रत्ययान्त, द्वितीया विभक्ति) |
| हृष्टमानसाः |
प्रसन्न मन वाली (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| उपसृत्य |
पास जाकर (ल्यबन्त अव्यय) |
| ततः |
तब (अव्यय) |
| सर्वाः |
सभी (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| ताः |
वे (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| तम् |
उससे (द्वितीया विभक्ति) |
| ऊचुः |
बोलीं (वच् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| इदम् |
यह (द्वितीया विभक्ति) |
| वचः |
वचन (द्वितीया विभक्ति) |
| एहि |
आओ (आ + इ, लोट् लकार, मध्यम पुरुष एकवचन) |
| आश्रमपदम् |
आश्रम में (द्वितीया विभक्ति) |
| सौम्य |
हे सौम्य / सज्जन! (सम्बोधन विभक्ति) |
| अस्माकम् |
हमारे (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| अब्रुवन् |
कहा (ब्रू धातु, लङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
चित्राण्यत्र बहूनि स्युर्मूलानि च फलानि च।
तत्राप्येष विशेषेण विधिर्हि भविता ध्रुवम्॥
॥ 1.10.27 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
यद्यपि यहाँ नाना प्रकारके फल-मूल बहुत मिलते हैं तथापि वहाँ भी निश्चय ही इन सबका विशेषरूपसे प्रबन्ध हो सकता है’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| चित्राणि |
नाना प्रकार के / विचित्र (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| अत्र |
यहाँ (अव्यय) |
| बहूनि |
बहुत से (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| स्युः |
हैं / होते हैं (अस् धातु, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| मूलानि |
मूल (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| फलानि |
फल (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
| च |
और (अव्यय) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| अपि |
भी (अव्यय) |
| एषः |
इन (फल-मूल) का (प्रथमा विभक्ति) |
| विशेषेण |
विशेष रूप से (तृतीया विभक्ति) |
| विधिः |
प्रबन्ध / व्यवस्था (प्रथमा विभक्ति) |
| हि |
ही (निश्चयार्थक अव्यय) |
| भविता |
हो सकता है (भू धातु, लुट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| ध्रुवम् |
निश्चय ही (अव्यय/क्रियाविशेषण) |
श्रुत्वा तु वचनं तासां सर्वासां हृदयंगमम्।
गमनाय मतिं चक्रे तं च निन्युस्तथा स्त्रियः॥
॥ 1.10.28 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“उन सबके मनोहर वचन सुनकर ऋष्यशृंग उनके साथ जानेको तैयार हो गये और वे स्त्रियाँ उन्हें अंगदेशमें ले गयीं।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| श्रुत्वा |
सुनकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| वचनम् |
वचन को (द्वितीया विभक्ति) |
| तासाम् |
उन (स्त्रियों) का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| सर्वासाम् |
सब का (षष्ठी विभक्ति, बहुवचन) |
| हृदयङ्गमम् |
हृदय को लगने वाला / मनोहर (द्वितीया विभक्ति) |
| गमनाय |
जाने के लिए (चतुर्थी विभक्ति) |
| मतिम् |
निश्चय / तैयारी को (द्वितीया विभक्ति) |
| चक्रे |
की (कृ धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तम् |
उसे (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| निन्युः |
ले गईं (नी धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन) |
| तथा |
उसी प्रकार (अव्यय) |
| स्त्रियः |
स्त्रियाँ (प्रथमा विभक्ति, बहुवचन) |
तत्र चानीयमाने तु विप्रे तस्मिन् महात्मनि।
ववर्ष सहसा देवो जगत् प्रह्लादयंस्तदा ॥
॥ 1.10.29 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“उन महात्मा ब्राह्मणके अंगदेशमें आते ही इन्द्रने सम्पूर्ण जगत् को प्रसन्न करते हुए सहसा पानी बरसाना आरम्भ कर दिया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| तत्र |
वहाँ (अंगदेश में) (अव्यय) |
| च |
और (अव्यय) |
| आनीयमाने |
लाये जाने पर (सप्तमी विभक्ति, शानच् प्रत्ययान्त, सति सप्तमी) |
| तु |
तो (अव्यय) |
| विप्रे |
ब्राह्मण के (सप्तमी विभक्ति) |
| तस्मिन् |
उस (सप्तमी विभक्ति) |
| महात्मनि |
महात्मा के (सप्तमी विभक्ति) |
| ववर्ष |
वर्षा की (वृष् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सहसा |
सहसा / तुरन्त (तृतीया विभक्ति का अव्यय) |
| देवः |
देव (इन्द्र) ने (प्रथमा विभक्ति) |
| जगत् |
जगत् को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रह्लादयन् |
प्रसन्न करते हुए (प्रथमा विभक्ति, शतृ प्रत्ययान्त) |
| तदा |
उस समय (अव्यय) |
वर्षेणैवागतं विप्रं तापसं स नराधिपः।
प्रत्युद्गम्य मुनिं प्रह्वः शिरसा च महीं गतः॥
॥ 1.10.30 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“वर्षासे ही राजाको अनुमान हो गया कि वे तपस्वी ब्राह्मणकुमार आ गये। फिर बड़ी विनयके साथ राजाने उनकी अगवानी की और पृथ्वीपर मस्तक टेककर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| वर्षेण |
वर्षा के द्वारा (तृतीया विभक्ति) |
| एव |
ही (अव्यय) |
| आगतम् |
आ गया (द्वितीया विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| विप्रम् |
ब्राह्मण को (द्वितीया विभक्ति) |
| तापसम् |
तपस्वी को (द्वितीया विभक्ति) |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
| नराधिपः |
राजा (रोमपाद) ने (प्रथमा विभक्ति) |
| प्रत्युद्गम्य |
आगे बढ़कर / अगवानी करके (ल्यबन्त अव्यय) |
| मुनिम् |
मुनि को (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रह्वः |
विनय से झुककर (प्रथमा विभक्ति) |
| शिरसा |
सिर से (तृतीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| महीम् |
पृथ्वी को (द्वितीया विभक्ति) |
| गतः |
प्राप्त हुआ / टेका (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
अर्घ्यं च प्रददौ तस्मै न्यायतः सुसमाहितः।
वरं प्रसादं विप्रेन्द्रान्मा विप्रं मन्युराविशेत्॥
॥ 1.10.31 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“फिर एकाग्रचित्त होकर उन्होंने ऋषिको अर्घ्य निवेदन किया तथा उन विप्रशिरोमणिसे वरदान माँगा, ‘भगवन् ! आप और आपके पिताजीका कृपाप्रसाद मुझे प्राप्त हो।’ ऐसा उन्होंने इसलिये किया कि कहीं कपटपूर्वक यहाँतक लाये जानेका रहस्य जान लेनेपर विप्रवर ऋष्यशृंग अथवा विभाण्डक मुनिके मनमें मेरे प्रति क्रोध न हो ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अर्घ्यम् |
अर्घ्य को (द्वितीया विभक्ति) |
| च |
और (अव्यय) |
| प्रददौ |
दिया (प्र + दा, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तस्मै |
उसे (चतुर्थी विभक्ति) |
| न्यायतः |
न्याय / विधि के अनुसार (अव्यय) |
| सुसमाहितः |
एकाग्रचित्त होकर (प्रथमा विभक्ति) |
| वरम् |
वरदान (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रसादम् |
प्रसाद / कृपा (द्वितीया विभक्ति) |
| विप्रेन्द्रात् |
विप्रश्रेष्ठ से (पञ्चमी विभक्ति) |
| मा |
नहीं (निषेधार्थक अव्यय) |
| विप्रम् |
विप्र (ऋष्यशृंग) को (द्वितीया विभक्ति) |
| मन्युः |
क्रोध (प्रथमा विभक्ति) |
| आविशेत् |
प्राप्त हो (आ + विश्, विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
अन्तःपुरं प्रवेश्यास्मै कन्यां दत्त्वा यथाविधि।
शान्तां शान्तेन मनसा राजा हर्षमवाप सः॥
॥ 1.10.32 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“तत्पश्चात् ऋष्यशृंगको अन्तःपुरमें ले जाकर उन्होंने शान्तचित्तसे अपनी कन्या शान्ताका उनके साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया। ऐसा करके राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| अन्तःपुरम् |
अन्तःपुर में (द्वितीया विभक्ति) |
| प्रवेश्य |
प्रवेश कराकर (ल्यबन्त अव्यय, प्रयोज्यार्थ) |
| अस्मै |
उसे (ऋष्यशृंग को) (चतुर्थी विभक्ति) |
| कन्याम् |
कन्या को (द्वितीया विभक्ति) |
| दत्त्वा |
देकर (क्त्वान्त अव्यय) |
| यथाविधि |
विधि के अनुसार (अव्यय) |
| शान्ताम् |
शान्ता को (द्वितीया विभक्ति) |
| शान्तेन |
शान्त (तृतीया विभक्ति) |
| मनसा |
मन से (तृतीया विभक्ति) |
| राजा |
राजा ने (प्रथमा विभक्ति) |
| हर्षम् |
हर्ष / प्रसन्नता को (द्वितीया विभक्ति) |
| अवाप |
प्राप्त हुआ (अव + आप्, लिट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| सः |
वह (प्रथमा विभक्ति) |
एवं स न्यवसत् तत्र सर्वकामैः सुपूजितः।
ऋष्यश्रृंगो महातेजाः शान्तया सह भार्यया॥
॥ 1.10.33 ॥
📖 हिंदी अनुवाद:
“इस प्रकार महातेजस्वी ऋष्यशृंग राजा से पूजित हो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोग प्राप्त कर अपनी धर्मपत्नी शान्ता के साथ वहाँ रहने लगे’ ।
शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| एवम् |
इस प्रकार (अव्यय) |
| सः |
वे (प्रथमा विभक्ति) |
| न्यवसत् |
रहने लगे (नि + वस्, लङ् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन) |
| तत्र |
वहाँ (अव्यय) |
| सर्वकामैः |
समस्त कामनाओं से (तृतीया विभक्ति) |
| सुपूजितः |
अच्छी तरह पूजित / सेवित (प्रथमा विभक्ति, क्त प्रत्ययान्त) |
| ऋष्यश्रृङ्गः |
ऋष्यशृंग (प्रथमा विभक्ति) |
| महातेजाः |
महातेजस्वी (प्रथमा विभक्ति) |
| शान्तया |
शान्ता के साथ (तृतीया विभक्ति) |
| सह |
सहित (अव्यय) |
| भार्यया |
पत्नी के साथ (तृतीया विभक्ति) |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे दशमः सर्गः॥१०॥
📖 हिंदी अनुवाद:
इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के बालकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १० ॥
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत शब्द |
हिंदी अर्थ |
| इति |
इस प्रकार (अव्यय, समाप्ति सूचक) |
| आर्षे |
ऋषि प्रोक्त में (सप्तमी विभक्ति) |
| श्रीमद्रामायणे |
श्रीरामायण में (सप्तमी विभक्ति) |
| वाल्मीकीये |
वाल्मीकि द्वारा रचित में (सप्तमी विभक्ति) |
| आदिकाव्ये |
आदिकाव्य में (सप्तमी विभक्ति) |
| बालकाण्डे |
बालकाण्ड में (सप्तमी विभक्ति) |
| दशमः |
दसवाँ (प्रथमा विभक्ति) |
| सर्गः |
सर्ग (प्रथमा विभक्ति) |
| ॥१०॥ |
॥१०॥ (सर्ग संख्या) |
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